श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि कोई एक ही (विरला) मनुष्य मेरे समग्ररूपको जानता है—‘कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः’। यहाँ बताते हैं कि जो मेरे शरण हो जाता है, वह मेरे समग्ररूपको जान लेता है।
अतः भगवान्के समग्ररूप-(विज्ञानसहित ज्ञान-) को जाननेकी मुख्य साधना है—शरणागति (‘मामाश्रित्य’)। कारण कि समग्रका ज्ञान विचारसे नहीं होता, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासपूर्वक शरणागत होनेपर भगवत्कृपासे ही होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मदाश्रयः’ कहकर अन्तमें ‘मामाश्रित्य’ पदसे उसका उपसंहार किया है।
ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव) तथा अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ)—यह ‘ज्ञान’ का विभाग है। इस विभागमें निर्गुणकी मुख्यता है।
अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर््यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह ‘विज्ञान’ का विभाग है। इस विभागमें सगुणकी मुख्यता है।
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके ‘सहित’ कहनेका तात्पर्य है कि सत्-असत्, परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय किञ्चिन्मात्र भी कुछ नहीं है। सत्-असत्को अलग-अलग करनेसे ज्ञानमार्ग होता है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि’……’ (गीता २।१६) और एक करनेसे भक्तिमार्ग होता है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)।
‘ब्रह्म’ की बात पहले पाँचवें अध्यायमें तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक कही गयी है। ‘कृत्स्न अध्यात्म’ की बात पहले छठे अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें ‘सर्वभूतस्थमात्मानम्’ पदसे कही गयी है। ‘अखिल कर्म’ की बात पहले चौथे अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और तैंतीसवें श्लोकमें क्रमशः ‘कृत्स्नकर्मकृत्’, ‘कर्म समग्रम्’ और ‘सर्व कर्माखिलम्’ पदसे कही गयी है।
अभाव कर्मका होता है, आत्मा या ब्रह्मका नहीं। न्यायमें आता है कि किसी वस्तुके भावका ज्ञान जिस इन्द्रियसे होता है, उसी इन्द्रियसे उसके अभावका और जातिका ज्ञान भी होता है। अतः मनुष्य जिस ज्ञानसे कर्मोंको जानता है (कर्म चाखिलम्), उसी ज्ञानसे कर्मोंके अभावको अर्थात् अकर्मको भी जानता है—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’ (गीता ४।१८)। ब्रह्म, आत्मा और अकर्म—तीनों एक ही हैं, ऐसा जानना ही ‘ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्’ पदोंका तात्पर्य है।
‘कर्म’ सीमित है, कर्मसे व्यापक ‘अध्यात्म’ है और अध्यात्मसे व्यापक ‘ब्रह्म’ है। परन्तु ‘माम्’ (समग्र) उस ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि ब्रह्मके अन्तर्गत तो समग्र नहीं आता, पर समग्रके अन्तर्गत ब्रह्म आ जाता है।
‘अध्यात्म’ के साथ ‘कृत्स्न’ शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनको भगवान्ने अपनी परा प्रकृति बताया है, वे अनेक रूपसे दीखनेवाले सम्पूर्ण जीव। ‘कर्म’ के साथ ‘अखिल’ शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनके फलस्वरूप जीव अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें जाता है, वे शुभ-अशुभ सम्पूर्ण कर्म, परन्तु ‘ब्रह्म’ के साथ ‘कृत्स्न’ या ‘अखिल’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म अनेक नहीं है, प्रत्युत एक ही है।
गीतामें भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—कर्मयोग और ज्ञानयोग। ये दोनों ही निष्ठाएँ लौकिक हैं—‘लोकेशस्मिन् द्विविधा निष्ठा’ (गीता ३।३); परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि कर्मयोगमें ‘शर’ (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें ‘अक्षर’ (जीवात्मा) की प्रधानता है। शर और अक्षर—दोनों ही लोकमें हैं—‘द्वायिषौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६) इसलिये कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं। परन्तु भक्तियोगमें ‘परमात्मा’ की प्रधानता है, जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ, अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। भगवान्के समग्ररूपमें ब्रह्म, अध्यात्म तथा कर्म—इनमें लौकिक निष्ठा (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग) की बात आयी है* और अधिभूत, अधिदैव तथा
- ‘अध्यात्म’ से ज्ञानयोग और ‘कर्म’ से कर्मयोग लेना चाहिये। ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंसे ‘ब्रह्म’ की प्राप्ति होती है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
भक्तिका प्रसंग होनेसे यहाँ भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोगका विस्तारसे वर्णन नहीं किया। इनका विस्तारसे वर्णन पिछले (दूसरेसे छठे) अध्यायोंमें कर चुके हैं।