भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 534

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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‘आध्यात्मिक’ होता है।*

इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है, वह सर्वथा निरर्थक है; क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी

नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई, न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है।

परिशिष्ट भाव —चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि मेरी शरण लेनेवाले भक्त गुणमयी मायाको तर जाते हैं। वे शरण लेनेवाले भक्त कौन हैं—इसको अब इस श्लोकमें बताते हैं।

पूर्व श्लोकमें ‘दुष्कृती’ मनुष्योंकी और इस श्लोकमें ‘सुकृती’ मनुष्योंकी बात आयी है। जो हमारेसे अलग है, उस संसारको अपना मानना सबसे बड़ा दुष्कृत अर्थात् पाप है और जो हमारेसे अभिन्न हैं, उन भगवान्को अपना मानना सबसे बड़ा सुकृत अर्थात् पुण्य है। अतः जो संसारको अपना मानते हैं, वे दुष्कृती हैं और जो भगवान्को अपना मानते हैं, वे सुकृती हैं।

भोगी मनुष्य भगवान्में नहीं लगता, इसलिये ‘अर्थार्थी’ तो भगवान्का भक्त हो सकता है, पर ‘भोगार्थी’ भगवान्का भक्त नहीं हो सकता। कारण कि भोगार्थीमें संसारकी लिप्तता अधिक होती है और अर्थार्थीमें लिप्तता कम होती है तथा भगवान्की मुख्यता होती है।

कुछ अंशमें भगवान्के सिवाय अन्य सत्ताकी मान्यता होनेके कारण ही भक्त अर्थार्थी, आर्त अथवा जिज्ञासु होता है। अगर अन्य सत्ताकी मान्यता सर्वथा न हो तो वह ज्ञानी (प्रेमी) हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही ये चार भेद होते हैं। वास्तवमें एक भगवान्की सत्ताके सिवाय दूसरी सत्ता सम्भव ही नहीं है।

जो विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् परमात्माके समग्ररूपको जानना चाहता है, वह ‘जिज्ञासु’ है। जिज्ञासु भगवान्के ऐश्वर्य, प्रभाव, सामर्थ्यको जानना चाहता है, इसलिये भगवान्की लीला-कथामें उसको विशेष रस आता है। भगवान्ने ‘मुमुक्षु’ पद न देकर ‘जिज्ञासु’ पद दिया है; क्योंकि मुमुक्षु तो केवल तत्त्वज्ञान चाहनेवाला ही हो सकता है, पर ‘जिज्ञासु’ ज्ञान चाहनेवाला भी हो सकता है और भक्ति चाहनेवाला भी। मुमुक्षुमें अपने कल्याणकी बात मुख्य होती है और जिज्ञासु भक्तमें अपनेको भगवान्के अर्पित करनेकी बात मुख्य होती है। मुमुक्षुको ब्रह्मका ज्ञान होता है और जिज्ञासु भक्तको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का ज्ञान होता है। तत्त्वज्ञानीको तो ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तको समग्रका ज्ञान होता है (गीता इसी अध्यायका उन्तीसवाँ, तीसवाँ श्लोक)।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः संसारका सम्बन्ध घटता जाता है और परमात्माका सम्बन्ध बढ़ता जाता है। जबतक जीव जगत्को धारण किये रहता है, तभीतक अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु रहते हैं। जब वह जगत्को धारण नहीं करता, तब केवल ‘ज्ञानी’ रहता है।

जिस भक्तको ‘सब कुछ वासुदेव ही है’— इस प्रकार परमात्माके समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसको यहाँ ‘ज्ञानी’ कहा गया है। इसी ज्ञानी भक्तको आगे उन्नीसवें श्लोकमें ‘ज्ञानवान्’ कहा गया है।

‘अर्थार्थी’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष न करके धन चाहता है। ‘आर्त’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष तो करता है, पर दुःख आनेपर उससे दुःख सहा नहीं जाता। ‘अर्थार्थी’ में अर्थकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है। उसमें धनकी इच्छा तो रहती है, पर उस इच्छाको वह केवल भगवान्से ही पूरी कराना चाहता है। कारण कि भगवान्में कोई कमी नहीं है। अपरा प्रकृति है तो भगवान्की ही! ‘आर्त’ भी अपना दुःख केवल भगवान्से ही दूर करना चाहता है। ‘जिज्ञासु’ भी केवल भगवान्से ही अपनी जिज्ञासाकी पूर्ति करना चाहता है। परन्तु जब भक्तमें ऐसी उत्कट अभिलाषा रहती है कि ‘मेरेको केवल भगवान् ही प्यारे लगे’, तब उसमें अर्थार्थीपना, आर्तपना और जिज्ञासुपना नहीं रहता और वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी हो जाता है।

  • आध्यात्मिक दुःखके दो प्रकार हैं—आधि और व्याधि। मनकी चिन्ता ‘आधि’ है और शरीरका रोग ‘व्याधि’ है। आधि भी दो तरहकी होती है—(१) पागलपन और (२) चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि। पागलपन तो प्रारब्धसे होता है और चिन्ता, शोक आदि अज्ञानसे होते हैं। ज्ञान होनेपर चिन्ता, शोक आदि तो मिट जाते हैं, पर पागलपन प्रारब्धवशात् हो सकता है।