श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है अर्थात् दोनों एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं१। सगुण-साकारके उपासकोंको तो भगवत्कृपासे निर्गुण-निराकारका भी बोध हो जाता है—मम दरसन फल परम अनुपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ (मानस ३।३६।५) निर्गुण-निराकारके उपासकमें यदि भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्के दर्शनकी अभिलाषा है, तो उसे भगवान्के दर्शन हो जाते हैं अथवा भगवान्को उससे कुछ काम लेना होता है, तो भगवान् अपनी तरफसे भी दर्शन दे सकते हैं। जैसे, निर्गुण-निराकारके उपासक मधुसूदनाचार्यजीको भगवान्ने अपनी तरफसे दर्शन दिये थे२।
(३)
वास्तवमें परमात्मा सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब कुछ है। सगुण-निर्गुण तो उनके विशेषण हैं, नाम हैं। साधक परमात्माको गुणोंके सहित मानता है तो उसके लिये वे सगुण हैं और साधक उनको गुणोंसे रहित मानता है तो उसके लिये वे निर्गुण हैं। वास्तवमें परमात्मा सगुण तथा निर्गुण—दोनों हैं और दोनोंसे परे भी हैं। परन्तु इस वास्तविकताका पता तभी लगता है, जब बोध होता है।
भगवान्के सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, औदार्य आदि जो दिव्य गुण हैं, उन गुणोंके सहित सर्वत्र व्यापक परमात्माको 'सगुण' कहते हैं। इस सगुणके दो भेद होते हैं—
(१) सगुण-निराकार —जैसे, आकाशका गुण 'शब्द' है, पर आकाशका कोई आकार (आकृति) नहीं है, इसलिये आकाश सगुण-निराकार हुआ। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माका नाम सगुण-निराकार है।
(२) सगुण-साकार —वे ही सगुण-निराकार परमात्मा जब अपनी दिव्य प्रकृतिको अधिष्ठित करके अपनी योगमायासे लोगोंके सामने प्रकट हो जाते हैं, उनकी इन्द्रियोंके विषय हो जाते हैं, तब उन परमात्माको सगुण-
साकार कहते हैं। सगुण तो वे थे ही, आकृतियुक्त प्रकट हो जानेसे वे साकार कहलाते हैं।
जब साधक परमात्माको दिव्य अलौकिक गुणोंसे भी रहित मानता है अर्थात् साधककी दृष्टि केवल निर्गुण परमात्माकी तरफ रहती है, तब परमात्माका वह स्वरूप 'निर्गुण-निराकार' कहा जाता है।
गुणोंके भी दो भेद होते हैं—(१) परमात्माके स्वरूपभूत सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि दिव्य, अलौकिक, अप्राकृत गुण और (२) प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुण। परमात्मा चाहे सगुण-निराकार हों, चाहे सगुण-साकार हों, वे प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंसे सर्वथा रहित हैं, अतीत हैं। वे यद्यपि प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार करके सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं, फिर भी वे प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा रहित ही रहते हैं (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)।
जो परमात्मा गुणोंसे कभी नहीं बँधते, जिनका गुणोंपर पूरा आधिपत्य होता है, वे ही परमात्मा निर्गुण होते हैं। अगर परमात्मा गुणोंसे बँधे हुए और गुणोंके अधीन होंगे, तो वे कभी निर्गुण नहीं हो सकते। निर्गुण तो वे ही हो सकते हैं, जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं और जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं, ऐसे परमात्मामें ही सम्पूर्ण गुण रह सकते हैं। इसलिये परमात्माको सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि सब कुछ कह सकते हैं। ऐसे परमात्माका ही उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें समग्ररूपसे वर्णन किया गया है।
अध्याय-सम्बन्धी विशेष बात
भगवान्ने इस अध्यायमें पहले परिवर्तनशीलको 'अपर' और अपरिवर्तनशीलको 'परा' नामसे कहा (चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। फिर इन दोनोंके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी और अपनेको सम्पूर्ण संसारका प्रभव और प्रलय बताया अर्थात् संसारके आदिमें और अन्तमें 'केवल मैं ही रहता हूँ'—यह बताया (छठा-सातवाँ श्लोक)। उसी
१-सगुण-निर्गुणका भेद तो उपासनाकी दृष्टिसे है। वास्तवमें इन दोनों उपासनाओंमें उपास्यतत्त्व एक ही है। उपासना साधककी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार होती है। अतः साधकोंकी भिन्न-भिन्न रुचि, विश्वास और योग्यता होनेके कारण उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। परन्तु सम्पूर्ण उपासनाओंसे अन्तमें एक ही उपास्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। उस उपास्यतत्त्वको ही 'समग्र ब्रह्म' कहते हैं।
२-अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवर्धुवितेन॥
'अद्वैतमार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!'