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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३३

‘आध्यात्मिक’ होता है।*

इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है, वह सर्वथा निरर्थक है; क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी

नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई, न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है।

परिशिष्ट भाव —चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि मेरी शरण लेनेवाले भक्त गुणमयी मायाको तर जाते हैं। वे शरण लेनेवाले भक्त कौन हैं—इसको अब इस श्लोकमें बताते हैं।

पूर्व श्लोकमें ‘दुष्कृती’ मनुष्योंकी और इस श्लोकमें ‘सुकृती’ मनुष्योंकी बात आयी है। जो हमारेसे अलग है, उस संसारको अपना मानना सबसे बड़ा दुष्कृत अर्थात् पाप है और जो हमारेसे अभिन्न हैं, उन भगवान्को अपना मानना सबसे बड़ा सुकृत अर्थात् पुण्य है। अतः जो संसारको अपना मानते हैं, वे दुष्कृती हैं और जो भगवान्को अपना मानते हैं, वे सुकृती हैं।

भोगी मनुष्य भगवान्में नहीं लगता, इसलिये ‘अर्थार्थी’ तो भगवान्का भक्त हो सकता है, पर ‘भोगार्थी’ भगवान्का भक्त नहीं हो सकता। कारण कि भोगार्थीमें संसारकी लिप्तता अधिक होती है और अर्थार्थीमें लिप्तता कम होती है तथा भगवान्की मुख्यता होती है।

कुछ अंशमें भगवान्के सिवाय अन्य सत्ताकी मान्यता होनेके कारण ही भक्त अर्थार्थी, आर्त अथवा जिज्ञासु होता है। अगर अन्य सत्ताकी मान्यता सर्वथा न हो तो वह ज्ञानी (प्रेमी) हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही ये चार भेद होते हैं। वास्तवमें एक भगवान्की सत्ताके सिवाय दूसरी सत्ता सम्भव ही नहीं है।

जो विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् परमात्माके समग्ररूपको जानना चाहता है, वह ‘जिज्ञासु’ है। जिज्ञासु भगवान्के ऐश्वर्य, प्रभाव, सामर्थ्यको जानना चाहता है, इसलिये भगवान्की लीला-कथामें उसको विशेष रस आता है। भगवान्ने ‘मुमुक्षु’ पद न देकर ‘जिज्ञासु’ पद दिया है; क्योंकि मुमुक्षु तो केवल तत्त्वज्ञान चाहनेवाला ही हो सकता है, पर ‘जिज्ञासु’ ज्ञान चाहनेवाला भी हो सकता है और भक्ति चाहनेवाला भी। मुमुक्षुमें अपने कल्याणकी बात मुख्य होती है और जिज्ञासु भक्तमें अपनेको भगवान्के अर्पित करनेकी बात मुख्य होती है। मुमुक्षुको ब्रह्मका ज्ञान होता है और जिज्ञासु भक्तको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का ज्ञान होता है। तत्त्वज्ञानीको तो ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तको समग्रका ज्ञान होता है (गीता इसी अध्यायका उन्तीसवाँ, तीसवाँ श्लोक)।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः संसारका सम्बन्ध घटता जाता है और परमात्माका सम्बन्ध बढ़ता जाता है। जबतक जीव जगत्को धारण किये रहता है, तभीतक अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु रहते हैं। जब वह जगत्को धारण नहीं करता, तब केवल ‘ज्ञानी’ रहता है।

जिस भक्तको ‘सब कुछ वासुदेव ही है’— इस प्रकार परमात्माके समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसको यहाँ ‘ज्ञानी’ कहा गया है। इसी ज्ञानी भक्तको आगे उन्नीसवें श्लोकमें ‘ज्ञानवान्’ कहा गया है।

‘अर्थार्थी’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष न करके धन चाहता है। ‘आर्त’ प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष तो करता है, पर दुःख आनेपर उससे दुःख सहा नहीं जाता। ‘अर्थार्थी’ में अर्थकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है। उसमें धनकी इच्छा तो रहती है, पर उस इच्छाको वह केवल भगवान्से ही पूरी कराना चाहता है। कारण कि भगवान्में कोई कमी नहीं है। अपरा प्रकृति है तो भगवान्की ही! ‘आर्त’ भी अपना दुःख केवल भगवान्से ही दूर करना चाहता है। ‘जिज्ञासु’ भी केवल भगवान्से ही अपनी जिज्ञासाकी पूर्ति करना चाहता है। परन्तु जब भक्तमें ऐसी उत्कट अभिलाषा रहती है कि ‘मेरेको केवल भगवान् ही प्यारे लगे’, तब उसमें अर्थार्थीपना, आर्तपना और जिज्ञासुपना नहीं रहता और वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी हो जाता है।

  • आध्यात्मिक दुःखके दो प्रकार हैं—आधि और व्याधि। मनकी चिन्ता ‘आधि’ है और शरीरका रोग ‘व्याधि’ है। आधि भी दो तरहकी होती है—(१) पागलपन और (२) चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि। पागलपन तो प्रारब्धसे होता है और चिन्ता, शोक आदि अज्ञानसे होते हैं। ज्ञान होनेपर चिन्ता, शोक आदि तो मिट जाते हैं, पर पागलपन प्रारब्धवशात् हो सकता है।

५३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

‘अर्थार्थी’ का तो अर्थसे निरन्तर सम्बन्ध रहता है; क्योंकि अर्थकी वासना हरदम रहती है। परन्तु ‘आर्त’ का दुःखसे निरन्तर सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि दुःख हरदम नहीं रहता। ‘जिज्ञासु’ को सुख-दुःखकी परवाह नहीं होती; अतः वह न तो सुखके आनेकी इच्छा करता है और न दुःखके जानेकी इच्छा करता है। अर्थार्थी और आर्त—दोनों जिज्ञासु होकर ज्ञानी हो जाते हैं।

‘अर्थार्थी’ भक्तको जब अर्थ मिलता है, तब उसको अपनी भूलपर पश्चाताप होता है; जैसे—ध्रुवजीको राज्य मिलनेपर पश्चाताप हुआ। परन्तु ‘आर्त’ भक्तको उतना पश्चाताप नहीं होता, प्रत्युत उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् दुःख दूर करनेवाले हैं; जैसे—द्रौपदी और गजेन्द्रकी रक्षा होनेपर उनको पश्चाताप नहीं हुआ, प्रत्युत भगवान्की तरफ ही उनकी वृत्ति रही। ‘आर्त’ भक्त आये हुए दुःखको सह नहीं सकता—यह उसकी कमजोरी है।

‘जिज्ञासु’ भक्तमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी कमी रहती है। उसको मुक्ति, तत्त्वज्ञान होनेपर भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत उसमें प्रेम प्राप्त करनेकी भूख रहती है। परन्तु ‘ज्ञानी’ भक्तकी दृष्टिमें एक वासुदेवके सिवाय अन्य सत्ता लेशमात्र भी नहीं होती, फिर उसमें कोई कमी कैसे रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ (गीता ७।१८)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं—

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तर्विशिष्यते।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥

तेषाम्= उन चारप्रेमी भक्तप्रियः= प्रिय हूँ
भक्तोंमेंविशिष्यते= श्रेष्ठ है;= और
नित्ययुक्तः= मुझमें निरन्तरहि= क्योंकिसः
लगा हुआज्ञानिनः= ज्ञानी भक्तकोमम= मुझे
एकभक्तिः= अनन्य भक्तिवालाअहम्= मैंप्रियः
ज्ञानी= ज्ञानी अर्थात्अत्यर्थम्= अत्यन्त

व्याख्या—‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’— उन (अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी) भक्तोंमें ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वह नित्ययुक्त है अर्थात् वह सदा-सर्वदा केवल भगवान्में ही लगा रहता है। भगवान्के सिवाय दूसरे किसीमें वह किंचिन्मात्र भी नहीं लगता। जैसे गोपियोंँ गाय दूहते, दही बिलोते, धान कूटते आदि सभी लौकिक कार्य करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णमें चित्तवाली रहती हैं*, ऐसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और पारमार्थिक सब क्रियाएँ करते समय सदा-सर्वदा भगवान्से जुड़ा रहता है। भगवान्का सम्बन्ध रखते हुए ही उसकी

सब क्रियाएँ होती हैं।

‘एकभक्तर्विशिष्यते’— उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तका आकर्षण केवल भगवान्में होता है। उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिये वह श्रेष्ठ है।

अर्थार्थी आदि भक्तोंमें पूर्वसंस्कारोंके कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं, तबतक उनकी एकभक्ति नहीं होती अर्थात् केवल भगवान्में प्रेम नहीं होता। परन्तु उन भक्तोंमें इन इच्छाओंको नष्ट करनेका भाव भी होता रहता है और इच्छाओंके सर्वथा नष्ट होनेपर सभी भक्त भगवान्के प्रेमी और भगवान्के प्रेमास्पद हो जाते हैं।

  • या दोहनेऽवहने मथनोपलेपप्रेक्षेद्वुनाभरुदितोक्षणमार्जनादी।

गायन्ति चैनमनुत्तुक्तधियोऽशुक्लकण्ठो धन्या ब्रजस्त्रिय उरुकमचित्तयानाः ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।४४।१५)

‘जो गौओंका दूध दूहते समय, धान आदि कूटते समय, दही मथते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें झूलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, तुलसी आदिको जलसे सींचते समय तथा झाड़ू देने आदि सब कर्मोंको करते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे श्रीकृष्णकी दिव्य लीलाओंका गान करती रहती हैं, वे श्रीकृष्णमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेवाली ब्रजवासिनी गोपियाँ धन्य हैं।’

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३५

वहाँ भक्त और भगवान्में द्वैतका भाव न रहकर प्रेमाद्वैत (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है।

ऐसे तो चारों भक्त भगवान्में नित्य-निरन्तर लगे रहते हैं; परन्तु तीन भक्तोंके भीतरमें कुछ-न-कुछ व्यक्तिगत इच्छा रहती है; जैसे—अर्थाथी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं, आर्त भक्त प्रतिकूलताको मिटानेकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूपको या भगवतत्त्वको जाननेकी इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती; अतः वह एकभक्ति है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’—

उस ज्ञानी प्रेमी भक्तको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ। उसमें अपनी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है, केवल मेरेमें प्रेम है। इसलिये वह मेरेको अत्यन्त प्यारा है।

वास्तवमें तो भगवान्का अंश होनेसे सभी जीव स्वाभाविक ही भगवान्को प्यारे हैं। भगवान्के प्यारमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। जैसे माता अपने बच्चोंका पालन

परिशिष्ट भाव— भगवान्ने अपने प्रेमी भक्तको ‘ज्ञानी’ नामसे इसलिये कहा है कि ‘सब कुछ परमात्मा ही है’—यही वास्तविक और अन्तिम ज्ञान है, इससे आगे कुछ नहीं है। इसलिये ऐसा अनुभव करनेवाला प्रेमी भक्त ही वास्तविक ज्ञानी है (इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। कारण कि ऐसे भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, जबकि विवेकी पुरुषकी दृष्टिमें सत् और असत्—दो सत्ता रहती है। तात्पर्य है कि यहाँ ‘ज्ञानी’ शब्द जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानीके लिये नहीं आया है, प्रत्युत ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेवाले ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तके लिये आया है। गीतामें भगवान्ने मुख्य रूपसे भक्तको ही ‘ज्ञानी’ कहा है (इसी अध्यायका सोलहवाँ, सत्रहवाँ और अठारहवाँ श्लोक); क्योंकि वही अन्तिम और असली ज्ञानी है। उसका केवल भगवान्में ही प्रेम होता है, इसलिये वह श्रेष्ठ है— ‘एकभक्तिर्विशिष्यते’

