श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ कहा है।
‘ते ब्रह्म तत् (विदुः) ’—इस तरहसे यत्न (साधन) करनेपर वे मेरे स्वरूपको* अर्थात् जो निर्गुण-निराकार है, जो मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, जो सामने नहीं है, शास्त्र जिसका परोक्षरूपसे वर्णन करते हैं, उस सच्चिदानन्दधन ब्रह्मको जान जाते हैं।
‘ब्रह्म’ के साथ ‘तत्’ शब्द देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी ‘तत्’ शब्दसे कहे जानेवाले जिस परमात्माको परोक्षरूपसे ही देखते हैं, ऐसे परमात्माका भी वे साक्षात् अपरोक्षरूपसे अनुभव कर लेते हैं।
उस परमात्माकी सत्ता प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। कारण कि वह परमात्मा किसी देशमें न हो, किसी समयमें न हो, किसी वस्तुमें न हो और किसी व्यक्तिमें न हो—ऐसा नहीं है, प्रत्युत वह सब देशमें है, सब समयमें है, सब वस्तुओंमें है और सब व्यक्तियोंमें है। ऐसा होनेपर भी वह अप्राप्त क्यों दीखता है? जो पहले नहीं था, बादमें नहीं रहेगा, अभी मौजूद रहते हुए भी प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है, अभावमें जा रहा है—ऐसे शरीर-संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार कर ली, इसीसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीख रहा है।
‘कृत्स्नमध्यात्मम् (विदुः) ’—वे सम्पूर्ण अध्यात्मको जान जाते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जीव तत्त्वसे क्या हैं, इस बातको वे जान जाते हैं। पंद्रहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें कहा है कि ‘जीवके द्वारा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त करनेको विमूह पुरुष नहीं जानते और ज्ञानचक्षुवाले जानते हैं।’ इसको जाननेका तात्पर्य यह नहीं है कि ‘जीव कितने हैं, वे क्या-क्या करते हैं और उनकी क्या-क्या गति हो रही है’—इसको जान जाते हैं, प्रत्युत आत्मा शरीरसे अलग है—इसको तत्त्वसे जान जाते हैं अर्थात् अनुभव कर लेते हैं।
भगवान्के आश्रयसे साधकका जब क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब वह अध्यात्म-तत्त्वको—अपने स्वरूपको जान जाता है। केवल अपने स्वरूपको ही नहीं, प्रत्युत तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबके स्वरूपको भी जान जाता है कि सबका स्वरूप शुद्ध है, निर्मल है, प्रकृतिसे असम्बद्ध है। अनन्त जन्मोंतक अनन्त क्रियाओं
और शरीरोंके साथ एकता करनेपर भी उनकी कभी एकता हो ही नहीं सकती और अनन्त जन्मोंतक अपने स्वरूपका बोध न होनेपर भी वे अपने स्वरूपसे कभी अलग हो ही नहीं सकते—ऐसा जानना सम्पूर्ण अध्यात्म-तत्त्वको जानना है।
‘कर्म चाखिलं विदुः’—वे सम्पूर्ण कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् सृष्टिकी रचना क्यों होती है, कैसे होती है और भगवान् कैसे करते हैं—इसको भी वे जान जाते हैं।
जैसे भगवान्ने चारों वर्णोंकी रचना की। उस रचनामें जीवोंके जो गुण और कर्म हैं अर्थात् उनके जैसे भाव हैं और उन्होंने जैसे कर्म किये हैं, उनके अनुसार ही शरीरोंकी रचना की गयी है। उन वर्णोंमें जन्म होनेमें स्वयं भगवान्की तरफसे कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये भगवान्में कर्तृत्व नहीं है और फलेच्छा भी नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिकी रचना करते हुए भी भगवान् कर्तृत्व और फलासक्तिसे सर्वथा निलिप्त रहते हैं। ऐसे ही मनुष्यमात्रको देश, काल, परिस्थितिके अनुरूप जो भी कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जाय, उसे कर्तृत्व और फलासक्तिसे रहित होकर करनेसे वह कर्म मनुष्यको बाँधनेवाला नहीं होता अर्थात् वह कर्म फलजनक नहीं बनता। तात्पर्य है कि कर्मके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं है, इस तरह उनके साथ निलिप्तताका अनुभव करना ही अखिल कर्मको जानना है।
जो अनन्यभावसे केवल भगवान्का आश्रय लेता है, उसका प्राकृत क्रियाओं और पदार्थोंका आश्रय छूट जाता है। इससे उसको यह बात ठीक तरहसे समझमें आ जाती है कि ये सब क्रियाएँ और पदार्थ परिवर्तनशील और नाशवान् हैं अर्थात् क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंकी भी उत्पत्ति और विनाश, संयोग और वियोग होता है। ब्रह्मलोकतककी कोई भी क्रिया और पदार्थ नित्य रहनेवाला नहीं है। अतः कर्मके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है—यह भी अखिल कर्मको जानना है।
तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का आश्रय लेकर चलने-वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् भगवान्ने जैसे कहा है कि ‘यह सम्पूर्ण
- यहाँ अट्टाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अस्मत् शब्द ‘माम्’ का प्रयोग किया है, इसलिये यहाँ व्याख्यामें ‘मेरा स्वरूप’ ऐसा अर्थ लिया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
संसार मेरेमें ही ओतप्रोत है' (सातवें अध्यायका सातवों श्लोक) और 'सब कुछ वासुदेव ही है' (सातवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक), ऐसे ही वे भगवान्के
समग्ररूपको जान जाते हैं कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं, भगवान्के सिवाय इनमें दूसरी कोई सत्ता नहीं है।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः ॥ ३० ॥
ये = जो मनुष्य साधि- भूताधिदैवम् = अधिभूत तथा अधिदैवके सहित च = और साधियज्ञम् = अधियज्ञके सहित
माम् = मुझे विदुः = जानते हैं, ते = वे युक्तचेतसः = मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य
प्रयाणकाले = अन्तकालमें अपि = भी माम् = मुझे च = ही विदुः = जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।
व्याख्या —'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः'—[पूर्वश्लोकमें निर्गुण-निराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुण-साकारको जाननेकी बात कहते हैं।] यहाँ 'अधिभूत' नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है, जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता, स्थिरता, सुखरूपता, श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सब-के-सब वास्तवमें भगवान्के ही हैं, क्षणभंगुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती, ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है—ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है।
'अधिदैव' नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है, जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं—ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है।
'अधियज्ञ' नाम भगवान् विष्णुका है, जो अन्तर्यामी-रूपसे सबमें व्याप्त हैं और जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है। तत्त्वसे भगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे सबमें परिपूर्ण हैं—ऐसा जानना ही अधियज्ञके सहित भगवान्को जानना है।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्णके शरीरके किसी
एक अंशमें विराट्रूप है (गीता—दसवें अध्यायका बयालीसवों और ग्यारहवें अध्यायका सातवों श्लोक) और उस विराट्रूपमें अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (ब्रह्माजी) और अधियज्ञ (विष्णु) आदि सभी हैं, जैसा कि अर्जुनने कहा है—हे देव! मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको; जिनकी नाभिसे कमल निकला है, उन विष्णुको, कमलपर विराजमान ब्रह्माको और शंकर आदिको देख रहा हूँ (गीता—ग्यारहवें अध्यायका पन्द्रहवों श्लोक)। अतः तत्त्वसे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण ही समग्र भगवान् हैं।
'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः' —जो संसारके भोगों और संग्रहकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें समान रहनेवाले हैं तथा संसारसे सर्वथा उपरत होकर भगवान्में लगे हुए हैं, वे पुरुष युक्तचेता हैं। ऐसे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मेरेको ही जानते हैं अर्थात् अन्तकालकी पीड़ा आदिमें भी वे मेरेमें ही अटलरूपसे स्थित रहते हैं। उनकी ऐसी दृढ़ स्थिति होती है कि वे स्थूल और सूक्ष्म-शरीरमें कितनी ही हलचल होनेपर भी कभी किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं होते।
भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी
विशेष बात
(१)
प्रकृति और प्रकृतिके कार्य—क्रिया, पदार्थ आदिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही सभी विकार पैदा होते हैं और उन क्रिया, पदार्थ आदिकी प्रकटरूपसे सत्ता दीखने लग जाती है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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सम्बन्ध-विच्छेद करके भगवत्स्वरूपमें स्थित होनेसे उनकी स्वतन्त्र सत्ता उस भगवतत्वमें ही लीन हो जाती है। फिर उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं दीखती।
जैसे, किसी व्यक्तिके विषयमें हमारी जो अच्छे और बुरेकी मान्यता है, वह मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो वह व्यक्ति भगवान्का स्वरूप है अर्थात् उस व्यक्तिमें तत्त्वके सिवाय दूसरा कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही संसारमें 'यह ठीक है, यह बेठीक है' इस प्रकार ठीक-बेठीककी मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो संसार भगवान्का स्वरूप ही है। हाँ, संसारमें जो वर्ण-आश्रमकी मर्यादा है, 'ऐसा काम करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये'-यह जो विधि-निषेधकी मर्यादा है, इसको महापुरुषोंने जीवोंके कल्याणार्थ व्यवहारके लिये मान्यता दी है।
जब यह भौतिक सृष्टि नहीं थी, तब भी भगवान् थे और इसके लीन होनेपर भी भगवान् रहेंगे—इस तरहसे जब वास्तविक भगवतत्त्वका बोध हो जाता है, तब भौतिक सृष्टिकी सत्ता भगवान्में ही लीन हो जाती है अर्थात् इस सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न रहनेपर संसार मिट जाता है, उसका अभाव हो जाता है, प्रत्युत अन्तःकरणमें सत्यत्वने जो संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई थी, जो कि जीवके कल्याणमें बाधक थी, वह नहीं रहती। जैसे सोनेके गहनोंकी अनेक तरहकी आकृति और अलग-अलग उपयोग होनेपर भी उन सबमें एक ही सोना है, ऐसे ही भगवद्भक्तके द्वारा अनेक तरहका यथायोग्य सांसारिक व्यवहार होनेपर भी उन सबमें एक ही भगवतत्त्व है—ऐसी अटलबुद्धि रहती है। इस तत्त्वको समझनेके लिये ही उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें समग्ररूपका वर्णन हुआ है।
(२)
उपासनाकी दृष्टिसे भगवान्के प्रायः दो रूपोंका विशेष वर्णन आता है—एक सगुण और एक निर्गुण। इनमें
सगुणके दो भेद होते हैं—एक सगुण-साकार और एक सगुण-निराकार। परन्तु निर्गुणके दो भेद नहीं होते, निर्गुण निराकार ही होता है। हाँ, निराकारके दो भेद होते हैं—एक सगुण-निराकार और एक निर्गुण-निराकार।
