भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

इतना खर्च कर सकते हो, इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है; अतः वे उतना ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओंमें अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने-अपने उपासकोंको अपने-अपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—आठवें

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सब देवताओंको अलग-अलग और सीमित अधिकार दिये हुए हैं। परन्तु भगवान्का अधिकार असीम है। भगवान्में यह विशेषता है कि वे किसीपर शासन नहीं करते, किसीको अपना गुलाम नहीं बनाते, किसीको अपना चेला नहीं बनाते, प्रत्युत हर एकको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव विषयी था, पर भगवान् श्रीरामने तीनोंको ही अपना सखा बनाया। यह विशेषता देवताओं आदि किसीमें भी नहीं है। इसलिये वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

(मुण्डक० ३।१।१, श्वेता० ४।६)

गीतामें भी भगवान्ने अर्जुनको कहा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति ’ (४।३)। यहाँ भगवान्ने ‘भक्त’ तो अर्जुनकी दृष्टिसे कहा है*, पर अपनी दृष्टिसे ‘सखा’ कहा है। ‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (१५।७)—इन पदोंमें भी भगवान्ने ‘एव’ पदसे जीवको साक्षात् अपना स्वरूप बताया है। यह मेरा ही अंश है—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इसमें प्रकृतिका अंश बिलकुल नहीं है।

सम्बन्ध—अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥

तु= परन्तुअन्तवत्= अन्तवालायान्ति= प्राप्त होते हैं
तेषाम्= उन(नाशवान्) ही(और)
अल्पमेधसाम्= तुच्छ बुद्धिवालेभवति= मिलता है।मद्भक्ताः= मेरे भक्त
मनुष्योंकोदेवयजः= देवताओंकामाम्= मुझे
तत्= उन देवताओंकोपूजनअपि= ही
आराधनाकाकरनेवालेयान्ति= प्राप्त
फलम्= फलदेवान्= देवताओंकोहोते हैं।

व्याख्या —‘अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्’—देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि-युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको

अध्यायका सोलहवाँ श्लोक।

यहाँ ‘मयैव ’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है, वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले, तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा।

नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है—एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

  • अर्जुनकी दृष्टिसे इसलिये ‘भक्त’ कहा कि अर्जुनने भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी—‘शाधि मां त्वां प्रपन्म’ (गीता १।७)