श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें५६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
परिशिष्ट भाव —यद्यपि संसार-बन्धनका मूल कारण अज्ञान है, तथापि अज्ञानकी अपेक्षा भी मनुष्य राग-द्वेषरूप द्रन्द्वसे संसारमें ज्यादा फँसता है। किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिको अपने सुख-दुःखका कारण माननेसे राग-द्वेष पैदा होते हैं। जिसको अपने सुखका कारण मानते हैं, उसमें 'राग' हो जाता है और जिसको अपने दुःखका कारण मानते हैं, उसमें 'द्वेष' हो जाता है। राग-द्वेष मिटनेपर मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है—'निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्ममुच्यते' (गीता ५।३)।
पहले तेरहवें श्लोकमें भी भगवान् कह चुके हैं कि तीनों गुणोंसे मोहित प्राणी मेरेको नहीं जानता। ऐसे मोहित प्राणी न संसारको जानते हैं, न भगवान्को। संसारमें रचे-पचे रहकर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता और भगवान्से अलग (दूर) रहकर मनुष्य भगवान्को नहीं जान सकता। वास्तवमें संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर और भगवान्का ज्ञान भगवान्से अभिन्न होनेपर ही होता है। संसार नहीं है—यही संसारका ज्ञान है। वास्तवमें जो है ही नहीं, रहता ही नहीं, उसका ज्ञान कैसा? संसार है—ऐसा मानना ही अज्ञान है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने द्रन्द्वमोहसे मोहित होनेवालोंकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें द्रन्द्वमोहसे रहित होनेवालोंकी बात कहते हैं।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्रन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८ ॥
| तु | = परन्तु | पापम् | = पाप | रहित हुए मनुष्य |
|---|---|---|---|---|
| येषाम् | = जिन | अन्तगतम् | = नष्ट हो गये हैं, | दृढव्रताः |
| पुण्यकर्मणाम् | = पुण्यकर्म | ते | = वे | माम् |
| जनानाम् | = मनुष्योंके | द्रन्द्वमोहनिर्मुक्ताः | = द्रन्द्वमोहसे | भजन्ते |
व्याख्या —'येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्य-कर्मणाम्'—द्रन्द्वमोहसे मोहित मनुष्य तो भजन नहीं करते और जो द्रन्द्वमोहसे मोहित नहीं हैं, वे भजन करते हैं, तो भजन न करनेवालोंकी अपेक्षा भजन करनेवालोंकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।
जिन मनुष्योंने 'अपनेको तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है'— इस उद्देश्यको पहचान लिया है अर्थात् जिनको उद्देश्यकी यह स्मृति आ गयी है कि यह मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपासे केवल उनकी प्राप्तिके लिये ही मिला है—ऐसा जिनका दृढ़ निश्चय हो गया है, वे मनुष्य ही 'पुण्यकर्म' हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपने एक निश्चयसे जो शुद्धि होती है, पवित्रता आती है, वह यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाओंसे नहीं आती। कारण कि 'हमें तो एक भगवान्की तरफ ही चलना है', यह निश्चय स्वयंमें होता है और यज्ञ, दान आदि क्रियाएँ बाहरसे होती हैं।
'अन्तगतं पापम्' कहनेका भाव यह है कि जब यह निश्चय हो गया कि 'मेरेको तो केवल भगवान्की तरफ ही चलना है' तो इस निश्चयसे भगवान्की समुखता होनेसे
विमुखता चली गयी, जिससे पापोंकी जड़ ही कट गयी; क्योंकि भगवान्से विमुखता ही पापोंका खास कारण है। सन्तोने कहा है कि डेढ़ ही पाप है और डेढ़ ही पुण्य है। भगवान्से विमुख होना पूरा पाप है और दुर्गुण-दुराचारोंमें लगना आधा पाप है। ऐसे ही भगवान्के समुख होना पूरा पुण्य है और सदगुण-सदाचारोंमें लगना आधा पुण्य है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है, तब उसके पापोंका अन्त हो जाता है।
दूसरा भाव यह है कि जिनका लक्ष्य केवल भगवान् हैं, वे पुण्यकर्म हैं; क्योंकि भगवान्का लक्ष्य होनेपर सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का लक्ष्य होनेपर पुराने किसी संस्कारसे पाप हो भी जायगा, तो भी वह रहेगा नहीं; क्योंकि हृदयमें विराजमान भगवान् उस पापको नष्ट कर देते हैं—'विकर्म यच्चोत्पत्तिं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः' (श्रीमद्भगवद्गीता ११।५।४२)।
तीसरा भाव यह है कि मनुष्य सच्चे हृदयसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि 'अब आगे मैं कभी पाप नहीं करूँगा' तो उसके पाप नहीं रहते।
'ते द्रन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः'—