उपासना करनेवाले दो रुचिके होते हैं—एक सगुण विषयक रुचिवाला होता है और एक निर्गुणविषयक रुचिवाला होता है। परन्तु इन दोनोंकी उपासना भगवान्के 'सगुण-निराकार' रूपसे ही शुरू होती है; जैसे—परमात्म-प्राप्तिके लिये कोई भी साधक चलता है तो वह पहले 'परमात्मा है'—इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको मानता है और 'वे परमात्मा सबसे श्रेष्ठ हैं, सबसे दयालु हैं, उनसे बढ़कर कोई है नहीं'—ऐसे भाव उसके भीतर रहते हैं, तो उपासना सगुण-निराकारसे ही शुरू हुई। इसका कारण यह है कि बुद्धि प्रकृति कार्य (सगुण) होनेसे निर्गुणको पकड़ नहीं सकती। इसलिये निर्गुणके उपासकका लक्ष्य तो निर्गुण-निराकार होता है, पर बुद्धिसे वह सगुण-निराकार-का ही चिन्तन करता है*।
सगुणकी ही उपासना करनेवाले पहले सगुण-साकार मानकर उपासना करते हैं। परन्तु मनमें जबतक साकार-रूप दृढ़ नहीं होता, तबतक 'प्रभु हैं और वे मेरे सामने हैं' ऐसी मान्यता मुख्य होती है। इस मान्यतामें सगुण भगवान्की अभिव्यक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें जब वह सगुण-साकाररूपसे भगवान्के दर्शन, भाषण, स्पर्श और प्रसाद प्राप्त कर लेता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।
निर्गुणकी उपासना करनेवाले परमात्माको सम्पूर्ण संसारमें व्यापक समझते हुए चिन्तन करते हैं। उनकी वृत्ति जितनी ही सूक्ष्म होती चली जाती है, उतनी ही उनकी उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें सांसारिक आसक्ति और गुणोंका सर्वथा त्याग होनेपर जब 'मैं', 'तू' आदि कुछ भी नहीं रहता, केवल चिन्मय-तत्त्व शेष रह जाता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है।
इस प्रकार दोनोंकी अपनी-अपनी उपासनाकी पूर्णता
- उपासना सगुण-निराकारसे शुरू होती है—इसीलिये भगवान्ने इस (सातवें) अध्यायके अठ्ठाईसवें श्लोकमें 'सगुण-निराकार' का वर्णन किया है। फिर उन्तीसवें श्लोकमें 'निर्गुण-निराकार' का और तीसवें श्लोकमें 'सगुण-साकार' का वर्णन किया है। इस प्रकार यहाँ तो तीनों स्वरूपोंका एक-एक श्लोकमें वर्णन किया गया है, पर आगे आठवें अध्यायमें इन तीनोंका तीन-तीन श्लोकोंमें वर्णन किया गया है, जैसे—आठवें अध्यायके आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें 'सगुण-निराकार' की उपासनाका; ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें 'निर्गुण-निराकार' की उपासनाका तथा चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें 'सगुण-साकार' की उपासनाका विशद वर्णन किया गया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है अर्थात् दोनों एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं१। सगुण-साकारके उपासकोंको तो भगवत्कृपासे निर्गुण-निराकारका भी बोध हो जाता है—मम दरसन फल परम अनुपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ (मानस ३।३६।५) निर्गुण-निराकारके उपासकमें यदि भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्के दर्शनकी अभिलाषा है, तो उसे भगवान्के दर्शन हो जाते हैं अथवा भगवान्को उससे कुछ काम लेना होता है, तो भगवान् अपनी तरफसे भी दर्शन दे सकते हैं। जैसे, निर्गुण-निराकारके उपासक मधुसूदनाचार्यजीको भगवान्ने अपनी तरफसे दर्शन दिये थे२।
(३)
वास्तवमें परमात्मा सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब कुछ है। सगुण-निर्गुण तो उनके विशेषण हैं, नाम हैं। साधक परमात्माको गुणोंके सहित मानता है तो उसके लिये वे सगुण हैं और साधक उनको गुणोंसे रहित मानता है तो उसके लिये वे निर्गुण हैं। वास्तवमें परमात्मा सगुण तथा निर्गुण—दोनों हैं और दोनोंसे परे भी हैं। परन्तु इस वास्तविकताका पता तभी लगता है, जब बोध होता है।
भगवान्के सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, औदार्य आदि जो दिव्य गुण हैं, उन गुणोंके सहित सर्वत्र व्यापक परमात्माको 'सगुण' कहते हैं। इस सगुणके दो भेद होते हैं—
(१) सगुण-निराकार —जैसे, आकाशका गुण 'शब्द' है, पर आकाशका कोई आकार (आकृति) नहीं है, इसलिये आकाश सगुण-निराकार हुआ। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माका नाम सगुण-निराकार है।
(२) सगुण-साकार —वे ही सगुण-निराकार परमात्मा जब अपनी दिव्य प्रकृतिको अधिष्ठित करके अपनी योगमायासे लोगोंके सामने प्रकट हो जाते हैं, उनकी इन्द्रियोंके विषय हो जाते हैं, तब उन परमात्माको सगुण-
साकार कहते हैं। सगुण तो वे थे ही, आकृतियुक्त प्रकट हो जानेसे वे साकार कहलाते हैं।
जब साधक परमात्माको दिव्य अलौकिक गुणोंसे भी रहित मानता है अर्थात् साधककी दृष्टि केवल निर्गुण परमात्माकी तरफ रहती है, तब परमात्माका वह स्वरूप 'निर्गुण-निराकार' कहा जाता है।
गुणोंके भी दो भेद होते हैं—(१) परमात्माके स्वरूपभूत सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि दिव्य, अलौकिक, अप्राकृत गुण और (२) प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुण। परमात्मा चाहे सगुण-निराकार हों, चाहे सगुण-साकार हों, वे प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंसे सर्वथा रहित हैं, अतीत हैं। वे यद्यपि प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार करके सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं, फिर भी वे प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा रहित ही रहते हैं (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
जो परमात्मा गुणोंसे कभी नहीं बँधते, जिनका गुणोंपर पूरा आधिपत्य होता है, वे ही परमात्मा निर्गुण होते हैं। अगर परमात्मा गुणोंसे बँधे हुए और गुणोंके अधीन होंगे, तो वे कभी निर्गुण नहीं हो सकते। निर्गुण तो वे ही हो सकते हैं, जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं और जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं, ऐसे परमात्मामें ही सम्पूर्ण गुण रह सकते हैं। इसलिये परमात्माको सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि सब कुछ कह सकते हैं। ऐसे परमात्माका ही उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें समग्ररूपसे वर्णन किया गया है।
अध्याय-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने इस अध्यायमें पहले परिवर्तनशीलको 'अपर' और अपरिवर्तनशीलको 'परा' नामसे कहा (चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। फिर इन दोनोंके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी और अपनेको सम्पूर्ण संसारका प्रभव और प्रलय बताया अर्थात् संसारके आदिमें और अन्तमें 'केवल मैं ही रहता हूँ'—यह बताया (छठा-सातवाँ श्लोक)। उसी
१-सगुण-निर्गुणका भेद तो उपासनाकी दृष्टिसे है। वास्तवमें इन दोनों उपासनाओंमें उपास्यतत्त्व एक ही है। उपासना साधककी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार होती है। अतः साधकोंकी भिन्न-भिन्न रुचि, विश्वास और योग्यता होनेके कारण उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। परन्तु सम्पूर्ण उपासनाओंसे अन्तमें एक ही उपास्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। उस उपास्यतत्त्वको ही 'समग्र ब्रह्म' कहते हैं।
२-अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवर्धुवितेन॥
'अद्वैतमार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!'
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
५७९
प्रसंगमें भगवान्ने सत्रह विभूतियोंके रूपमें कारणरूपसे अपनी व्यापकता बतायी (आठवेंसे बारहवें श्लोकतक)। फिर भगवान्ने कहा कि जो तीनों गुणोंसे मोहित है अर्थात् जिसने निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है, वह गुणोंसे पर मेरेको नहीं जान सकता (तेरहवाँ श्लोक)। यह गुणमयी माया तरनेमें बड़ी दुष्कर है। जो मेरे शरण हो जाते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं (चौदहवाँ श्लोक); परन्तु जो मेरेसे विमुख होकर निषिद्ध आचरणोंमें लग जाते हैं, वे दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते (पन्द्रहवाँ श्लोक)। अब यहाँ चौदहवें श्लोकके बाद ही सोलहवाँ श्लोक कह देते तो बहुत ठीक बैठता अर्थात् चौदहवें श्लोकमें शरण होनेकी बात कही, तो अब शरण होनेवाले चार तरहके होते हैं—ऐसा बतानेसे श्रृंखला बहुत ठीक बैठती। परन्तु पंद्रहवाँ श्लोक बीचमें आ जानेसे प्रकरण ठीक नहीं बैठता। अतः यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध अर्थात् बाधा डालनेवाला मालूम देता है। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि यह श्लोक न आनेसे 'पापी मेरे शरण नहीं होते'—यह कहना बाकी रह जाता। इसलिये पंद्रहवें श्लोकमें 'दुष्कृती (पापी) मेरे शरण होते ही नहीं'—यह बात बता दी और सोलहवें श्लोकमें शरण होनेवालोंके चार प्रकार बता दिये।
अब जो शरण होते हैं, उनके भी दो प्रकार हैं—एक तो भगवान्को भगवान् समझकर अर्थात् भगवान्की महत्ता समझकर भगवान्के शरण होते हैं (सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) और दूसरे भगवान्को साधारण मनुष्य मानकर
परिशिष्ट भाव —इस अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको जान जायगा और जिसको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। फिर उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने 'वासुदेवः सर्वम्' कहकर अपने समग्ररूपका संक्षेपसे वर्णन किया। अब अध्यायके अन्तमें भगवान् उसका खुलासा करते हैं।
साधकका जन्म तो हो चुका है और व्याधि अवश्यम्भावी नहीं है; परन्तु वृद्धावस्था और मृत्यु—ये दोनों अवश्यम्भावी हैं और इनसे मनुष्यको अधिक दुःख होता है। इसलिये यहाँ 'जरामरणमोक्षाय' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का आश्रय लेनेवाले भक्त जरा और मरण—दोनोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् उनको शरीरके रहते हुए वृद्धावस्थाका भी दुःख नहीं होता और गतिके विषयमें भी दुःख नहीं होता कि मरनेके बाद हमारी क्या गति होगी? वे भगवान्का आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, इसलिये वे परा-अपराके सहित भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं अर्थात् विज्ञानसहित ज्ञानको जान लेते हैं।
यद्यपि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी भी जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं, पर भक्त जरा-मरणसे मुक्त होनेके साथ-साथ भगवान्के समग्ररूपको भी जान लेते हैं। कारण कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगीकी तो आरम्भसे ही अपने साधनकी निष्ठा होती है (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक), पर भक्त आरम्भसे ही भगवन्निष्ठ अर्थात् भगवत्परायण होता है। भगवन्निष्ठ होनेसे भगवान् कृपा करके उसको अपने समग्ररूपका ज्ञान करा देते हैं।
