श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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होनेसे भक्तियोग ‘अलौकिक निष्ठा’ है।
वास्तवमें लौकिक कोई तत्त्व नहीं है। वास्तविक तत्त्व तो अलौकिक ही है। परन्तु साधककी दृष्टिसे लौकिक और अलौकिक—ये दो भेद कहे गये हैं। तात्पर्य है कि लौकिक-अलौकिकका विभाग अज्ञानवश होनेवाले राग-द्वेषके कारण ही है। राग-द्वेष न हो तो सब कुछ अलौकिक, चिन्मय, दिव्य ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’। कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है। राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्स्वरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया!
विज्ञानसहित ज्ञानका अर्थात् भगवान्के समग्ररूपका वर्णन करनेका तात्पर्य यही है कि जड़-चेतन, सत्-असत्, परा-अपरा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्का ही स्वरूप है। इसलिये भगवान्ने यहाँ समग्ररूपवर्णनके आदि और अन्तमें ‘माम्’ पद दिया है, जो समग्रका वाचक है—‘मामाश्रित्य’ (७।२९) और ‘मां ते विदुः’ (७।३०)।
भगवान्ने कर्मोंकी गति (तत्त्व)—को गहन बताया है—‘गहना कर्मणो गतिः’ (गीता ४।१७), पर भक्त उसको भी जान लेता है। कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—दोनोंको भक्त जान लेता है। तात्पर्य है कि वह कर्मको भी जान लेता है और कर्मयोगको भी जान लेता है। कर्मयोगी तो कर्मयोगको ही जानता है और ज्ञानयोगी ज्ञानयोगको ही जानता है, पर भक्त भगवत्कृपासे कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको ही जान लेता है।
इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये ‘योगं युञ्जन्मदाश्रयः’ को यहाँ ‘मामाश्रित्य यतन्ति ये’ पदोंसे और ‘मव्यासक्तमनाः’ को यहाँ ‘युक्तचेतसः’ पदसे कहा गया है। तात्पर्य है कि मेरा आश्रय लेनेसे भक्तको कर्मयोग तथा ज्ञानयोगकी भी सिद्धि हो जाती है अर्थात् वे दोनोंके फल (लक्ष्य) रूप ब्रह्मको भी जान लेते हैं—‘ते ब्रह्म तद्विदुः’ और मेरे समग्ररूपको भी जान लेते हैं—‘मां ते विदुः’।
‘प्रयाणकालेऽपि’ में ‘अपि’ पद देनेका तात्पर्य है कि वे भक्त मेरेको पहले भी जानते हैं और अन्तकालमें भी जानते हैं अर्थात् उनका ज्ञान कभी लुप्त नहीं होता। ऐसे भक्त ‘युक्तचेता’ हो जाते हैं अर्थात् उनके मनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं। भगवान्के साथ उनकी अभिन्नता (नित्ययोग) होनेसे न वे भगवान्से वियुक्त होते हैं, न भगवान् उनसे वियुक्त होते हैं। ऐसे युक्तचेता भक्त अन्तकालमें कुछ भी चिन्तन होनेपर भी योगभ्रष्ट नहीं होते, प्रत्युत भगवान्को ही प्राप्त होते हैं—‘प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः’। कारण कि उन भक्तोंकी दृष्टिमें जब भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जायगा? क्यों जायगा? कैसे जायगा? उनके मनमें कुछ भी चिन्तन होगा तो भगवान्का ही चिन्तन होगा, फिर उनका मन विचलित कैसे होगा और मनके विचलित हुए बिना वह योगभ्रष्ट कैसे होगा? कारण कि करणसापेक्ष साधनमें योगसे मनके विचलित होनेपर ही मनुष्य योगभ्रष्ट होता है—‘योगाच्छलितमानसः’ (गीता ६।३७); परन्तु सब जगह भगवान्को देखनेवालेका भगवान्से नित्ययोग रहता है।
भगवान्के कुछ भक्त तो मुक्ति चाहते हैं—‘जरामरणमोक्षाय’ और कुछ भक्त प्रेम चाहते हैं—‘मां ते विदुर्युक्तचेतसः’। मुक्ति चाहनेवाले भक्त कर्मयोग और ज्ञानयोग (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म)—को जान लेते हैं, पर प्रेम चाहनेवाले भक्त स्वयं समग्र भगवान्को जान लेते हैं—‘मां विदुः’। भगवान् अपने प्रेमी भक्तोंको कर्मयोग (बुद्धियोग) और ज्ञानयोग—दोनों प्रदान कर देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। जरा-मरणरूप बन्धन और मुक्ति—दोनों ही लौकिक हैं, पर प्रेम अलौकिक है। यद्यपि साधन-भक्ति भी लौकिक है, तथापि उद्देश्य अलौकिक होनेसे वह अलौकिक साध्य-भक्तिमें चली जाती है—‘भवत्या संजातया भवत्या’ (श्रीमद्भगवद्गीता ११।३।३९)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘ज्ञानविज्ञानयोग’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