श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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पुण्यकर्मा लोग द्वन्दरूप मोहसे रहित होकर और दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं। द्वन्द्व कई तरहका होता; जैसे-
१-भगवान्में लगें या संसारमें लगें ? क्योंकि परलोकके लिये भगवान्का भजन आवश्यक है और इहलोकके लिये संसारका काम आवश्यक है।
२-वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत और सौर-इन सम्प्रदायोंमेंसे किस सम्प्रदायमें चलें और किस सम्प्रदायमें न चलें ?
३-परमात्माके स्वरूपके विषयमें द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि कई तरहके सिद्धान्त हैं। इनमेंसे किस सिद्धान्तको स्वीकार करें और किस सिद्धान्तको स्वीकार न करें ?
४-परमात्माकी प्राप्तिके भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि कई मार्ग हैं। उनमेंसे किस मार्गपर चलें और किस मार्गपर न चलें ?
५-संसारमें होनेवाले अनुकूल-प्रतिकूल, हर्ष-शोक, ठीक-बेठीक, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि सभी द्वन्द्व हैं।
उपर्युक्त सभी पारमार्थिक और सांसारिक द्वन्दरूप मोहसे मुक्त हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं।
मनुष्यका एक ही पारमार्थिक उद्देश्य हो जाय, तो पारमार्थिक और सांसारिक सभी द्वन्द्व मिट जाते हैं। पारमार्थिक उद्देश्यवाले साधक अपनी-अपनी रुचि, योग्यता और श्रद्धा-विश्वासके अनुसार अपने-अपने इष्टको सगुण मानें, साकार मानें, निर्गुण मानें, निराकार मानें, द्विभुज मानें, चतुर्भुज मानें अथवा सहस्रभुज आदि कैसे ही मानें, पर संसारकी विमुखतामें और परमात्माकी सम्मुखतामें वे सभी एक हैं। उपासनाकी पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न होनेपर भी लक्ष्य सबका एक होनेसे कोई भी पद्धति छोटी-बड़ी नहीं है। जिस साधकका जिस पद्धतिमें श्रद्धा-विश्वास होता है, उसके लिये वही पद्धति श्रेष्ठ है और उसको उसी पद्धतिका ही अनुसरण करना चाहिये। परन्तु दूसरोंकी पद्धति या निष्ठाकी निन्दा करना, उसको दो नम्बरका
मानना दोष है। जबतक यह साधनविषयक द्वन्द्व रहता है और साधकमें अपने पक्षका आग्रह और दूसरोंका निरादर रहता है, तबतक साधकको भगवान्के समग्ररूपका अनुभव नहीं होता। इसलिये आदर तो सब पद्धतियों और निष्ठाओंका करे, पर अनुसरण अपनी पद्धति और निष्ठाका ही करे; तो इससे साधनविषयक द्वन्द्व मिट जाता है।
मनुष्यमात्रकी यह प्रकृति होती है, ऐसा एक स्वभाव होता है कि जब वह पारमार्थिक बातें सुनता है, तब वह यह समझता है कि साधन करके अपना कल्याण करना है; क्योंकि मनुष्यजन्मकी सफलता इसीमें है। परन्तु जब वह व्यवहारमें आता है, तब वह ऐसा सोचता है कि 'साधन-भजन' से क्या होगा ? सांसारिक काम तो करना पड़ेगा; क्योंकि संसारमें बैठे हैं; चीज-वस्तुकी आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना काम कैसे चलेगा ? अतः संसारका काम मुख्य रहेगा ही और भजन-स्मरणका नित्य-नियम तो समयपर कर लेना है; क्योंकि सांसारिक कामकी जितनी आवश्यकता है, उतनी भजन-स्मरण, नित्य-नियमकी नहीं। ऐसी धारणा रखकर भगवान्में लगे हुए मनुष्य बहुत हैं।
भगवान्की तरफ चलनेवालोंमें भी जिन्होंने एक निश्चय कर लिया है कि मेरेको अपना कल्याण करना है, सांसारिक लाभ-हानि कुछ भी हो जाय, इसकी कोई परवाह नहीं। कारण कि सांसारिक जितनी भी सिद्धि है, वह आँख मीचते ही कुछ नहीं है-'सम्मीलने नयनयोर्हि किंचिदस्ति' और इन सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त करनेसे कितने दिनतक हमारा काम चलेगा ? ऐसा विचार करके जो एक भगवान्की तरफ ही लग जाते हैं और सांसारिक आदर-निरादर आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, ऐसे मनुष्य ही द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए हैं।
'दृढ़व्रता:' कहनेका तात्पर्य है कि हमें तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, हमारा और कोई लक्ष्य है ही नहीं। वह परमात्मा द्वैत है कि अद्वैत है, शुद्धाद्वैत है कि विशिष्टाद्वैत है, सगुण है कि निर्गुण है, द्विभुज है कि चतुर्भुज है-इससे हमें कोई मतलब नहीं*। वह हमारे लिये कैसी भी परिस्थिति भेजे; हमें कहीं भी रखे और कैसे भी
- जैसा कि गजेन्द्रने कहा था- यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्। भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्व्यानमृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि।। (श्रीमद्भा० ८।२।३३) 'जो कोई ईश्वर प्रचण्ड वेगसे (सबको निगल जानेके लिये) दौड़ते हुए अत्यन्त बलवान् कालरूपी साँपसे भयभीत होकर शरणमें आये हुएकी रक्षा करता है और जिससे भयभीत होकर मृत्यु भी दौड़ रही है, उसीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।'