श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिस्थिति आनेपर दुनियाकी सेवा करना और प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अनुकूलताकी इच्छिका त्याग करना—यह साधकका काम है। ऐसा करनेसे ये दोनों ही परिस्थितियाँ साधन-सामग्री हो जायँगी। इनमें भी देखा जाय तो अनुकूल परिस्थितियोंमें पुराने पुण्योंका नाश होता
है और वर्तमानमें भोगोंमें फँसनेकी सम्भावना भी रहती है। परन्तु प्रतिकूल परिस्थितियोंमें पुराने पापोंका नाश होता है और वर्तमानमें अधिक सजगता, सावधानी रहती है, जिससे साधन सुगमतासे बनता है। इस दृष्टिसे संतजन सांसारिक प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते आये हैं।
परिशिष्ट भाव —भगवान्के सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य है; क्योंकि यह सब पुण्योंका मूल है*। परन्तु भगवान्से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है; क्योंकि यह सब पापोंका मूल है। जिन मनुष्योंके पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् जो संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो गये हैं, वे राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भगवान्का भजन करते हैं। भजन करनेवालोंके प्रकारका वर्णन भगवान् सोलहवें श्लोकमें 'चतुर्विधा भजन्ते माम्' पदोंसे कर चुके हैं।
राग-द्वेष मनुष्यको संसारकी तरफ खींचते रहते हैं। जबतक एक वस्तुमें राग रहता है, तबतक दूसरी वस्तुमें द्वेष रहता ही है; क्योंकि मनुष्य किसी वस्तुके सम्मुख होगा तो किसी वस्तुसे विमुख होगा ही। जबतक मनुष्यके भीतर राग-द्वेष रहते हैं; तबतक वह भगवान्के सर्वथा सम्मुख नहीं हो सकता; क्योंकि उसका सम्बन्ध संसारसे जुड़ा रहता है। उसका जितने अंशमें संसारसे राग रहता है, उतने अंशमें भगवान्से द्वेष अर्थात् विमुखता रहती है।
'दुद्वन्ताः' —ढीली प्रकृतिवाला अर्थात् शिथिल स्वभाववाला मनुष्य असत्का जल्दी त्याग नहीं कर सकता। एक विचार किया और उसको छोड़ दिया, फिर दूसरा विचार किया और उसको छोड़ दिया—इस प्रकार बार-बार विचार करने और उसको छोड़ते रहनेसे आदत बिगड़ जाती है। इस बिगड़ी हुई आदतके कारण ही वह असत्के त्यागकी बातें तो सीख जाता है, पर असत्का त्याग नहीं कर पाता। अगर वह असत्का त्याग कर भी देता है तो स्वभावकी ढिलाईके कारण फिर उसको सता दे देता है। स्वभावकी यह शिथिलता स्वयं साधककी बनायी हुई है। अतः साधकके लिये यह बहुत आवश्यक है कि वह अपना स्वभाव दृढ़ रहनेका बना ले। एक बार वह जो विचार कर ले, उसपर वह दृढ़ रहे। छोटी-से-छोटी बातमें भी वह दृढ़ (पक्का) रहे तो ऐसा स्वभाव बननेसे उसमें असत्का त्याग करनेकी, संसारसे विमुख होनेकी शक्ति आ जायगी।
सम्बन्ध—सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने साधकके लिये तीन बातें कही थीं—'मव्यासक्तमनाः'—'मेरेमें प्रेम करके और 'मदाश्रयः'—'मेरा आश्रय लेकर 'योगं युज्जन्'—'योगका अनुष्ठान करता है, वह मेरे समग्ररूपको जान जाता है। उन्हीं तीन बातोंका उपसंहार अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २१ ॥
| जरामरण- | माम् | = मेरा | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण |
|---|---|---|---|---|
| मोक्षाय | आश्रित्य | = आश्रय लेकर | अध्यात्मम् | = अध्यात्मको |
| यतन्ति | = प्रयत्न करते हैं, | च | = और | |
| ते | = वे | अखिलम् | = सम्पूर्ण | |
| तत् | = उस | कर्म | = कर्मको | |
| ये | ब्रह्म | = ब्रह्मको, | विदुः | = जान जाते हैं। |
व्याख्या —[इन उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें आये 'मामाश्रित्य' पदमें 'मदाश्रयः' का, 'यतन्ति' पदमें 'योगं युज्जन्' का और 'युक्तचेतसः' पदमें 'मव्यासक्तमनाः' का उपसंहार किया गया है। इसी अध्यायके आरम्भमें जो 'समग्रम्' पद आया था, उसको यहाँ ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ कहा गया है।]
- सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥ (मानस, सुन्दर० ४४।१)