भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 546

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

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सन्त-महात्माओंने ऐसा किया—इस तरह संकेत करनेसे उन सन्तोंका दूसरा दर्जा हो गया, (३) सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—ऐसा कहनेसे सन्तोंका तीसरा दर्जा हो गया, (४) ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—इस तरहका विधान करनेसे उन सन्तोंका चौथा दर्जा हो गया, (५) तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो—ऐसा कहना उन सन्तोंके पाँचवें दर्जेकी बात हो गयी, (६) शाप और वरदान देना उन सन्तोंके छठे दर्जेकी बात हो गयी। इन सब दर्जोंमें सन्त-महापुरुषोंका जो नीचे उतरना है, उसमें उनकी क्रमशः अधिकाधिक दयालुता है। वे शाप और वरदान दे दें, ताड़ना कर दें, इसमें उन सन्तोंका दर्जा तो नीचे हुआ, पर इसमें उनका अत्यधिक त्याग है। कारण कि उन्होंने जीवोंके

उद्धारके लिये ही नीचा दर्जा स्वीकार कर लिया है। इसमें उनका लेशामात्र भी अपना स्वार्थ नहीं है।

ऐसे ही भगवान् भी अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, यह उनके ऊँचे दर्जेकी बात है; परन्तु वे ही भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण, कृपाके परवश होकर जीवोंका उद्धार करनेके लिये अवतार लेकर आदर्श लीला करते हैं। उनकी लीलाओंको देखने-सुननेसे लोगोंका उद्धार होता है। भगवान् और भी नीचे उतरते हैं तो उपदेश देते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो आज्ञा दे देते हैं। और भी नीचे उतरते हैं तो शासन करके लोगोंको सही रास्तेपर लाते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो शाप और वरदान दे देते हैं अथवा उसके और संसारके हितके लिये उसका शरीरसे वियोग भी करा देते हैं।

परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चार प्रकारके भक्तोंद्वारा अपना भजन करनेकी बात कही थी—‘चतुर्विधा भजन्ते माम् ’। उनमें ज्ञानीके भजनका क्या स्वरूप है—इसको इस श्लोकमें बताते हैं कि ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा अनुभव करना ही ज्ञानीका भजन है, शरणागति है। असली शरणागति वही है, जिसमें शरणागतकी सत्ता ही न रहे, प्रत्युत शरण्य ही रह जाय।

सब कुछ भगवान् ही हैं—यह वास्तविक ज्ञान है। ऐसे वास्तविक ज्ञानवाला महात्मा भक्त भगवान्के शरण हो जाता है अर्थात् अपना अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान्में लीन हो जाता है। फिर मैंपन नहीं रहता अर्थात् प्रेमवाला नहीं रहता, प्रत्युत केवल प्रेमस्वरूप भगवान् रह जाते हैं, जिनमें मैं-तू-यह-वह चारों ही नहीं हैं। यही शरणागतिका वास्तविक स्वरूप है।

‘महात्मा’ शब्दका अर्थ है—महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा१। जिसमें अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयता है, वह ‘अल्पात्मा’ है।

यहाँ ‘वासुदेवः’ पद पुँल्लिंगमें आया है; अतः यहाँ ‘वासुदेवः सर्वः’ पद आने चाहिये थे। परन्तु यहाँ ‘सर्वः’ पद न देकर ‘सर्वम्’ पद दिया गया है, जो नपुंसकलिंगमें है। अगर तीनों लिंगों—(सर्वः, सर्वा और सर्वम्)—का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिंग (सर्वम्) ही एकशेष रहता है। नपुंसकलिंगके अन्तर्गत तीनों लिंग आ जाते हैं। अतः ‘सर्वम्’ पदमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक—सबका समाहार हो जाता है। गीतामें जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंके लिये पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग—इन तीनों ही लिंगोंका प्रयोग हुआ है२। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि जगत्, जीव और परमात्मा—ये तीनों ही ‘सर्वम्’ शब्दके अन्तर्गत हैं। अतः तीनों लिंगोंसे कही जानेवाली सब-की-सब वस्तुएँ, व्यक्ति, परिस्थितियाँ आदि परमात्मा ही हैं।

‘वासुदेवः सर्वम्’—इसमें ‘सर्वम्’ तो असत् है और ‘वासुदेवः’ सत् है। असत्का भाव विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। तात्पर्य है कि

१-गीतामें भगवान्ने ‘महात्मा’ शब्दका प्रयोग केवल भक्तके लिये ही किया है। जो भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन साधकोंको भी महात्मा कहा है—‘महात्मानस्तु मां पार्थ देवीं प्रकृतिमाश्रिताः’ (१।१३), जो भगवान्से अभिन्न हो गये हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’ (७।१९), और जो परमसिद्धि (परमप्रेम)-को प्राप्त हो चुके हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘नाणुर्वन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः’ (८।१५)। इसी तरह गीतामें भगवान्ने ‘सुकृतिनः’ (७।१६), ‘उदाराः’ (७।१८), ‘सुदुर्लभः’ (७।१९), ‘युक्ततमः’ (६।४७; १२।२), ‘अद्भुष्टा’, ‘मैत्रः’, ‘कृष्णः’ (१२।१३), ‘अतीव मे प्रियाः’ (१२।२०) आदि पदोंका प्रयोग भी केवल भक्तके लिये ही किया है।

२-द्रष्टव्य—‘गीता-दर्पण’ ग्रन्थमें लेख-संख्या १९—‘गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको अलिंगता’।