देवताओंको सबसे बड़ा मानते हैं, इसलिये भगवान्का आश्रय न लेकर कामनापूर्तिके लिये देवताओंके शरण हो जाते हैं (बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक)।
देवताओंके शरणमें होनेमें भी दो हेतु होते हैं—कामनाओंका बढ़ जाना और भगवान्की महत्ताको न जानना। इनमेंसे पहले हेतुका वर्णन तो बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक कर दिया और दूसरे हेतुका वर्णन चौबीसवें श्लोकमें कर दिया। जो भगवान्को साधारण मनुष्य मानते हैं, उनके सामने भगवान् प्रकट नहीं होते—यह बात पचीसवें श्लोकमें बता दी।
अब ऐसा असर पड़ता है कि भगवान् भी मायासे ढके होंगे। अतः भगवान् कहते हैं कि मेरा ज्ञान ढका हुआ नहीं है (छब्बीसवाँ श्लोक)। मेरेको न जाननेमें राग-द्वेष ही मुख्य कारण हैं (सताईसवाँ श्लोक)। जो इस द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं (अट्ठाईसवाँ श्लोक)। जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे मेरे समग्ररूपको जान जाते हैं और अन्तमें मेरेको ही प्राप्त होते हैं (उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)।
इस अध्यायपर आदिसे अन्ततक विचार करके देखें तो भगवान्के विमुख और सम्मुख होनेका ही इसमें वर्णन है। तात्पर्य है कि जड़ताकी तरफ वृत्ति रखनेसे मनुष्य बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। अगर वे जड़तासे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, तो वे सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार—ऐसे भगवान्के समग्ररूपको जानकर अन्तमें भगवान्को ही प्राप्त हो जाते हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि कोई एक ही (विरला) मनुष्य मेरे समग्ररूपको जानता है—‘कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः’। यहाँ बताते हैं कि जो मेरे शरण हो जाता है, वह मेरे समग्ररूपको जान लेता है।
अतः भगवान्के समग्ररूप-(विज्ञानसहित ज्ञान-) को जाननेकी मुख्य साधना है—शरणागति (‘मामाश्रित्य’)। कारण कि समग्रका ज्ञान विचारसे नहीं होता, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासपूर्वक शरणागत होनेपर भगवत्कृपासे ही होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मदाश्रयः’ कहकर अन्तमें ‘मामाश्रित्य’ पदसे उसका उपसंहार किया है।
ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव) तथा अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ)—यह ‘ज्ञान’ का विभाग है। इस विभागमें निर्गुणकी मुख्यता है।
अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर््यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह ‘विज्ञान’ का विभाग है। इस विभागमें सगुणकी मुख्यता है।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके ‘सहित’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्-असत्, परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय किञ्चिन्मात्र भी कुछ नहीं है। सत्-असत्को अलग-अलग करनेसे ज्ञानमार्ग होता है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि’……’ (गीता २।१६) और एक करनेसे भक्तिमार्ग होता है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)।
‘ब्रह्म’ की बात पहले पाँचवें अध्यायमें तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक कही गयी है। ‘कृत्स्न अध्यात्म’ की बात पहले छठे अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें ‘सर्वभूतस्थमात्मानम्’ पदसे कही गयी है। ‘अखिल कर्म’ की बात पहले चौथे अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और तैंतीसवें श्लोकमें क्रमशः ‘कृत्स्नकर्मकृत्’, ‘कर्म समग्रम्’ और ‘सर्व कर्माखिलम्’ पदसे कही गयी है।
अभाव कर्मका होता है, आत्मा या ब्रह्मका नहीं। न्यायमें आता है कि किसी वस्तुके भावका ज्ञान जिस इन्द्रियसे होता है, उसी इन्द्रियसे उसके अभावका और जातिका ज्ञान भी होता है। अतः मनुष्य जिस ज्ञानसे कर्मोंको जानता है (कर्म चाखिलम्), उसी ज्ञानसे कर्मोंके अभावको अर्थात् अकर्मको भी जानता है—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’ (गीता ४।१८)। ब्रह्म, आत्मा और अकर्म—तीनों एक ही हैं, ऐसा जानना ही ‘ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्’ पदोंका तात्पर्य है।
‘कर्म’ सीमित है, कर्मसे व्यापक ‘अध्यात्म’ है और अध्यात्मसे व्यापक ‘ब्रह्म’ है। परन्तु ‘माम्’ (समग्र) उस ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि ब्रह्मके अन्तर्गत तो समग्र नहीं आता, पर समग्रके अन्तर्गत ब्रह्म आ जाता है।
‘अध्यात्म’ के साथ ‘कृत्स्न’ शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनको भगवान्ने अपनी परा प्रकृति बताया है, वे अनेक रूपसे दीखनेवाले सम्पूर्ण जीव। ‘कर्म’ के साथ ‘अखिल’ शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनके फलस्वरूप जीव अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें जाता है, वे शुभ-अशुभ सम्पूर्ण कर्म, परन्तु ‘ब्रह्म’ के साथ ‘कृत्स्न’ या ‘अखिल’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म अनेक नहीं है, प्रत्युत एक ही है।
गीतामें भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—कर्मयोग और ज्ञानयोग। ये दोनों ही निष्ठाएँ लौकिक हैं—‘लोकेशस्मिन् द्विविधा निष्ठा’ (गीता ३।३); परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि कर्मयोगमें ‘शर’ (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें ‘अक्षर’ (जीवात्मा) की प्रधानता है। शर और अक्षर—दोनों ही लोकमें हैं—‘द्वायिषौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६) इसलिये कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं। परन्तु भक्तियोगमें ‘परमात्मा’ की प्रधानता है, जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ, अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। भगवान्के समग्ररूपमें ब्रह्म, अध्यात्म तथा कर्म—इनमें लौकिक निष्ठा (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग) की बात आयी है* और अधिभूत, अधिदैव तथा
- ‘अध्यात्म’ से ज्ञानयोग और ‘कर्म’ से कर्मयोग लेना चाहिये। ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंसे ‘ब्रह्म’ की प्राप्ति होती है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
भक्तिका प्रसंग होनेसे यहाँ भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोगका विस्तारसे वर्णन नहीं किया। इनका विस्तारसे वर्णन पिछले (दूसरेसे छठे) अध्यायोंमें कर चुके हैं।
लोक ३०]
- साधक-संजीवनी *
५७३
अधियज्ञ—इनमें अलौकिक निष्ठा-(भक्तियोग-) की बात आयी है। 'ज्ञान' लौकिक है—'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते'" (गीता ४।३८) और 'विज्ञान' अलौकिक है। लौकिक तथा अलौकिक—दोनों ही समग्र भगवान्के रूप हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।
'लोक' शब्दमें जड़ भी है और चेतन भी। केवल जड़ अथवा केवल चेतनका वाचक 'लोक' शब्द नहीं हो सकता। अतः 'लौकिक' में जड़ और चेतन दोनों आते हैं, पर 'अलौकिक' में केवल चेतन ही आता है; क्योंकि अलौकिक सदा चिन्मय ही होता है। परन्तु 'समग्र' में लौकिक और अलौकिक—दोनों आ जाते हैं।
यहाँ एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि निर्गुण-निराकार 'ब्रह्म' का नाम भगवान्के समग्ररूपके अन्तर्गत आया है। लोगोंमें प्रायः इस बातकी प्रसिद्धि है कि 'निर्गुण-निराकार ब्रह्मके अन्तर्गत ही सगुण ईश्वर है। ब्रह्म मायारहित है और ईश्वर मायासहित है। अतः ब्रह्मके एक अंशमें ईश्वर है।' वास्तवमें ऐसा मानना शास्त्रसम्मत एवं युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब ब्रह्ममें माया है ही नहीं तो फिर मायासहित ईश्वर ब्रह्मके अन्तर्गत कैसे हुआ? ब्रह्ममें माया कहाँसे आयी? परन्तु गीतामें भगवान् कह रहे हैं कि मेरे समग्ररूपके एक अंशमें ब्रह्म है! इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मका आधार बताया है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्' (गीता १४।२७) 'मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ' तथा 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४) 'यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।' भगवान्के इस कथनका तात्पर्य है कि ब्रह्मका अंश मैं नहीं हूँ, प्रत्युत मेरा अंश ब्रह्म है। अतः निष्पक्ष विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि गीतामें ब्रह्मकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत ईश्वरकी मुख्यता है। पूर्ण तत्त्व समग्र ही है। समग्रमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब आ जाते हैं।
वास्तवमें देखा जाय तो समग्ररूप सगुणका ही हो सकता है; क्योंकि सगुण शब्दके अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुण शब्दके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणाँका निषेध है। अतः निर्गुणमें समग्र शब्द लग ही नहीं सकता। इसलिये यहाँ 'अध्यात्म' और 'कर्म' के साथ तो क्रमशः 'कृत्स्न' और 'अखिल' शब्द आये हैं, जो समग्रताके वाचक हैं, पर 'ब्रह्म' के साथ समग्रताका वाचक कोई शब्द कहीं भी नहीं आया है। अतः समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं।
प्रश्न —ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये तीनों लौकिक कैसे हैं?
उत्तर —भगवान्ने ब्रह्मको 'अक्षर' कहा है—'अक्षरं ब्रह्म परमम्' (गीता ८।३) और जीवको भी 'अक्षर' कहा है—'द्वारिमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च' (गीता १५।१६)। जीव और ब्रह्म—दोनों एक हैं—'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य० १)। प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध होनेसे जो 'जीव' (अध्यात्म) है, वही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध न होनेसे सामान्य 'ब्रह्म' है। अतः गीताके अनुसार जैसे जीव लोकमें है, ऐसे ही ब्रह्म भी लोकमें है अर्थात् ब्रह्म लौकिक निष्ठा-(कर्मयोग तथा ज्ञानयोग-) से प्रापणीय तत्त्व है।
'अध्यात्म' अर्थात् जीवने जगत्को धारण किया हुआ है—'यदेदं धार्यते जगत्' (गीता ७।५)। जीवकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये जगत्के संगसे जीव भी जगत् अर्थात् लौकिक हो जाता है। (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। लोकमें होनेके कारण भी जीव लौकिक है—'ममेवांशो जीवलोके' (गीता १५।७), 'द्वारिमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च' (गीता १५।१६)।
'कर्म' दो प्रकारसे होते हैं—सकामभावसे और निष्कामभावसे। ये दोनों ही प्रकारके कर्म लोकमें होनेसे लौकिक हैं।
प्रश्न —अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—ये तीनों अलौकिक कैसे हैं?
१-यहाँ 'पवित्रमिह' के अन्तर्गत आया 'इह' शब्द लोकका वाचक है।
२-ब्रह्मो विषय सनेह ते, ताते कहिये जीव। अलख अजोगी आप है, हरिया न्यारी थीव॥
३-लोकमें होनेवाले सकाम-कर्म—'यज्ञार्थार्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।' (गीता ३।९), 'क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्ववति कर्मजा॥' (गीता ४।१२); 'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके' (गीता १५।२)।
लोकमें होनेवाले निष्काम-कर्म—'लोकेऽस्मिन्द्विधा ..... योगिनाम्॥' (गीता ३।३)।
वास्तवमें कर्म सकाम या निष्काम नहीं होते, प्रत्युत कर्ता सकाम या निष्काम होता है। अतः सकाम-निष्कामभाव कर्तामें रहते हैं।
५७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
उत्तर—‘अधिभूत’ अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् तत्त्वसे भगवान्का ही स्वरूप होनेसे अलौकिक है—‘अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुनं’ (गीता ९।१९) ‘अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ’। भगवान्ने अर्जुनको जो विराट्रूप दिखाया था, वह भी दिव्य अर्थात् अलौकिक था। वह दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अपने ही दिव्य शरीरके एक अंगमें दिखाया था। अतः भगवान्का ही विराट्रूप होनेसे यह पांचभौतिक जगत् भी अलौकिक ही है। भगवान्ने संसारमें अपनी विभूतियोंको भी दिव्य अर्थात् अलौकिक कहा है—‘दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ (गीता १०।१९), ‘मम दिव्यानां विभूतीनाम्’ (१०।४०)। परन्तु जीवको अज्ञानवश अपनी बुद्धिसे (राग-द्वेषके कारण) यह जगत् लौकिक दीखता है। इसलिये अज्ञान मिटनेपर जड़ता रहती ही नहीं, केवल चिन्मयता रहती है।
‘अधिदैव’ अर्थात् ब्रह्माजी आदि सभी देवता अलौकिक हैं।
‘अधि यज्ञ’ अर्थात् अन्तर्यामी भगवान् सबके हृदयमें रहते हुए भी निलिप्त होनेके कारण अलौकिक हैं।
भगवान्ने ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञम्’ पदोंमें अपनेको अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञके सहित जाननेकी बात कही है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्माके सहित होनेसे ही ये तीनों अलौकिक हैं, अन्यथा लौकिक ही हैं। जबतक भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है; परन्तु भगवान्के साथ सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। इसलिये अपना उद्योग मुख्य होनेसे कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘लौकिक निष्ठा’ है और भगवान्का आश्रय मुख्य
१-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्तादेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मतोऽन्यदिति बुध्यध्वर्मजसा ॥
(श्रीमद्भा० ११।१३।२४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें, स्वीकार कर लें।
२-‘नानाविधानि दिव्यानि’ (गीता ११।५), ‘अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्’ (११।१०), ‘दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्’ (११।११), ‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे……सर्वानुरगांश्च दिव्यान्’ (११।१५)।
३-भगवान्के वचन हैं—‘इहैकस्थं जगत्कृतं…… मम देहे’ (११।७)।
संजयके वचन हैं—‘तत्रैकस्थं जगत्कृतं…… अपश्यदेवदेवस्य शरीरं’ (११।१३)।
अर्जुनके वचन हैं—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे’ (११।१५)।
४-खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींश्च सन्त्वानि दिशो दृमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरः शरीरं
यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्यः ॥
(श्रीमद्भा० ११।२।४९)
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, जीव-जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के ही शरीर हैं—ऐसा मानकर भक्त सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है।’
भद्रूपवर्षसदिरद्विनभः समुद्रपातालदिन्द्रनकभागणलोकसंस्था ।
गीता मया तव नृपाद्भूतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम ॥
(श्रीमद्भा० ५।२६।४०)
‘परीक्षितु! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण और लोकोंको स्थितिका वर्णन किया। यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूल रूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है।’
५-अर्जुनने भी विभूतियोंको दिव्य कहा है—‘वक्तुमहँस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ (१०।१६)।
द्वा सुपुर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषरवजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्भूतनश्चनन्यो अभिचाकशीति ॥
(मुण्डक० ३।१।१; श्वेताश्वतर० ४।६)
६-‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, पर दूसरा (परमात्मा) उपभोग न करता हुआ केवल प्रकाशित करता है।’
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
५७५
होनेसे भक्तियोग ‘अलौकिक निष्ठा’ है।
वास्तवमें लौकिक कोई तत्त्व नहीं है। वास्तविक तत्त्व तो अलौकिक ही है। परन्तु साधककी दृष्टिसे लौकिक और अलौकिक—ये दो भेद कहे गये हैं। तात्पर्य है कि लौकिक-अलौकिकका विभाग अज्ञानवश होनेवाले राग-द्वेषके कारण ही है। राग-द्वेष न हो तो सब कुछ अलौकिक, चिन्मय, दिव्य ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’। कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है। राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्स्वरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया!
विज्ञानसहित ज्ञानका अर्थात् भगवान्के समग्ररूपका वर्णन करनेका तात्पर्य यही है कि जड़-चेतन, सत्-असत्, परा-अपरा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्का ही स्वरूप है। इसलिये भगवान्ने यहाँ समग्ररूपवर्णनके आदि और अन्तमें ‘माम्’ पद दिया है, जो समग्रका वाचक है—‘मामाश्रित्य’ (७।२९) और ‘मां ते विदुः’ (७।३०)।
भगवान्ने कर्मोंकी गति (तत्त्व)—को गहन बताया है—‘गहना कर्मणो गतिः’ (गीता ४।१७), पर भक्त उसको भी जान लेता है। कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—दोनोंको भक्त जान लेता है। तात्पर्य है कि वह कर्मको भी जान लेता है और कर्मयोगको भी जान लेता है। कर्मयोगी तो कर्मयोगको ही जानता है और ज्ञानयोगी ज्ञानयोगको ही जानता है, पर भक्त भगवत्कृपासे कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको ही जान लेता है।
इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये ‘योगं युञ्जन्मदाश्रयः’ को यहाँ ‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ पदोंसे और ‘मव्यासक्तमनाः’ को यहाँ ‘युक्तचेतसः’ पदसे कहा गया है। तात्पर्य है कि मेरा आश्रय लेनेसे भक्तको कर्मयोग तथा ज्ञानयोगकी भी सिद्धि हो जाती है अर्थात् वे दोनोंके फल (लक्ष्य) रूप ब्रह्मको भी जान लेते हैं—‘ते ब्रह्म तद्विदुः’ और मेरे समग्ररूपको भी जान लेते हैं—‘मां ते विदुः’।
‘प्रयाणकालेऽपि’ में ‘अपि’ पद देनेका तात्पर्य है कि वे भक्त मेरेको पहले भी जानते हैं और अन्तकालमें भी जानते हैं अर्थात् उनका ज्ञान कभी लुप्त नहीं होता। ऐसे भक्त ‘युक्तचेता’ हो जाते हैं अर्थात् उनके मनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं। भगवान्के साथ उनकी अभिन्नता (नित्ययोग) होनेसे न वे भगवान्से वियुक्त होते हैं, न भगवान् उनसे वियुक्त होते हैं। ऐसे युक्तचेता भक्त अन्तकालमें कुछ भी चिन्तन होनेपर भी योगभ्रष्ट नहीं होते, प्रत्युत भगवान्को ही प्राप्त होते हैं—‘प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः’। कारण कि उन भक्तोंकी दृष्टिमें जब भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जायगा? क्यों जायगा? कैसे जायगा? उनके मनमें कुछ भी चिन्तन होगा तो भगवान्का ही चिन्तन होगा, फिर उनका मन विचलित कैसे होगा और मनके विचलित हुए बिना वह योगभ्रष्ट कैसे होगा? कारण कि करणसापेक्ष साधनमें योगसे मनके विचलित होनेपर ही मनुष्य योगभ्रष्ट होता है—‘योगाच्छलितमानसः’ (गीता ६।३७); परन्तु सब जगह भगवान्को देखनेवालेका भगवान्से नित्ययोग रहता है।
भगवान्के कुछ भक्त तो मुक्ति चाहते हैं—‘जरामरणमोक्षाय’ और कुछ भक्त प्रेम चाहते हैं—‘मां ते विदुर्युक्तचेतसः’। मुक्ति चाहनेवाले भक्त कर्मयोग और ज्ञानयोग (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म)—को जान लेते हैं, पर प्रेम चाहनेवाले भक्त स्वयं समग्र भगवान्को जान लेते हैं—‘मां विदुः’। भगवान् अपने प्रेमी भक्तोंको कर्मयोग (बुद्धियोग) और ज्ञानयोग—दोनों प्रदान कर देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। जरा-मरणरूप बन्धन और मुक्ति—दोनों ही लौकिक हैं, पर प्रेम अलौकिक है। यद्यपि साधन-भक्ति भी लौकिक है, तथापि उद्देश्य अलौकिक होनेसे वह अलौकिक साध्य-भक्तिमें चली जाती है—‘भवत्या संजातया भवत्या’ (श्रीमद्भगवद्गीता ११।३।३९)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘ज्ञानविज्ञानयोग’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
५७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
इस सातवें अध्यायमें ज्ञान और विज्ञानका वर्णन किया गया है। भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तापूर्वक मानना ‘ज्ञान’ है। ऐसे ही भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना ‘विज्ञान’ है। ज्ञान और विज्ञानसे परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है अर्थात् ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ इस परम प्रेमरूप नित्य-सम्बन्धकी जागृति हो जाती है। इसलिये इस सातवें अध्यायका नाम ‘ज्ञानविज्ञानयोग’ रखा गया है।
सातवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तमोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके चार सौ छः और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौबीस है।
(२) ‘अथ सप्तमोऽध्यायः’ के सात ‘श्रीभगवानुवाच’
के सात, श्लोकोंके नौ सौ साठ और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार बाईस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच’।
सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके तीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; तथा उन्नीसवें और बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तेईस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
सातवें अध्यायका सार
