श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 578, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंसार ]
- साधक-संजीवनी *
५७७
जान लेता है, जिसको जाननेपर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसके सिवाय अन्य चीज कोई है ही नहीं। उसका भगवान्के साथ आत्मीय सम्बन्ध हो जाता है, जिससे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति (जागृति) हो जाती है। इस प्रेमकी जागृतिमें ही मनुष्यजन्मकी पूर्णता है।
× × × ×
एक अपरा प्रकृति है, एक परा प्रकृति है और एक परा-अपराके मालिक परमात्मा हैं। सम्पूर्ण शरीर-संसार (अधिभूत) अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत और सम्पूर्ण शरीरी (कृत्स्न अध्यात्म) परा प्रकृतिके अन्तर्गत आते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मात्र शरीर (संसार) भी एक हैं और मात्र शरीरी (जीव) भी एक हैं तथा अपरा और परा-ये दोनों जिसकी शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा भी एक हैं। अतः: शरीरोंकी दृष्टिसे, आत्माकी दृष्टिसे और परमात्माकी दृष्टिसे-तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं, अनेक नहीं हैं-'नेह नानास्ति किञ्चन' (कठ० २।१।११, बृहदा० ४।४।१९)।
सम्पूर्ण शरीरोंमें एकता स्वीकार करनेपर किसी भी प्राणीसे राग अथवा द्वेष नहीं होगा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव होगा। ऐसा होनेसे 'कर्मयोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि जब अपनेसे भिन्न दूसरा कोई है ही नहीं और व्यक्तिगत अपना कुछ है ही नहीं तो फिर अपने पास जो भी वस्तु है, उसमें ममता नहीं होगी और जो वस्तु नहीं है, उसकी कामना नहीं होगी। ममता और कामना न होनेपर अपने पास जो भी वस्तु है, वह स्वतः दूसरोंकी सेवामें लगेगी।
सम्पूर्ण जीवोंमें एकता स्वीकार करनेपर सर्वत्र आत्मभाव अथवा ब्रह्मभाव हो जायगा-'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१), 'आत्मवेदं सर्वम्' (छान्दोग्य० ७।२५।२)। ऐसा होनेसे 'ज्ञानयोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है अर्थात् जीव और ब्रह्म एक ही हैं-'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य० १)।
अपरा और परा-इन दोनों प्रकृतियोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; क्योंकि ये दोनों भगवान्की शक्तियाँ, स्वभाव होनेसे भगवत्स्वरूप ही हैं। ऐसा स्वीकार करनेसे सर्वत्र भगवद्भाव हो जायगा। 'वासुदेव: सर्वम्' (७।१९)। ऐसा होनेसे 'भक्तियोग' सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि 'सब कुछ भगवान् ही हैं'-यही वास्तविक शरणागति है।
तात्पर्य यह निकला कि जगत्, जीव और परमात्मा-तीनोंकी दृष्टिसे हम सब एक समान हैं। इस समताको गीताने 'योग' कहा है-'समत्वं योग उच्यते' (गीता २।४८)। भेद (विषमता) केवल व्यवहारके लिये है, जो अनिवार्य है; क्योंकि व्यवहारमें समता सम्भव ही नहीं है। अतः: साधककी दृष्टि (भावना) सम होनी चाहिये-'सर्वत्र समदर्शन:' (गीता ६।२९), 'पण्डिता: समदर्शिन:' (गीता ५।१८), 'समबुद्धिविशिष्यते' (गीता ६।९), 'सर्वत्र समबुद्धय:' (गीता १२।४)। व्यवहारकी भिन्नता तो स्वाभाविक है, पर भावकी भिन्नता मनुष्यने अपने राग-द्वेषसे पैदा की है। राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यने जगत्, जीव और परमात्मा-तीनोंमें अनेक भेद पैदा कर लिये हैं, जो इसके जन्म-मरणका कारण है-'मृत्यो: स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति' (कठ० २।१।११)। जो किसीको भी पराया मानता है, किसीका भी बुरा चाहता, देखता तथा करता और संसारसे कुछ भी चाहता है, वह न तो कर्मयोगी हो सकता है, न ज्ञानयोगी हो सकता है और न भक्तियोगी ही हो सकता है।
जगत्, जीव और परमात्मा-इन तीनोंपर विचार करें तो स्वतन्त्र सत्ता एक परमात्माकी ही है। जगत् और जीवकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जगत्को जीवने ही धारण किया है-'ययेदं धार्यते जगत्' (७।५) अर्थात् जगत्को सत्ता जीवने ही दी है, इसलिये जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जीव परमात्माका ही अंश है-'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५।७), इसलिये खुद जीवकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि जगत्की सत्ता जीवके अधीन है और जीवकी सत्ता परमात्माके अधीन है, इसलिये एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ नहीं है-'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता ९।१९)। जगत् और जीव-दोनों परमात्मामें ही भासित हो रहे हैं।