भगवान्का अर्थाथी भक्त अनित्ययुक्त (निरन्तर भगवान्में न लगा हुआ) होता है। अर्थाथीकी अपेक्षा आर्त कम अनित्ययुक्त होता है। आर्तकी अपेक्षा भी जिज्ञासु कम अनित्ययुक्त होता है। परन्तु ज्ञानी सर्वथा नित्ययुक्त होता है।

‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ पदोंका तात्पर्य है कि ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव होनेपर फिर भक्त और भगवान्—दोनोंमें परस्पर प्रेम-ही-प्रेम शेष रहता है। इसीको शास्त्रोंमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम, अनन्तरस आदि नामोंसे कहा गया है।

सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना अत्यन्त प्यारा बताया, तो इससे यह असर पड़ता है कि भगवान्ने दूसरे भक्तोंका आदर नहीं किया। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें कहते हैं—

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्सैव मे मतम्।

आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८ ॥

एते= पहले कहे हुएभाववाले) हैं।आत्मा= स्वरूप
सर्वै, एव= सब-के-सबतु= परन्तुएव
(चारों) ही भक्तज्ञानी= ज्ञानी (प्रेमी) तोमतम्= (ऐसा मेरा)
उदाराः= बड़े उदार (श्रेष्ठ)मे= मेरा

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

हि= कारण किअनुत्तमाम्,(ऐसे)
सः= वहगतिम्= जिससे श्रेष्ठमाम्
युक्तात्मा= मुझसे अभिन्न हैदूसरी कोईएव
(और)गति नहीं है,आस्थितः= दृढ़ स्थित है।

व्याख्या—'उदाराः सर्व एवैते'— ये सब-के-सब भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ भाववाले हैं। भगवान्ने यहाँ जो 'उदाराः' शब्दका प्रयोग किया है, उसमें कई विचित्र भाव हैं; जैसे—

(१) चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं, उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूँ।' भक्त भगवान्को चाहते हैं और भगवान् भक्तको चाहते हैं। परन्तु इन दोनोंमें पहले भक्तने ही सम्बन्ध जोड़ा है और जो पहले सम्बन्ध जोड़ता है, वह उदार होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान् सम्बन्ध जोड़ें या न जोड़ें, इसकी भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफसे पहले सम्बन्ध जोड़ता है और अपनेको समर्पित करता है। इसलिये वह उदार है।

(२) देवताओंके भक्त सकामभावसे विधिपूर्वक यज्ञ, दान, तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओंको उनकी कामनाके अनुसार वह चीज देनी ही पड़ती है; क्योंकि देवतालोग उनका हित-अहित नहीं देखते। परन्तु भगवान्का भक्त अगर भगवान्से कोई चीज माँगता है तो भगवान् अगर उचित समझें तो वह चीज दे देते हैं अर्थात् देनेसे उसकी भक्ति बढ़ती हो तो दे देते हैं और भक्ति न बढ़ती हो, संसारमें फँसावट होती हो तो नहीं देते। कारण कि भगवान् परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपनी कामनाकी पूर्ति हो अथवा न हो, तो भी वे भगवान्का ही भजन करते हैं, भगवान्के भजनको नहीं छोड़ते—यह उनकी उदारता ही है।

(३) संसारके भोग और रुपये-पैसे प्रत्यक्ष सुखदायी दीखते हैं और भगवान्के भजनमें प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दीखता, फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुखको छोड़कर अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करनेकी लालसाको छोड़कर भगवान्का भजन करते हैं, यह उनकी उदारता ही है।

(४) भगवान्के दरबारमें माँगनेवालोंको भी उदार कहा जाता है—'यहि दरबार दीनको आदर रीति सदा चलि आई।' (विनयपत्रिका १६५।५) अर्थात् कोई कुछ माँगता है, कोई धन चाहता है, कोई दुःख दूर करना चाहता है—ऐसे माँगनेवाले भक्तोंको भी भगवान् उदार कहते हैं,

यह भगवान्की विशेष उदारता ही है।

(५) भक्तोंका लौकिक-पारलौकिक कामनापूर्तिके लिये अन्यकी तरफ किंचिन्मात्र भी भाव नहीं जाता। वे केवल भगवान्से ही कामनापूर्ति चाहते हैं। भक्तोंका यह अनन्यभाव ही उनकी उदारता है।

'ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्'—यहाँ 'तु' पदसे ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी विलक्षणता बतायी है कि दूसरे भक्त तो उदार हैं ही, पर ज्ञानीको उदार क्या कहें, वह तो मेरा स्वरूप ही है। स्वरूपमें किसी निमित्तसे, किसी कारण-विशेषसे प्रियता नहीं होती, प्रत्युत अपना स्वरूप होनेसे स्वतःस्वाभाविक प्रियता होती है।

प्रेममें प्रेमी अपने-आपको प्रेमास्पदपर न्योछावर कर देता है अर्थात् प्रेमी अपनी सत्ता अलग नहीं मानता। ऐसे ही प्रेमास्पद भी स्वयं प्रेमीपर न्योछावर हो जाते हैं। उनको इस प्रेमाद्वैतकी विलक्षण अनुभूति होती है। ज्ञानमार्गका जो अद्वैतभाव है, वह नित्य-निरन्तर अखण्डरूपसे शान्त, सम रहता है। परन्तु प्रेमका जो अद्वैतभाव है, वह एक-दूसरेकी अभिन्नताका अनुभव कराता हुआ प्रतिक्षण वर्धमान रहता है। प्रेमका अद्वैतभाव एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक है। इसलिये प्रेम-तत्त्व अनिवर्चनीय है। शरीरके साथ सर्वथा अभिन्नता (एकता) मानते हुए भी निरन्तर भिन्नता बनी रहती है और भिन्नताका अनुभव होनेपर भी भिन्नता बनी रहती है। इसी तरह प्रेमतत्त्वमें भिन्नता रहते हुए भी अभिन्नता बनी रहती है और अभिन्नताका अनुभव होनेपर भी अभिन्नता बनी रहती है।

जैसे, नदी समुद्रमें प्रविष्ट होती है तो प्रविष्ट होते ही नदी और समुद्रके जलकी एकता हो जाती है। एकता होनेपर भी दोनों तरफसे जलका एक प्रवाह चलता रहता है अर्थात् कभी नदीका समुद्रकी तरफ और कभी समुद्रका नदीकी तरफ एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। ऐसे ही प्रेमीका प्रेमास्पदकी तरफ और प्रेमास्पदका प्रेमीकी तरफ प्रेमका एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। उनका नित्ययोगमें वियोग और वियोगमें नित्ययोग—इस प्रकार प्रेमकी एक विलक्षण लीला अनन्तरूपसे अनन्तकालतक चलती रहती है। उसमें कौन प्रेमास्पद है और कौन प्रेमी

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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है—इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही ‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ पदोंका तात्पर्य है।

‘आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्’—क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती, ऐसे सर्वांपरि मेरेमें ही उसकी दृढ़ स्थिति है।

परिशिष्ट भाव —सांसारिक अर्थार्थी भगवान्को छोड़कर केवल अर्थको ही चाहता है; अतः वह झूठ, कपट, बेईमानी आदिका भक्त होता है। उसके भीतर धनका महत्त्व ज्यादा होनेसे वह उदार नहीं होता, प्रत्युत महान् कृपण होता है। अतः उसके लिये ‘उदार’ शब्द लागू ही नहीं होता। परन्तु जो अर्थार्थी भगवान्का भक्त होता है, उसके भीतर अर्थका महत्त्व न होकर भगवान्का महत्त्व होता है। इसलिये उसमें कृपणता नहीं होती, प्रत्युत उदारता होती है। अतः उसको भगवान्ने यहाँ उदार कहा है। यहाँ उदारभावका अर्थ है—त्याग। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्त संसार-(भोग और संग्रह-) को छोड़कर भगवान्में लग गये—यह उनका त्याग है। इसलिये वे सभी उदार हैं—‘उदाराः सर्व एवेते।’ एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध मुख्य होनेसे अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भी आगे चलकर स्वतः ‘ज्ञानी’ हो जाते हैं।

एक मार्मिक बात है कि भगवान्को न मानना कामनासे भी अधिक दोषी है। जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, उनमें यदि कामना रह जाय तो वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। परन्तु जो केवल भगवान्का ही भजन करते हैं, उनमें यदि कामना रह भी जाय तो भगवान्की कृपा और भजनके प्रभावसे वे भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। कारण कि मनुष्यका किसी भी तरहसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह भगवान्को ही प्राप्त होता है*; क्योंकि वह मूलमें भगवान्का ही अंश है।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु—इन तीनोंको ही भगवान्ने यहाँ ‘उदार’ कहा है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय अन्यका भजन करनेवाले हैं, उनको भगवान्ने उदार न कहकर ‘अल्पमेधा’ कहा है (गीता—इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) और उनके भजनको अविधिपूर्वक किया गया बताया है (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। देवताओंको भगवान्से अलग समझनेके कारण अर्थात् देवताओंमें भगवदबुद्धि न होनेके कारण तथा कामना भी होनेके कारण उनकी उपासना अविधिपूर्वक है। तात्पर्य है कि सबमें भगवदबुद्धि न होना सकामभावसे भी अधिक घातक है; क्योंकि चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ!

तत्त्वज्ञानीकी ब्रह्मसे ‘तात्त्विक एकता’ अर्थात् सधर्मता होती है; परन्तु भक्तकी भगवान्के साथ ‘आत्मीय एकता’ होती है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’। तत्त्वज्ञानीकी तात्त्विक एकता-(सधर्मता-) में जीव और ब्रह्ममें अभेद हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे वह भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है और एक तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता। परन्तु भक्तकी आत्मीय एकतामें जीव और भगवान्में अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नतामें भक्त और भगवान् एक होते हुए भी प्रेमके लिये दो हो जाते हैं। उनमें दोनों ही प्रेमी और दोनों ही प्रेमास्पद होते हैं। इसलिये वे दो होते हुए भी एक ही रहते हैं।

जीव परमात्माका अंश है। अतः वह परमात्मासे जितना-जितना दूर जाता है, उतना-उतना अहंकार दृढ़ होता जाता है और वह ज्यों-ज्यों परमात्माकी तरफ आता है, त्यों-त्यों अहंकार मिटता जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहम्की गन्ध रह सकती है। परन्तु प्रेममें परमात्माके साथ अभिन्नता (आत्मीयता) होनेपर जीवका अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अहंकार सर्वथा मिट जाता है, क्योंकि अहंकार अपरा प्रकृतिका ही कार्य है। इसलिये भगवान्ने कहा है—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’।

  • कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः ॥

( श्रीमद्भगवद्गीता ७।१२१ )

‘एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप धोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।’

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

अर्थाथी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः अपनी स्वतन्त्र सत्ता (अहंता) कम होती जाती है और ज्ञानीमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता बिलकुल नहीं रहती। इसलिये ‘त्वात्मैव ’ पदका तात्पर्य है कि प्रेमी भक्तकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रही, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहे अर्थात् प्रेमीके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं—‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ’ (नारद० ४१)। यह आत्मीयता भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत है, जो ज्ञानयोगके अद्वैतसे भी सुन्दर है—‘भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ’ (बोधसार, भक्ति० ४२)।

