श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रसंगमें भगवान्ने सत्रह विभूतियोंके रूपमें कारणरूपसे अपनी व्यापकता बतायी (आठवेंसे बारहवें श्लोकतक)। फिर भगवान्ने कहा कि जो तीनों गुणोंसे मोहित है अर्थात् जिसने निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है, वह गुणोंसे पर मेरेको नहीं जान सकता (तेरहवाँ श्लोक)। यह गुणमयी माया तरनेमें बड़ी दुष्कर है। जो मेरे शरण हो जाते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं (चौदहवाँ श्लोक); परन्तु जो मेरेसे विमुख होकर निषिद्ध आचरणोंमें लग जाते हैं, वे दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते (पन्द्रहवाँ श्लोक)। अब यहाँ चौदहवें श्लोकके बाद ही सोलहवाँ श्लोक कह देते तो बहुत ठीक बैठता अर्थात् चौदहवें श्लोकमें शरण होनेकी बात कही, तो अब शरण होनेवाले चार तरहके होते हैं—ऐसा बतानेसे श्रृंखला बहुत ठीक बैठती। परन्तु पंद्रहवाँ श्लोक बीचमें आ जानेसे प्रकरण ठीक नहीं बैठता। अतः यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध अर्थात् बाधा डालनेवाला मालूम देता है। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि यह श्लोक न आनेसे 'पापी मेरे शरण नहीं होते'—यह कहना बाकी रह जाता। इसलिये पंद्रहवें श्लोकमें 'दुष्कृती (पापी) मेरे शरण होते ही नहीं'—यह बात बता दी और सोलहवें श्लोकमें शरण होनेवालोंके चार प्रकार बता दिये।
अब जो शरण होते हैं, उनके भी दो प्रकार हैं—एक तो भगवान्को भगवान् समझकर अर्थात् भगवान्की महत्ता समझकर भगवान्के शरण होते हैं (सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) और दूसरे भगवान्को साधारण मनुष्य मानकर
परिशिष्ट भाव —इस अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको जान जायगा और जिसको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। फिर उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने 'वासुदेवः सर्वम्' कहकर अपने समग्ररूपका संक्षेपसे वर्णन किया। अब अध्यायके अन्तमें भगवान् उसका खुलासा करते हैं।
साधकका जन्म तो हो चुका है और व्याधि अवश्यम्भावी नहीं है; परन्तु वृद्धावस्था और मृत्यु—ये दोनों अवश्यम्भावी हैं और इनसे मनुष्यको अधिक दुःख होता है। इसलिये यहाँ 'जरामरणमोक्षाय' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का आश्रय लेनेवाले भक्त जरा और मरण—दोनोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् उनको शरीरके रहते हुए वृद्धावस्थाका भी दुःख नहीं होता और गतिके विषयमें भी दुःख नहीं होता कि मरनेके बाद हमारी क्या गति होगी? वे भगवान्का आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, इसलिये वे परा-अपराके सहित भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं अर्थात् विज्ञानसहित ज्ञानको जान लेते हैं।
यद्यपि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी भी जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं, पर भक्त जरा-मरणसे मुक्त होनेके साथ-साथ भगवान्के समग्ररूपको भी जान लेते हैं। कारण कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगीकी तो आरम्भसे ही अपने साधनकी निष्ठा होती है (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक), पर भक्त आरम्भसे ही भगवन्निष्ठ अर्थात् भगवत्परायण होता है। भगवन्निष्ठ होनेसे भगवान् कृपा करके उसको अपने समग्ररूपका ज्ञान करा देते हैं।
देवताओंको सबसे बड़ा मानते हैं, इसलिये भगवान्का आश्रय न लेकर कामनापूर्तिके लिये देवताओंके शरण हो जाते हैं (बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक)।
देवताओंके शरणमें होनेमें भी दो हेतु होते हैं—कामनाओंका बढ़ जाना और भगवान्की महत्ताको न जानना। इनमेंसे पहले हेतुका वर्णन तो बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक कर दिया और दूसरे हेतुका वर्णन चौबीसवें श्लोकमें कर दिया। जो भगवान्को साधारण मनुष्य मानते हैं, उनके सामने भगवान् प्रकट नहीं होते—यह बात पचीसवें श्लोकमें बता दी।
अब ऐसा असर पड़ता है कि भगवान् भी मायासे ढके होंगे। अतः भगवान् कहते हैं कि मेरा ज्ञान ढका हुआ नहीं है (छब्बीसवाँ श्लोक)। मेरेको न जाननेमें राग-द्वेष ही मुख्य कारण हैं (सताईसवाँ श्लोक)। जो इस द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं (अट्ठाईसवाँ श्लोक)। जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे मेरे समग्ररूपको जान जाते हैं और अन्तमें मेरेको ही प्राप्त होते हैं (उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)।
इस अध्यायपर आदिसे अन्ततक विचार करके देखें तो भगवान्के विमुख और सम्मुख होनेका ही इसमें वर्णन है। तात्पर्य है कि जड़ताकी तरफ वृत्ति रखनेसे मनुष्य बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। अगर वे जड़तासे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, तो वे सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार—ऐसे भगवान्के समग्ररूपको जानकर अन्तमें भगवान्को ही प्राप्त हो जाते हैं।