भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 568

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

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‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ कहा है।

‘ते ब्रह्म तत् (विदुः) ’—इस तरहसे यत्न (साधन) करनेपर वे मेरे स्वरूपको* अर्थात् जो निर्गुण-निराकार है, जो मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, जो सामने नहीं है, शास्त्र जिसका परोक्षरूपसे वर्णन करते हैं, उस सच्चिदानन्दधन ब्रह्मको जान जाते हैं।

‘ब्रह्म’ के साथ ‘तत्’ शब्द देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी ‘तत्’ शब्दसे कहे जानेवाले जिस परमात्माको परोक्षरूपसे ही देखते हैं, ऐसे परमात्माका भी वे साक्षात् अपरोक्षरूपसे अनुभव कर लेते हैं।

उस परमात्माकी सत्ता प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। कारण कि वह परमात्मा किसी देशमें न हो, किसी समयमें न हो, किसी वस्तुमें न हो और किसी व्यक्तिमें न हो—ऐसा नहीं है, प्रत्युत वह सब देशमें है, सब समयमें है, सब वस्तुओंमें है और सब व्यक्तियोंमें है। ऐसा होनेपर भी वह अप्राप्त क्यों दीखता है? जो पहले नहीं था, बादमें नहीं रहेगा, अभी मौजूद रहते हुए भी प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है, अभावमें जा रहा है—ऐसे शरीर-संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार कर ली, इसीसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीख रहा है।

‘कृत्स्नमध्यात्मम् (विदुः) ’—वे सम्पूर्ण अध्यात्मको जान जाते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जीव तत्त्वसे क्या हैं, इस बातको वे जान जाते हैं। पंद्रहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें कहा है कि ‘जीवके द्वारा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त करनेको विमूह पुरुष नहीं जानते और ज्ञानचक्षुवाले जानते हैं।’ इसको जाननेका तात्पर्य यह नहीं है कि ‘जीव कितने हैं, वे क्या-क्या करते हैं और उनकी क्या-क्या गति हो रही है’—इसको जान जाते हैं, प्रत्युत आत्मा शरीरसे अलग है—इसको तत्त्वसे जान जाते हैं अर्थात् अनुभव कर लेते हैं।

भगवान्के आश्रयसे साधकका जब क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब वह अध्यात्म-तत्त्वको—अपने स्वरूपको जान जाता है। केवल अपने स्वरूपको ही नहीं, प्रत्युत तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबके स्वरूपको भी जान जाता है कि सबका स्वरूप शुद्ध है, निर्मल है, प्रकृतिसे असम्बद्ध है। अनन्त जन्मोंतक अनन्त क्रियाओं

और शरीरोंके साथ एकता करनेपर भी उनकी कभी एकता हो ही नहीं सकती और अनन्त जन्मोंतक अपने स्वरूपका बोध न होनेपर भी वे अपने स्वरूपसे कभी अलग हो ही नहीं सकते—ऐसा जानना सम्पूर्ण अध्यात्म-तत्त्वको जानना है।

‘कर्म चाखिलं विदुः’—वे सम्पूर्ण कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् सृष्टिकी रचना क्यों होती है, कैसे होती है और भगवान् कैसे करते हैं—इसको भी वे जान जाते हैं।

जैसे भगवान्ने चारों वर्णोंकी रचना की। उस रचनामें जीवोंके जो गुण और कर्म हैं अर्थात् उनके जैसे भाव हैं और उन्होंने जैसे कर्म किये हैं, उनके अनुसार ही शरीरोंकी रचना की गयी है। उन वर्णोंमें जन्म होनेमें स्वयं भगवान्की तरफसे कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये भगवान्में कर्तृत्व नहीं है और फलेच्छा भी नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिकी रचना करते हुए भी भगवान् कर्तृत्व और फलासक्तिसे सर्वथा निलिप्त रहते हैं। ऐसे ही मनुष्यमात्रको देश, काल, परिस्थितिके अनुरूप जो भी कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जाय, उसे कर्तृत्व और फलासक्तिसे रहित होकर करनेसे वह कर्म मनुष्यको बाँधनेवाला नहीं होता अर्थात् वह कर्म फलजनक नहीं बनता। तात्पर्य है कि कर्मके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं है, इस तरह उनके साथ निलिप्तताका अनुभव करना ही अखिल कर्मको जानना है।

जो अनन्यभावसे केवल भगवान्का आश्रय लेता है, उसका प्राकृत क्रियाओं और पदार्थोंका आश्रय छूट जाता है। इससे उसको यह बात ठीक तरहसे समझमें आ जाती है कि ये सब क्रियाएँ और पदार्थ परिवर्तनशील और नाशवान् हैं अर्थात् क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंकी भी उत्पत्ति और विनाश, संयोग और वियोग होता है। ब्रह्मलोकतककी कोई भी क्रिया और पदार्थ नित्य रहनेवाला नहीं है। अतः कर्मके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है—यह भी अखिल कर्मको जानना है।

तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का आश्रय लेकर चलने-वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् भगवान्ने जैसे कहा है कि ‘यह सम्पूर्ण

  • यहाँ अट्टाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अस्मत् शब्द ‘माम्’ का प्रयोग किया है, इसलिये यहाँ व्याख्यामें ‘मेरा स्वरूप’ ऐसा अर्थ लिया है।