श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें५६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
संसार मेरेमें ही ओतप्रोत है' (सातवें अध्यायका सातवों श्लोक) और 'सब कुछ वासुदेव ही है' (सातवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक), ऐसे ही वे भगवान्के
समग्ररूपको जान जाते हैं कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं, भगवान्के सिवाय इनमें दूसरी कोई सत्ता नहीं है।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः ॥ ३० ॥
ये = जो मनुष्य साधि- भूताधिदैवम् = अधिभूत तथा अधिदैवके सहित च = और साधियज्ञम् = अधियज्ञके सहित
माम् = मुझे विदुः = जानते हैं, ते = वे युक्तचेतसः = मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य
प्रयाणकाले = अन्तकालमें अपि = भी माम् = मुझे च = ही विदुः = जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।
व्याख्या —'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः'—[पूर्वश्लोकमें निर्गुण-निराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुण-साकारको जाननेकी बात कहते हैं।] यहाँ 'अधिभूत' नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है, जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता, स्थिरता, सुखरूपता, श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सब-के-सब वास्तवमें भगवान्के ही हैं, क्षणभंगुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती, ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है—ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है।
'अधिदैव' नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है, जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं—ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है।
'अधियज्ञ' नाम भगवान् विष्णुका है, जो अन्तर्यामी-रूपसे सबमें व्याप्त हैं और जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है। तत्त्वसे भगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे सबमें परिपूर्ण हैं—ऐसा जानना ही अधियज्ञके सहित भगवान्को जानना है।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्णके शरीरके किसी
एक अंशमें विराट्रूप है (गीता—दसवें अध्यायका बयालीसवों और ग्यारहवें अध्यायका सातवों श्लोक) और उस विराट्रूपमें अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (ब्रह्माजी) और अधियज्ञ (विष्णु) आदि सभी हैं, जैसा कि अर्जुनने कहा है—हे देव! मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको; जिनकी नाभिसे कमल निकला है, उन विष्णुको, कमलपर विराजमान ब्रह्माको और शंकर आदिको देख रहा हूँ (गीता—ग्यारहवें अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। अतः तत्त्वसे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण ही समग्र भगवान् हैं।
'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः' —जो संसारके भोगों और संग्रहकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें समान रहनेवाले हैं तथा संसारसे सर्वथा उपरत होकर भगवान्में लगे हुए हैं, वे पुरुष युक्तचेता हैं। ऐसे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मेरेको ही जानते हैं अर्थात् अन्तकालकी पीड़ा आदिमें भी वे मेरेमें ही अटलरूपसे स्थित रहते हैं। उनकी ऐसी दृढ़ स्थिति होती है कि वे स्थूल और सूक्ष्म-शरीरमें कितनी ही हलचल होनेपर भी कभी किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं होते।
भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी
विशेष बात
(१)
प्रकृति और प्रकृतिके कार्य—क्रिया, पदार्थ आदिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही सभी विकार पैदा होते हैं और उन क्रिया, पदार्थ आदिकी प्रकटरूपसे सत्ता दीखने लग जाती है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा