भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हि प्रतिष्ठाहम्' (गीता १४।२७)। तात्पर्य है कि जिसको गीताने 'समग्र' कहा है, वह सबका रचयिता और नियन्ता अन्तर््यामी में ही हूँ। इसी अन्तर््यामीको चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें 'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नाथं दधाम्यहम्' और 'अहं बीजप्रदः पिता' पदोंमें 'अहम्' शब्दसे कहा गया है। गीतामें ब्रह्मके लिये कहा है—'न सत्तन्नासदुच्यते' (१३।१२) और समग्र भगवान्के लिये कहा है—'सदसच्चाहम्' (९।१९), 'सदसत्तत्परं यत्' (११।३७)।

सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें अर्जुनका सातवाँ प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥

यः= जो मनुष्यमुक्त्वा= छोड़करयाति= प्राप्त
अन्तकाले= अन्तकालमेंप्रयाति= जाता है,होता है,
= भीसः= वहअत्र= इसमें
माम्= मेरामद्भावम्= मेरेसंशयः= सन्देह
स्मरन्= स्मरण करते हुएस्वरूपको= नहीं
कलेवरम्= शरीरएव= हीअस्ति= है।

व्याख्या— 'अन्तकाले च * मामेव ..... याति नास्त्यत्र संशयः'—'अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए जो शरीर छोड़कर जाता है'—इसका तात्पर्य हुआ कि इस मनुष्यको जीवनमें साधन-भजन करके अपना उद्धार करनेका अवसर दिया था, पर इसने कुछ किया ही नहीं। अब बेचारा यह मनुष्य अन्तकालमें दूसरा साधन करनेमें असमर्थ है, इसलिये बस, मेरेको याद कर ले तो इसको मेरी प्राप्ति हो जायगी।

'मामेव स्मरन्' का तात्पर्य है कि सुनने, समझने और माननेमें जो कुछ आता है, वह सब मेरा समग्ररूप है। अतः जो उसको मेरा ही स्वरूप मानेगा उसको अन्तकालमें भी मेरा ही चिन्तन होगा अर्थात् उसने जब सब कुछ मेरा ही स्वरूप मान लिया तो अन्तकालमें उसको जो कुछ याद आयेगा, वह मेरा ही स्वरूप होगा, इसलिये वह स्मरण मेरा ही होगा। मेरा स्मरण होनेसे उसको मेरी ही प्राप्ति होगी।

'मद्भावम्' कहनेका तात्पर्य है कि साधकने मेरेको जिस-किसी भिन्न अथवा अभिन्न भावसे अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज-चतुर्भुज तथा नाम, लीला, धाम, रूप आदिसे स्वीकार किया है, मेरी उपासना की है, अन्तसमयके स्मरणके अनुसार वह मेरे उसी भावको

प्राप्त होता है।

जो भगवान्की उपासना करते हैं, वे तो अन्तसमयमें उपास्यका स्मरण होनेसे उसी उपास्यको अर्थात् भगवद्भावको प्राप्त होते हैं। परन्तु जो उपासना नहीं करते, उनको भी अन्तसमयमें किसी कारणवशात् भगवान्के किसी नाम, रूप, लीला, धाम आदिका स्मरण हो जाय, तो वे भी उन उपासकोंकी तरह उसी भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं। तात्पर्य है कि जैसे गुणोंमें स्थित रहनेवालेकी (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और अन्तकालमें जिस-किसी गुणके बढ़नेवालेकी वैसी ही गति होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक), ऐसे ही जिसको अन्तमें भगवान् याद आ जाते हैं, उसकी भी उपासकोंकी तरह गति होती है अर्थात् भगवान्की प्राप्ति होती है।

भगवान्के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि अनेक रूपोंका और नाम, लीला, धाम आदिका भेद तो साधकोंकी दृष्टिसे है, अन्तमें सब एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सब एक 'मद्भाव'—भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं; क्योंकि भगवान्का समग्र स्वरूप एक ही है। परन्तु गुणोंके अनुसार गतिको प्राप्त होनेवाले अन्तमें एक नहीं हो सकते; क्योंकि

  • यहाँ 'च' अव्ययका अर्थ 'अपि' अर्थात् 'भी' है।