भामेवानुत्तमां गतिम् ’—भगवान्से बढ़कर उत्तम गति और कोई नहीं है। ‘गति’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। यहाँ ‘गति’ शब्द प्राप्तिके अर्थमें आया है। अन्तिम प्रापणीय तत्त्व होनेसे भगवान् सर्वोत्तम गति हैं।

आस्थितः ’—एक दृढ़ता अभ्याससे होती है और एक दृढ़ता स्वतः होती है। जैसे मात्र प्राणियोंकी ‘मैं हूँ’—इस प्रकार अपने-आपमें स्वतः दृढ़ स्थिति होती है, ऐसे ही ज्ञानी भक्तकी भगवान्में स्वतः दृढ़ स्थिति होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्नां प्रपद्यते।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ ११ ॥

बहूनाम्= बहुतसर्वम्= सब कुछमाम्= मेरे
जन्मनाम्= जन्मोंकेवासुदेवः= परमात्माप्रपद्यते= शरण होता है,
अन्ते= अन्तिमही हैं—सः= वह
जन्ममें अर्थात्इति= इस प्रकारमहात्मा= महात्मा
मनुष्यजन्ममेंज्ञानवान्= (जो) ज्ञानवान्सुदुर्लभः= अत्यन्त दुर्लभ है।

व्याख्या —‘बहूनां जन्मनामन्ते ’—मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर देकर उसे जन्म-मरणके प्रवाहसे अलग होकर अपनी प्राप्तिका पूरा अधिकार दिया है। परन्तु यह मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके रागके कारण फिर पुराने प्रवाहमें अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें चला जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसार-वर्त्तनिं ’ (गीता १।३)। जहाँ भगवान् आसुरी योनियों और नरकोंके अधिकारियोंका वर्णन करते हैं, वहाँ दुर्गुण-दुराचारोंके कारण भगवत्प्राप्तिकी सम्भावना न दीखनेपर भी भगवान् कहते हैं—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यात्यधमां गतिम् ’ (गीता १६।२०) अर्थात् मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये प्राणी अधम गतिको चले गये अर्थात् वे मरनेके बाद मनुष्ययोनियोंमें भी चले जाते तो कम-से-कम मनुष्य तो रह जाते; पर वे मेरी प्राप्तिका पूरा अधिकार प्राप्त करके भी अधम गतिको चले गये!

संतोंकी वाणीमें और शास्त्रोंमें आता है कि मनुष्यजन्म

केवल अपना कल्याण करनेके लिये मिला है, विषयोंका सुख भोगनेके लिये तथा स्वर्गकी प्राप्तिके लिये नहीं। इसलिये गीताने स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवालोंको मूढ़ और तुच्छ बुद्धिवाले कहा है—‘अविपश्चितः ’ (२।४२) और ‘अल्पमेधसाम् ’ (७।२३)।

यह मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। सम्पूर्ण जन्मोंका आरम्भ मनुष्यजन्मसे ही होता है अर्थात् मनुष्यजन्ममें किये हुए पाप चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें भोगनेपर भी समाप्त नहीं होते, बाकी ही रहते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म है। मनुष्यजन्ममें सम्पूर्ण पापोंका नाश करके, सम्पूर्ण वासनाओंका नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं, भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है।

भगवान्ने आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि ‘जो मनुष्य अन्त-समयमें जिस-जिस भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, उस-उस भावको ही वह प्राप्त

१-भक्तिका यह अद्वैत कल्पना नहीं है, प्रत्युत स्वीकृति है। कल्पित अद्वैत तो असत्य होता है, उसमें प्रेम नहीं होता।

२-एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ (मानस ७।४४।१)

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

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होता है।' इस तरह मनुष्यको जिस किसी भावका स्मरण करनेमें जो स्वतन्त्रता दी गयी है, इससे मालूम होता है कि भगवान्ने मनुष्यको पूरा अधिकार दिया है अर्थात् मनुष्यके उद्धारके लिये भगवान्ने अपनी तरफसे यह अन्तिम जन्म दिया है। अब इसके आगे यह नये जन्मकी तैयारी कर ले अथवा अपना उद्धार कर ले—इसमें यह सर्वथा स्वतन्त्र है*। इस बातको लेकर गीता मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी मानती है और ढंकेकी चोटके साथ, खुले शब्दोंमें कहती है कि वर्तमानका दुराचारी-से-दुराचारी, पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनिमें जन्मा हुआ पापयोन और चारों वर्णवाले स्त्री-पुरुष—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकते हैं (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)। गीताने (नवें अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें) ऐसा विचित्र 'पापयोन' शब्द कहा है, जिसमें शूद्रसे भी नीचे कहे और माने जानेवाले चाण्डाल, यवन आदि तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी लिये जा सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर प्राणियोंमें परमात्माकी तरफ चलनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु परमात्माके अंश होनेसे उनके लिये परमात्माकी तरफसे मना नहीं है। उनमेंसे बहुत-से प्राणी भगवान् और संत-महापुरुषोंकी कृपासे तथा तीर्थ और भगवद्भाक्के प्रभावसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। देवता भोगयोन हैं; वे भोगोंमें ही लगे रहते हैं, इसलिये उनको 'अपना उद्धार करना है' ऐसा विचार नहीं होता। परन्तु वे अगर किसी कारणसे भगवान्की तरफ लग जायें तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इन्द्रको भी ज्ञान प्राप्त हुआ था—ऐसा शास्त्रोंमें आता है।

भगवान्की तरफसे मनुष्यमात्रका जन्म अन्तिम जन्म है। कारण कि भगवान्का यह संकल्प है कि मेरे दिये हुए इस शरीरसे यह अपना कल्याण कर ले। अतः यह अपना कोई संकल्प न रखकर केवल निमित्तमात्र बन जाय, तो भगवान्के संकल्पसे इसका कल्याण हो जाय। जैसे ग्यारहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे—'मया हार्तास्त्वं जहि'। तू चिन्ता मत कर—'मा व्यथिष्ठाः।' तू युद्ध कर, तेरी विजय होगी—'युध्यस्व जेतोसि।' इसी तरहसे भगवान्ने कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है। अगर

मनुष्य भगवान्से विमुख होकर संसारके रागमें न फँसे, तो भगवान्के उस संकल्पसे अनायास ही मुक्त हो जाय।

भगवान्का संकल्प ऐसा नहीं है कि साधककी इच्छाके बिना उसका कल्याण हो जाय अर्थात् जैसे शाग या वरदान दिया जाता है, वैसा यह संकल्प नहीं है। तो फिर कैसा है यह संकल्प? भगवान्ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेकी स्वतन्त्रता इस मनुष्यजन्ममें दी है। अगर यह प्राणी उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे अर्थात् भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चले, कम-से-कम अपने विवेकके विरुद्ध न चले तो उससे भगवान् और शास्त्रोंके अनुकूल चलना स्वाभाविक होगा। कारण कि भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चलनेपर दो अवस्थाओंमेंसे एक अवस्था स्वाभाविक होगी—या तो वह शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिसे कुछ नहीं करेगा या केवल भगवान् और शास्त्रके अनुकूल ही करेगा।

कुछ नहीं करनेकी अवस्थामें अर्थात् कुछ करनेकी रुचि न रहनेकी अवस्थामें मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। कारण कि कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छासे ही कर्तृत्वभिमान उत्पन्न होकर अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और अपने लिये करनेसे फलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कुछ भी न करनेसे न कर्तृत्व-भिमान होगा और न फलेच्छा होगी, प्रत्युत स्वरूपमें स्वतः स्थिति होगी।

शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेकी अवस्थामें करनेका प्रवाह मिट जाता है और क्रिया तथा पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे नयी कामना होगी नहीं और पुराना राग मिट जायगा तो स्वतः बोध हो जायगा—'तत्त्वव्यं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति' (गीता ४।३२)।

गीतामें आया है—निष्कामभावसे विधिपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मका पालन किया जाय तो अनादिकालसे बने हुए सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे तर जाता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् भक्तको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)। जो भगवान्को अज-अनादि जानता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है (दसवें अध्यायका

  • नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस ७।१२१।५)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

तीसरा श्लोक)। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योगोंसे पाप नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह निकला कि अन्तिम मनुष्यजन्म केवल कल्याणके लिये ही मिला है।

मनुष्यजन्ममें सत्संग मिल जाय, गीता—जैसे ग्रन्थसे परिचय हो जाय, भगवन्नामसे परिचय हो जाय तो साधकको यह समझना चाहिये कि भगवान्ने बहुत विशेषतासे कृपा कर दी है; अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही, अब आगे हमारा जन्म-मरण नहीं होगा। कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता, तो ऐसा मौका नहीं मिलता। परन्तु 'भगवान्की कृपासे उद्धार होगा ही'—इसके भरोसे साधन नहीं छोड़ना चाहिये, प्रत्युत तत्परता और उत्साहपूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। समय सार्थक बने, कोई समय खाली न जाय—ऐसी सावधानी हरदम रखनी चाहिये। परन्तु अपने कल्याणकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि अबतक जिसने इतना प्रबन्ध किया है, वही आगे भी करेगा। जैसे, किसीने भोजनके लिये निमन्त्रण दे दिया, आसन बिछा दिया, आसनपर बैठा दिया, पतल दे दी, लोटेमें जल भरकर पासमें रख दिया। अब कोई चिन्ता करे कि यह व्यक्ति भोजन देगा कि नहीं देगा, तो यह बिलकुल गलतीकी बात है। कारण कि अगर भोजन नहीं देना होता तो वह निमन्त्रण क्यों देता? भोजनकी तैयारी क्यों करता? परन्तु जब उसने निमन्त्रण दिया है, बुलाया है, तैयारी की है, तब उसको भोजन देना ही पड़ेगा। हम भोजनकी चिन्ता क्यों करें? अब तो बस,

ज्यों-ज्यों भोजनके पदार्थ आर्ये, त्यों-त्यों उनको पाते जायँ। ऐसे ही भगवान्ने हमको मनुष्यशरीर दिया है और उद्धारकी सब सामग्री (सत्संग, भगवन्नाम आदि) जुटा दी है, तो हमारा उद्धार होगा ही, अब तो हम संसार-समुद्रके किनारे आ गये हैं—ऐसा दृढ़ विश्वास करके निमित्तमात्र बनकर साधन करना चाहिये।

जिसके पूर्वजन्मोंके पुण्य होते हैं, वही भगवान्की तरफ चल सकता है—अगर ऐसा माना जाय तो पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्योंका फल तो पशु-पक्षी-कीट-पतंग आदि योनि-वाले प्राणी भोगते ही हैं, फिर मनुष्यमें और उन प्राणियोंमें क्या फरक रहेगा? भगवान्का कृपा करके मनुष्यशरीर देना कहीं सार्थक होगा? तथा मनुष्यजन्मकी विलक्षणता, महिमा क्या होगी? मनुष्यजन्मकी महिमा तो इसीमें है कि मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर अपने कल्याणके मार्गमें लग जाय।१

'वासुदेवः सर्वम्'२—महासर्गके आदिमें एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—'सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छान्दोग्य० ६।२।३) और अन्तमें अर्थात् महाप्रलयमें एक भगवान् ही शेष रह जाते हैं—'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भा० १०।३।२५)। इस प्रकार जब आदि और अन्तमें एक भगवान् ही रहते हैं, तब बीचमें दूसरा कहाँसे आया? क्योंकि संसारकी रचना करनेमें भगवान्के पास अपने सिवाय कोई सामग्री नहीं थी, वे तो स्वयं संसारके रूपसे प्रकट हुए हैं। इसलिये यह सब वासुदेव ही है।

जो चीज आदि और अन्तमें होती है, वही चीज मध्यमें

१-(१) लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमित्यमपीह धीरः।

तूर्णं यतेन न पतेदमुत्प्लुयावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० ११।१।२९)

'अनेक जन्मोंके बाद इस परमपुरुषार्थके साधनरूप मनुष्यशरीरको, जो अनित्य होनेपर भी अत्यन्त दुर्लभ है, पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्यु आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर ले। विषयभोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें इस अमूल्य जीवनको नहीं खोना चाहिये।'

(२) नुदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।

मयानुकूलंन नभस्वतेतिरितं पुमान् भवाभिर्व न तेरतु स आत्महा॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।१७)

'यह मनुष्यशरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसारसागरसे पार होनेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है, जिसे गुरुरूप नाविक चलाता है और मैं (भगवान्) वायुरूप होकर इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ानेमें सहायता देता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो मनुष्य इस संसारसागरसे पार नहीं होता, वह अपनी आत्माका हनन करनेवाला अर्थात् पतन करनेवाला है।'

२-यहाँ 'वासुदेवः' शब्द पुँल्लिंगमें और 'सर्वम्' शब्द नपुंसकलिंगमें आया है। यहाँ 'वासुदेवः सर्वः' भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा न कहकर 'वासुदेवः सर्वम्' कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि 'सर्वम्' शब्दमें स्त्री, पुरुष, नपुंसक, स्थावर-जंगम आदि सबका समाहार हो जाता है।

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

५४१

भी होती है। जैसे, सोनेके गहने आदिमें सोना थे और अन्तमें सोना रहेंगे, तो गहनोंमें दूसरी चीज कहाँसे आयेगी? केवल सोना-ही-सोना है। मिट्टीसे बननेवाले बर्तन पहले मिट्टी थे और अन्तमें मिट्टी हो जायेंगे, तो बीचमें मिट्टीके सिवाय क्या है? केवल मिट्टी-ही-मिट्टी है। खाँड़से बने हुए खिलौने पहले खाँड़ थे और अन्तमें खाँड़ ही हो जायेंगे, तो बीचमें खाँड़के सिवाय क्या है? केवल खाँड़-ही-खाँड़ है। इसी तरह सुष्टिके पहले भगवान् थे और अन्तमें भगवान् ही रहेंगे; तो बीचमें भगवान्के सिवाय क्या है? केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं। जैसे सोनेको चाहे गहनोंके रूपमें देखें, चाहे पासेके रूपमें देखें, चाहे वरकके रूपमें देखें, है वह सोना ही। ऐसे ही संसारमें अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें एक भगवान् ही हैं।

जबतक मनुष्यकी दृष्टि गहनोंकी तरफ, उसकी आकृतियोंकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'यह सोना ही है' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही जबतक मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक 'सब कुछ भगवान् ही हैं' इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। परन्तु जब गहनोंकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब गहनोंमें सोनेकी भावना नहीं होती, प्रत्युत 'यह सोना ही है' ऐसी भावना होती है। ऐसे ही जब संसारकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब संसारमें भगवान्की भावना नहीं होती, प्रत्युत 'सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं' ऐसी भावना होती है। कारण कि संसारमें भगवान्की भावना करनेसे संसारकी सत्ता साथमें रहती है अर्थात् संसारकी भावना रखते हुए उसकी सत्ता मानते हुए, उसमें भगवान्की भावना करते हैं। अतः जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, संसारको महत्त्व देते हैं, तबतक संसारमें भगवान्की भावना करते रहनेपर भी 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव नहीं होता। ब्रह्मभूत मनुष्य निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है (पाँचवें

अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत योगीको उत्तम सुख मिलता है (छठे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत भगवान्की पराभक्तिको प्राप्त होता है और उस भक्तिसे तत्त्वको जानकर उसमें प्रवेश करता है (अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ-पचपनवाँ श्लोक)— गीताकी दृष्टिसे ये तीनों ही अवस्थाएँ हैं। अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है। परन्तु 'वासुदेवः सर्वम्'—यह अवस्था नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्व है। इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

यह जो कुछ संसार दीखता है, सब भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान्के सिवाय इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता थी नहीं, है नहीं और कभी होगी भी नहीं। अतः देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, वह सब-का-सब भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्की आज्ञा है—

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्णातेऽन्यैरपीन्द्रियैः।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वर्मजसा॥

(श्रीमद्भगवद्गीता ११।१३।२४)

'मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक समझ लीजिये।'

इस आज्ञाके अनुसार ही उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमीका जीवन हो जाता है। वह सब जगह भगवान्को ही देखता है—'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति' (गीता ६।३०)। वह सब कुछ करता हुआ भी भगवान्में ही रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१)।

किसीको एक जगह भी अपनी प्रिय वस्तु मिल जाती है, तो उसको बड़ी प्रसन्नता होती है, फिर जिसको सब जगह ही अपने प्यारे इष्टदेवका अनुभव होता है,* उसकी प्रसन्नताका, आनन्दका क्या ठिकाना? उस आनन्दमें विभोर होकर भगवान्का प्रेमी भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है,

  • जित देखों तित स्याममई है।

स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घन घटा छड़ है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है॥ हैं बीरी, कै लोगन ही की, स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद सार काम बिजई है॥ नीलकंठको कंठ स्याम है, मनहुँ स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीप सिखापर स्यामतई है॥ नर देबनकी कोन कथा है, अलख ब्रह्मछवि स्याममई है॥

५४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

कभी नाचता है और कभी चुप होकर शान्त हो जाता है।* इस तरह उसका जीवन अलौकिक आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसके लिये किसी भी अवस्थामें, किसी भी परिस्थितिमें कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता।

जो भक्तिमार्गपर चलता है, वह 'यह सत् है और यह असत् है' इस विवेकको लेकर नहीं चलता। उसमें विवेक-ज्ञानकी प्रधानता नहीं रहती। उसमें केवल भगवद्भावकी ही प्रधानता रहती है। केवल भगवद्भावकी प्रधानता रहनेके कारण उसके लिये यह सब संसार चिन्मय हो जाता है। उसकी दृष्टिमें जडता रहती ही नहीं। भगवान्में तल्लीनता होनेसे भक्तका शरीर भी जड नहीं रहता, प्रत्युत चिन्मय हो जाता है, जैसे—मीराबाईका शरीर (चिन्मय होनेसे) भगवान्के विग्रहमें लीन हो गया था।

ज्ञानमार्गमें जहाँ सत्-असत्का विवेक होता है, वहाँ परिणाममें सत्-असत् दोकी सत्ता नहीं रहती, केवल सत्-स्वरूप ही रह जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें सत्-असत् सब कुछ भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। फिर भक्त भगवत्स्वरूप संसारकी सेवा करता है। सेवामें पहले तो सेवक, सेवा और सेव्य—ये तीन होते हैं। परन्तु जब भगवद्भावकी अत्यधिक गद्गदा हो जाती है, तब सेवक-भावकी विस्मृति हो जाती है। फिर भक्त स्वयं सेवारूप होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। केवल एक भगवत्सत् ही शेष रह जाता है। इस तरह भगवद्भावमें तल्लीन हुए भगवान्के प्रेमी भक्त जहाँ-कहीं भी विचरते हैं, वहाँ उनके दर्शन, स्पर्श, भाषण आदिका प्राणियोंपर बड़ा असर पड़ता है।

जबतक मनुष्योंकी पदार्थोंमें भोगबुद्धि रहती है, तबतक उनको उन पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप समझमें नहीं आता। परन्तु जब भोगबुद्धि सर्वथा हट जाती है, तब केवल भगवत्स्वरूप ही देखनेमें आ जाता है।

मार्मिक बात

'वासुदेवः सर्वम्'—इस तत्त्वको समझनेके दो प्रकार हैं—(१) संसारका अभाव करके परमात्माको रखना

अर्थात् संसार नहीं है और परमात्मा है, (२) सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं। इसमें जो परिवर्तन दीखता है, वह भी भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि भगवान्के सिवाय उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

उपर्युक्त दोनों ही प्रकार साधकोंके लिये हैं। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें आकर्षण (राग) है, उसको 'यह सब कुछ नहीं है, केवल परमात्मा ही है'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें किंचिन्मात्र भी आकर्षण नहीं है और जो केवल भगवान्के स्मरण, चिन्तन, जप, कीर्तन आदिमें लगा रहता है, उसको 'संसाररूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। वास्तवमें देखा जाय तो ये दोनों प्रणालियाँ तत्त्वसे एक ही हैं। इन दोनोंमें फरक इतना ही है कि जैसे सोनेमें गहने और गहनोंके नाम, रूप, आकृति आदि अलग-अलग होते हुए भी सब कुछ सोना-ही-सोना जानना। जहाँपर संसारका अभाव करके परमात्माको तत्त्वसे जानना है, वहाँ 'विवेक' की प्रधानता है; और जहाँ संसारको भगवत्स्वरूप मानना है, वहाँ 'भाव' की प्रधानता है। निर्गुणके उपासकोंमें विवेककी प्रधानता होती है और सगुणके उपासकोंमें भावकी प्रधानता होती है।

संसारका अभाव करके परमात्मतत्त्वको जानना भी तत्त्वसे जानना है और संसारको भगवत्स्वरूप मानना भी तत्त्वसे जानना है। कारण कि वास्तवमें तत्त्व एक ही है। फरक इतना ही है कि ज्ञानमार्गमें जाननेकी प्रधानता रहती है और भक्तिमार्गमें माननेकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानमार्गमें माननेको भी जाननेके अर्थमें लिया है—'इति मत्वा न सज्जते' (गीता ३।२८), और भक्तिमार्गमें जाननेको भी माननेके अर्थमें लिया है (पाँचवें अध्यायका उनीसवाँ, नवें अध्यायका तेरहवाँ, दसवें अध्यायका तीसरा, सातवाँ, चौबीसवाँ, सत्ताईसवाँ और इकतालीसवाँ श्लोक)। इसमें एक खास बात समझनेकी है कि परमात्माको जानना और मानना—दोनों ही ज्ञान हैं तथा संसारको सत्ता देकर संसारको जानना और मानना—दोनों ही अज्ञान हैं।

  • वाग् गदगदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्षणं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उदगायति नृत्यते च मद्भक्तिमुक्तो भुवनं पुनाति॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२४)

'जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करती-करती गदगद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंको याद करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारंबार रोता रहता है, कभी-कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।'

संसारको तत्त्वसे जाननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका

अभाव हो जाता है, और परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर

परमात्माका अनुभव हो जाता है। ऐसे ही संसार भगवत्स्वरूप

है-ऐसा दृढ़तासे माननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव

हो जाता है और फिर संसार संसार-रूपसे न दीखकर

भगवत्स्वरूप दीखने लग जाता है। तात्पर्य है कि

परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर जानना और मानना-दोनों

एक हो जाते हैं।

'इति ज्ञानवान्मा प्रपद्यते'-जो प्रतिक्षण बदलने-

वाले संसारकी सत्ताको मानते हैं, वे अज्ञानी हैं, मूढ़ हैं;

परन्तु जिनकी दृष्टि कभी न बदलनेवाले भगवत्तत्त्वकी

तरफ रहती है, वे ज्ञानवान् हैं, असम्मूढ़ हैं।

'ज्ञानवान्' कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्वसे समझता

है कि सब जगह, सबमें और सबके रूपमें वस्तुतः एक

भगवान् ही हैं। ऐसे ज्ञानवान्को ही आगे पन्द्रहवें अध्यायके

उन्नीसवें श्लोकमें 'सर्ववित्' कहा गया है।

ज्ञानवान्की शरणागति अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु

भक्तोंकी तरह नहीं है। भगवान्ने ज्ञानीको अपनी आत्मा

बताया है-'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' (गीता ७।१८)।

जब ज्ञानी भगवान्की आत्मा हुआ तो ज्ञानीकी आत्मा

भगवान् हुए। अतः एक भगवत्तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता

ही नहीं रही। इसलिये ज्ञानीकी शरणागति उन तीनों भक्तोंसे

विलक्षण होती है। उसके अनुभवमें एक भगवत्तत्त्वके

सिवाय कोई दूसरी सत्ता होती ही नहीं-यही उसकी

शरणागति है।

भगवान्की दृष्टिमें अपने सिवाय कोई अन्य तत्त्व है

ही नहीं-'मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव' (गीता

७।७)। जैसे सूतकी मालामें मणियोंकी जगह सूतकी गाँठ

लगा दी, तो मालामें सूतके सिवाय अन्य क्या रहा? केवल

सूत ही रहा। हाँ, दीखनेमें गाँठें अलग दीखती हैं और धागा

अलग दीखता है; परन्तु तत्त्वसे एक ही चीज (सूत) है।

ऐसे ही परमात्मा संसारमें व्यापक दीखते हैं; परन्तु तत्त्वसे

परमात्मा और संसार एक ही है। उनमें व्याप्य-व्यापकका

भाव नहीं है। अतः सब कुछ एक वासुदेव ही है-ऐसा

जिसको अनुभव होता है, वह भी भगवत्स्वरूप ही हुआ।

भगवत्स्वरूप हो जाना ही उसकी शरणागति है।

'स महात्मा सुदुर्लभः'-बहुत-से मनुष्य तो 'हमें

परमात्माकी प्राप्ति करनी है' इस तरफ दृष्टि ही नहीं डालते

और ऐसा चाहते ही नहीं। जो इस तरफ दृष्टि डालते हैं,

वे भी उत्कण्ठापूर्वक अनन्यभावसे अपने जीवनको सफल

करनेमें नहीं लगते। जो अपना कल्याण करनेमें लगते हैं,

वे भी मूर्खताके कारण परमात्मप्राप्तिसे निराश होकर अपने

असली अवसरको खो देते हैं, जिससे वे परम लाभसे

वंचित रह जाते हैं।

इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि

मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक मनुष्य वास्तविक

सिद्धिके लिये यत्न करता है। यत्न करनेवाले उन सिद्धोंमें

भी कोई एक मनुष्य 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसा तत्त्वसे

जानता है। ऐसा तत्त्वसे जाननेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ

है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमात्मा दुर्लभ हैं, प्रत्युत

सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेवाले दुर्लभ हैं।

सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिसे लिये लगनेपर मनुष्यमात्रको

परमात्मप्राप्ति हो सकती है; क्योंकि उसकी प्राप्तिके लिये

ही मनुष्य-शरीर मिला है।

संसारमें सब-के-सब मनुष्य धनी नहीं हो सकते।

सांसारिक भोग-सामग्री सबको समान रीतिसे नहीं मिल

सकती। परन्तु जो परमात्मतत्त्व भगवान् शंकरको प्राप्त है,

सनकादिकोंको प्राप्त है, नारद, वसिष्ठ आदि देवर्षि-

महर्षियोंको प्राप्त है, वही तत्त्व सब मनुष्योंको समानरूपसे

अवश्य प्राप्त हो सकता है। इसलिये मनुष्यको ऐसा दुर्लभ

अवसर कभी नहीं खोना चाहिये।

भगवान्की यह एक अलौकिक विलक्षणता है कि वे

भूखेके लिये अन्नरूपसे, प्यासेके लिये जलरूपसे और

विषयीके लिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-रूपसे

बनकर आते हैं। वे ही मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ बनकर आते हैं।

वे ही संकल्प-विकल्प बनकर आते हैं। वे ही व्यक्ति

बनकर आते हैं। परन्तु साथ-ही-साथ दुःख-रूपसे आकर

मनुष्यको चेताते हैं कि अगर तुम इन वस्तुओंको भोग्य

मानकर इनके भोक्ता बनोगे, तो इसके फलस्वरूप तुमको

दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको शर्म

आनी चाहिये कि मैं भगवान्को भोग-सामग्री बनाता हूँ,

मेरे सुखके लिये भगवान्को सुखकी सामग्री बनना पड़ता

है! भगवान् कितने विचित्र दयालु हैं कि यह प्राणी जो

चाहता है, भगवान् वैसे ही बन जाते हैं!

देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ आ रहा है, और

जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, वह सब भगवान्

ही हैं और भगवान्का ही है-ऐसा मान ले, वास्तविकतासे

अनुभव कर ले तो मनुष्य विलक्षण हो जाता है, 'स

५४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

महात्मा सुदुर्लभः ’ हो जाता है।

एक वैरागी बाबाजी थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। उनके पास सोनेकी बनी हुई एक गणेशजीकी और एक चूहेकी मूर्ति थी। वे दोनों मूर्तियों तौलमें बराबर थीं। एक बार बाबाजीने तीर्थमें जानेका विचार किया और वे उन मूर्तियोंकी बिक्री करनेके लिये सुनारके पास गये। सुनारने उन दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके बराबर दाम बता दिये तो बाबाजी सुनारपर बिगड़ गये कि तू क्या कह रहा है? गणेशजी तो देवता हैं और चूहा उनका वाहन है, पर तू दोनोंका बराबर मूल्य बता रहा है! यह कैसे हो सकता है? सुनार बोला कि बाबाजी! मैं गणेश और चूहेको नहीं खरीदता हूँ, मैं तो सोना खरीदता हूँ, सोनेका जितना वजन होगा, उसके अनुसार ही उसका मूल्य होगा। अगर सुनार गणेश और चूहेको देखेगा तो उसको सोना नहीं दीखेगा और अगर सोनेको देखेगा तो उसको गणेश और चूहा नहीं दीखेगा। इसलिये सुनार न गणेशको देखता है, न चूहेको, वह तो केवल सोनेको ही देखता है। ऐसे ही भगवान्के साथ अभिन्न हुआ महात्मा संसारको नहीं देखता, वह तो केवल भगवान्को ही देखता है।

कोई एक सन्त रास्तेमें चलते-चलते किसी खेतमें लघुशंका करनेको बैठे। उस खेतके मालिकने उनको देखा तो ‘मतीरा (तरबूजा) चुरानेवाला यही आदमी है’—ऐसा समझकर पीछेसे आकर उनके सिरपर लाठी मार दी। फिर देखा कि ये तो कोई बाबाजी हैं; अतः हाथ जोड़कर बोला—‘महाराज! मैंने आपको जाना नहीं और चोर समझकर लाठी मार दी; इसलिये महाराज! मुझे माफ करो।’ सन्तने कहा—‘माफ क्या करना? तूने मेरेको तो मारा नहीं, तूने तो चोरको मारा है।’ उसने कहा—‘अब क्या करूँ महाराज?’ सन्तने कहा—‘तरी जैसी मरजी हो, वैसे कर।’ उसने सन्तको बैलगाड़ीमें ले जाकर अस्पतालमें भरती कर दिया। वहाँ मलहम-पट्टी करनेके बाद कोई आदमी दूध लेकर आया और बोला—‘महाराज! दूध पी लो।’ सन्तने कहा—‘तू बड़ा चालाक-होशियार है। तेरे विचित्र-विचित्र रूप हैं। तू विचित्र-विचित्र लीलाएँ करता है। पहले तो तूने लाठीसे मारा और अब कहता है दूध पी लो!’ वह आदमी डर गया और कहने लगा—‘बाबाजी! मैंने नहीं मारा है।’ सन्त बोले—‘बिलकुल झूठी बात है। मैं पहचानता हूँ, तू ही था। तूने ही मारा है। तेरे सिवाय और कौन आये, कहाँसे आये? और कैसे आये? पहले तो मारा लाठीसे और अब आया दूध पिलाने! मैं

दूध पी लूँगा, पर था तू ही।’ इस तरह बाबाजी तो अपनी ‘वासुदेवः सर्वम्’—वाली भाषामें बोल रहे थे और वह सोच रहा था कि बाबाजी कहीं फँसा न दें! तात्पर्य यह है कि सन्त केवल भगवान्को ही देखते हैं कि लाठी मारनेवाला, मरहम-पट्टी करनेवाला, दूध पिलानेवाला—सब वह ही है।

महात्माओंकी महिमा

जहाँ सन्त-महात्माओंका वर्णन आता है, वहाँ कहा गया है—

(१) जो ऊँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, वे अभिन्नभाव और अखण्डरूपसे केवल अपने स्वरूपमें अथवा भगवत्त्वमें स्थित रहते हैं। उनके जीवनसे, उनके दर्शनसे, उनके चिन्तनसे, उनके शरीरका स्पर्श की हुई वायुके स्पर्शसे जीवोंका कल्याण होता रहता है।

(२) जो मनुष्य उन महापुरुषोंकी महिमाको नहीं जानते, उनके सामने वे महापुरुष अपने भावोंसे नीचे उतरते हैं तो कुछ कह देते हैं; जैसे—सन्त-महात्माओंने ऐसा किया है, उनके किये हुए आचरणों और कहे हुए वचनोंके अनुसार ही शास्त्र बनते हैं, आदि।

(३) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो कह देते हैं कि सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये।

(४) जिनसे उपर्युक्त बातका पालन नहीं होता, उन साधकोंके सामने वे स्वयं ऐसा विधान कर देते हैं कि ऐसा करना चाहिये, ऐसा नहीं करना चाहिये।

(५) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो ‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—ऐसी आज्ञा दे देते हैं।

[सन्तोंकी आज्ञामें जो सिद्धान्त भरा हुआ है, वह आज्ञापालकमें उतर आता है। उनकी आज्ञापालनके बिना भी उनके सिद्धान्तका पालन करनेवालोंका कल्याण हो जाता है; परन्तु वे महात्मा आज्ञाके रूपमें जिसको जो कुछ कह देते हैं, उसमें एक विलक्षण शक्ति आ जाती है। आज्ञापालन करनेवालेको कोई परिश्रम नहीं पड़ता और उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक वैसे आचरण होने लगते हैं।]

(६) जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करते, ऐसे नीचे दर्जेके साधकोंको वे कहीं-कहीं, कभी-कभी शाप या वरदान दे देते हैं।

इस परम्परामें देखा जाय तो (१) जो कुछ नहीं करते, निरन्तर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं—यह उन सन्त-महापुरुषोंका ऊँचा दर्जा हो गया, (२) शास्त्रोंने ऐसा कहा,