भगवान्की दो प्रकृतियाँ हैं—अपरा और परा। संसार ‘अपरा’ प्रकृति है और जीव ‘परा’ प्रकृति है। अपरा प्रकृति जड़ तथा निरन्तर परिवर्तनशील है और परा प्रकृति चेतन तथा नित्य अपरिवर्तनशील है। भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी ही प्रकृति अर्थात् स्वभाव बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। भगवान्का स्वभाव होनेसे अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र (भगवान्से अलग) सत्ता नहीं है; परन्तु जीव (परा प्रकृति) अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। यह सम्बन्ध जीव दो प्रकारसे मानता है—(१) अहंतापूर्वक; जैसे—मैं शरीर हूँ और (२) ममतापूर्वक; जैसे—शरीर मेरा है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पन्न होनेमें कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
वास्तवमें सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, कारण तथा कार्य एक भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिक्विदस्ति’ (७।७)। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। अतः एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत तथा इनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय—इन सबके मूल कारण भगवान् ही हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि तथा अविनाशी बीज हैं। तात्पर्य है कि सृष्टिमें जो कुछ भी क्रिया, पदार्थ, भाव आदि देखने-सुनने-समझनेमें आते हैं, उन सबके बीज (मूल कारण) एकमात्र भगवान् ही हैं। कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है।* अतः कारणकी तो स्वतन्त्र सत्ता होती है, पर कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। इसलिये अगर कोई साधक कार्यमें भगवान्को प्राप्त करना चाहे तो उसको भगवान् नहीं मिलेंगे—‘न त्वहं तेषु ते मयि’ (७।१२)। जो सबके कारणरूप भगवान्के शरण होते हैं, उन्हींको भगवान् मिलते हैं। परन्तु जो कारणरूप भगवान्के शरण न होकर कार्यरूप सत्त्वादि गुणोंमें उलझ जाते हैं, वे जन्म-मरणके चक्रमें पड़े रहते हैं। ऐसे मनुष्य कार्यरूप शरीर-संसारके सम्बन्धसे होनेवाली कामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंकी शरण लेते हैं, क्योंकि वे अलौकिक भगवान्को साधारण मनुष्यकी तरह लौकिक मानते हैं। परन्तु जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित नहीं होते, वे भगवान्की शरण लेते हैं। ऐसे भक्तोंके चार भेद होते हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। इन शरणगत भक्तोंमें भी जो ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इस प्रकार भगवान्के शरण हो जाता है, वह महात्मा भक्त मुक्त पुरुषोंसे भी श्रेष्ठ होनेके कारण अत्यन्त दुर्लभ है। वह महात्मा भक्त भगवान्की कृपासे परा-अपरासहित भगवान्के समग्ररूपको
- भगवान् कार्यरूपमें परिणत नहीं होते, प्रत्युत कार्यरूपसे प्रकट होते हैं।
सार ]
- साधक-संजीवनी *
५७७
जान लेता है, जिसको जाननेपर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसके सिवाय अन्य चीज कोई है ही नहीं। उसका भगवान्के साथ आत्मीय सम्बन्ध हो जाता है, जिससे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति (जागृति) हो जाती है। इस प्रेमकी जागृतिमें ही मनुष्यजन्मकी पूर्णता है।
× × × ×
एक अपरा प्रकृति है, एक परा प्रकृति है और एक परा-अपराके मालिक परमात्मा हैं। सम्पूर्ण शरीर-संसार (अधिभूत) अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत और सम्पूर्ण शरीरी (कृत्स्न अध्यात्म) परा प्रकृतिके अन्तर्गत आते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मात्र शरीर (संसार) भी एक हैं और मात्र शरीरी (जीव) भी एक हैं तथा अपरा और परा-ये दोनों जिसकी शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा भी एक हैं। अतः: शरीरोंकी दृष्टिसे, आत्माकी दृष्टिसे और परमात्माकी दृष्टिसे-तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं, अनेक नहीं हैं-'नेह नानास्ति किञ्चन' (कठ० २।१।११, बृहदा० ४।४।१९)।
सम्पूर्ण शरीरोंमें एकता स्वीकार करनेपर किसी भी प्राणीसे राग अथवा द्वेष नहीं होगा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव होगा। ऐसा होनेसे 'कर्मयोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि जब अपनेसे भिन्न दूसरा कोई है ही नहीं और व्यक्तिगत अपना कुछ है ही नहीं तो फिर अपने पास जो भी वस्तु है, उसमें ममता नहीं होगी और जो वस्तु नहीं है, उसकी कामना नहीं होगी। ममता और कामना न होनेपर अपने पास जो भी वस्तु है, वह स्वतः दूसरोंकी सेवामें लगेगी।
सम्पूर्ण जीवोंमें एकता स्वीकार करनेपर सर्वत्र आत्मभाव अथवा ब्रह्मभाव हो जायगा-'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१), 'आत्मवेदं सर्वम्' (छान्दोग्य० ७।२५।२)। ऐसा होनेसे 'ज्ञानयोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है अर्थात् जीव और ब्रह्म एक ही हैं-'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य० १)।
अपरा और परा-इन दोनों प्रकृतियोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; क्योंकि ये दोनों भगवान्की शक्तियाँ, स्वभाव होनेसे भगवत्स्वरूप ही हैं। ऐसा स्वीकार करनेसे सर्वत्र भगवद्भाव हो जायगा। 'वासुदेव: सर्वम्' (७।१९)। ऐसा होनेसे 'भक्तियोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि 'सब कुछ भगवान् ही हैं'-यही वास्तविक शरणागति है।
तात्पर्य यह निकला कि जगत्, जीव और परमात्मा-तीनोंकी दृष्टिसे हम सब एक समान हैं। इस समताको गीताने 'योग' कहा है-'समत्वं योग उच्यते' (गीता २।४८)। भेद (विषमता) केवल व्यवहारके लिये है, जो अनिवार्य है; क्योंकि व्यवहारमें समता सम्भव ही नहीं है। अतः: साधककी दृष्टि (भावना) सम होनी चाहिये-'सर्वत्र समदर्शन:' (गीता ६।२९), 'पण्डिता: समदर्शिन:' (गीता ५।१८), 'समबुद्धिविशिष्यते' (गीता ६।९), 'सर्वत्र समबुद्धय:' (गीता १२।४)। व्यवहारकी भिन्नता तो स्वाभाविक है, पर भावकी भिन्नता मनुष्यने अपने राग-द्वेषसे पैदा की है। राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यने जगत्, जीव और परमात्मा-तीनोंमें अनेक भेद पैदा कर लिये हैं, जो इसके जन्म-मरणका कारण है-'मृत्यो: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति' (कठ० २।१।११)। जो किसीको भी पराया मानता है, किसीका भी बुरा चाहता, देखता तथा करता और संसारसे कुछ भी चाहता है, वह न तो कर्मयोगी हो सकता है, न ज्ञानयोगी हो सकता है और न भक्तियोगी ही हो सकता है।
जगत्, जीव और परमात्मा-इन तीनोंपर विचार करें तो स्वतन्त्र सत्ता एक परमात्माकी ही है। जगत् और जीवकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जगत्को जीवने ही धारण किया है-'ययेदं धार्यते जगत्' (७।५) अर्थात् जगत्को सत्ता जीवने ही दी है, इसलिये जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जीव परमात्माका ही अंश है-'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५।७), इसलिये खुद जीवकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि जगत्की सत्ता जीवके अधीन है और जीवकी सत्ता परमात्माके अधीन है, इसलिये एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ नहीं है-'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९।१९)। जगत् और जीव-दोनों परमात्मामें ही भासित हो रहे हैं।
A detailed black and white illustration of Lord Krishna, the eighth avatar of Vishnu, depicted in a dynamic pose. He is shown from the waist up, wearing an ornate crown, a peacock feather in his hair, and a garland of flowers. He holds a flute to his lips with his right hand, while his left hand rests on his hip. He is adorned with multiple necklaces and a large, intricately patterned dhoti. The background is a lush, natural setting with trees, flowers, and a body of water. To the right, a cow and a bull are visible, along with a snake coiled on the ground. The entire image is framed by a decorative border consisting of a repeating pattern of the word 'गोदावरीताम्' (Godaavariyam) in Devanagari script. The style is reminiscent of traditional Indian folk art or a woodcut print.
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें अपने समग्ररूपका वर्णन करते हुए ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—इन छः शब्दोंका प्रयोग किया और इस समग्ररूपको जाननेवाले योगियोंको अन्तकालमें अपनी प्राप्ति बतायी। इसको सुनकर इन छः शब्दोंको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये अर्जुन आठवें अध्यायके आरम्भके ही श्लोकोंमें कुल सात प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
अर्जुन बोले—
| पुरुषोत्तम | = हे पुरुषोत्तम ! | प्रोक्तम् | = कहा गया है ? | देहे | = देहमें |
|---|---|---|---|---|---|
| तत् | = वह | च | = और | कथम् | = कैसे है ? |
| ब्रह्म | = ब्रह्म | अधिदैवम् | = अधिदैव | मधुसूदन | = हे मधुसूदन ! |
| किम् | = क्या है ? | किम् | = किसको | नियतात्मभिः | = वशीभूत अन्तः- |
| करणवाले | |||||
| अध्यात्मम् | = अध्यात्म | उच्यते | = कहा जाता है ? | मनुष्यके द्वारा | |
| किम् | = क्या है ? | अत्र | = यहाँ | प्रयाणकाले | = अन्तकालमें (आप) |
| कर्म | = कर्म | अधियज्ञः | = अधियज्ञ | कथम् | = कैसे |
| किम् | = क्या है ? | कः | = कौन है ? | ज्ञेयः | = जाननेमें आते |
| अधिभूतम् | = अधिभूत | च | = और (वह) | असि | = हैं ? |
| किम् | = किसको | अस्मिन् | = इस |
व्याख्या—‘पुरुषोत्तम किं तद्ब्रह्म’—हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अर्थात् ‘ब्रह्म’ शब्दसे क्या समझना चाहिये ?
‘किमध्यात्मम्’—‘अध्यात्म’ शब्दसे आपका क्या अभिप्राय है ?
‘किं कर्म’—कर्म क्या है अर्थात् ‘कर्म’ शब्दसे आपका क्या भाव है ?
‘अधिभूतं च किं प्रोक्तम्’—आपने जो ‘अधिभूत’
शब्द कहा है, उसका क्या तात्पर्य है ?
‘अधिदैवं किमुच्यते’—‘अधिदैव’ किसको कहा जाता है ?
‘अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्’—इस प्रकरणमें ‘अधियज्ञ’ शब्दसे किसको लेना चाहिये। वह ‘अधियज्ञ’ इस देहमें कैसे है ?
‘मधुसूदन प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः’—हे मधुसूदन ! जो पुरुष वशीभूत
५८०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अन्तःकरणवाले हैं अर्थात् जो संसारसे सर्वथा हटकर अनन्यभावसे केवल आपमें ही लगे हुए हैं, उनके द्वारा
अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? अर्थात् वे आपके किस रूपको जानते हैं और किस प्रकारसे जानते हैं?
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुनके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| परमम् | = परम | (जीव-) को | करः | = प्राणियोंकी सत्ता- |
|---|---|---|---|---|
| अक्षरम् | = अक्षर | अध्यात्मम् | = अध्यात्म | को प्रकट करनेवाला |
| ब्रह्म | = ब्रह्म है (और) | उच्यते | = कहते हैं। | विसर्गः |
| स्वभावः | = परा प्रकृति- | भूतभावोद्भव- | कर्मसञ्जितः |
व्याख्या—‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’— परम अक्षरका नाम ब्रह्म है। यद्यपि गीतामें ‘ब्रह्म’ शब्द प्रणव, वेद, प्रकृति आदिका वाचक भी आया है, तथापि यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्दके साथ ‘परम’ और ‘अक्षर’ विशेषण देनेसे यह शब्द सर्वोपरि, सच्चिदानन्दधन, अविनाशी, निर्गुण-निराकार परमात्माका वाचक है।
‘स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते’— ऐसे तो आत्माको लेकर जो वर्णन किया जाता है, वह भी अध्यात्म है; अध्यात्म-मार्गका जिसमें वर्णन हो, वह मार्ग भी अध्यात्म है और इस आत्माकी जो विद्या है, उसका नाम भी अध्यात्म है (गीता—दसवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ ‘स्वभाव’ विशेषणके साथ ‘अध्यात्म’ शब्द आत्माका अर्थात् जीवके होनेपनका (स्वरूपका) वाचक है।
‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः’— स्थावर-जंगम जितने भी प्राणी देखनेमें आते हैं, उनका जो भाव अर्थात् होनापन है, उस होनेपनको प्रकट करनेके लिये जो विसर्ग अर्थात् त्याग है, उसको ‘कर्म’ कहते हैं।
महाप्रलयके समय प्रकृतिकी अक्रिय-अवस्था मानी जाती है तथा महासर्गके समय प्रकृतिकी सक्रिय-अवस्था मानी जाती है। इस सक्रिय-अवस्थाका कारण भगवान्का संकल्प है कि ‘मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ।’ इसी संकल्पसे सृष्टिकी रचना होती है। तात्पर्य है कि महाप्रलयके समय अहंकार और संचित कर्मोंके सहित प्राणी प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं और उन प्राणियोंके सहित प्रकृति एक तरहसे परमात्मामें लीन हो जाती है। उस लीन हुई प्रकृतिको विशेष क्रियाशील करनेके लिये
भगवान्का पूर्वोक्त संकल्प ही विसर्ग अर्थात् त्याग है। भगवान्का यह संकल्प ही कर्मोंका आरम्भ है, जिससे प्राणियोंकी कर्म-परम्परा चल पड़ती है। कारण कि महाप्रलयमें प्राणियोंके कर्म नहीं बनते, प्रत्युत उसमें प्राणियोंकी सुषुप्त-अवस्था रहती है। महासर्गके आदिसे कर्म शुरू हो जाते हैं।
चौदहवें अध्यायमें आया है—परमात्माकी मूल प्रकृतिका नाम ‘महद्ब्रह्म’ है। उस प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंका प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध करा देना अर्थात् जीवोंका अपने-अपने कर्मोंके फलस्वरूप शरीरोंके साथ सम्बन्ध करा देना ही परमात्माके द्वारा प्रकृतिमें गर्भ-स्थापन करना है (गीता—चौदहवें अध्यायका तीसरा-चौथा श्लोक)। उसमें भी अलग-अलग योनियोंमें तरह-तरहके जितने शरीर पैदा होते हैं, उन शरीरोंकी उत्पत्तिमें प्रकृति हेतु है और उनमें जीवरूपसे भगवान्का अंश है—‘ममैवांशो जीवलोकै’ (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। इस प्रकार प्रकृति और पुरुषके अंशसे सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं।
तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि स्थावर-जंगम जितने भी प्राणी उत्पन्न होते हैं, वे सब क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ-(पुरुष-) के संयोगसे ही होते हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विशेष संयोग अर्थात् स्थूलशरीर धारण करानेके लिये भगवान्का संकल्प-रूप विशेष सम्बन्ध ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके स्थूलशरीर पैदा करनेका कारण है। उस संकल्पके होनेमें भगवान्का कोई अभिमान नहीं है, प्रत्युत जीवोंके जन्म-जन्मान्तरोंके जो कर्म-संस्कार हैं, वे
श्लोक ४]
- साधक-संजीवनी *
५८९
महाप्रलयके समय परिपक्व होकर जब फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब भगवान्का संकल्प होता है। इस प्रकार जीवोंके कर्माकी प्रेरणासे भगवान्में 'मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ'—यह संकल्प होता है।
मनुष्यमात्रके द्वारा विहित और निषिद्ध जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंका नाम 'कर्म' है। तात्पर्य है कि मुख्य कर्म तो भगवान्का संकल्प हुआ और उसके बाद कर्म-परम्परा चलती है।
परिशिष्ट भाव—'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते'— 'परा प्रकृति' भगवान्का स्वभाव है—'प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ' (गीता ७।५)। प्रकृति कहो, चाहे स्वभाव कहो, एक ही बात है। यह परा प्रकृति अर्थात् जीव ही 'अध्यात्म' नामसे कहा गया है। इसको भगवान्ने अपना अंश भी बताया है—'ममैवांशो जीवलोकै ' (गीता १५।७)।
'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ' का दूसरा तात्पर्य है कि बालक, जवानी और वृद्धावस्थामें; जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें; चौरासी लाख योनियोंमें, सर्ग और प्रलयमें, महासर्ग और महाप्रलयमें भी जीवका कभी अभाव नहीं होता—'नाभावो विद्यते सतः ' (गीता २।१६) अर्थात् इसका अपना भाव (सत्ता या होनापन) सदा विद्यमान रहता है।
सृष्टि-रचनारूप कर्मको 'त्याग' कहनेका तात्पर्य है कि इसमें अपनी स्थिरताका त्याग है। कारण कि तत्त्व स्थिर, अचल है और उस स्थिरताका त्याग ही कर्म है।
भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म ही आदि कर्म है, जिससे कर्माकी परम्परा चली है। अतः 'कर्म' के अन्तर्गत तीन प्रकारके कर्म आते हैं—(१) सृष्टिकी रचना (२) क्रियामात्र, जो फलजनक नहीं होती और (३) पाप-पुण्य (शुभाशुभ कर्म), जो फलजनक होते हैं।
भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म वास्तवमें 'अकर्म' ही है। भगवान्ने कहा भी है—'तस्य कर्तारमपि मां विद्धव्यकर्तारमव्ययम् ' (गीता ४।१३) 'उस सृष्टि-रचनाका कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान।'
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभूतां वर ॥ ४ ॥
देहभूताम्, वर= हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! क्षरः = क्षर भावः = भाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ | अधिभूतम् = अधिभूत है, पुरुषः = पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अधिदैवतम् = अधिदैव है च = और | अत्र = इस देहे = देहमें (अन्तर्धामीरूपसे) अहम् = मैं एव = ही अधियज्ञः = अधियज्ञ हूँ। ---|---|---
व्याख्या—'अधिभूतं क्षरो भावः' —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पंचमहाभूतोंसे बनी प्रतिक्षण परिवर्तनशील और नाशवान् सृष्टिको अधिभूत कहते हैं। 'पुरुषश्चाधिदैवतम्' —यहाँ 'अधिदैवत' (अधिदैव) पद आदिपुरुष हिरण्यगर्भ ब्रह्माका वाचक है। महासर्गके आदिमें भगवान्के संकल्पसे सबसे पहले ब्रह्माजी ही प्रकट होते हैं और फिर वे ही सर्गके आदिमें सब सृष्टिकी रचना करते हैं।
१-जैसे कर्म करते-करते थकावट होती है तो कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके ज्यों-के-त्यों रहते हुए ही प्राणियोंको नींद आ जाती है। नींदमें विश्राम पानेसे थकावट दूर होती है और कर्म करनेके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें ताजगी आती है, सामर्थ्य आती है। इसी रीतिसे प्राणी कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके सहित प्रलयमें सूक्ष्म प्रकृतिमें और महाप्रलयमें कारण प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। उन लीन हुए प्राणियोंके संचित कर्म विश्राम पाकर—परिपक्व होकर अर्थात् प्रारब्धरूप होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। तब भगवान्का संकल्प होता है और उस संकल्पसे प्राणियोंका जन्मारम्भक कर्मके साथ विशेषतासे सम्बन्ध जुड़ जानेका नाम ही 'कर्म' है।
२-'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्' (गीता ४।१३), 'कल्यादी विमुजाम्यहम्' (१।७), विमुजामि पुनः पुनः' (१।८), 'अहं बीजप्रदः पिता' (१४।४)।
५८२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
‘अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर’—हे देहधारियोंमें
श्रेष्ठ अर्जुन! इस देहमें अधियज्ञ मैं ही हूँ अर्थात् इस
मनुष्यशरीरमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही हूँ। भगवान्ने गीतामें
‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ (१३।१७), ‘सर्वस्य चाहं हृदि
संनिविष्ट:’ (१५।१५), ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
तिष्ठति’ (१८।६१) आदिमें अपनेको अन्तर्यामीरूपसे
सबके हृदयमें विराजमान बताया है।
‘अहमेव अत्र२ देहे’ कहनेका तात्पर्य है कि दूसरी
योनियोंमें तो पूर्वकृत कर्मोंका भोग होता है, नये कर्म नहीं
बनते, पर इस मनुष्यशरीरमें नये कर्म भी बनते हैं। उन
कर्मोंके प्रेरक अन्तर्यामी भगवान् होते हैं३। जहाँ मनुष्य
राग-द्वेष नहीं करता उसके सब कर्म भगवान्की प्रेरणाके
अनुसार शुद्ध होते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते और
जहाँ वह राग-द्वेषके कारण भगवान्की प्रेरणाके अनुसार
कर्म नहीं करता, उसके कर्म बन्धनकारक होते हैं। कारण
कि राग और द्वेष मनुष्यके महान् शत्रु हैं (गीता—तीसरे
अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि
भगवान्की प्रेरणासे कभी निषिद्ध-कर्म होते ही नहीं। श्रुति
और स्मृति भगवान्की आज्ञा है—‘श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे।’
अतः भगवान् श्रुति और स्मृतिके विरुद्ध प्रेरणा कैसे कर
सकते हैं? नहीं कर सकते। निषिद्ध-कर्म तो मनुष्य
कामनाके वशीभूत होकर ही करता है (गीता—तीसरे
अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। अगर मनुष्य कामनाके
वशीभूत न हो, तो उसके द्वारा स्वाभाविक ही विहित कर्म
होंगे, जिनको अठारहवें अध्यायमें सहज, स्वभावियत कर्म
नामसे कहा गया है।
यहाँ अर्जुनके लिये ‘देहभृतां वर’ कहनेका तात्पर्य है
कि देहधारियोंमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है, जो ‘इस देहमें
परमात्मा हैं’—ऐसा जान लेता है। ऐसा ज्ञान न हो, तो भी
ऐसा मान ले कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके कण-
