श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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बतानेवाला मानते हैं। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक तत्त्वकी कठिनातके विषयमें नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत तत्त्वप्राप्तिकी उल्टट अभिलाषा होना और अभिलाषकी पूर्तिके लिये तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुषोंका मिलना दुर्लभ है, कठिन है। यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि 'मैं कहूँगा और तू जानेगा', तो अर्जुन-जैसा अपने श्रेयका प्रश्न करनेवाला और भगवान्- जैसा सर्वज्ञ कहेनेवाला मिलना दुर्लभ है। वास्तवमें देखा जाय तो केवल उल्टट अभिलाषा होना ही दुर्लभ है। कारण कि अभिलाषा
होनेपर उसको जाननेकी जिम्मेवारी भगवान्पर आ जाती है।
यहाँ 'तत्त्वतः' कहनेका तात्पर्य है कि वह मेरे सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि रूपोंमें प्रकट होनेवाले और समय-समयपर तरह-तरहके अवतार लेनेवाले मुझको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसके जाननेमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता और उसके अनुभवमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी किंचिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती।
परिशिष्ट भाव —कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जितने साधन हैं, उन साधनोंसे (यत्न करते हुए) जो सिद्ध हो चुके हैं, ऐसे जीवनमुक्त ज्ञानी महापुरुषोंमें भी 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—इस प्रकार भगवान्के समग्ररूपको यथार्थरूपसे अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्त दुर्लभ हैं* (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
'यततामपि सिद्धानाम्' —वे सिद्ध अर्थात् जीवनमुक्त पुरुष अपनी स्थिति-(मुक्तावस्था-) से असन्तुष्ट हैं और उनके भीतर परमप्रेम-(अनन्तरस-) को प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा है, भूख है। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—'मुक्तोपसृज्यव्यपदेशात्' (१।३।२) 'उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है'। कारण यह है कि मुक्त होनेपर नाशवान् रसकी कामना तो मिट जाती है, पर अनन्तरसकी भूख नहीं मिटती। वह भूख भगवान्की कृपासे ही जाग्रत् होती है। तात्पर्य है कि जो भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास रखते हुए साधन करते हैं, जिनके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, उनको भगवान् ज्ञानमें सन्तुष्ट नहीं होने देते, उसमें टिकने नहीं देते और उनकी मुक्तिके रसको फीका कर देते हैं।
सिद्ध (मुक्त) तो कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी आदि सभी हो सकते हैं, पर भगवान्के समग्ररूपको जाननेवाले सब नहीं होते। अतः 'यततामपि सिद्धानाम्' पदोंका तात्पर्य है कि वे यत्न करते हुए अपनी पद्धतिसे सिद्ध तो हो गये, पर मेरे समग्ररूपको नहीं जान सके! कारण कि मेरे समग्ररूपको पराभक्तिसे ही जाना जा सकता है—'भवत्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः' (गीता १८।५५)।
'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः' —यहाँ 'माम्' पद समग्र परमात्माका वाचक है। भगवान्के समग्ररूपको भगवान्की कृपासे ही जाना जा सकता है, विचारसे नहीं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी गीता सुननेके बाद भगवान्से कहा है कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति प्राप्त हो गयी—'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत' (१८।७३)। जैसे दूध पिलाते समय गाय अपने बछड़ेको स्नेहपूर्वक चाटती है तो उससे बछड़ेकी जो पुष्टि होती है, वह केवल दूध पीनेसे नहीं होती। ऐसे ही भगवान्की कृपासे जो ज्ञान होता है, वह अपने विचारसे नहीं होता; क्योंकि विचार करनेमें स्वयंकी सत्ता रहती है।
केवल निर्गुणको जाननेवाला परमात्माको तत्त्वसे नहीं जानता, प्रत्युत सगुण-निर्गुण दोनोंको (समग्रको) जाननेवाला ही परमात्माको तत्त्वसे जानता है।
है और उसमें देश, कालकी दूरी होती है; अतः उसीके लिये भविष्य होता है। मनुष्य यह विचार करे कि परमात्मा सब देशमें है तो यहाँ भी है, जब यहाँ है तो कहीं जानेकी जरूरत नहीं। परमात्मा सब समयमें है तो अभी भी है, जब अभी है, तो भविष्य क्यों? परमात्मा सबमें है तो मेरेमें भी है, जब मेरेमें है तो दुसरे किसीमें खोजनेकी पराधीनता नहीं। परमात्मा सबके हैं, तो मेरे भी हैं; जब मेरे हैं तो मेरेको अत्यन्त प्यारे होने ही चाहिये; क्योंकि अपनी चीज सबको प्यारी होती ही है। साथ-ही-साथ परमात्मा सर्वोत्कृष्ट है अर्थात् उनसे बढ़कर कोई है ही नहीं—ऐसा विश्वास होनेपर स्वतः ही मन खिंचेगा।
उपपत्युक्त बातोंपर दृढ़ विश्वास हो जाय तो परमात्माकी आशा भविष्यका अवलम्बन करनेवाली नहीं होती; किन्तु परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा हो जाती है।
- धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥
सब ते सो दुर्लभ सुराया। राम भगति रत गत मद माया॥ (मानस, उत्तर० ५४।३-४)