भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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लोक ३०]

  • साधक-संजीवनी *

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अधियज्ञ—इनमें अलौकिक निष्ठा-(भक्तियोग-) की बात आयी है। 'ज्ञान' लौकिक है—'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते'" (गीता ४।३८) और 'विज्ञान' अलौकिक है। लौकिक तथा अलौकिक—दोनों ही समग्र भगवान्के रूप हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।

'लोक' शब्दमें जड़ भी है और चेतन भी। केवल जड़ अथवा केवल चेतनका वाचक 'लोक' शब्द नहीं हो सकता। अतः 'लौकिक' में जड़ और चेतन दोनों आते हैं, पर 'अलौकिक' में केवल चेतन ही आता है; क्योंकि अलौकिक सदा चिन्मय ही होता है। परन्तु 'समग्र' में लौकिक और अलौकिक—दोनों आ जाते हैं।

यहाँ एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि निर्गुण-निराकार 'ब्रह्म' का नाम भगवान्के समग्ररूपके अन्तर्गत आया है। लोगोंमें प्रायः इस बातकी प्रसिद्धि है कि 'निर्गुण-निराकार ब्रह्मके अन्तर्गत ही सगुण ईश्वर है। ब्रह्म मायारहित है और ईश्वर मायासहित है। अतः ब्रह्मके एक अंशमें ईश्वर है।' वास्तवमें ऐसा मानना शास्त्रसम्मत एवं युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब ब्रह्ममें माया है ही नहीं तो फिर मायासहित ईश्वर ब्रह्मके अन्तर्गत कैसे हुआ? ब्रह्ममें माया कहाँसे आयी? परन्तु गीतामें भगवान् कह रहे हैं कि मेरे समग्ररूपके एक अंशमें ब्रह्म है! इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मका आधार बताया है—'ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्' (गीता १४।२७) 'मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ' तथा 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४) 'यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।' भगवान्के इस कथनका तात्पर्य है कि ब्रह्मका अंश मैं नहीं हूँ, प्रत्युत मेरा अंश ब्रह्म है। अतः निष्पक्ष विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि गीतामें ब्रह्मकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत ईश्वरकी मुख्यता है। पूर्ण तत्त्व समग्र ही है। समग्रमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब आ जाते हैं।

वास्तवमें देखा जाय तो समग्ररूप सगुणका ही हो सकता है; क्योंकि सगुण शब्दके अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुण शब्दके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणाँका निषेध है। अतः निर्गुणमें समग्र शब्द लग ही नहीं सकता। इसलिये यहाँ 'अध्यात्म' और 'कर्म' के साथ तो क्रमशः 'कृत्स्न' और 'अखिल' शब्द आये हैं, जो समग्रताके वाचक हैं, पर 'ब्रह्म' के साथ समग्रताका वाचक कोई शब्द कहीं भी नहीं आया है। अतः समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं।

प्रश्न —ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये तीनों लौकिक कैसे हैं?

उत्तर —भगवान्ने ब्रह्मको 'अक्षर' कहा है—'अक्षरं ब्रह्म परमम्' (गीता ८।३) और जीवको भी 'अक्षर' कहा है—'द्वारिमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च' (गीता १५।१६)। जीव और ब्रह्म—दोनों एक हैं—'अयमात्मा ब्रह्म' (माण्डूक्य० १)। प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध होनेसे जो 'जीव' (अध्यात्म) है, वही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध न होनेसे सामान्य 'ब्रह्म' है। अतः गीताके अनुसार जैसे जीव लोकमें है, ऐसे ही ब्रह्म भी लोकमें है अर्थात् ब्रह्म लौकिक निष्ठा-(कर्मयोग तथा ज्ञानयोग-) से प्रापणीय तत्त्व है।

'अध्यात्म' अर्थात् जीवने जगत्को धारण किया हुआ है—'यदेदं धार्यते जगत्' (गीता ७।५)। जीवकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये जगत्के संगसे जीव भी जगत् अर्थात् लौकिक हो जाता है। (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। लोकमें होनेके कारण भी जीव लौकिक है—'ममेवांशो जीवलोके' (गीता १५।७), 'द्वारिमी पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एव च' (गीता १५।१६)।

'कर्म' दो प्रकारसे होते हैं—सकामभावसे और निष्कामभावसे। ये दोनों ही प्रकारके कर्म लोकमें होनेसे लौकिक हैं।

प्रश्न —अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—ये तीनों अलौकिक कैसे हैं?


१-यहाँ 'पवित्रमिह' के अन्तर्गत आया 'इह' शब्द लोकका वाचक है।

२-ब्रह्मो विषय सनेह ते, ताते कहिये जीव। अलख अजोगी आप है, हरिया न्यारी थीव॥

३-लोकमें होनेवाले सकाम-कर्म—'यज्ञार्थार्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।' (गीता ३।९), 'क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्ववति कर्मजा॥' (गीता ४।१२); 'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके' (गीता १५।२)।

लोकमें होनेवाले निष्काम-कर्म—'लोकेऽस्मिन्द्विधा ..... योगिनाम्॥' (गीता ३।३)।

वास्तवमें कर्म सकाम या निष्काम नहीं होते, प्रत्युत कर्ता सकाम या निष्काम होता है। अतः सकाम-निष्कामभाव कर्तामें रहते हैं।