कणमें परमात्मा हैं और उनका अनुभव करना ही मनुष्य-
जन्मका खास ध्येय है। इस ध्येयकी सिद्धिके लिये
परमात्माकी आज्ञाके अनुसार ही काम करना है।
तीसरे और चौथे श्लोकमें जो ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म,
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका वर्णन हुआ है, उसे
समझनेमात्रके लिये जलका एक दृष्टान्त दिया जाता है।
जैसे, जब आकाश स्वच्छ होता है, तब हमारे और सूर्यके
मध्यमें कोई पदार्थ न दीखनेपर भी वास्तवमें वहाँ परमाणुरूपसे
जल-तत्त्व रहता है। वही जल-तत्त्व भाप बनता और
भापके घनीभूत होनेपर बादल बनता है। बादलमें जो
जलकण रहते हैं, उनके मिलनेसे बूँदें बन जाती हैं। उन
बूँदोंमें जब ठण्डकके संयोगसे घनता आ जाती है, तब वे
ही बूँदें ओले (बर्फ) बन जाती हैं—यह जल-तत्त्वका
बहुत स्थूल रूप हुआ। ऐसे ही निर्गुण-निराकार ‘ब्रह्म’
परमाणुरूपसे जल-तत्त्व है, ‘अधियज्ञ’ (व्यापक विष्णु)
भापरूपसे जल है; ‘अधिदैव’ (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) बादलरूपसे
जल है, ‘अध्यात्म’ (अनन्त जीव) बूँदें-रूपसे जल है,
‘कर्म’ (सृष्टि-रचनारूप कर्म) वर्षाकी क्रिया है और
‘अधिभूत’ (भौतिक सृष्टिमात्र) बर्फरूपसे जल है।
इस वर्णनका तात्पर्य यह हुआ कि जैसे एक ही जल
परमाणु, भाप, बादल, वर्षाकी क्रिया, बूँदें और ओले-
(बर्फ-) के रूपसे भिन्न-भिन्न दीखता है, पर वास्तवमें
है एक ही। इसी प्रकार एक ही परमात्मतत्त्व ब्रह्म,
अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके रूपसे
भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः एक ही है। इसीको
सातवें अध्यायमें ‘समग्रम्’ (७।१) और ‘वासुदेव:
सर्वम्’ (७।१९) कहा गया है।
तात्त्विक दृष्टिसे तो सब कुछ वासुदेव ही है
(सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें भी जब
विवेक-दृष्टिसे देखते हैं, तब शरीर-शरीरी, प्रकृति-
पुरुष—ऐसे दो भेद हो जाते हैं। उपासनाकी दृष्टिसे देखते
हैं तो उपास्य (परमात्मा), उपासक (जीव) और त्याज्य
१-यहाँ इस मनुष्य-शरीरमें कहनेका तात्पर्य है कि इसमें भगवान्की प्रेरणाको समझनेकी, स्वीकार करनेकी और उसके
अनुसार आचरण करके तत्त्वको प्राप्त करनेकी सामर्थ्य है। अन्य शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे परमात्माके रहते हुए भी उन प्राणियोंमें
उस तत्त्वकी तरफ दृष्टि डालनेकी सामर्थ्य नहीं है और मनुष्यशरीरमें जो विवेक प्राप्त है, वह विवेक उन शरीरोंमें जाग्रत् नहीं
है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस शरीरके रहते-रहते उस तत्त्वको प्राप्त कर ले। इस दुर्लभ अवसरको व्यर्थ न जाने दे।
२-दूसरे श्लोकमें तो ‘अत्र’ पद प्रकरणके लिये आया है, तथा ‘अस्मिन्’ पद देहके लिये आया है, पर यहाँ ‘अत्र’ पद
देहके लिये ही आया है। कारण कि अर्जुनने प्रश्नमें ‘अत्र’ पद देकर प्रकरणका संकेत कर दिया है, इसलिये अब उसका
उत्तर देते हुए प्रकरणके लिये ‘अत्र’ पद देनेकी जरूरत नहीं है।
३-कर्मोंकी प्रेरणा भगवान् मनुष्यके स्वभावके अनुसार करते हैं। यदि स्वभावमें राग-द्वेष है तो उस राग-द्वेषके वशीभूत
होना अथवा न होना मनुष्यके हाथमें है। वह शास्त्र, सन्त तथा भगवान्का आश्रय लेकर अपने स्वभावको बदल सकता है।
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
५८३
(प्रकृतिका कार्य—संसार)—ये तीन भेद हो जाते हैं। इन तीनोंको समझनेके लिये यहाँ इनके छः भेद किये गये हैं— परमात्माके दो भेद—ब्रह्म (निर्गुण) और अधियज्ञ (सगुण)।
जीवके दो भेद—अध्यात्म (सामान्य जीव, जो कि बद्ध हैं) और अधिदैव (कारक पुरुष, जो कि मुक्त हैं)। संसारके दो भेद—कर्म (जो कि परिवर्तनका पुंज है) और अधिभूत (जो कि पदार्थ हैं)।
विशेष बात
(१)
सब संसारमें परमात्मा व्याप्त हैं—‘मया तत्मिदं सर्वम्’ (९।१४), ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (१८।४६); सब संसार परमात्मामें हैं—‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्’ (७।७); सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९); सब संसार परमात्माका है—‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुवे च’ (९।२४), ‘भोक्तां यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्’ (५।२९)—इस प्रकार गीतामें भगवान्के तरह-तरहके वचन आते हैं। इन सबका सामंजस्य कैसे हो? सबकी संगति कैसे बैठे? इसपर विचार किया जाता है।
संसारमें परमात्मप्राप्तिके लिये, अपने कल्याणके लिये साधना करनेवाले जितने भी साधक* हैं, वे सभी संसारसे छूटना चाहते हैं और परमात्माको प्राप्त करना चाहते हैं। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे सदा रहनेवाली शान्ति और सुख नहीं मिल सकता, प्रत्युत सदा अशान्ति और दुःख ही मिलता रहता है—ऐसा मनुष्योंका प्रत्यक्ष अनुभव है। परमात्मा अनन्त आनन्दके स्वरूप हैं, वहाँ दुःखका लेश भी नहीं है—ऐसा शास्त्रोंका कथन है और सन्तोका अनुभव है।
अब विचार यह करना है कि साधकको संसार तो
प्रत्यक्षरूपसे दीखता है और परमात्माको वह केवल मानता है; क्योंकि परमात्मा प्रत्यक्ष दीखते नहीं। शास्त्र और सन्त कहते हैं कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’ इसको मानकर साधक साधन करता है। उस साधनामें जबतक संसारकी मुख्यता रहती है, तबतक परमात्माकी मान्यता गौण रहती है। साधन करते-करते ज्यों-ज्यों परमात्माकी धारणा (मान्यता) मुख्य होती चली जाती है, त्यों-ही-त्यों संसारकी मान्यता गौण होती चली जाती है। परमात्माकी धारणा सर्वथा मुख्य होनेपर साधकको यह स्पष्ट दीखने लग जाता है कि संसार पहले नहीं था और फिर बादमें नहीं रहेगा तथा वर्तमानमें जो ‘है’ रूपसे दीखता है, वह भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। जब संसार नहीं था, तब भी परमात्मा थे; जब संसार नहीं रहेगा, तब भी परमात्मा रहेंगे और वर्तमानमें संसारके प्रतिक्षण अभावमें जाते हुए भी परमात्मा ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। तात्पर्य है कि संसारका सदा अभाव है और परमात्माका सदा भाव है। इस तरह जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब सत्यस्वरूपसे ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा वास्तविक अनुभव हो जाता है, जिसके होनेसे साधक ‘सिद्ध’ कहा जाता है। कारण कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’—ऐसी मान्यता संसारकी सत्ता
- सदा रहनेवाली शान्ति और अनन्त सुख मिले, जिसमें अशान्ति और दुःखका लेश भी न हो—ऐसा विचार करनेवाले ‘साधक’ होते हैं। परन्तु जो संसारमें ही रहना चाहते हैं, संसारसे ही सुख लेना चाहते हैं, सांसारिक संग्रह और भोगोंमें ही लगे रहना चाहते हैं और संसारके सुख-दुःखको भोगते रहते हैं, वे साधक नहीं होते, प्रत्युत ‘संसारी’ होते हैं। वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े रहते हैं।
५८४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
माननेसे ही होती थी और संसारकी सत्ता साधकके रागके कारण ही दीखती थी। तत्त्वतः सब कुछ परमात्मा ही हैं।
(२)
सत् और असत् सब परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९), परमात्मा न सत् कहे जा सकते हैं और न असत् कहे जा सकते हैं—‘न सत्तनासदुच्यते’ (१३।१२); परमात्मा सत् भी हैं; असत् भी हैं और सत्-असत् दोनोंसे परे भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)। इस प्रकार गीतामें भिन्न-भिन्न वचन आते हैं। अब उनकी संगतिके विषयमें विचार किया जाता है।
परमात्मतत्त्व अत्यन्त अलौकिक और विलक्षण है। उस तत्त्वका वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। उस तत्त्वको इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि नहीं पकड़ सकते अर्थात् वह तत्त्व इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिकी परिधिमें नहीं आता। हाँ, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि उसमें विलीन हो सकते हैं। साधक उस तत्त्वमें स्वयं लीन हो सकता है, उसको प्राप्त कर सकता है, पर उस तत्त्वको अपने कब्जेमें, अपने अधिकारमें, अपनी सीमामें नहीं ले सकता।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधक दो तरहके होते हैं—एक विवेकप्रधान और एक श्रद्धाप्रधान अर्थात् एक मस्तिष्कप्रधान होता है और एक हृदयप्रधान होता है। विवेकप्रधान साधकके भीतर विवेककी अर्थात् जाननेकी मुख्यता रहती है और श्रद्धाप्रधान साधकके भीतर माननेकी मुख्यता रहती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विवेक-प्रधान साधकमें श्रद्धा नहीं रहती और श्रद्धाप्रधान साधकमें विवेक नहीं रहता, प्रत्युत यह तात्पर्य है कि विवेकप्रधान साधकमें विवेककी मुख्यता और साथमें श्रद्धा रहती है, तथा श्रद्धाप्रधान साधकमें श्रद्धाकी मुख्यता और साथमें विवेक रहता है। दूसरे शब्दोंमें, जाननेवालोंमें मानना भी रहता है और माननेवालोंमें जानना भी रहता है। जाननेवाले जानकर मान लेते हैं और माननेवाले मानकर जान लेते हैं। अतः किसी भी तरहके साधकमें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं रहती।
साधक चाहे विवेकप्रधान हो, चाहे श्रद्धाप्रधान हो, पर साधनमें उसकी अपनी रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यताकी प्रधानता रहती है। रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यता एक साधनमें होनेसे साधक उस तत्त्वको जल्दी
समझता है। परन्तु रुचि और श्रद्धा-विश्वास होनेपर भी वैसी योग्यता न हो अथवा योग्यता होनेपर भी वैसी रुचि और श्रद्धा-विश्वास न हो, तो साधकको उस साधनमें कठिनाता पड़ती है। रुचि होनेसे मन स्वाभाविक लग जाता है, श्रद्धा-विश्वास होनेसे बुद्धि स्वाभाविक लग जाती है और योग्यता होनेसे बात ठीक समझमें आ जाती है।
विवेकप्रधान साधक निर्गुण-निराकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि निर्गुण-निराकारमें होती है। श्रद्धाप्रधान साधक सगुण-साकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि सगुण-साकारमें होती है। जो निर्गुण-निराकारको पसंद करता है, वह यह कहता है कि परमात्मतत्त्व न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है। जो सगुण-साकारको पसंद करता है वह कहता है कि परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत्से परे भी हैं।
