भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 552

श्लोक २२]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव— प्रायः मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनी तरफ लगाना चाहते हैं, अपना शिष्य या दास बनाना चाहते हैं, अपने सम्प्रदायमें लाना चाहते हैं, अपनेमें श्रद्धा करवाना चाहते हैं, अपना पूजन, आदर, मान-सम्मान करवाना चाहते हैं, अपनी बात मनवाना चाहते हैं। परन्तु भगवान् सर्वोपरि होते हुए भी किसीको अपने अधीन नहीं बनाते, प्रत्युत जो जहाँ श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको वहाँ दृढ़ कर देते हैं—यह भगवान्की कितनी उदारता है, निष्पक्षता है।

भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ उनका ही स्वरूप है—‘मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति ’। इसलिये भगवान्में किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है। परन्तु भगवान्का यह पक्षपातरहित स्वभाव सहज ही समझमें नहीं आता, प्रत्युत गहरा विचार करनेसे ही समझमें आता है। अगर यह स्वभाव किसीकी समझमें आ जाय तो वह भगवान्का भक्त हो जायगा—उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहिं भजनु तजि भाव न आना॥

(मानस, सुन्दर० ३४।२)

स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत॥ (गीता १५।१९)

दूसरेको अपना दास वही बनाता है, जिसमें कोई कमी है। भगवान्में कोई कमी है ही नहीं, इसलिये वे अपनी तरफसे किसीको अपना दास (अधीन) कैसे बना सकते हैं? परन्तु कोई उनका दास बनना चाहे तो वे मना नहीं करते और दयापूर्वक उसको दास स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी विशेष उदारता है! जैसे छोटे-से बालकको देखकर कोई व्यक्ति रौझ जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस बालकसे उसका कोई स्वार्थभाव है। ऐसे ही जो भगवान्का दास बनता है, उसके सरलभावसे भगवान् रौझ जाते हैं—‘मोरं अधिक दास पर प्रीती ’ (मानस, उत्तर० १६।४)। गीताके अठारहवें अध्यायमें जब भगवान्के द्वारा ‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ सुनकर अर्जुन घबरा गये, तब भगवान् दयापरवश होकर अर्जुनसे बोले कि तू मेरी शरणमें आ जा—‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) परन्तु ऐसा कहनेसे पहले भगवान्ने कहा कि यह सबसे अत्यन्त गोपनीय बात है (अठारहवें अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) और बादमें भी कहा कि इसे हर किसीको मत कहना (अठारहवें अध्यायका सड़सठवाँ श्लोक)। इससे सिद्ध होता है कि दूसरेको अपना दास बनानेकी नीयत न होनेपर भी अगर कोई दूसरा सहारा न मिलनेपर मनुष्य घबरा जाय और उनका दास बनना चाहे तो भगवान् दयापरवश होकर उसको स्वीकार कर लेते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी देवतापर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् उस देवतामें दृढ़ कर देते हैं और जो भगवान्पर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् अपनेमें दृढ़ कर दें—इसमें सन्देह ही क्या है! कारण कि भगवान्की दृष्टि भक्तके हितके लिये होती है, अपने स्वार्थके लिये नहीं।

स तथा श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ २२ ॥

तया= उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई)भावपूर्वक)हि= परन्तु
श्रद्धया= श्रद्धासेउपासनातान्= वह कामना-पूर्ति
युक्तः= युक्त होकरईहतेमया= मेरे द्वारा
सः= वह मनुष्यएव= ही
तस्य= उस देवताकीततःविहितान्= विहित की हुई
आराधनम्= (सकाम-कामान्होती है।होती है।
लभते

व्याख्या—स तथा श्रद्धया युक्तः : ..... मयैव विहितान्हि तान् ’—मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है, उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी

पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है; परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं। जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुम लोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर