भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

५१३

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥

पार्थ = हे पृथानन्दन ! सर्वभूतानाम् = सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातनम् = अनादि बीजम् = बीज | माम् = मुझे विद्धि = जान । बुद्धिमताम् = बुद्धिमानोंमें बुद्धिः = बुद्धि (और) | तेजस्विनाम् = तेजस्वियोंमें तेजः = तेज अहम् = मैं अस्मि = हूँ। ---|---|---

व्याख्या— ‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि’* पार्थ सनातनम्’—हे पार्थ! सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। सम्पूर्ण प्राणी बीजरूप मेरेसे उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही रहते हैं और अन्तमें मेरेमें ही लीन होते हैं। मेरे बिना प्राणीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।

जितने बीज होते हैं, वे सब वृक्षसे उत्पन्न होते हैं और वृक्ष पैदा करके नष्ट हो जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस बीजका वर्णन है, वह बीज ‘सनातन’ है अर्थात् आदि-अन्तसे रहित (अनादि एवं अनन्त) है। इसीको नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘अव्यय बीज’ कहा गया है। यह चेतन-तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। यह स्वयं विकाररहित रहते हुए ही सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, आश्रय और प्रकाशक है तथा जगत्का कारण है।

गीतामें ‘बीज’ शब्द कहीं भगवान् और कहीं जीवात्मा—दोनोंके लिये आया है। यहाँ जो ‘बीज’ शब्द आया है, वह भगवान्का वाचक है; क्योंकि यहाँ कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन है। दसवें अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें विभूतरूपसे आया ‘बीज’ शब्द भी भगवान्का ही वाचक है; क्योंकि वहाँ उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण कहा गया है। नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘बीज’ शब्द भगवान्के लिये आया है; क्योंकि उसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें ‘सदसच्चाहमर्जुन’ पदमें कहा गया है कि कार्य और कारण सब मैं ही हूँ। सब कुछ भगवान् ही होनेसे ‘बीज’ शब्द भगवान्का वाचक है। चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘अहं बीजप्रदः पिता’ ‘मैं बीज प्रदान करनेवाला पिता हूँ’—ऐसा होनेसे वहाँ ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक है। ‘बीज’ शब्द जीवात्माका वाचक तभी होता है, जब यह

जड़के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, नहीं तो यह भगवान्का स्वरूप ही है।

‘बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि’—बुद्धिमानोंमें बुद्धि मैं हूँ। बुद्धिके कारण ही वे बुद्धिमान् कहलाते हैं। अगर उनमें बुद्धि न रहे तो उनकी बुद्धिमान् संज्ञा ही नहीं रहेगी।

‘तेजस्तेजस्विनामहम्’—तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। यह तेज दैवी-सम्पत्तिका एक गुण है। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंमें एक विशेष तेज—शक्ति रहती है, जिसके प्रभावसे दुर्गुण-दुराचारी मनुष्य भी सदगुण-सदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान्का ही स्वरूप है।

विशेष बात

भगवान् ही सम्पूर्ण संसारके कारण हैं, संसारके रहते हुए भी वे सबमें परिपूर्ण हैं और सब संसारके मिटनेपर भी वे रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सब कुछ भगवान् ही हैं। इसके लिये उपनिषदोंमें सोना, मिट्टी और लोहेका दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे सोनेसे बने हुए सब गहने सोना ही हैं, मिट्टीसे बने हुए सब बर्तन मिट्टी ही हैं और लोहेसे बने हुए सब अस्त्र-शस्त्र लोहा ही हैं, ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न हुआ सब संसार भगवान् ही है। परन्तु गीतामें भगवान्ने बीजका दृष्टान्त दिया है कि सम्पूर्ण संसारका बीज मैं हूँ। बीज वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है अर्थात् बीजसे अंकुर निकल आता है, अंकुरसे वृक्ष हो जाता है और बीज स्वयं मिट जाता है। परन्तु भगवान्ने अपनेको संसारमात्रका बीज कहते हुए भी यह एक विलक्षण बात बतायी कि मैं अनादि बीज हूँ, पैदा हुआ बीज नहीं हूँ—‘बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्’ (७।१०), और मैं अविनाशी बीज हूँ—‘बीजमव्ययम्’ (१।१८)। अविनाशी बीज कहनेका

  • इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने ‘उपधारय’ कहा और यहाँ ‘विद्धि’ कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र संसारमें साररूपसे मैं ही हूँ—इस बातको समझो और समझकर धारण करो। समझकर धारण करनेसे असली प्रेम जाग्रत् हो जाता है।