भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 536

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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वहाँ भक्त और भगवान्में द्वैतका भाव न रहकर प्रेमाद्वैत (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है।

ऐसे तो चारों भक्त भगवान्में नित्य-निरन्तर लगे रहते हैं; परन्तु तीन भक्तोंके भीतरमें कुछ-न-कुछ व्यक्तिगत इच्छा रहती है; जैसे—अर्थाथी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं, आर्त भक्त प्रतिकूलताको मिटानेकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूपको या भगवतत्त्वको जाननेकी इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती; अतः वह एकभक्ति है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’—

उस ज्ञानी प्रेमी भक्तको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ। उसमें अपनी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है, केवल मेरेमें प्रेम है। इसलिये वह मेरेको अत्यन्त प्यारा है।

वास्तवमें तो भगवान्का अंश होनेसे सभी जीव स्वाभाविक ही भगवान्को प्यारे हैं। भगवान्के प्यारमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। जैसे माता अपने बच्चोंका पालन

परिशिष्ट भाव— भगवान्ने अपने प्रेमी भक्तको ‘ज्ञानी’ नामसे इसलिये कहा है कि ‘सब कुछ परमात्मा ही है’—यही वास्तविक और अन्तिम ज्ञान है, इससे आगे कुछ नहीं है। इसलिये ऐसा अनुभव करनेवाला प्रेमी भक्त ही वास्तविक ज्ञानी है (इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। कारण कि ऐसे भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, जबकि विवेकी पुरुषकी दृष्टिमें सत् और असत्—दो सत्ता रहती है। तात्पर्य है कि यहाँ ‘ज्ञानी’ शब्द जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानीके लिये नहीं आया है, प्रत्युत ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तके लिये आया है। गीतामें भगवान्ने मुख्य रूपसे भक्तको ही ‘ज्ञानी’ कहा है (इसी अध्यायका सोलहवाँ, सत्रहवाँ और अठारहवाँ श्लोक); क्योंकि वही अन्तिम और असली ज्ञानी है। उसका केवल भगवान्में ही प्रेम होता है, इसलिये वह श्रेष्ठ है— ‘एकभक्तिर्विशिष्यते’

भगवान्का अर्थाथी भक्त अनित्ययुक्त (निरन्तर भगवान्में न लगा हुआ) होता है। अर्थाथीकी अपेक्षा आर्त कम अनित्ययुक्त होता है। आर्तकी अपेक्षा भी जिज्ञासु कम अनित्ययुक्त होता है। परन्तु ज्ञानी सर्वथा नित्ययुक्त होता है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ पदोंका तात्पर्य है कि ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव होनेपर फिर भक्त और भगवान्—दोनोंमें परस्पर प्रेम-ही-प्रेम शेष रहता है। इसीको शास्त्रोंमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम, अनन्तरस आदि नामोंसे कहा गया है।

सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना अत्यन्त प्यारा बताया, तो इससे यह असर पड़ता है कि भगवान्ने दूसरे भक्तोंका आदर नहीं किया। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें कहते हैं—

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्सैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥

एते= पहले कहे हुएभाववाले) हैं।आत्मा= स्वरूप
सर्वै, एव= सब-के-सबतु= परन्तुएव
(चारों) ही भक्तज्ञानी= ज्ञानी (प्रेमी) तोमतम्= (ऐसा मेरा)
उदाराः= बड़े उदार (श्रेष्ठ)मे= मेरा