श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
‘अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर’—हे देहधारियोंमें
श्रेष्ठ अर्जुन! इस देहमें अधियज्ञ मैं ही हूँ अर्थात् इस
मनुष्यशरीरमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही हूँ। भगवान्ने गीतामें
‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ (१३।१७), ‘सर्वस्य चाहं हृदि
संनिविष्ट:’ (१५।१५), ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
तिष्ठति’ (१८।६१) आदिमें अपनेको अन्तर्यामीरूपसे
सबके हृदयमें विराजमान बताया है।
‘अहमेव अत्र२ देहे’ कहनेका तात्पर्य है कि दूसरी
योनियोंमें तो पूर्वकृत कर्मोंका भोग होता है, नये कर्म नहीं
बनते, पर इस मनुष्यशरीरमें नये कर्म भी बनते हैं। उन
कर्मोंके प्रेरक अन्तर्यामी भगवान् होते हैं३। जहाँ मनुष्य
राग-द्वेष नहीं करता उसके सब कर्म भगवान्की प्रेरणाके
अनुसार शुद्ध होते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते और
जहाँ वह राग-द्वेषके कारण भगवान्की प्रेरणाके अनुसार
कर्म नहीं करता, उसके कर्म बन्धनकारक होते हैं। कारण
कि राग और द्वेष मनुष्यके महान् शत्रु हैं (गीता—तीसरे
अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि
भगवान्की प्रेरणासे कभी निषिद्ध-कर्म होते ही नहीं। श्रुति
और स्मृति भगवान्की आज्ञा है—‘श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे।’
अतः भगवान् श्रुति और स्मृतिके विरुद्ध प्रेरणा कैसे कर
सकते हैं? नहीं कर सकते। निषिद्ध-कर्म तो मनुष्य
कामनाके वशीभूत होकर ही करता है (गीता—तीसरे
अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। अगर मनुष्य कामनाके
वशीभूत न हो, तो उसके द्वारा स्वाभाविक ही विहित कर्म
होंगे, जिनको अठारहवें अध्यायमें सहज, स्वभावियत कर्म
नामसे कहा गया है।
यहाँ अर्जुनके लिये ‘देहभृतां वर’ कहनेका तात्पर्य है
कि देहधारियोंमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है, जो ‘इस देहमें
परमात्मा हैं’—ऐसा जान लेता है। ऐसा ज्ञान न हो, तो भी
ऐसा मान ले कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके कण-
कणमें परमात्मा हैं और उनका अनुभव करना ही मनुष्य-
जन्मका खास ध्येय है। इस ध्येयकी सिद्धिके लिये
परमात्माकी आज्ञाके अनुसार ही काम करना है।
तीसरे और चौथे श्लोकमें जो ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म,
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका वर्णन हुआ है, उसे
समझनेमात्रके लिये जलका एक दृष्टान्त दिया जाता है।
जैसे, जब आकाश स्वच्छ होता है, तब हमारे और सूर्यके
मध्यमें कोई पदार्थ न दीखनेपर भी वास्तवमें वहाँ परमाणुरूपसे
जल-तत्त्व रहता है। वही जल-तत्त्व भाप बनता और
भापके घनीभूत होनेपर बादल बनता है। बादलमें जो
जलकण रहते हैं, उनके मिलनेसे बूँदें बन जाती हैं। उन
बूँदोंमें जब ठण्डकके संयोगसे घनता आ जाती है, तब वे
ही बूँदें ओले (बर्फ) बन जाती हैं—यह जल-तत्त्वका
बहुत स्थूल रूप हुआ। ऐसे ही निर्गुण-निराकार ‘ब्रह्म’
परमाणुरूपसे जल-तत्त्व है, ‘अधियज्ञ’ (व्यापक विष्णु)
भापरूपसे जल है; ‘अधिदैव’ (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) बादलरूपसे
जल है, ‘अध्यात्म’ (अनन्त जीव) बूँदें-रूपसे जल है,
‘कर्म’ (सृष्टि-रचनारूप कर्म) वर्षाकी क्रिया है और
‘अधिभूत’ (भौतिक सृष्टिमात्र) बर्फरूपसे जल है।
इस वर्णनका तात्पर्य यह हुआ कि जैसे एक ही जल
परमाणु, भाप, बादल, वर्षाकी क्रिया, बूँदें और ओले-
(बर्फ-) के रूपसे भिन्न-भिन्न दीखता है, पर वास्तवमें
है एक ही। इसी प्रकार एक ही परमात्मतत्त्व ब्रह्म,
अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके रूपसे
भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः एक ही है। इसीको
सातवें अध्यायमें ‘समग्रम्’ (७।१) और ‘वासुदेव:
सर्वम्’ (७।१९) कहा गया है।
तात्त्विक दृष्टिसे तो सब कुछ वासुदेव ही है
(सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें भी जब
विवेक-दृष्टिसे देखते हैं, तब शरीर-शरीरी, प्रकृति-
पुरुष—ऐसे दो भेद हो जाते हैं। उपासनाकी दृष्टिसे देखते
हैं तो उपास्य (परमात्मा), उपासक (जीव) और त्याज्य
१-यहाँ इस मनुष्य-शरीरमें कहनेका तात्पर्य है कि इसमें भगवान्की प्रेरणाको समझनेकी, स्वीकार करनेकी और उसके
अनुसार आचरण करके तत्त्वको प्राप्त करनेकी सामर्थ्य है। अन्य शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे परमात्माके रहते हुए भी उन प्राणियोंमें
उस तत्त्वकी तरफ दृष्टि डालनेकी सामर्थ्य नहीं है और मनुष्यशरीरमें जो विवेक प्राप्त है, वह विवेक उन शरीरोंमें जाग्रत् नहीं
है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस शरीरके रहते-रहते उस तत्त्वको प्राप्त कर ले। इस दुर्लभ अवसरको व्यर्थ न जाने दे।
२-दूसरे श्लोकमें तो ‘अत्र’ पद प्रकरणके लिये आया है, तथा ‘अस्मिन्’ पद देहके लिये आया है, पर यहाँ ‘अत्र’ पद
देहके लिये ही आया है। कारण कि अर्जुनने प्रश्नमें ‘अत्र’ पद देकर प्रकरणका संकेत कर दिया है, इसलिये अब उसका
उत्तर देते हुए प्रकरणके लिये ‘अत्र’ पद देनेकी जरूरत नहीं है।
३-कर्मोंकी प्रेरणा भगवान् मनुष्यके स्वभावके अनुसार करते हैं। यदि स्वभावमें राग-द्वेष है तो उस राग-द्वेषके वशीभूत
होना अथवा न होना मनुष्यके हाथमें है। वह शास्त्र, सन्त तथा भगवान्का आश्रय लेकर अपने स्वभावको बदल सकता है।