भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

सहस्रेषु= हजारोंयतति= यत्न करता है (और)कश्चित्= कोई (एक)
मनुष्याणाम्= मनुष्योंमेंयतताम्= (उन) यत्न करनेवालेअपि= ही
कश्चित्= कोई (एक)माम्= मुझे
सिद्धये= सिद्धि-(कल्याण)-के लियेसिद्धानाम्= सिद्धों-(मुक्त-पुरुषों-) मेंतत्त्वतः= यथार्थरूपसे
वेत्ति= जानता है।

व्याख्या —‘मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये’—हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। तात्पर्य है कि जिनमें मनुष्यपना है अर्थात् जिनमें पशुओंकी तरह खाना-पीना और ऐश-आराम करना नहीं है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उन मनुष्योंमें भी जो नीति और धर्मपर चलनेवाले हैं, ऐसे मनुष्य हजारों हैं। उन हजारों मनुष्योंमें भी कोई एक ही सिद्धिके लिये यत्न करता है अर्थात् जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं, जिसमें दुःखका लेश भी नहीं और आनन्दकी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं, कमीकी सम्भावना ही नहीं—ऐसे स्वतःसिद्ध नित्यतत्त्वकी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। जो परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति नहीं चाहता और इस लोकमें धन, मान, भोग, कीर्ति आदि नहीं चाहता अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें नहीं अटकता और भोगे हुए भोगोंके तथा मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार आदिके संस्कार रहनेसे उन विषयोंका संग होनेपर, उन विषयोंमें रुचि होते रहनेपर भी जो अपनी मान्यता, उद्देश्य, विचार, सिद्धान्त आदिसे विचलित नहीं होता—ऐसा कोई एक पुरुष ही सिद्धिके लिये यत्न करता है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धिके लिये यत्न करनेवाले अर्थात् दृढ़तासे उधर लगनेवाले बहुत कम मनुष्य होते हैं।

परमात्मप्राप्तिकी तरफ न लगनेमें कारण है—भोग और संग्रहमें लगना। सांसारिक भोग-पदार्थोंमें केवल

आरम्भमें ही सुख दीखता है। मनुष्य प्रायः तत्काल सुख देनेवाले साधनोंमें ही लगते हैं। उनका परिणाम क्या होगा—इसपर वे विचार करते ही नहीं। अगर वे भोग और ऐश्वर्यके परिणामपर विचार करने लग जायें कि ‘भोग और संग्रहके अन्तमें कुछ नहीं मिलेगा, रीते रह जायेंगे और उनकी प्राप्तिके लिये किये हुए पाप-कर्मोंके फलस्वरूप चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंके रूपमें दुःख-ही-दुःख मिलेगा’, तो वे परमात्माके साधनमें लग जायेंगे। दूसरा कारण यह है कि प्रायः लोग सांसारिक भोगोंमें ही लगे रहते हैं। उनमेंसे कुछ लोग संसारके भोगोंसे ऊँचे उठते भी हैं तो वे परलोकके स्वर्ग आदि भोग-भूमियोंकी प्राप्तिमें लग जाते हैं। परन्तु अपना कल्याण हो जाय, परमात्माकी प्राप्ति हो जाय—ऐसा दृढ़तासे विचार करके परमात्माकी तरफ लगनेवाले लोग बहुत कम होते हैं। इतिहासमें भी देखते हैं तो सकामभावसे तपस्या आदि साधन करनेवालोंके ही चरित्र विशेष आते हैं। कल्याणके लिये तत्परतासे साधन करनेवालोंके चरित्र बहुत ही कम आते हैं।

वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इधर सच्ची लगनेसे तत्परतापूर्वक लगनेवाले बहुत कम हैं। इधर दृढ़तासे न लगनेमें संयोगजन्य सुखकी तरफ आकृष्ट होना और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा रखना ही खास कारण है।

प्रायः लोग इस (तीसरे) श्लोकको तत्त्वकी कठिनता

१-संख्यावाचक शब्दको यदि किसीका विशेषण बताया जाय, तो उस शब्दमें एकवचन ही होता है। यदि उसके योगमें षष्ठी की जाय तो संख्यावाचक शब्दमें तीनों वचन होते हैं। यहाँ ‘मनुष्याणाम्’ पदमें सहस्र संख्याके योगमें षष्ठी हुई है और ‘सहस्राणि’ पदमें निर्धारण अर्थमें सप्तमीका बहुवचन हुआ है। अतः ‘मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये’ पदोंका अर्थ हुआ—‘मनुष्याणां सहस्राणि भगवति रुचिं कुर्वन्ति सहस्रेषु कश्चित् सिद्धये यतति च’ ‘हजारों मनुष्य भगवान्में रुचि रखते हैं, पर उन हजारोंमेंसे कोई एक सिद्धिके लिये यत्न करता है।’

२-स्वर्ग आदि लोकोंको और अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति वास्तवमें सिद्धि है ही नहीं, प्रत्युत वह तो अस्मिद्धि ही है; क्योंकि वह पतन करनेवाली अर्थात् बार-बार जन्म-मरण देनेवाली है (नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसलिये यहाँ परमात्माकी प्राप्तिको ही सिद्धि कहा गया है।

३-परमात्मा सब देशोंमें, सब कालोंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सब वस्तुओंमें, सब घटनाओंमें, सब परिस्थितियोंमें और सम्पूर्ण क्रियाओंमें स्वतः परिपूर्णरूपसे मौजूद है; अतः उनकी प्राप्तिमें भविष्यका कोई कारण ही नहीं है। परमात्मतत्त्व कर्मजन्य नहीं है। जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह भविष्यमें मिलती है। कारण कि जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह उत्पत्ति-विनाशवाली होती है।