भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सुनीं तो उसने दूसरी गोपीसे पूछा—अरी वीर! ये ब्रह्म, जीव आदि क्या होते हैं? वह गोपी बोली कि ये हमारे लालाके ही कोई सगे-सम्बन्धी होंगे, तभी साधुलोग उनकी बात करते हैं, नहीं तो साधुओंको लालाके सिवाय औरसे क्या मतलब?

(४) जिसके भीतर भगवत्त्वको जाननेकी व्याकुलता है, दिनमें भूख नहीं लगती, रातमें नींद नहीं आती, वह किसी सन्तसे सुनकर अथवा पुस्तकमें पढ़कर दृढ़तापूर्वक मान लेता है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् कैसे हैं—इसका तो पता नहीं, पर भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है—यह सन्तके वचनोंपर विश्वासकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है। सन्त वचनपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होनेपर फिर वैसा ही दीखने लग जाता है अर्थात् अनुभव हो जाता है।

दार्शनिक दृष्टिसे विचार करें तो सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। श्रद्धा-विश्वास (भक्ति) की दृष्टिसे देखें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भक्तकी दृष्टि भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई उसकी दृष्टिमें आता ही नहीं।

सम्बन्ध—जो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं, ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

परन्तु—

तैः, तैः= उन-उनप्रकृत्या= प्रकृति अर्थात्उन-उन
कामैः= कामनाओंसेस्वभावसेनियमम्
हृतज्ञानाः= जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य)नियताः= नियन्त्रित होकरआस्थाय
स्वया= अपनी-अपनीतम्, तम्= उस-उस अर्थात्अन्यदेवताः
देवताओंकेप्रपद्यन्ते= शरण हो जाते हैं।

व्याख्या—'कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः'—उन-उन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है, आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है, उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं। संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है—यहाँके भोग भोगनेके लिये धन-संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्य-संग्रहकी कामना।

धन-संग्रहकी कामना दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ चाहे जैसे भोग भोगें; चाहे जब, चाहे जहाँ और चाहे जितना धन खर्च करें, सुख-आरामसे दिन बीतें आदिके

लिये अर्थात् संयोगजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है और दूसरी, मैं धनी हो जाऊँ, धनसे मैं बड़ा बन जाऊँ आदिके लिये अर्थात् अभिमानजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है। ऐसे ही पुण्य-संग्रहकी कामना भी दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ मैं पुण्यात्मा कहलाऊँ और दूसरी, परलोकमें मेरेको भोग मिलें। इन सभी कामनाओंसे सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, बन्ध-मोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है। विवेक आच्छादित होनेसे वे यह समझ ही नहीं पाते कि जिन पदार्थोंकी हम कामना कर रहे हैं, वे पदार्थ हमारे साथ कबतक रहेंगे और हम उन पदार्थोंके साथ कबतक रहेंगे?

'प्रकृत्या नियताः स्वया'२—कामनाओंके कारण विवेक ढका जानेसे वे अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित रहते हैं

१—इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित पुरुषोंका ज्ञान तो मायासे ढका हुआ है और यहाँ वर्णित पुरुषोंका ज्ञान कामनासे ढका हुआ है। वहाँके पुरुष तो कामनापूर्तिके लिये जड़-पदार्थोंका आश्रय लेते हैं और यहाँके पुरुष कामनापूर्तिके लिये देवताओंका आश्रय लेते हैं। वहाँके पुरुष दुष्टताके कारण नरकोंमें जाते हैं और यहाँके पुरुष कामनाके कारण बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं।

२—यहाँ जो 'प्रकृत्या नियताः स्वया' कहा है, इसीको सत्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'यो यच्छद्धः स एव सः' कहा है।