श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) अलग-अलग हैं। अतः गुणोंके अनुसार उनकी गतियाँ भी अलग-अलग होती हैं। भगवान्का स्मरण करके शरीर छोड़नेवालोंका तो भगवान्के साथ सम्बन्ध रहता है और गुणोंके अनुसार शरीर छोड़नेवालोंका गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है। इसलिये अन्तमें भगवान्का स्मरण करनेवाले भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् भगवान्को प्राप्त हो जाते हैं और गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाले गुणोंके सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् गुणोंके कार्य जन्म-मरणको प्राप्त हो जाते हैं।
भगवान्ने एक यह विशेष छूट दी हुई है कि मरणासन्न व्यक्तिके कैसे ही आचरण रहे हों, कैसे ही भाव रहे हों, किसी भी तरहका जीवन बीता हो, पर अन्तकालमें वह भगवान्को याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा। कारण कि भगवान्ने जीवका कल्याण करनेके लिये ही उसको मनुष्यशरीर दिया है और जीवने उस मनुष्यशरीरको स्वीकार किया है। अतः जीवका कल्याण हो जाय, तभी भगवान्का इस जीवको मनुष्यशरीर देना और जीवका मनुष्यशरीर लेना सफल होगा। परन्तु वह अपना उद्धार किये बिना ही आज दुनियासे विदा हो रहा है, इसके लिये भगवान् कहते हैं कि 'भैया! तेरी और मेरी दोनोंकी इज्जत रह जाय, इसलिये अब जाते-जाते (अन्तकालमें) भी तू मेरेको याद कर ले तो तेरा कल्याण हो जाय।' अतः हरक मनुष्यके लिये सावधान होनेकी जरूरत है कि वह सब समयमें भगवान्का स्मरण करे, कोई समय खाली न जाने दे; क्योंकि अन्तकालका पता नहीं है कि कब आ जाय। वास्तवमें सब समय अन्तकाल ही है। यह बात तो है नहीं कि इतने वर्ष, इतने महीने और इतने दिनोंके बाद मृत्यु होगी। देखनेमें तो यही आता है कि गर्भमें ही कई बालक मर जाते हैं, कई जन्मते ही मर जाते हैं, कई कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें मर जाते हैं। इस प्रकार मरनेकी चाल हरदम चल ही रही है। अतः सब समयमें भगवान्को याद रखना चाहिये और यही समझना चाहिये कि बस, यही अन्तकाल है! नीतिमें यह बात आती है कि अगर धर्मका आचरण करना हो, कल्याण करना हो तो मृत्युने मेरे केश पकड़े हुए हैं; झटका दिया कि खत्म! ऐसा विचार हरदम
रहना चाहिये—'गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।' भगवान्की उपर्युक्त छूटसे मनुष्यमात्रको विशेष लाभ लेना चाहिये। कहीं कोई भी व्याधिग्रस्त, मरणासन्न व्यक्ति हो तो उसके इष्टके चित्र या मूर्तिको उसे दिखाना चाहिये; जैसी उसकी उपासना है और जिस भगवन्नाममें उसकी रुचि हो, जिसका वह जप करता हो, वही भगवन्नाम उसको सुनाना चाहिये; जिस स्वरूपमें उसकी श्रद्धा और विश्वास हो, उसकी याद दिलानी चाहिये; भगवान्की महिमाका वर्णन करना चाहिये; गीताके श्लोक सुनाने चाहिये। अगर वह बेहोश हो जाय तो उसके पास भगवन्नामका जप-कीर्तन करना चाहिये, जिससे उस मरणासन्न व्यक्तिके सामने भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल बना रहे। भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल रहनेसे वहाँ यमराजके दूत नहीं आ सकते। अजामिलके द्वारा मृत्युके समय 'नारायण' नामका उच्चारण करनेसे वहाँ भगवान्के पार्षद आ गये और यमदूत भागकर यमराजके पासमें गये, तो यमराजने अपने दूतोंसे कहा कि 'जहाँ भगवन्नामका जप, कीर्तन, कथा आदि होते हों, वहाँ तुमलोग कभी मत जाना; क्योंकि वहाँ हमारा राज्य नहीं है।' ऐसा कहकर यमराजने भगवान्का स्मरण करके भगवान्से क्षमा माँगी कि 'मेरे दूतोंके द्वारा जो अपराध हुआ है, उसको आप क्षमा करें।'।
अन्तकालमें स्मरणका तात्पर्य है कि उसने भगवान्का जो स्वरूप मान रखा है, उसकी याद आ जाय अर्थात् उसने पहले राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, सर्वव्यापक विश्वरूप परमात्मा आदिमेंसे जिस स्वरूपको मान रखा है, उस स्वरूपके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण, प्रभाव आदिकी याद आ जाय। उसकी याद करते हुए शरीरको छोड़कर जानेसे वह भगवान्को ही प्राप्त होता है। कारण कि भगवान्की याद आनेसे 'मैं' शरीर हूँ और शरीर 'मेरा' है—इसकी याद नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान्को ही याद करते हुए शरीर छूट जाता है। इसलिये उसके लिये भगवान्को प्राप्त होनेके अतिरिक्त और कोई गुंजाइश ही नहीं है।
यहाँ शंका होती है कि जिस व्यक्तिने उग्रभरमें भजन-स्मरण नहीं किया, कोई साधन नहीं किया, सर्वथा
१-एवं विमूष्य सुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्।
ते मे न दण्डमहँत्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरगायवादः ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।२६)
२-तत्क्षम्यात् स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसक्तुर्न नः।
स्वानामहो न विदुषां रचितान्जलीनां क्षान्तिर्गीरीयसि नमः पुरुषाय भूमे ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।३०)