भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

उत्तर—‘अधिभूत’ अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् तत्त्वसे भगवान्का ही स्वरूप होनेसे अलौकिक है—‘अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुनं’ (गीता ९।१९) ‘अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ’। भगवान्ने अर्जुनको जो विराट्रूप दिखाया था, वह भी दिव्य अर्थात् अलौकिक था। वह दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अपने ही दिव्य शरीरके एक अंगमें दिखाया था। अतः भगवान्का ही विराट्रूप होनेसे यह पांचभौतिक जगत् भी अलौकिक ही है। भगवान्ने संसारमें अपनी विभूतियोंको भी दिव्य अर्थात् अलौकिक कहा है—‘दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ (गीता १०।१९), ‘मम दिव्यानां विभूतीनाम्’ (१०।४०)। परन्तु जीवको अज्ञानवश अपनी बुद्धिसे (राग-द्वेषके कारण) यह जगत् लौकिक दीखता है। इसलिये अज्ञान मिटनेपर जड़ता रहती ही नहीं, केवल चिन्मयता रहती है।

‘अधिदैव’ अर्थात् ब्रह्माजी आदि सभी देवता अलौकिक हैं।

‘अधि यज्ञ’ अर्थात् अन्तर्यामी भगवान् सबके हृदयमें रहते हुए भी निलिप्त होनेके कारण अलौकिक हैं।

भगवान्ने ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञम्’ पदोंमें अपनेको अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञके सहित जाननेकी बात कही है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्माके सहित होनेसे ही ये तीनों अलौकिक हैं, अन्यथा लौकिक ही हैं। जबतक भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है; परन्तु भगवान्के साथ सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। इसलिये अपना उद्योग मुख्य होनेसे कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘लौकिक निष्ठा’ है और भगवान्का आश्रय मुख्य

१-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्तादेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मतोऽन्यदिति बुध्यध्वर्मजसा ॥

(श्रीमद्भा० ११।१३।२४)

‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें, स्वीकार कर लें।

२-‘नानाविधानि दिव्यानि’ (गीता ११।५), ‘अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्’ (११।१०), ‘दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्’ (११।११), ‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे……सर्वानुरगांश्च दिव्यान्’ (११।१५)।

३-भगवान्के वचन हैं—‘इहैकस्थं जगत्कृतं…… मम देहे’ (११।७)।

संजयके वचन हैं—‘तत्रैकस्थं जगत्कृतं…… अपश्यदेवदेवस्य शरीरं’ (११।१३)।

अर्जुनके वचन हैं—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे’ (११।१५)।

४-खं वायुमग्निं सलिलं महीं च

ज्योतींश्च सन्त्वानि दिशो दृमादीन्।

सरित्समुद्रांश्च हरः शरीरं

यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्यः ॥

(श्रीमद्भा० ११।२।४९)

‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, जीव-जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के ही शरीर हैं—ऐसा मानकर भक्त सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है।’

भद्रूपवर्षसदिरद्विनभः समुद्रपातालदिन्द्रनकभागणलोकसंस्था ।

गीता मया तव नृपाद्भूतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम ॥

(श्रीमद्भा० ५।२६।४०)

‘परीक्षितु! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण और लोकोंको स्थितिका वर्णन किया। यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूल रूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है।’

५-अर्जुनने भी विभूतियोंको दिव्य कहा है—‘वक्तुमहँस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ (१०।१६)।

द्वा सुपुर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषरवजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्भूतनश्चनन्यो अभिचाकशीति ॥

(मुण्डक० ३।१।१; श्वेताश्वतर० ४।६)

६-‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, पर दूसरा (परमात्मा) उपभोग न करता हुआ केवल प्रकाशित करता है।’