श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
५८३
(प्रकृतिका कार्य—संसार)—ये तीन भेद हो जाते हैं। इन तीनोंको समझनेके लिये यहाँ इनके छः भेद किये गये हैं— परमात्माके दो भेद—ब्रह्म (निर्गुण) और अधियज्ञ (सगुण)।
जीवके दो भेद—अध्यात्म (सामान्य जीव, जो कि बद्ध हैं) और अधिदैव (कारक पुरुष, जो कि मुक्त हैं)। संसारके दो भेद—कर्म (जो कि परिवर्तनका पुंज है) और अधिभूत (जो कि पदार्थ हैं)।
विशेष बात
(१)
सब संसारमें परमात्मा व्याप्त हैं—‘मया तत्मिदं सर्वम्’ (९।१४), ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (१८।४६); सब संसार परमात्मामें हैं—‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्’ (७।७); सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९); सब संसार परमात्माका है—‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुवे च’ (९।२४), ‘भोक्तां यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्’ (५।२९)—इस प्रकार गीतामें भगवान्के तरह-तरहके वचन आते हैं। इन सबका सामंजस्य कैसे हो? सबकी संगति कैसे बैठे? इसपर विचार किया जाता है।
संसारमें परमात्मप्राप्तिके लिये, अपने कल्याणके लिये साधना करनेवाले जितने भी साधक* हैं, वे सभी संसारसे छूटना चाहते हैं और परमात्माको प्राप्त करना चाहते हैं। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे सदा रहनेवाली शान्ति और सुख नहीं मिल सकता, प्रत्युत सदा अशान्ति और दुःख ही मिलता रहता है—ऐसा मनुष्योंका प्रत्यक्ष अनुभव है। परमात्मा अनन्त आनन्दके स्वरूप हैं, वहाँ दुःखका लेश भी नहीं है—ऐसा शास्त्रोंका कथन है और सन्तोका अनुभव है।
अब विचार यह करना है कि साधकको संसार तो
प्रत्यक्षरूपसे दीखता है और परमात्माको वह केवल मानता है; क्योंकि परमात्मा प्रत्यक्ष दीखते नहीं। शास्त्र और सन्त कहते हैं कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’ इसको मानकर साधक साधन करता है। उस साधनामें जबतक संसारकी मुख्यता रहती है, तबतक परमात्माकी मान्यता गौण रहती है। साधन करते-करते ज्यों-ज्यों परमात्माकी धारणा (मान्यता) मुख्य होती चली जाती है, त्यों-ही-त्यों संसारकी मान्यता गौण होती चली जाती है। परमात्माकी धारणा सर्वथा मुख्य होनेपर साधकको यह स्पष्ट दीखने लग जाता है कि संसार पहले नहीं था और फिर बादमें नहीं रहेगा तथा वर्तमानमें जो ‘है’ रूपसे दीखता है, वह भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। जब संसार नहीं था, तब भी परमात्मा थे; जब संसार नहीं रहेगा, तब भी परमात्मा रहेंगे और वर्तमानमें संसारके प्रतिक्षण अभावमें जाते हुए भी परमात्मा ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। तात्पर्य है कि संसारका सदा अभाव है और परमात्माका सदा भाव है। इस तरह जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब सत्यस्वरूपसे ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा वास्तविक अनुभव हो जाता है, जिसके होनेसे साधक ‘सिद्ध’ कहा जाता है। कारण कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’—ऐसी मान्यता संसारकी सत्ता
- सदा रहनेवाली शान्ति और अनन्त सुख मिले, जिसमें अशान्ति और दुःखका लेश भी न हो—ऐसा विचार करनेवाले ‘साधक’ होते हैं। परन्तु जो संसारमें ही रहना चाहते हैं, संसारसे ही सुख लेना चाहते हैं, सांसारिक संग्रह और भोगोंमें ही लगे रहना चाहते हैं और संसारके सुख-दुःखको भोगते रहते हैं, वे साधक नहीं होते, प्रत्युत ‘संसारी’ होते हैं। वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े रहते हैं।