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

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सन्त-महात्माओंने ऐसा किया—इस तरह संकेत करनेसे उन सन्तोंका दूसरा दर्जा हो गया, (३) सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—ऐसा कहनेसे सन्तोंका तीसरा दर्जा हो गया, (४) ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—इस तरहका विधान करनेसे उन सन्तोंका चौथा दर्जा हो गया, (५) तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो—ऐसा कहना उन सन्तोंके पाँचवें दर्जेकी बात हो गयी, (६) शाप और वरदान देना उन सन्तोंके छठे दर्जेकी बात हो गयी। इन सब दर्जोंमें सन्त-महापुरुषोंका जो नीचे उतरना है, उसमें उनकी क्रमशः अधिकाधिक दयालुता है। वे शाप और वरदान दे दें, ताड़ना कर दें, इसमें उन सन्तोंका दर्जा तो नीचे हुआ, पर इसमें उनका अत्यधिक त्याग है। कारण कि उन्होंने जीवोंके

उद्धारके लिये ही नीचा दर्जा स्वीकार कर लिया है। इसमें उनका लेशामात्र भी अपना स्वार्थ नहीं है।

ऐसे ही भगवान् भी अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, यह उनके ऊँचे दर्जेकी बात है; परन्तु वे ही भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण, कृपाके परवश होकर जीवोंका उद्धार करनेके लिये अवतार लेकर आदर्श लीला करते हैं। उनकी लीलाओंको देखने-सुननेसे लोगोंका उद्धार होता है। भगवान् और भी नीचे उतरते हैं तो उपदेश देते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो आज्ञा दे देते हैं। और भी नीचे उतरते हैं तो शासन करके लोगोंको सही रास्तेपर लाते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो शाप और वरदान दे देते हैं अथवा उसके और संसारके हितके लिये उसका शरीरसे वियोग भी करा देते हैं।

परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चार प्रकारके भक्तोंद्वारा अपना भजन करनेकी बात कही थी—‘चतुर्विधा भजन्ते माम् ’। उनमें ज्ञानीके भजनका क्या स्वरूप है—इसको इस श्लोकमें बताते हैं कि ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा अनुभव करना ही ज्ञानीका भजन है, शरणागति है। असली शरणागति वही है, जिसमें शरणागतकी सत्ता ही न रहे, प्रत्युत शरण्य ही रह जाय।

सब कुछ भगवान् ही हैं—यह वास्तविक ज्ञान है। ऐसे वास्तविक ज्ञानवाला महात्मा भक्त भगवान्के शरण हो जाता है अर्थात् अपना अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान्में लीन हो जाता है। फिर मैंपन नहीं रहता अर्थात् प्रेमवाला नहीं रहता, प्रत्युत केवल प्रेमस्वरूप भगवान् रह जाते हैं, जिनमें मैं-तू-यह-वह चारों ही नहीं हैं। यही शरणागतिका वास्तविक स्वरूप है।

‘महात्मा’ शब्दका अर्थ है—महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा१। जिसमें अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयता है, वह ‘अल्पात्मा’ है।

यहाँ ‘वासुदेवः’ पद पुँल्लिंगमें आया है; अतः यहाँ ‘वासुदेवः सर्वः’ पद आने चाहिये थे। परन्तु यहाँ ‘सर्वः’ पद न देकर ‘सर्वम्’ पद दिया गया है, जो नपुंसकलिंगमें है। अगर तीनों लिंगों—(सर्वः, सर्वा और सर्वम्)—का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिंग (सर्वम्) ही एकशेष रहता है। नपुंसकलिंगके अन्तर्गत तीनों लिंग आ जाते हैं। अतः ‘सर्वम्’ पदमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक—सबका समाहार हो जाता है। गीतामें जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंके लिये पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग—इन तीनों ही लिंगोंका प्रयोग हुआ है२। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि जगत्, जीव और परमात्मा—ये तीनों ही ‘सर्वम्’ शब्दके अन्तर्गत हैं। अतः तीनों लिंगोंसे कही जानेवाली सब-की-सब वस्तुएँ, व्यक्ति, परिस्थितियाँ आदि परमात्मा ही हैं।

‘वासुदेवः सर्वम्’—इसमें ‘सर्वम्’ तो असत् है और ‘वासुदेवः’ सत् है। असत्का भाव विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। तात्पर्य है कि

१-गीतामें भगवान्ने ‘महात्मा’ शब्दका प्रयोग केवल भक्तके लिये ही किया है। जो भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन साधकोंको भी महात्मा कहा है—‘महात्मानस्तु मां पार्थ देवीं प्रकृतिमाश्रिताः’ (१।१३), जो भगवान्से अभिन्न हो गये हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’ (७।१९), और जो परमसिद्धि (परमप्रेम)-को प्राप्त हो चुके हैं, उनको भी महात्मा कहा है—‘नाणुर्वन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः’ (८।१५)। इसी तरह गीतामें भगवान्ने ‘सुकृतिनः’ (७।१६), ‘उदाराः’ (७।१८), ‘सुदुर्लभः’ (७।१९), ‘युक्ततमः’ (६।४७; १२।२), ‘अद्भुष्टा’, ‘मैत्रः’, ‘कृष्णः’ (१२।१३), ‘अतीव मे प्रियाः’ (१२।२०) आदि पदोंका प्रयोग भी केवल भक्तके लिये ही किया है।

२-द्रष्टव्य—‘गीता-दर्पण’ ग्रन्थमें लेख-संख्या १९—‘गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको अलिंगता’।

५४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सत्-ही-सत् है, असत् है ही नहीं। वासुदेव-ही-वासुदेव है, 'सर्वम्' है ही नहीं। परन्तु कहने, सुनने, पढ़नेवाले साधकोंकी दृष्टिमें 'सर्वम्' (संसार) रहता है, इसलिये भगवान् 'सर्वम्' की धारणा मिटानेके लिये 'वासुदेवः सर्वम्' कहते हैं।

कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, लययोगी, हठयोगी, राजयोगी, मन्त्रयोगी, अनासक्तयोगी आदि अनेक तरहके योगी हैं, जिनका शास्त्रोंमें वर्णन हुआ है, पर उनको भगवान् अत्यन्त दुर्लभ नहीं बताते हैं, प्रत्युत 'सब कुछ वासुदेव ही है'—इसका अनुभव करनेवाले महात्माको ही अत्यन्त दुर्लभ बताते हैं।

भगवान् सम्पूर्ण संसारके बीज हैं—'यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन' (गीता १०।३९), 'बीजं मां सर्वभूतानां विद्वि पार्थ सनातनम्' (गीता ७।१०)। बीजसे जितनी चीजें पैदा होती हैं, वे सब बीजरूप ही होती हैं। जैसे, गेहूँसे पैदा होनेवाली खेतीको भी गेहूँ ही कहते हैं। किसानलोग कहते हैं कि गेहूँकी खेती बहुत अच्छी हुई है! देखो, खेतमें गेहूँ खड़े हैं, गेहूँसे खेत भरा है! परन्तु कोई शहरमें रहनेवाला व्यापारी हो, वह उसको गेहूँ कैसे मान लेगा? वह कहेगा कि मैंने बोर-के-बोर गेहूँ खरीदा और बेचा है, क्या मैं नहीं जानता कि गेहूँ कैसा होता है? यह तो घास है, डंठल और पत्ती है, यह गेहूँ नहीं है। परन्तु खेती करनेवाला जानकार आदमी तो यही कहेगा कि यह वह घास नहीं है, जो पशु खाया करते हैं; यह तो गेहूँ है। खेतीको गाय खा जाती है तो कहते हैं कि तुम्हारी गाय हमारा गेहूँ खा गयी, जबकि उसने गेहूँका एक दाना भी नहीं खाया। खेतमें भले ही गेहूँका एक दाना भी न दीखे, पर यह गेहूँ है—इसमें सन्देह नहीं होता। कारण कि यह पहले भी गेहूँ ही था, अन्तमें भी गेहूँ रहेगा; अतः बीचमें खेतीरूपसे अलग दीखते हुए भी गेहूँ ही है। अभी तो यह हरी-हरी घास दीखती है, पर बादमें पकनेपर इससे गेहूँ ही निकलेगा। इसी तरह संसारके पहले भी परमात्मा थे—'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छान्दोग्य० ६।२।१), अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे—'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भग० १०।३।२५)। अतः बीचमें भी सब कुछ परमात्मा ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।

जबतक साधकमें अहम् है, तबतक वह भोगी है। मैं योगी हूँ—यह योगका भोग है, मैं ज्ञानी हूँ—यह ज्ञानका भोग है, मैं प्रेमी हूँ—यह प्रेमका भोग है। जबतक साधकमें भोग रहता है, तबतक उसके पतनकी सम्भावना रहती है। जो योगका भोगी है, वह कभी विषयोंका भोगी भी हो सकता है; जो ज्ञानका भोगी है, वह कभी अज्ञानका भोगी भी हो सकता है और जो प्रेमका भोगी है, वह कभी रागका भोगी भी हो सकता है। कारण कि उसमें पहलेसे भोगकी प्रवृत्ति, आदत रही है। जब भोगी नहीं रहता, तब केवल योग रहता है। योग रहनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। परन्तु मुक्त होनेपर भी महापुरुषने जिस साधनसे मुक्ति प्राप्त की है, उस साधनका एक संस्कार (अहम्की सूक्ष्म गन्ध) रह जाता है, जो दूसरे दार्शनिकोंके साथ एकता नहीं होने देता। इस संस्कारके कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें मतभेद रहता है। अपने मतका संस्कार दूसरे दार्शनिकोंके मतोंका समान आदर नहीं करने देता। परन्तु प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होनेपर अपने मतका संस्कार भी नहीं रहता और सबके साथ एकता हो जाती है अर्थात् सम्पूर्ण मतभेद मिट जाते हैं और 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव हो जाता है। वास्तवमें 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव करनेवाला, इसको जाननेवाला, कहनेवाला भी नहीं रहता, प्रत्युत एक वासुदेव ही रहता है, जो अनादिकालसे ज्यों-का-त्यों है। सबमें परमात्माको देखनेसे सम्पूर्ण मतोंमें समान आदरभाव हो जाता है; क्योंकि अपने इष्ट परमात्मासे विरोध सम्भव ही नहीं है—'निज प्रभुमय देखहि जगत केहि सन करहि विरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)।

ईश्वर और जीवके विषयमें दो तरहका वर्णन है—(१) ईश्वर समुद्र है और जीव उसकी तरंग है अर्थात् तरंग समुद्रकी है और (२) जीव (स्वरूप) समुद्र है और ईश्वर उसकी तरंग है अर्थात् समुद्र तरंगका है। इन दोनोंमें तरंग समुद्रकी है—ऐसा मानना ही ठीक दीखता है। समुद्र तरंगका है—ऐसा मानना ठीक नहीं दीखता; क्योंकि समुद्र अपेक्षाकृत नित्य है और तरंग अनित्य (क्षणभंगुर) है। अतः तरंग समुद्रकी होती है, समुद्र तरंगका नहीं होता। अगर अपनेको समुद्र और ईश्वरको तरंग मानें तो इस मान्यतासे अनर्थ होगा; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान पैदा हो जायगा तथा अहम् (चिञ्जड्ग्रन्थि) तो नित्य रहेगा और ईश्वर अनित्य हो जायगा! कारण कि जीवमें अनादिकालसे अहम्- (व्यक्तित्व-) का अभ्यास पड़ा हुआ है। अतः जहाँ स्वरूपको अहम् कहेंगे, वहाँ वही अहम् आयेगा, जो अनादिकालसे है। उस अहम्के मिटनेसे ही मुक्ति होती है। उपर्युक्त दोनों बातोंके सिवाय तीसरी एक विलक्षण बात है कि जल-तत्वमें न समुद्र है, न तरंग है अर्थात् वहाँ समुद्र और तरंगका भेद नहीं है। यही वास्तविक बात है। समुद्र

