भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ४]

  • साधक-संजीवनी *

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महाप्रलयके समय परिपक्व होकर जब फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब भगवान्का संकल्प होता है। इस प्रकार जीवोंके कर्माकी प्रेरणासे भगवान्में 'मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ'—यह संकल्प होता है।

मनुष्यमात्रके द्वारा विहित और निषिद्ध जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंका नाम 'कर्म' है। तात्पर्य है कि मुख्य कर्म तो भगवान्का संकल्प हुआ और उसके बाद कर्म-परम्परा चलती है।

परिशिष्ट भाव—'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते'— 'परा प्रकृति' भगवान्का स्वभाव है—'प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ' (गीता ७।५)। प्रकृति कहो, चाहे स्वभाव कहो, एक ही बात है। यह परा प्रकृति अर्थात् जीव ही 'अध्यात्म' नामसे कहा गया है। इसको भगवान्ने अपना अंश भी बताया है—'ममैवांशो जीवलोकै ' (गीता १५।७)।

'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ' का दूसरा तात्पर्य है कि बालक, जवानी और वृद्धावस्थामें; जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें; चौरासी लाख योनियोंमें, सर्ग और प्रलयमें, महासर्ग और महाप्रलयमें भी जीवका कभी अभाव नहीं होता—'नाभावो विद्यते सतः ' (गीता २।१६) अर्थात् इसका अपना भाव (सत्ता या होनापन) सदा विद्यमान रहता है।

सृष्टि-रचनारूप कर्मको 'त्याग' कहनेका तात्पर्य है कि इसमें अपनी स्थिरताका त्याग है। कारण कि तत्त्व स्थिर, अचल है और उस स्थिरताका त्याग ही कर्म है।

भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म ही आदि कर्म है, जिससे कर्माकी परम्परा चली है। अतः 'कर्म' के अन्तर्गत तीन प्रकारके कर्म आते हैं—(१) सृष्टिकी रचना (२) क्रियामात्र, जो फलजनक नहीं होती और (३) पाप-पुण्य (शुभाशुभ कर्म), जो फलजनक होते हैं।

भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म वास्तवमें 'अकर्म' ही है। भगवान्ने कहा भी है—'तस्य कर्तारमपि मां विद्धव्यकर्तारमव्ययम् ' (गीता ४।१३) 'उस सृष्टि-रचनाका कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान।'

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।

अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभूतां वर ॥ ४ ॥

देहभूताम्, वर= हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! क्षरः = क्षर भावः = भाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ | अधिभूतम् = अधिभूत है, पुरुषः = पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अधिदैवतम् = अधिदैव है = और | अत्र = इस देहे = देहमें (अन्तर्धामीरूपसे) अहम् = मैं एव = ही अधियज्ञः = अधियज्ञ हूँ। ---|---|---

व्याख्या—'अधिभूतं क्षरो भावः' —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पंचमहाभूतोंसे बनी प्रतिक्षण परिवर्तनशील और नाशवान् सृष्टिको अधिभूत कहते हैं। 'पुरुषश्चाधिदैवतम्' —यहाँ 'अधिदैवत' (अधिदैव) पद आदिपुरुष हिरण्यगर्भ ब्रह्माका वाचक है। महासर्गके आदिमें भगवान्के संकल्पसे सबसे पहले ब्रह्माजी ही प्रकट होते हैं और फिर वे ही सर्गके आदिमें सब सृष्टिकी रचना करते हैं।

१-जैसे कर्म करते-करते थकावट होती है तो कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके ज्यों-के-त्यों रहते हुए ही प्राणियोंको नींद आ जाती है। नींदमें विश्राम पानेसे थकावट दूर होती है और कर्म करनेके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें ताजगी आती है, सामर्थ्य आती है। इसी रीतिसे प्राणी कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके सहित प्रलयमें सूक्ष्म प्रकृतिमें और महाप्रलयमें कारण प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। उन लीन हुए प्राणियोंके संचित कर्म विश्राम पाकर—परिपक्व होकर अर्थात् प्रारब्धरूप होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। तब भगवान्का संकल्प होता है और उस संकल्पसे प्राणियोंका जन्मारम्भक कर्मके साथ विशेषतासे सम्बन्ध जुड़ जानेका नाम ही 'कर्म' है।

२-'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्' (गीता ४।१३), 'कल्यादी विमुजाम्यहम्' (१।७), विमुजामि पुनः पुनः' (१।८), 'अहं बीजप्रदः पिता' (१४।४)।