श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
इस सातवें अध्यायमें ज्ञान और विज्ञानका वर्णन किया गया है। भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तापूर्वक मानना ‘ज्ञान’ है। ऐसे ही भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना ‘विज्ञान’ है। ज्ञान और विज्ञानसे परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है अर्थात् ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ इस परम प्रेमरूप नित्य-सम्बन्धकी जागृति हो जाती है। इसलिये इस सातवें अध्यायका नाम ‘ज्ञानविज्ञानयोग’ रखा गया है।
सातवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ सप्तमोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके चार सौ छः और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौबीस है।
(२) ‘अथ सप्तमोऽध्यायः’ के सात ‘श्रीभगवानुवाच’
के सात, श्लोकोंके नौ सौ साठ और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार बाईस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच’।
सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके तीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; तथा उन्नीसवें और बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तेईस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
सातवें अध्यायका सार
भगवान्की दो प्रकृतियाँ हैं—अपरा और परा। संसार ‘अपरा’ प्रकृति है और जीव ‘परा’ प्रकृति है। अपरा प्रकृति जड़ तथा निरन्तर परिवर्तनशील है और परा प्रकृति चेतन तथा नित्य अपरिवर्तनशील है। भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी ही प्रकृति अर्थात् स्वभाव बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। भगवान्का स्वभाव होनेसे अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र (भगवान्से अलग) सत्ता नहीं है; परन्तु जीव (परा प्रकृति) अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। यह सम्बन्ध जीव दो प्रकारसे मानता है—(१) अहंतापूर्वक; जैसे—मैं शरीर हूँ और (२) ममतापूर्वक; जैसे—शरीर मेरा है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पन्न होनेमें कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
वास्तवमें सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, कारण तथा कार्य एक भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिक्विदस्ति’ (७।७)। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। अतः एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत तथा इनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय—इन सबके मूल कारण भगवान् ही हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि तथा अविनाशी बीज हैं। तात्पर्य है कि सृष्टिमें जो कुछ भी क्रिया, पदार्थ, भाव आदि देखने-सुनने-समझनेमें आते हैं, उन सबके बीज (मूल कारण) एकमात्र भगवान् ही हैं। कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है।* अतः कारणकी तो स्वतन्त्र सत्ता होती है, पर कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। इसलिये अगर कोई साधक कार्यमें भगवान्को प्राप्त करना चाहे तो उसको भगवान् नहीं मिलेंगे—‘न त्वहं तेषु ते मयि’ (७।१२)। जो सबके कारणरूप भगवान्के शरण होते हैं, उन्हींको भगवान् मिलते हैं। परन्तु जो कारणरूप भगवान्के शरण न होकर कार्यरूप सत्त्वादि गुणोंमें उलझ जाते हैं, वे जन्म-मरणके चक्रमें पड़े रहते हैं। ऐसे मनुष्य कार्यरूप शरीर-संसारके सम्बन्धसे होनेवाली कामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंकी शरण लेते हैं, क्योंकि वे अलौकिक भगवान्को साधारण मनुष्यकी तरह लौकिक मानते हैं। परन्तु जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित नहीं होते, वे भगवान्की शरण लेते हैं। ऐसे भक्तोंके चार भेद होते हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। इन शरणगत भक्तोंमें भी जो ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इस प्रकार भगवान्के शरण हो जाता है, वह महात्मा भक्त मुक्त पुरुषोंसे भी श्रेष्ठ होनेके कारण अत्यन्त दुर्लभ है। वह महात्मा भक्त भगवान्की कृपासे परा-अपरासहित भगवान्के समग्ररूपको
- भगवान् कार्यरूपमें परिणत नहीं होते, प्रत्युत कार्यरूपसे प्रकट होते हैं।