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

५४७

और तरंग तो सापेक्ष हैं, पर जल-तत्त्व निरपेक्ष है।

जैसे जल-तत्त्वमें समुद्र, नदी, वर्षा, ओस, कोहरा, भाप, बादल आदि सब मिटकर एक हो जाते हैं, ऐसे ही 'वासुदेवः सर्वम्' में सभी साधन, योगमार्ग मिटकर एक (वासुदेवरूप) हो जाते हैं। जैसे जल-तत्त्वमें कोई भेद नहीं है, ऐसे ही 'वासुदेवः सर्वम्' में कोई भेद नहीं है। मतभेदसे असन्तोष होता है, पर 'वासुदेवः सर्वम्' में कोई मतभेद न होनेसे सबको सर्वथा सन्तोष हो जाता है। 'वासुदेवः सर्वम्' में न योगी है, न ज्ञानी है, न प्रेमी है, इसलिये इसका अनुभव करनेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

एक ही जल बर्फ, कोहरा, बादल, ओला, वर्षा, नदी, तालाब, समुद्र आदि अनेक रूपोंमें हो जाता है। कड़ाहीमें बर्फ डालकर उसको अगिनपर रखा जाय तो बर्फ पिघलकर पानी हो जायगी। फिर पानी भी भाप हो जायगा और भाप परमाणु होकर निराकार हो जायगा। जल ही कोहरारूपसे होता है, वही बादलरूपसे होता है, वही निराकाररूपसे होता है, वही बर्फरूपसे होता है, वही ओलारूपसे होता है, वही वर्षारूप होकर पृथ्वीपर बरसता है, वही नदीरूपसे होता है, वही समुद्ररूपसे होता है। अनेक रूपसे होनेपर भी तत्त्वसे जल एक ही रहता है। इसी तरह एक ही भगवान् अनेक रूपसे बन जाते हैं। जैसे जल ठण्डकसे जमकर बर्फ हो जाता है और गरमीसे पिघलकर तथा भाप बनकर परमाणुरूप हो जाता है, ऐसे ही अज्ञानरूपी ठण्डकसे भगवान् स्थूल तथा जड़ संसाररूपसे दीखते हैं और ज्ञानरूपी अगिनसे सूक्ष्म तथा चेतन वासुदेवरूपसे दीखते हैं। जल चाहे बर्फरूपसे दीखे, चाहे भाप, बादल आदि रूपोंसे दीखे, हैं वह जल ही। जलके सिवाय कुछ नहीं है। ऐसे ही भगवान् चाहे संसाररूपसे दीखें, चाहे अन्य रूपोंसे दीखें, हैं वे भगवान् ही। भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है।

साधकसे एक गलती होती है कि वह अपनेको अलग रखकर संसारको भगवत्स्वरूप देखनेकी चेष्टा करता है अर्थात् 'वासुदेवः सर्वम्' को अपनी बुद्धिका विषय बनाता है। वास्तवमें दीखनेवाला संसार ही भगवत्स्वरूप नहीं है, प्रत्युत देखनेवाला भी भगवत्स्वरूप है—'सकलमिदमहं च वासुदेवः' (विष्णुपुराण ३।७।३२)। अतः साधकको ऐसा मानना चाहिये कि अपनी देहसहित सब कुछ भगवान् ही हैं अर्थात् शरीर भी भगवत्स्वरूप है, इन्द्रियाँ भी भगवत्स्वरूप हैं, मन भी भगवत्स्वरूप है, बुद्धि भी भगवत्स्वरूप है, प्राण भी भगवत्स्वरूप हैं और अहम् (मैंपन) भी भगवत्स्वरूप है। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको माननेके लिये साधकको बुद्धिसे जोर नहीं लगाना चाहिये, प्रत्युत सहजरूपसे जैसा है, वैसा स्वीकार कर लेना चाहिये। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है—

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्मनीषया । परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः ॥

(११।२९।१८)

जब 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—ऐसा निश्चय हो जाय, तब साधक इस अध्यात्मविद्या-(ब्रह्मविद्या-) के द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह भगवान्को भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् भगवान् ही दीखने लगे।

तात्पर्य है कि 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस भावसे भी उपराम हो जाय अर्थात् न द्रष्टा (देखनेवाला) रहे, न दृश्य (दीखनेवाला) रहे और न दर्शन (देखनेकी वृत्ति) ही रहे, केवल भगवान् ही रहें।

'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव अनेक दृष्टियोंसे हो सकता है; जैसे—

(१) क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिका तो आदि और अन्त होता है, पर सत्ता निरन्तर ज्यों-की-त्यों रहती है। इसलिये मनुष्यमात्रको क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिके अभावका तो अनुभव होता है, पर अपनी सत्ताके अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। इस नित्य-निरन्तर रहनेवाली सत्ताका अनुभव होना विवेककी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है।

(२) सृष्टिसे पहले भी केवल भगवान् थे और पीछे भी केवल भगवान् रहेंगे, फिर बीचमें भगवान्के सिवाय दूसरा कैसे आ सकता है?—यह युक्तिकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है।

(३) मेरे तो एक भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय मेरा कोई है ही नहीं और कोई है तो होगा, हमें उससे क्या मतलब?—यह सीधे-सरल, विश्वासी भक्तोंकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है। जैसे, ब्रजमें एक साधु कुएँपर किसीसे बातें कर रहा था कि ब्रह्म ऐसा होता है, जीव ऐसा होता है आदि-आदि। वहाँ जल भरनेके लिये आयी एक गोपीने ये बातें

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सुनीं तो उसने दूसरी गोपीसे पूछा—अरी वीर! ये ब्रह्म, जीव आदि क्या होते हैं? वह गोपी बोली कि ये हमारे लालाके ही कोई सगे-सम्बन्धी होंगे, तभी साधुलोग उनकी बात करते हैं, नहीं तो साधुओंको लालाके सिवाय औरसे क्या मतलब?

(४) जिसके भीतर भगवत्त्वको जाननेकी व्याकुलता है, दिनमें भूख नहीं लगती, रातमें नींद नहीं आती, वह किसी सन्तसे सुनकर अथवा पुस्तकमें पढ़कर दृढ़तापूर्वक मान लेता है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् कैसे हैं—इसका तो पता नहीं, पर भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है—यह सन्तके वचनोंपर विश्वासकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' है। सन्त वचनपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होनेपर फिर वैसा ही दीखने लग जाता है अर्थात् अनुभव हो जाता है।

दार्शनिक दृष्टिसे विचार करें तो सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। श्रद्धा-विश्वास (भक्ति) की दृष्टिसे देखें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भक्तकी दृष्टि भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई उसकी दृष्टिमें आता ही नहीं।

सम्बन्ध—जो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं, ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।

तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

परन्तु—

तैः, तैः= उन-उनप्रकृत्या= प्रकृति अर्थात्उन-उन
कामैः= कामनाओंसेस्वभावसेनियमम्
हृतज्ञानाः= जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य)नियताः= नियन्त्रित होकरआस्थाय
स्वया= अपनी-अपनीतम्, तम्= उस-उस अर्थात्अन्यदेवताः
देवताओंकेप्रपद्यन्ते= शरण हो जाते हैं।

व्याख्या—'कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः'—उन-उन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है, आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है, उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं। संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है—यहाँके भोग भोगनेके लिये धन-संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्य-संग्रहकी कामना।

धन-संग्रहकी कामना दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ चाहे जैसे भोग भोगें; चाहे जब, चाहे जहाँ और चाहे जितना धन खर्च करें, सुख-आरामसे दिन बीतें आदिके

लिये अर्थात् संयोगजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है और दूसरी, मैं धनी हो जाऊँ, धनसे मैं बड़ा बन जाऊँ आदिके लिये अर्थात् अभिमानजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है। ऐसे ही पुण्य-संग्रहकी कामना भी दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ मैं पुण्यात्मा कहलाऊँ और दूसरी, परलोकमें मेरेको भोग मिलें। इन सभी कामनाओंसे सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, बन्ध-मोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है। विवेक आच्छादित होनेसे वे यह समझ ही नहीं पाते कि जिन पदार्थोंकी हम कामना कर रहे हैं, वे पदार्थ हमारे साथ कबतक रहेंगे और हम उन पदार्थोंके साथ कबतक रहेंगे?

'प्रकृत्या नियताः स्वया'२—कामनाओंके कारण विवेक ढका जानेसे वे अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित रहते हैं

१—इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित पुरुषोंका ज्ञान तो मायासे ढका हुआ है और यहाँ वर्णित पुरुषोंका ज्ञान कामनासे ढका हुआ है। वहाँके पुरुष तो कामनापूर्तिके लिये जड़-पदार्थोंका आश्रय लेते हैं और यहाँके पुरुष कामनापूर्तिके लिये देवताओंका आश्रय लेते हैं। वहाँके पुरुष दुष्टताके कारण नरकोंमें जाते हैं और यहाँके पुरुष कामनाके कारण बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं।

२—यहाँ जो 'प्रकृत्या नियताः स्वया' कहा है, इसीको सत्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'यो यच्छद्धः स एव सः' कहा है।

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

५४९

अर्थात् अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहाँ 'प्रकृति' शब्द व्यक्तिगत स्वभावका वाचक है, समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह व्यक्तिगत स्वभाव सबमें मुख्य होता है—'स्वभावो मूर्ध्न वर्तते।' अतः व्यक्तिगत स्वभावको कोई छोड़ नहीं सकता—'या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते।' परन्तु इस स्वभावमें जो दोष हैं, उनको तो मनुष्य छोड़ ही सकता है, अगर उन दोषोंको मनुष्य छोड़ नहीं सकता, तो फिर मनुष्यजन्यकी महिमा ही क्या हुई? मनुष्य अपने स्वभावको निर्दोष, शुद्ध बनानेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामनापूर्तिके उद्देश्य रहता है, तबतक वह अपने स्वभावको सुधार नहीं सकता और तभीतक स्वभावकी प्रबलता और अपनेमें निर्बलता दीखती है। परन्तु जिसका उद्देश्य कामना मिटानेका हो जाता है, वह अपनी प्रकृति—(स्वभाव—) का सुधार कर सकता है अर्थात् उसमें प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती।

'तं तं नियममास्थाप्य' —कामनाओंके कारण अपनी प्रकृतिके परवश होनेपर मनुष्य कामनापूर्तिके अनेक उपायोंको और विधियों (नियमों—) को दृढ़ता रहता है। अमुक यज्ञ करनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक तप

करनेसे? अमुक दान देनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक मन्त्रका जप करनेसे? आदि—आदि उपाय खोजता रहता है। उन उपायोंकी विधियाँ अर्थात् नियम अलग—अलग होते हैं। जैसे—अमुक कामनापूर्तिके लिये अमुक विधिसे यज्ञ आदि करना चाहिये और अमुक स्थानपर करना चाहिये आदि—आदि। इस तरह मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करता है।

'प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः' —कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करके मनुष्य अन्य देवताओंकी शरण लेते हैं, भगवान्की शरण नहीं लेते। यहाँ 'अन्यदेवताः' कहनेका तात्पर्य है कि वे देवताओंको भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं, प्रत्युत उनकी अलग सत्ता मानते हैं, इसीसे उनको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलता है—'अन्तवन्तु फलं तेषाम्' (गीता ७।२३)। अगर वे देवताओंकी अलग सत्ता न मानकर उनको भगवत्स्वरूप ही मानें तो फिर उनको अन्तवाला फल नहीं मिलेगा, प्रत्युत अविनाशी फल मिलेगा।

यहाँ देवताओंकी शरण लेनेमें दो कारण मुख्य हुए—एक कामना और एक अपने स्वभावकी परवशता।

परिशिष्ट भाव —भगवान्के अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें जो कामनाएँ हैं, वही कामनाएँ इस श्लोकमें वर्णित मनुष्योंमें भी हैं। परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें कामनाकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है, इसलिये वे 'हृतज्ञानाः' नहीं हैं। परन्तु यहाँ वर्णित मनुष्योंमें कामनाकी मुख्यता है; इसलिये ये 'हृतज्ञानाः' हैं।

अर्थार्थी और आर्त भक्त तो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं, पर ये मनुष्य भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंके शरण होते हैं। कामनाएँ, देवता, मनुष्य और नियम—ये सभी अनेक हुआ करते हैं। अगर अनेक कामनाएँ होनेपर भी उपास्यदेव एक परमात्मा हों तो वे उपासकका उद्धार कर देंगे। परन्तु कामनाएँ भी अनेक हों और उपास्यदेव भी अनेक हों तो उद्धार कौन करेगा?

एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—यह ज्ञान सुखकी कामनाके कारण ढक जाता है। यह कामना न तो प्रकृतिकी बनायी हुई है और न परमात्माकी बनायी हुई है, प्रत्युत मनुष्यकी अपनी बनायी हुई है। इसलिये इसको मिटानेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। 'हृतज्ञानाः' कहनेका तात्पर्य है कि यह ज्ञान नष्ट नहीं हुआ है, प्रत्युत कामनाके कारण हरा गया है। इस बातको गीतामें 'माययापहृतज्ञानाः' (७।१५), 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (५।१५) आदि पदोंसे भी कहा गया है।

इसी अध्ययके पन्द्रहवें श्लोकमें आये 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें तमोगुणकी प्रधानता और रजोगुणकी गौणता है, पर यहाँ आये 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणता है। 'माययापहृतज्ञानाः' पदमें अर्थकी इच्छा मुख्य है और 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' पदमें भोगोंकी इच्छा मुख्य है। दोनोंमें फर्क यह है कि मायासे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन नहीं करते, पर कामनाओंसे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन कर सकते हैं। कारण कि अर्थसे अरुचि नहीं होती—'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' , पर भोगोंसे अरुचि होती ही है। 'माययापहृतज्ञानाः' में तो आसुरभावका, झूठ, कपट, बेईमानी आदिका आश्रय है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में

'स्वया' कहनेका तात्पर्य है कि अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार सबकी कामनाएँ भी अलग—अलग होती हैं।

५५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

देवताओंका आश्रय है। अतः 'माययापहृतज्ञानाः' में तो विशेष जड़ता है, पर 'कामैस्तैस्तैहृतज्ञानाः' में उनकी अपेक्षा चेतनता है।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥

यः, यः= जो-जोअर्चितुम्= पूजन करनाअहम्= मैं
भक्तः= भक्तइच्छति= चाहता है,ताम्= उसी
याम्, याम्२= जिस-जिसतस्य, तस्य= उस-उसश्रद्धाम्= श्रद्धाको
तनुम्= देवताकादेवतामेंअचलाम्= दृढ़
श्रद्धया= श्रद्धापूर्वकएव= हीविदधामि= कर देता हूँ।

व्याख्या —'यो यो यां यां तनुं भक्तः' '..... तामेव विदधाम्यहम्'—जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करना चाहता है, उस-उस मनुष्यकी श्रद्धा उस-उस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायें—ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उन-उन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता, फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ, तो जो मेरेमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता ५।२९)।

इसपर यह शंका होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता, सार्थकता ही कहाँ रही? तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ? अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि ऐसा बताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजा-प्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये।

अब दूसरी शंका यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं, इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी, पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ? इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा, तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे, वे मेरे इस बतावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढ़िया है।

अब तीसरी शंका यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं, तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा? इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ, दूसरोंके प्रति नहीं—ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश, निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही? और इच्छा (कामना-) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था—'जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्' (गीता ३।४३)?

१-जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह 'चेतन' है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह 'जड़' है। २-जैसे यहाँ 'यो यः, यां याम्' आया है, ऐसे ही आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'यं यं वापि स्मरन्भावम्' आया है। दो बार 'यत्' शब्दका अर्थात् 'यो यः' 'यां याम्' और 'यं यम्' शब्दोंका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जैसे मनुष्य उपासना करनेमें स्वतन्त्र है अर्थात् देवताओंकी उपासना करे, चाहे मेरी उपासना करे—इसमें वह स्वतन्त्र है, ऐसे ही अन्तकालमें स्मरण करनेमें भी मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है अर्थात् मेरा स्मरण करे चाहे किसी औरका स्मरण करे—इसमें वह स्वतन्त्र है।

श्लोक २२]

  • साधक-संजीवनी *

५५१

परिशिष्ट भाव— प्रायः मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनी तरफ लगाना चाहते हैं, अपना शिष्य या दास बनाना चाहते हैं, अपने सम्प्रदायमें लाना चाहते हैं, अपनेमें श्रद्धा करवाना चाहते हैं, अपना पूजन, आदर, मान-सम्मान करवाना चाहते हैं, अपनी बात मनवाना चाहते हैं। परन्तु भगवान् सर्वोपरि होते हुए भी किसीको अपने अधीन नहीं बनाते, प्रत्युत जो जहाँ श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको वहाँ दृढ़ कर देते हैं—यह भगवान्की कितनी उदारता है, निष्पक्षता है।

भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ उनका ही स्वरूप है—‘मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति ’। इसलिये भगवान्में किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है। परन्तु भगवान्का यह पक्षपातरहित स्वभाव सहज ही समझमें नहीं आता, प्रत्युत गहरा विचार करनेसे ही समझमें आता है। अगर यह स्वभाव किसीकी समझमें आ जाय तो वह भगवान्का भक्त हो जायगा—उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहिं भजनु तजि भाव न आना॥

(मानस, सुन्दर० ३४।२)

स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत॥ (गीता १५।१९)

दूसरेको अपना दास वही बनाता है, जिसमें कोई कमी है। भगवान्में कोई कमी है ही नहीं, इसलिये वे अपनी तरफसे किसीको अपना दास (अधीन) कैसे बना सकते हैं? परन्तु कोई उनका दास बनना चाहे तो वे मना नहीं करते और दयापूर्वक उसको दास स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी विशेष उदारता है! जैसे छोटे-से बालकको देखकर कोई व्यक्ति रौझ जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस बालकसे उसका कोई स्वार्थभाव है। ऐसे ही जो भगवान्का दास बनता है, उसके सरलभावसे भगवान् रौझ जाते हैं—‘मोरं अधिक दास पर प्रीती ’ (मानस, उत्तर० १६।४)। गीताके अठारहवें अध्यायमें जब भगवान्के द्वारा ‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ सुनकर अर्जुन घबरा गये, तब भगवान् दयापरवश होकर अर्जुनसे बोले कि तू मेरी शरणमें आ जा—‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) परन्तु ऐसा कहनेसे पहले भगवान्ने कहा कि यह सबसे अत्यन्त गोपनीय बात है (अठारहवें अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) और बादमें भी कहा कि इसे हर किसीको मत कहना (अठारहवें अध्यायका सड़सठवाँ श्लोक)। इससे सिद्ध होता है कि दूसरेको अपना दास बनानेकी नीयत न होनेपर भी अगर कोई दूसरा सहारा न मिलनेपर मनुष्य घबरा जाय और उनका दास बनना चाहे तो भगवान् दयापरवश होकर उसको स्वीकार कर लेते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी देवतापर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् उस देवतामें दृढ़ कर देते हैं और जो भगवान्पर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् अपनेमें दृढ़ कर दें—इसमें सन्देह ही क्या है! कारण कि भगवान्की दृष्टि भक्तके हितके लिये होती है, अपने स्वार्थके लिये नहीं।

स तथा श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ २२ ॥

तया= उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई)भावपूर्वक)हि= परन्तु
श्रद्धया= श्रद्धासेउपासनातान्= वह कामना-पूर्ति
युक्तः= युक्त होकरईहतेमया= मेरे द्वारा
सः= वह मनुष्यएव= ही
तस्य= उस देवताकीततःविहितान्= विहित की हुई
आराधनम्= (सकाम-कामान्होती है।होती है।
लभते

व्याख्या—स तथा श्रद्धया युक्तः : ..... मयैव विहितान्हि तान् ’—मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है, उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी

पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है; परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं। जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुम लोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर

५५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

इतना खर्च कर सकते हो, इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है; अतः वे उतना ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओंमें अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने-अपने उपासकोंको अपने-अपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—आठवें

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सब देवताओंको अलग-अलग और सीमित अधिकार दिये हुए हैं। परन्तु भगवान्का अधिकार असीम है। भगवान्में यह विशेषता है कि वे किसीपर शासन नहीं करते, किसीको अपना गुलाम नहीं बनाते, किसीको अपना चेला नहीं बनाते, प्रत्युत हर एकको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव विषयी था, पर भगवान् श्रीरामने तीनोंको ही अपना सखा बनाया। यह विशेषता देवताओं आदि किसीमें भी नहीं है। इसलिये वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

(मुण्डक० ३।१।१, श्वेता० ४।६)

गीतामें भी भगवान्ने अर्जुनको कहा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति ’ (४।३)। यहाँ भगवान्ने ‘भक्त’ तो अर्जुनकी दृष्टिसे कहा है*, पर अपनी दृष्टिसे ‘सखा’ कहा है। ‘ममैवांशो जीवलोकै ’ (१५।७)—इन पदोंमें भी भगवान्ने ‘एव’ पदसे जीवको साक्षात् अपना स्वरूप बताया है। यह मेरा ही अंश है—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इसमें प्रकृतिका अंश बिलकुल नहीं है।

सम्बन्ध—अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥

तु= परन्तुअन्तवत्= अन्तवालायान्ति= प्राप्त होते हैं
तेषाम्= उन(नाशवान्) ही(और)
अल्पमेधसाम्= तुच्छ बुद्धिवालेभवति= मिलता है।मद्भक्ताः= मेरे भक्त
मनुष्योंकोदेवयजः= देवताओंकामाम्= मुझे
तत्= उन देवताओंकोपूजनअपि= ही
आराधनाकाकरनेवालेयान्ति= प्राप्त
फलम्= फलदेवान्= देवताओंकोहोते हैं।

व्याख्या —‘अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्’—देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि-युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको

अध्यायका सोलहवाँ श्लोक।

यहाँ ‘मयैव ’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है, वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले, तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा।

नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है—एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

  • अर्जुनकी दृष्टिसे इसलिये ‘भक्त’ कहा कि अर्जुनने भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी—‘शाधि मां त्वां प्रपन्म’ (गीता १।७)