भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 535

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

‘अर्थार्थी’ का तो अर्थसे निरन्तर सम्बन्ध रहता है; क्योंकि अर्थकी वासना हरदम रहती है। परन्तु ‘आर्त’ का दुःखसे निरन्तर सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि दुःख हरदम नहीं रहता। ‘जिज्ञासु’ को सुख-दुःखकी परवाह नहीं होती; अतः वह न तो सुखके आनेकी इच्छा करता है और न दुःखके जानेकी इच्छा करता है। अर्थार्थी और आर्त—दोनों जिज्ञासु होकर ज्ञानी हो जाते हैं।

‘अर्थार्थी’ भक्तको जब अर्थ मिलता है, तब उसको अपनी भूलपर पश्चाताप होता है; जैसे—ध्रुवजीको राज्य मिलनेपर पश्चाताप हुआ। परन्तु ‘आर्त’ भक्तको उतना पश्चाताप नहीं होता, प्रत्युत उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् दुःख दूर करनेवाले हैं; जैसे—द्रौपदी और गजेन्द्रकी रक्षा होनेपर उनको पश्चाताप नहीं हुआ, प्रत्युत भगवान्की तरफ ही उनकी वृत्ति रही। ‘आर्त’ भक्त आये हुए दुःखको सह नहीं सकता—यह उसकी कमजोरी है।

‘जिज्ञासु’ भक्तमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी कमी रहती है। उसको मुक्ति, तत्त्वज्ञान होनेपर भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत उसमें प्रेम प्राप्त करनेकी भूख रहती है। परन्तु ‘ज्ञानी’ भक्तकी दृष्टिमें एक वासुदेवके सिवाय अन्य सत्ता लेशमात्र भी नहीं होती, फिर उसमें कोई कमी कैसे रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ (गीता ७।१८)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं—

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तर्विशिष्यते।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥

तेषाम्= उन चारप्रेमी भक्तप्रियः= प्रिय हूँ
भक्तोंमेंविशिष्यते= श्रेष्ठ है;= और
नित्ययुक्तः= मुझमें निरन्तरहि= क्योंकिसः
लगा हुआज्ञानिनः= ज्ञानी भक्तकोमम= मुझे
एकभक्तिः= अनन्य भक्तिवालाअहम्= मैंप्रियः
ज्ञानी= ज्ञानी अर्थात्अत्यर्थम्= अत्यन्त

व्याख्या—‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’— उन (अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी) भक्तोंमें ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वह नित्ययुक्त है अर्थात् वह सदा-सर्वदा केवल भगवान्में ही लगा रहता है। भगवान्के सिवाय दूसरे किसीमें वह किंचिन्मात्र भी नहीं लगता। जैसे गोपियोंँ गाय दूहते, दही बिलोते, धान कूटते आदि सभी लौकिक कार्य करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णमें चित्तवाली रहती हैं*, ऐसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और पारमार्थिक सब क्रियाएँ करते समय सदा-सर्वदा भगवान्से जुड़ा रहता है। भगवान्का सम्बन्ध रखते हुए ही उसकी

सब क्रियाएँ होती हैं।

‘एकभक्तर्विशिष्यते’— उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तका आकर्षण केवल भगवान्में होता है। उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिये वह श्रेष्ठ है।

अर्थार्थी आदि भक्तोंमें पूर्वसंस्कारोंके कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं, तबतक उनकी एकभक्ति नहीं होती अर्थात् केवल भगवान्में प्रेम नहीं होता। परन्तु उन भक्तोंमें इन इच्छाओंको नष्ट करनेका भाव भी होता रहता है और इच्छाओंके सर्वथा नष्ट होनेपर सभी भक्त भगवान्के प्रेमी और भगवान्के प्रेमास्पद हो जाते हैं।

  • या दोहनेऽवहने मथनोपलेपप्रेक्षेद्वुनाभरुदितोक्षणमार्जनादी।

गायन्ति चैनमनुत्तुक्तधियोऽशुक्लकण्ठो धन्या ब्रजस्त्रिय उरुकमचित्तयानाः ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।४४।१५)

‘जो गौओंका दूध दूहते समय, धान आदि कूटते समय, दही मथते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें झूलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, तुलसी आदिको जलसे सींचते समय तथा झाड़ू देने आदि सब कर्मोंको करते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे श्रीकृष्णकी दिव्य लीलाओंका गान करती रहती हैं, वे श्रीकृष्णमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेवाली ब्रजवासिनी गोपियाँ धन्य हैं।’