श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ४]
- साधक-संजीवनी *
५८९
महाप्रलयके समय परिपक्व होकर जब फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब भगवान्का संकल्प होता है। इस प्रकार जीवोंके कर्माकी प्रेरणासे भगवान्में 'मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ'—यह संकल्प होता है।
मनुष्यमात्रके द्वारा विहित और निषिद्ध जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंका नाम 'कर्म' है। तात्पर्य है कि मुख्य कर्म तो भगवान्का संकल्प हुआ और उसके बाद कर्म-परम्परा चलती है।
परिशिष्ट भाव—'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते'— 'परा प्रकृति' भगवान्का स्वभाव है—'प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ' (गीता ७।५)। प्रकृति कहो, चाहे स्वभाव कहो, एक ही बात है। यह परा प्रकृति अर्थात् जीव ही 'अध्यात्म' नामसे कहा गया है। इसको भगवान्ने अपना अंश भी बताया है—'ममैवांशो जीवलोकै ' (गीता १५।७)।
'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ' का दूसरा तात्पर्य है कि बालक, जवानी और वृद्धावस्थामें; जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें; चौरासी लाख योनियोंमें, सर्ग और प्रलयमें, महासर्ग और महाप्रलयमें भी जीवका कभी अभाव नहीं होता—'नाभावो विद्यते सतः ' (गीता २।१६) अर्थात् इसका अपना भाव (सत्ता या होनापन) सदा विद्यमान रहता है।
सृष्टि-रचनारूप कर्मको 'त्याग' कहनेका तात्पर्य है कि इसमें अपनी स्थिरताका त्याग है। कारण कि तत्त्व स्थिर, अचल है और उस स्थिरताका त्याग ही कर्म है।
भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म ही आदि कर्म है, जिससे कर्माकी परम्परा चली है। अतः 'कर्म' के अन्तर्गत तीन प्रकारके कर्म आते हैं—(१) सृष्टिकी रचना (२) क्रियामात्र, जो फलजनक नहीं होती और (३) पाप-पुण्य (शुभाशुभ कर्म), जो फलजनक होते हैं।
भगवान्का सृष्टि-रचनारूप कर्म वास्तवमें 'अकर्म' ही है। भगवान्ने कहा भी है—'तस्य कर्तारमपि मां विद्धव्यकर्तारमव्ययम् ' (गीता ४।१३) 'उस सृष्टि-रचनाका कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान।'
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभूतां वर ॥ ४ ॥
देहभूताम्, वर= हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! क्षरः = क्षर भावः = भाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ | अधिभूतम् = अधिभूत है, पुरुषः = पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अधिदैवतम् = अधिदैव है च = और | अत्र = इस देहे = देहमें (अन्तर्धामीरूपसे) अहम् = मैं एव = ही अधियज्ञः = अधियज्ञ हूँ। ---|---|---
व्याख्या—'अधिभूतं क्षरो भावः' —पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पंचमहाभूतोंसे बनी प्रतिक्षण परिवर्तनशील और नाशवान् सृष्टिको अधिभूत कहते हैं। 'पुरुषश्चाधिदैवतम्' —यहाँ 'अधिदैवत' (अधिदैव) पद आदिपुरुष हिरण्यगर्भ ब्रह्माका वाचक है। महासर्गके आदिमें भगवान्के संकल्पसे सबसे पहले ब्रह्माजी ही प्रकट होते हैं और फिर वे ही सर्गके आदिमें सब सृष्टिकी रचना करते हैं।
१-जैसे कर्म करते-करते थकावट होती है तो कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके ज्यों-के-त्यों रहते हुए ही प्राणियोंको नींद आ जाती है। नींदमें विश्राम पानेसे थकावट दूर होती है और कर्म करनेके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें ताजगी आती है, सामर्थ्य आती है। इसी रीतिसे प्राणी कर्तृत्वाभिमान, कर्मफलसक्ति और संचित कर्मके सहित प्रलयमें सूक्ष्म प्रकृतिमें और महाप्रलयमें कारण प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। उन लीन हुए प्राणियोंके संचित कर्म विश्राम पाकर—परिपक्व होकर अर्थात् प्रारब्धरूप होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं। तब भगवान्का संकल्प होता है और उस संकल्पसे प्राणियोंका जन्मारम्भक कर्मके साथ विशेषतासे सम्बन्ध जुड़ जानेका नाम ही 'कर्म' है।