तात्पर्य यह हुआ कि चिन्मय-तत्त्व तो हरदम ज्यों-का-त्यों ही रहता है और जड़, असत् कहलानेवाला संसार निरन्तर बदलता रहता है। जब यह चेतन जीव बदलते हुए संसारको महत्त्व देता है, उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब यह जन्म-मरणके चक्करमें घूमता रहता है। परन्तु जब यह जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब इसको स्वतःसिद्ध चिन्मय-तत्त्वका अनुभव हो जाता है। विवेकप्रधान साधक विवेक-विचारके द्वारा जड़ताका त्याग करता है। जड़ताका त्याग होनेपर चिन्मय-तत्त्व अवशेष रहता है अर्थात् नित्यप्राप्त तत्त्वका अनुभव हो जाता है। श्रद्धाप्रधान साधक केवल भगवान्के ही सम्मुख हो जाता है, जिससे वह जड़तासे विमुख होकर भगवान्को प्रेमपूर्वक प्राप्त कर लेता है। विवेकप्रधान साधक तो सम, शान्त, सत्-घन, चित्-घन, आनन्द-घन तत्त्वमें अटल स्थित होकर अखण्ड आनन्दको प्राप्त होता है; पर श्रद्धाप्रधान साधक भगवान्के साथ अभिन्न होकर प्रेमके अनन्त, प्रतिक्षण वर्धमान आनन्दको प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार दोनों ही साधकोंको जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक चिन्मय-तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है और ‘सत्-असत् अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —परिवर्तनशील एवं नाशवान् क्रिया और पदार्थमात्र ‘क्षरभाव’ हैं, जो भगवान्की अपरा प्रकृति है। ज्ञानमें ब्रह्मके साथ एकता होती है और प्रेममें अन्तर्यामी भगवान्के साथ अभिन्नता होती है। भगवान्ने यहाँ अन्तर्यामी-(अधिष्ठित-) को अपना स्वरूप बताया है। अतः ब्रह्म तो विशेषण है और अन्तर्यामी विशेष्य हैं—‘ब्रह्मणो
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
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हि प्रतिष्ठाहम्' (गीता १४।२७)। तात्पर्य है कि जिसको गीताने 'समग्र' कहा है, वह सबका रचयिता और नियन्ता अन्तर््यामी में ही हूँ। इसी अन्तर््यामीको चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें 'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नाथं दधाम्यहम्' और 'अहं बीजप्रदः पिता' पदोंमें 'अहम्' शब्दसे कहा गया है। गीतामें ब्रह्मके लिये कहा है—'न सत्तन्नासदुच्यते' (१३।१२) और समग्र भगवान्के लिये कहा है—'सदसच्चाहम्' (९।१९), 'सदसत्तत्परं यत्' (११।३७)।
सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें अर्जुनका सातवाँ प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥
| यः | = जो मनुष्य | मुक्त्वा | = छोड़कर | याति | = प्राप्त |
|---|---|---|---|---|---|
| अन्तकाले | = अन्तकालमें | प्रयाति | = जाता है, | होता है, | |
| च | = भी | सः | = वह | अत्र | = इसमें |
| माम् | = मेरा | मद्भावम् | = मेरे | संशयः | = सन्देह |
| स्मरन् | = स्मरण करते हुए | स्वरूपको | न | = नहीं | |
| कलेवरम् | = शरीर | एव | = ही | अस्ति | = है। |
व्याख्या— 'अन्तकाले च * मामेव ..... याति नास्त्यत्र संशयः'—'अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए जो शरीर छोड़कर जाता है'—इसका तात्पर्य हुआ कि इस मनुष्यको जीवनमें साधन-भजन करके अपना उद्धार करनेका अवसर दिया था, पर इसने कुछ किया ही नहीं। अब बेचारा यह मनुष्य अन्तकालमें दूसरा साधन करनेमें असमर्थ है, इसलिये बस, मेरेको याद कर ले तो इसको मेरी प्राप्ति हो जायगी।
'मामेव स्मरन्' का तात्पर्य है कि सुनने, समझने और माननेमें जो कुछ आता है, वह सब मेरा समग्ररूप है। अतः जो उसको मेरा ही स्वरूप मानेगा उसको अन्तकालमें भी मेरा ही चिन्तन होगा अर्थात् उसने जब सब कुछ मेरा ही स्वरूप मान लिया तो अन्तकालमें उसको जो कुछ याद आयेगा, वह मेरा ही स्वरूप होगा, इसलिये वह स्मरण मेरा ही होगा। मेरा स्मरण होनेसे उसको मेरी ही प्राप्ति होगी।
'मद्भावम्' कहनेका तात्पर्य है कि साधकने मेरेको जिस-किसी भिन्न अथवा अभिन्न भावसे अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज-चतुर्भुज तथा नाम, लीला, धाम, रूप आदिसे स्वीकार किया है, मेरी उपासना की है, अन्तसमयके स्मरणके अनुसार वह मेरे उसी भावको
प्राप्त होता है।
जो भगवान्की उपासना करते हैं, वे तो अन्तसमयमें उपास्यका स्मरण होनेसे उसी उपास्यको अर्थात् भगवद्भावको प्राप्त होते हैं। परन्तु जो उपासना नहीं करते, उनको भी अन्तसमयमें किसी कारणवशात् भगवान्के किसी नाम, रूप, लीला, धाम आदिका स्मरण हो जाय, तो वे भी उन उपासकोंकी तरह उसी भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं। तात्पर्य है कि जैसे गुणोंमें स्थित रहनेवालेकी (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और अन्तकालमें जिस-किसी गुणके बढ़नेवालेकी वैसी ही गति होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक), ऐसे ही जिसको अन्तमें भगवान् याद आ जाते हैं, उसकी भी उपासकोंकी तरह गति होती है अर्थात् भगवान्की प्राप्ति होती है।
भगवान्के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि अनेक रूपोंका और नाम, लीला, धाम आदिका भेद तो साधकोंकी दृष्टिसे है, अन्तमें सब एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सब एक 'मद्भाव'—भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं; क्योंकि भगवान्का समग्र स्वरूप एक ही है। परन्तु गुणोंके अनुसार गतिको प्राप्त होनेवाले अन्तमें एक नहीं हो सकते; क्योंकि
- यहाँ 'च' अव्ययका अर्थ 'अपि' अर्थात् 'भी' है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) अलग-अलग हैं। अतः गुणोंके अनुसार उनकी गतियाँ भी अलग-अलग होती हैं। भगवान्का स्मरण करके शरीर छोड़नेवालोंका तो भगवान्के साथ सम्बन्ध रहता है और गुणोंके अनुसार शरीर छोड़नेवालोंका गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है। इसलिये अन्तमें भगवान्का स्मरण करनेवाले भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् भगवान्को प्राप्त हो जाते हैं और गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाले गुणोंके सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् गुणोंके कार्य जन्म-मरणको प्राप्त हो जाते हैं।
भगवान्ने एक यह विशेष छूट दी हुई है कि मरणासन्न व्यक्तिके कैसे ही आचरण रहे हों, कैसे ही भाव रहे हों, किसी भी तरहका जीवन बीता हो, पर अन्तकालमें वह भगवान्को याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा। कारण कि भगवान्ने जीवका कल्याण करनेके लिये ही उसको मनुष्यशरीर दिया है और जीवने उस मनुष्यशरीरको स्वीकार किया है। अतः जीवका कल्याण हो जाय, तभी भगवान्का इस जीवको मनुष्यशरीर देना और जीवका मनुष्यशरीर लेना सफल होगा। परन्तु वह अपना उद्धार किये बिना ही आज दुनियासे विदा हो रहा है, इसके लिये भगवान् कहते हैं कि 'भैया! तेरी और मेरी दोनोंकी इज्जत रह जाय, इसलिये अब जाते-जाते (अन्तकालमें) भी तू मेरेको याद कर ले तो तेरा कल्याण हो जाय।' अतः हरक मनुष्यके लिये सावधान होनेकी जरूरत है कि वह सब समयमें भगवान्का स्मरण करे, कोई समय खाली न जाने दे; क्योंकि अन्तकालका पता नहीं है कि कब आ जाय। वास्तवमें सब समय अन्तकाल ही है। यह बात तो है नहीं कि इतने वर्ष, इतने महीने और इतने दिनोंके बाद मृत्यु होगी। देखनेमें तो यही आता है कि गर्भमें ही कई बालक मर जाते हैं, कई जन्मते ही मर जाते हैं, कई कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें मर जाते हैं। इस प्रकार मरनेकी चाल हरदम चल ही रही है। अतः सब समयमें भगवान्को याद रखना चाहिये और यही समझना चाहिये कि बस, यही अन्तकाल है! नीतिमें यह बात आती है कि अगर धर्मका आचरण करना हो, कल्याण करना हो तो मृत्युने मेरे केश पकड़े हुए हैं; झटका दिया कि खत्म! ऐसा विचार हरदम
रहना चाहिये—'गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।' भगवान्की उपर्युक्त छूटसे मनुष्यमात्रको विशेष लाभ लेना चाहिये। कहीं कोई भी व्याधिग्रस्त, मरणासन्न व्यक्ति हो तो उसके इष्टके चित्र या मूर्तिको उसे दिखाना चाहिये; जैसी उसकी उपासना है और जिस भगवन्नाममें उसकी रुचि हो, जिसका वह जप करता हो, वही भगवन्नाम उसको सुनाना चाहिये; जिस स्वरूपमें उसकी श्रद्धा और विश्वास हो, उसकी याद दिलानी चाहिये; भगवान्की महिमाका वर्णन करना चाहिये; गीताके श्लोक सुनाने चाहिये। अगर वह बेहोश हो जाय तो उसके पास भगवन्नामका जप-कीर्तन करना चाहिये, जिससे उस मरणासन्न व्यक्तिके सामने भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल बना रहे। भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल रहनेसे वहाँ यमराजके दूत नहीं आ सकते। अजामिलके द्वारा मृत्युके समय 'नारायण' नामका उच्चारण करनेसे वहाँ भगवान्के पार्षद आ गये और यमदूत भागकर यमराजके पासमें गये, तो यमराजने अपने दूतोंसे कहा कि 'जहाँ भगवन्नामका जप, कीर्तन, कथा आदि होते हों, वहाँ तुमलोग कभी मत जाना; क्योंकि वहाँ हमारा राज्य नहीं है।' ऐसा कहकर यमराजने भगवान्का स्मरण करके भगवान्से क्षमा माँगी कि 'मेरे दूतोंके द्वारा जो अपराध हुआ है, उसको आप क्षमा करें।'।
अन्तकालमें स्मरणका तात्पर्य है कि उसने भगवान्का जो स्वरूप मान रखा है, उसकी याद आ जाय अर्थात् उसने पहले राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, सर्वव्यापक विश्वरूप परमात्मा आदिमेंसे जिस स्वरूपको मान रखा है, उस स्वरूपके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण, प्रभाव आदिकी याद आ जाय। उसकी याद करते हुए शरीरको छोड़कर जानेसे वह भगवान्को ही प्राप्त होता है। कारण कि भगवान्की याद आनेसे 'मैं' शरीर हूँ और शरीर 'मेरा' है—इसकी याद नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान्को ही याद करते हुए शरीर छूट जाता है। इसलिये उसके लिये भगवान्को प्राप्त होनेके अतिरिक्त और कोई गुंजाइश ही नहीं है।
यहाँ शंका होती है कि जिस व्यक्तिने उग्रभरमें भजन-स्मरण नहीं किया, कोई साधन नहीं किया, सर्वथा
१-एवं विमूष्य सुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्।
ते मे न दण्डमहँत्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरगायवादः ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।२६)
२-तत्क्षम्यात् स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसक्तुर्न नः।
स्वानामहो न विदुषां रचितान्जलीनां क्षान्तिर्गीरीयसि नमः पुरुषाय भूमे ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।३०)