श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
रखे—इससे भी हमें कोई मतलब नहीं है। बस, हमें तो केवल परमात्माकी तरफ चलना है—ऐसे निश्चयसे वे दृढ़व्रती हो जाते हैं।
परमात्माकी तरफ चलनेवालोंके सामने तीन बातें आती हैं—परमात्मा कैसे हैं? जीव कैसा है? और जगत् कैसा है? तो उनके हृदयमें इनका सीधा उत्तर यह होता है कि ‘परमात्मा हैं।’ वे कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं आदिसे हमें कोई मतलब नहीं, हमें तो परमात्मासे मतलब है। जीव क्या है, उसका कैसा स्वरूप है, वह कहाँ रहता है, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही पर्याप्त है कि ‘मैं हूँ।’ जगत् कैसा है, ठीक है कि बेठीक है, हमें इससे कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही समझना पर्याप्त है कि ‘जगत् त्याज्य है’ और हमें इसका त्याग करना है। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माकी तरफ चलना है, संसारको छोड़ना है और हमें चलना है अर्थात् ‘हमें संसारसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख होना है’—यही सम्पूर्ण दर्शनोंका सार है और यही दृढ़व्रती होना है। दृढ़व्रती होनेसे उनके द्रढ़ नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक निश्चय न होनेसे ही द्रढ़ रहते हैं।
दूसरा भाव है कि उनको न तो निर्गुणका ज्ञान है और न उनको सगुणके दर्शन हुए हैं; किन्तु उनकी मान्यतामें संसार निरन्तर नष्ट हो रहा है, निरन्तर अभावमें जा रहा है और सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें भावरूपसे एक परमात्मा ही हैं—ऐसा मानकर वे दृढ़व्रती होकर भजन करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके परायण रहती है, ऐसे ही भगवान्के परायण रहना ही उनका भजन है।
विशेष बात
शास्त्रोंमें, सन्तवाणोंमें और गीतामें भी यह बात आती है कि पापी मनुष्य भगवान्में प्रायः नहीं लग पाते; पर यह एक स्वाभाविक सामान्य नियम है। वास्तवमें कितने ही पाप क्यों न हों, वे भगवान्से विमुख कर ही नहीं सकते; क्योंकि जीव साक्षात् भगवान्का अंश है; अतः उसकी शुद्धि पापोंसे आच्छादित भले ही हो जाय, पर मिट नहीं सकती। इसलिये दुराचारी भी दुराचार छोड़कर भगवान्के भजनमें लग जाय, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा ( भक्त )
हो जाता है—‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’* (गीता ९।३१)। अतः मनुष्यको कभी भी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि पुराने पापोंके कारण मेरेसे भजन नहीं हो रहा है; क्योंकि पुराने पाप केवल प्रतिकूल परिस्थितिरूप फल देनेके लिये होते हैं, भजनमें बाधा देनेके लिये नहीं। प्रतिकूल परिस्थिति देकर वे पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर ऐसा मान लिया जाय कि पापोंके कारण ही भजन नहीं होता, तो ‘अपि चेतसुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’ (गीता ९।३०) ‘दुराचारी—से—दुराचारी पुरुष अनन्यभावसे मेरा भजन करता है’—यह कहना बन नहीं सकता। पापोंके कारण अगर भजन-ध्यानमें बाधा लग जाय, तो बड़ी मुश्किल हो जायगी; क्योंकि बिना पापके कोई प्राणी है ही नहीं। पाप-पुण्यसे ही मनुष्यशरीर मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि पुराने पाप भजनमें बाधक नहीं हो सकते। इसलिये जो दृढ़व्रती पुरुष भगवान्के शरण होकर वर्तमानमें भगवान्के भजनमें लग जाते हैं, उनके पुराने पापोंका अन्त हो जाता है। मनुष्यशरीर भजन करनेके लिये ही मिला है, अतः जो परिस्थितियाँ शरीरतक रहनेवाली हैं, वे भजनमें बाधा पहुँचायें—ऐसा कभी सम्भव ही नहीं है।
सकाम पुण्यकर्मीकी मुख्यता होनेसे जीव स्वर्गमें जाते हैं और पापकर्मीकी मुख्यता होनेसे नरकोंमें जाते हैं। परन्तु भगवान् विशेष कृपा करके पापों और पुण्योंका पूरा फल-भोग न होनेपर भी अर्थात् चौरासी लाख योनियोंके बीचमें ही जीवको मनुष्यशरीर दे देते हैं। मनुष्यशरीरमें भगवद्भजनका अवसर विशेषतासे प्राप्त होता है। अतः मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर भगवत्प्राप्तिके तरफसे कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिलता है।
यह मनुष्यशरीर भोगयोनि नहीं है। इसको सामान्यतः कर्मयोनि कहते हैं। परन्तु संतोंकी वाणी और सिद्धान्तोंके अनुसार मनुष्यशरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। इसमें पुराने पुण्योंके अनुसार जो अनुकूल परिस्थिति आती है और पुराने पापोंके अनुसार जो प्रतिकूल परिस्थिति आती है—ये दोनों ही केवल साधन-सामग्री हैं। इन दोनोंमेंसे अनुकूल
- अन्य योनियोंमें पाप नष्ट होनेपर भी स्वभाव सुधर जाय—यह नियम नहीं है; जैसे—चौरासी लाख योनियाँ और नरक भोगते हुए पाप तो नष्ट हो जाते हैं, पर स्वभाव नहीं सुधरता। परन्तु मनुष्ययोनियोंमें पाप रहनेपर भी साधकका स्वभाव सुधर सकता है, जैसे—पापोंके रहनेसे उनके फलरूपमें प्रतिकूल परिस्थिति ( बीमारी आदि ) आती है, पर सत्संगसे, साधनपरायणतासे, अहंता-परिवर्तनसे पारमार्थिक साधकका स्वभाव सुधर जाता है।