२-'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्' (गीता ४।१३), 'कल्यादी विमुजाम्यहम्' (१।७), विमुजामि पुनः पुनः' (१।८), 'अहं बीजप्रदः पिता' (१४।४)।
५८२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
‘अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर’—हे देहधारियोंमें
श्रेष्ठ अर्जुन! इस देहमें अधियज्ञ मैं ही हूँ अर्थात् इस
मनुष्यशरीरमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही हूँ। भगवान्ने गीतामें
‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ (१३।१७), ‘सर्वस्य चाहं हृदि
संनिविष्ट:’ (१५।१५), ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन
तिष्ठति’ (१८।६१) आदिमें अपनेको अन्तर्यामीरूपसे
सबके हृदयमें विराजमान बताया है।
‘अहमेव अत्र२ देहे’ कहनेका तात्पर्य है कि दूसरी
योनियोंमें तो पूर्वकृत कर्मोंका भोग होता है, नये कर्म नहीं
बनते, पर इस मनुष्यशरीरमें नये कर्म भी बनते हैं। उन
कर्मोंके प्रेरक अन्तर्यामी भगवान् होते हैं३। जहाँ मनुष्य
राग-द्वेष नहीं करता उसके सब कर्म भगवान्की प्रेरणाके
अनुसार शुद्ध होते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते और
जहाँ वह राग-द्वेषके कारण भगवान्की प्रेरणाके अनुसार
कर्म नहीं करता, उसके कर्म बन्धनकारक होते हैं। कारण
कि राग और द्वेष मनुष्यके महान् शत्रु हैं (गीता—तीसरे
अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि
भगवान्की प्रेरणासे कभी निषिद्ध-कर्म होते ही नहीं। श्रुति
और स्मृति भगवान्की आज्ञा है—‘श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे।’
अतः भगवान् श्रुति और स्मृतिके विरुद्ध प्रेरणा कैसे कर
सकते हैं? नहीं कर सकते। निषिद्ध-कर्म तो मनुष्य
कामनाके वशीभूत होकर ही करता है (गीता—तीसरे
अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। अगर मनुष्य कामनाके
वशीभूत न हो, तो उसके द्वारा स्वाभाविक ही विहित कर्म
होंगे, जिनको अठारहवें अध्यायमें सहज, स्वभावियत कर्म
नामसे कहा गया है।
यहाँ अर्जुनके लिये ‘देहभृतां वर’ कहनेका तात्पर्य है
कि देहधारियोंमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है, जो ‘इस देहमें
परमात्मा हैं’—ऐसा जान लेता है। ऐसा ज्ञान न हो, तो भी
ऐसा मान ले कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके कण-
कणमें परमात्मा हैं और उनका अनुभव करना ही मनुष्य-
जन्मका खास ध्येय है। इस ध्येयकी सिद्धिके लिये
परमात्माकी आज्ञाके अनुसार ही काम करना है।
तीसरे और चौथे श्लोकमें जो ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म,
अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका वर्णन हुआ है, उसे
समझनेमात्रके लिये जलका एक दृष्टान्त दिया जाता है।
जैसे, जब आकाश स्वच्छ होता है, तब हमारे और सूर्यके
मध्यमें कोई पदार्थ न दीखनेपर भी वास्तवमें वहाँ परमाणुरूपसे
जल-तत्त्व रहता है। वही जल-तत्त्व भाप बनता और
भापके घनीभूत होनेपर बादल बनता है। बादलमें जो
जलकण रहते हैं, उनके मिलनेसे बूँदें बन जाती हैं। उन
बूँदोंमें जब ठण्डकके संयोगसे घनता आ जाती है, तब वे
ही बूँदें ओले (बर्फ) बन जाती हैं—यह जल-तत्त्वका
बहुत स्थूल रूप हुआ। ऐसे ही निर्गुण-निराकार ‘ब्रह्म’
परमाणुरूपसे जल-तत्त्व है, ‘अधियज्ञ’ (व्यापक विष्णु)
भापरूपसे जल है; ‘अधिदैव’ (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) बादलरूपसे
जल है, ‘अध्यात्म’ (अनन्त जीव) बूँदें-रूपसे जल है,
‘कर्म’ (सृष्टि-रचनारूप कर्म) वर्षाकी क्रिया है और
‘अधिभूत’ (भौतिक सृष्टिमात्र) बर्फरूपसे जल है।
इस वर्णनका तात्पर्य यह हुआ कि जैसे एक ही जल
परमाणु, भाप, बादल, वर्षाकी क्रिया, बूँदें और ओले-
(बर्फ-) के रूपसे भिन्न-भिन्न दीखता है, पर वास्तवमें
है एक ही। इसी प्रकार एक ही परमात्मतत्त्व ब्रह्म,
अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके रूपसे
भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः एक ही है। इसीको
सातवें अध्यायमें ‘समग्रम्’ (७।१) और ‘वासुदेव:
सर्वम्’ (७।१९) कहा गया है।
तात्त्विक दृष्टिसे तो सब कुछ वासुदेव ही है
(सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें भी जब
