भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 550

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

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अर्थात् अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहाँ 'प्रकृति' शब्द व्यक्तिगत स्वभावका वाचक है, समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह व्यक्तिगत स्वभाव सबमें मुख्य होता है—'स्वभावो मूर्ध्न वर्तते।' अतः व्यक्तिगत स्वभावको कोई छोड़ नहीं सकता—'या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते।' परन्तु इस स्वभावमें जो दोष हैं, उनको तो मनुष्य छोड़ ही सकता है, अगर उन दोषोंको मनुष्य छोड़ नहीं सकता, तो फिर मनुष्यजन्यकी महिमा ही क्या हुई? मनुष्य अपने स्वभावको निर्दोष, शुद्ध बनानेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामनापूर्तिके उद्देश्य रहता है, तबतक वह अपने स्वभावको सुधार नहीं सकता और तभीतक स्वभावकी प्रबलता और अपनेमें निर्बलता दीखती है। परन्तु जिसका उद्देश्य कामना मिटानेका हो जाता है, वह अपनी प्रकृति—(स्वभाव—) का सुधार कर सकता है अर्थात् उसमें प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती।

'तं तं नियममास्थाप्य' —कामनाओंके कारण अपनी प्रकृतिके परवश होनेपर मनुष्य कामनापूर्तिके अनेक उपायोंको और विधियों (नियमों—) को दृढ़ता रहता है। अमुक यज्ञ करनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक तप

करनेसे? अमुक दान देनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक मन्त्रका जप करनेसे? आदि—आदि उपाय खोजता रहता है। उन उपायोंकी विधियाँ अर्थात् नियम अलग—अलग होते हैं। जैसे—अमुक कामनापूर्तिके लिये अमुक विधिसे यज्ञ आदि करना चाहिये और अमुक स्थानपर करना चाहिये आदि—आदि। इस तरह मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करता है।

'प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः' —कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करके मनुष्य अन्य देवताओंकी शरण लेते हैं, भगवान्की शरण नहीं लेते। यहाँ 'अन्यदेवताः' कहनेका तात्पर्य है कि वे देवताओंको भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं, प्रत्युत उनकी अलग सत्ता मानते हैं, इसीसे उनको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलता है—'अन्तवन्तु फलं तेषाम्' (गीता ७।२३)। अगर वे देवताओंकी अलग सत्ता न मानकर उनको भगवत्स्वरूप ही मानें तो फिर उनको अन्तवाला फल नहीं मिलेगा, प्रत्युत अविनाशी फल मिलेगा।

यहाँ देवताओंकी शरण लेनेमें दो कारण मुख्य हुए—एक कामना और एक अपने स्वभावकी परवशता।

परिशिष्ट भाव —भगवान्के अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें जो कामनाएँ हैं, वही कामनाएँ इस श्लोकमें वर्णित मनुष्योंमें भी हैं। परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें कामनाकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है, इसलिये वे 'हृतज्ञानाः' नहीं हैं। परन्तु यहाँ वर्णित मनुष्योंमें कामनाकी मुख्यता है; इसलिये ये 'हृतज्ञानाः' हैं।

अर्थार्थी और आर्त भक्त तो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं, पर ये मनुष्य भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंके शरण होते हैं। कामनाएँ, देवता, मनुष्य और नियम—ये सभी अनेक हुआ करते हैं। अगर अनेक कामनाएँ होनेपर भी उपास्यदेव एक परमात्मा हों तो वे उपासकका उद्धार कर देंगे। परन्तु कामनाएँ भी अनेक हों और उपास्यदेव भी अनेक हों तो उद्धार कौन करेगा?

एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—यह ज्ञान सुखकी कामनाके कारण ढक जाता है। यह कामना न तो प्रकृतिकी बनायी हुई है और न परमात्माकी बनायी हुई है, प्रत्युत मनुष्यकी अपनी बनायी हुई है। इसलिये इसको मिटानेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। 'हृतज्ञानाः' कहनेका तात्पर्य है कि यह ज्ञान नष्ट नहीं हुआ है, प्रत्युत कामनाके कारण हरा गया है। इस बातको गीतामें 'माययापहृतज्ञानाः' (७।१५), 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (५।१५) आदि पदोंसे भी कहा गया है।

इसी अध्ययके पन्द्रहवें श्लोकमें आये 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें तमोगुणकी प्रधानता और रजोगुणकी गौणता है, पर यहाँ आये 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणता है। 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें अर्थकी इच्छा मुख्य है और 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें भोगोंकी इच्छा मुख्य है। दोनोंमें फर्क यह है कि मायासे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन नहीं करते, पर कामनाओंसे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन कर सकते हैं। कारण कि अर्थसे अरुचि नहीं होती—'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' , पर भोगोंसे अरुचि होती ही है। 'माययापहृतज्ञानाः' में तो आसुरभावका, झूठ, कपट, बेईमानी आदिका आश्रय है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में

'स्वया' कहनेका तात्पर्य है कि अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार सबकी कामनाएँ भी अलग—अलग होती हैं।