श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
माननेसे ही होती थी और संसारकी सत्ता साधकके रागके कारण ही दीखती थी। तत्त्वतः सब कुछ परमात्मा ही हैं।
(२)
सत् और असत् सब परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९), परमात्मा न सत् कहे जा सकते हैं और न असत् कहे जा सकते हैं—‘न सत्तनासदुच्यते’ (१३।१२); परमात्मा सत् भी हैं; असत् भी हैं और सत्-असत् दोनोंसे परे भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)। इस प्रकार गीतामें भिन्न-भिन्न वचन आते हैं। अब उनकी संगतिके विषयमें विचार किया जाता है।
परमात्मतत्त्व अत्यन्त अलौकिक और विलक्षण है। उस तत्त्वका वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। उस तत्त्वको इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि नहीं पकड़ सकते अर्थात् वह तत्त्व इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिकी परिधिमें नहीं आता। हाँ, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि उसमें विलीन हो सकते हैं। साधक उस तत्त्वमें स्वयं लीन हो सकता है, उसको प्राप्त कर सकता है, पर उस तत्त्वको अपने कब्जेमें, अपने अधिकारमें, अपनी सीमामें नहीं ले सकता।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधक दो तरहके होते हैं—एक विवेकप्रधान और एक श्रद्धाप्रधान अर्थात् एक मस्तिष्कप्रधान होता है और एक हृदयप्रधान होता है। विवेकप्रधान साधकके भीतर विवेककी अर्थात् जाननेकी मुख्यता रहती है और श्रद्धाप्रधान साधकके भीतर माननेकी मुख्यता रहती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विवेक-प्रधान साधकमें श्रद्धा नहीं रहती और श्रद्धाप्रधान साधकमें विवेक नहीं रहता, प्रत्युत यह तात्पर्य है कि विवेकप्रधान साधकमें विवेककी मुख्यता और साथमें श्रद्धा रहती है, तथा श्रद्धाप्रधान साधकमें श्रद्धाकी मुख्यता और साथमें विवेक रहता है। दूसरे शब्दोंमें, जाननेवालोंमें मानना भी रहता है और माननेवालोंमें जानना भी रहता है। जाननेवाले जानकर मान लेते हैं और माननेवाले मानकर जान लेते हैं। अतः किसी भी तरहके साधकमें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं रहती।
साधक चाहे विवेकप्रधान हो, चाहे श्रद्धाप्रधान हो, पर साधनमें उसकी अपनी रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यताकी प्रधानता रहती है। रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यता एक साधनमें होनेसे साधक उस तत्त्वको जल्दी
समझता है। परन्तु रुचि और श्रद्धा-विश्वास होनेपर भी वैसी योग्यता न हो अथवा योग्यता होनेपर भी वैसी रुचि और श्रद्धा-विश्वास न हो, तो साधकको उस साधनमें कठिनाता पड़ती है। रुचि होनेसे मन स्वाभाविक लग जाता है, श्रद्धा-विश्वास होनेसे बुद्धि स्वाभाविक लग जाती है और योग्यता होनेसे बात ठीक समझमें आ जाती है।
विवेकप्रधान साधक निर्गुण-निराकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि निर्गुण-निराकारमें होती है। श्रद्धाप्रधान साधक सगुण-साकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि सगुण-साकारमें होती है। जो निर्गुण-निराकारको पसंद करता है, वह यह कहता है कि परमात्मतत्त्व न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है। जो सगुण-साकारको पसंद करता है वह कहता है कि परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत्से परे भी हैं।
तात्पर्य यह हुआ कि चिन्मय-तत्त्व तो हरदम ज्यों-का-त्यों ही रहता है और जड़, असत् कहलानेवाला संसार निरन्तर बदलता रहता है। जब यह चेतन जीव बदलते हुए संसारको महत्त्व देता है, उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब यह जन्म-मरणके चक्करमें घूमता रहता है। परन्तु जब यह जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब इसको स्वतःसिद्ध चिन्मय-तत्त्वका अनुभव हो जाता है। विवेकप्रधान साधक विवेक-विचारके द्वारा जड़ताका त्याग करता है। जड़ताका त्याग होनेपर चिन्मय-तत्त्व अवशेष रहता है अर्थात् नित्यप्राप्त तत्त्वका अनुभव हो जाता है। श्रद्धाप्रधान साधक केवल भगवान्के ही सम्मुख हो जाता है, जिससे वह जड़तासे विमुख होकर भगवान्को प्रेमपूर्वक प्राप्त कर लेता है। विवेकप्रधान साधक तो सम, शान्त, सत्-घन, चित्-घन, आनन्द-घन तत्त्वमें अटल स्थित होकर अखण्ड आनन्दको प्राप्त होता है; पर श्रद्धाप्रधान साधक भगवान्के साथ अभिन्न होकर प्रेमके अनन्त, प्रतिक्षण वर्धमान आनन्दको प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार दोनों ही साधकोंको जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक चिन्मय-तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है और ‘सत्-असत् अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —परिवर्तनशील एवं नाशवान् क्रिया और पदार्थमात्र ‘क्षरभाव’ हैं, जो भगवान्की अपरा प्रकृति है। ज्ञानमें ब्रह्मके साथ एकता होती है और प्रेममें अन्तर्यामी भगवान्के साथ अभिन्नता होती है। भगवान्ने यहाँ अन्तर्यामी-(अधिष्ठित-) को अपना स्वरूप बताया है। अतः ब्रह्म तो विशेषण है और अन्तर्यामी विशेष्य हैं—‘ब्रह्मणो