श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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भगवान्से विमुख रहा, उसको अन्तकालमें भगवान्का स्मरण कैसे होगा और उसका कल्याण कैसे होगा? इसका समाधान है कि अन्तसमयमें उसपर भगवान्की कोई विशेष कृपा हो जाय अथवा उसको किसी सन्तके दर्शन हो जायें तो भगवान्का स्मरण होकर उसका कल्याण हो जाता है। उसके कल्याणके लिये कोई साधक उसको भगवान्का नाम, लीला, चरित्र सुनाये, पद गाये तो भगवान्का स्मरण होनेसे उसका कल्याण हो जाता है। अगर मरणासन्न व्यक्तिको गीतामें रुचि हो तो उसको गीताका आठवाँ अध्याय सुनाना चाहिये; क्योंकि इस अध्यायमें जीवकी सदगंतिका विशेषतासे वर्णन आया है। इसको सुननेसे उसको भगवान्की स्मृति हो जाती है। कारण कि वास्तवमें परमात्माका ही अंश होनेसे उसका परमात्माके साथ स्वतः सम्बन्ध है ही। अगर अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी आदि किसी तीर्थस्थलमें उसके प्राण छूट जायें तो उस तीर्थके प्रभावसे उसको भगवान्की स्मृति हो जायगी१। ऐसे ही जिस जगह भगवान्के नामका जप, कीर्तन, कथा, सत्संग आदि होता है, उस जगह उसकी मृत्यु हो जाय तो वहाँके पवित्र वायुमण्डलके प्रभावसे उसको भगवान्की स्मृति हो सकती है। अन्तकालमें कोई भयंकर स्थिति आनेसे भयभीत होनेपर भी भगवान्की याद आ सकती है। शरीर छूटते समय शरीर, कुटुम्ब, रूपये आदिकी आशा-ममता छूट जाय और यह भाव हो जाय कि 'हे नाथ! आपके बिना मेरा कोई नहीं है, केवल आप ही मेरे हैं' तो भगवान्की स्मृति होनेसे कल्याण हो जाता है। ऐसे ही किसी कारणसे अचानक अपने कल्याणका भाव बन जाय, तो भी कल्याण हो सकता है। ऐसे ही कोई साधक किसी प्राणी, जीव-जन्तुके मृत्युसमयमें 'उसका कल्याण हो जाय' इस भावसे उसको भगवन्नाम सुनाता है, तो उस भगवन्नामके
प्रभावसे उस प्राणीका कल्याण हो जाता है। शास्त्रोंमें तो सन्त-महापुरुषोंके प्रभावकी विचित्र बातें आती हैं कि यदि सन्त-महापुरुष किसी मरणासन्न व्यक्तिको देख लें अथवा उसके मृत शरीर-(मुर्दे-) को देख लें अथवा उसकी चिताके धुएँको देख लें अथवा चिताकी भस्मको देख लें, तो भी उस जीवका कल्याण हो जाता है२!
मार्मिक बात
इस अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें ब्रह्म, अध्यात्म आदि जिन छः बातोंका वर्णन किया गया है, उसका तात्पर्य समग्ररूपसे है; और समग्ररूपका तात्पर्य है—'वासुदेवः सर्वम्' अर्थात् सब कुछ वासुदेव ही है। जिसको समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसके लिये अन्तकालके स्मरणकी बात ही नहीं की जा सकती। कारण कि जिसकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न होकर सब कुछ वासुदेव ही है, उसके लिये 'अन्तकालमें भगवान्का चिन्तन करें' यह कहना ही नहीं बनता। जैसे सामान्य मनुष्यको 'मैं हूँ' इस अपने होनेपनका किंचिन्मात्र भी स्मरण नहीं करना पड़ता, ऐसे ही उस महापुरुषको भगवान्का स्मरण नहीं करना पड़ता, प्रत्युत उसको जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें भगवान्के होनेपनका स्वाभाविक अटल ज्ञान रहता है।
पवित्र-से-पवित्र अथवा अपवित्र-से-अपवित्र किसी भी देशमें; उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष, दिन-रात्रि, प्रातः-सायं आदि किसी भी कालमें; जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूच्छा, रूग्णाता, नीरोगता आदि किसी भी अवस्थामें; और पवित्र अथवा अपवित्र कोई भी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदि सामने होनेपर भी उस महापुरुषके कल्याणमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता!
उपर्युक्त महापुरुषोंके सिवाय परमात्माकी उपासना
१-अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका। पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
(नारदपुराण, पूर्व० २७। ३५)
२-एक बार एक सज्जन गंगाजीसे होकर आये थे और सबको गंगाजलका आचमन दे रहे थे। वहाँ एक व्यक्ति खड़ा था; उसको जब वे आचमन देने लगे तो उसने कहा—मेरे पाप बहुत हैं, मेरी जानकारीमें मैंने बहुत पाप किये हैं, इसलिये इतने थोड़े गंगाजलसे मेरे पाप कैसे कट जायेंगे? मेरा कल्याण कैसे हो जायगा? तो उससे पूछा—कितना चाहिये? उसने कहा—लोटाभर दो। उस सज्जने उसे लोटाभर गंगाजल दे दिया। उसने उस लोटाभर गंगाजलको पी लिया और कहा—अब मेरे पाप नहीं रहेंगे! यह सब घटना वहाँके एक भाईने सुनी थी। बादमें उस भाईने बताया कि वह व्यक्ति जब मरा, तब उसके प्राण दसवें द्वारको फोड़कर निकले, अर्थात् उसका कल्याण हो गया।
३-महापातकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकैः। परं पदं प्रयान्त्येव महद्द्विरवलोकिताः॥
कलेवरं वा तद्दस्म तद्भूमं वापि सत्तम। यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परां गतिम्॥
(नारदपुराण, पूर्व० १। ७। ७४-७५)