विवेक-दृष्टिसे देखते हैं, तब शरीर-शरीरी, प्रकृति-
पुरुष—ऐसे दो भेद हो जाते हैं। उपासनाकी दृष्टिसे देखते
हैं तो उपास्य (परमात्मा), उपासक (जीव) और त्याज्य
१-यहाँ इस मनुष्य-शरीरमें कहनेका तात्पर्य है कि इसमें भगवान्की प्रेरणाको समझनेकी, स्वीकार करनेकी और उसके
अनुसार आचरण करके तत्त्वको प्राप्त करनेकी सामर्थ्य है। अन्य शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे परमात्माके रहते हुए भी उन प्राणियोंमें
उस तत्त्वकी तरफ दृष्टि डालनेकी सामर्थ्य नहीं है और मनुष्यशरीरमें जो विवेक प्राप्त है, वह विवेक उन शरीरोंमें जाग्रत् नहीं
है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस शरीरके रहते-रहते उस तत्त्वको प्राप्त कर ले। इस दुर्लभ अवसरको व्यर्थ न जाने दे।
२-दूसरे श्लोकमें तो ‘अत्र’ पद प्रकरणके लिये आया है, तथा ‘अस्मिन्’ पद देहके लिये आया है, पर यहाँ ‘अत्र’ पद
देहके लिये ही आया है। कारण कि अर्जुनने प्रश्नमें ‘अत्र’ पद देकर प्रकरणका संकेत कर दिया है, इसलिये अब उसका
उत्तर देते हुए प्रकरणके लिये ‘अत्र’ पद देनेकी जरूरत नहीं है।
३-कर्मोंकी प्रेरणा भगवान् मनुष्यके स्वभावके अनुसार करते हैं। यदि स्वभावमें राग-द्वेष है तो उस राग-द्वेषके वशीभूत
होना अथवा न होना मनुष्यके हाथमें है। वह शास्त्र, सन्त तथा भगवान्का आश्रय लेकर अपने स्वभावको बदल सकता है।
श्लोक ४ ]
- साधक-संजीवनी *
५८३
(प्रकृतिका कार्य—संसार)—ये तीन भेद हो जाते हैं। इन तीनोंको समझनेके लिये यहाँ इनके छः भेद किये गये हैं— परमात्माके दो भेद—ब्रह्म (निर्गुण) और अधियज्ञ (सगुण)।
जीवके दो भेद—अध्यात्म (सामान्य जीव, जो कि बद्ध हैं) और अधिदैव (कारक पुरुष, जो कि मुक्त हैं)। संसारके दो भेद—कर्म (जो कि परिवर्तनका पुंज है) और अधिभूत (जो कि पदार्थ हैं)।
विशेष बात
(१)
सब संसारमें परमात्मा व्याप्त हैं—‘मया तत्मिदं सर्वम्’ (९।१४), ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (१८।४६); सब संसार परमात्मामें हैं—‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्’ (७।७); सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९); सब संसार परमात्माका है—‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुवे च’ (९।२४), ‘भोक्तां यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्’ (५।२९)—इस प्रकार गीतामें भगवान्के तरह-तरहके वचन आते हैं। इन सबका सामंजस्य कैसे हो? सबकी संगति कैसे बैठे? इसपर विचार किया जाता है।
संसारमें परमात्मप्राप्तिके लिये, अपने कल्याणके लिये साधना करनेवाले जितने भी साधक* हैं, वे सभी संसारसे छूटना चाहते हैं और परमात्माको प्राप्त करना चाहते हैं। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे सदा रहनेवाली शान्ति और सुख नहीं मिल सकता, प्रत्युत सदा अशान्ति और दुःख ही मिलता रहता है—ऐसा मनुष्योंका प्रत्यक्ष अनुभव है। परमात्मा अनन्त आनन्दके स्वरूप हैं, वहाँ दुःखका लेश भी नहीं है—ऐसा शास्त्रोंका कथन है और सन्तोका अनुभव है।
अब विचार यह करना है कि साधकको संसार तो
प्रत्यक्षरूपसे दीखता है और परमात्माको वह केवल मानता है; क्योंकि परमात्मा प्रत्यक्ष दीखते नहीं। शास्त्र और सन्त कहते हैं कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’ इसको मानकर साधक साधन करता है। उस साधनामें जबतक संसारकी मुख्यता रहती है, तबतक परमात्माकी मान्यता गौण रहती है। साधन करते-करते ज्यों-ज्यों परमात्माकी धारणा (मान्यता) मुख्य होती चली जाती है, त्यों-ही-त्यों संसारकी मान्यता गौण होती चली जाती है। परमात्माकी धारणा सर्वथा मुख्य होनेपर साधकको यह स्पष्ट दीखने लग जाता है कि संसार पहले नहीं था और फिर बादमें नहीं रहेगा तथा वर्तमानमें जो ‘है’ रूपसे दीखता है, वह भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। जब संसार नहीं था, तब भी परमात्मा थे; जब संसार नहीं रहेगा, तब भी परमात्मा रहेंगे और वर्तमानमें संसारके प्रतिक्षण अभावमें जाते हुए भी परमात्मा ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। तात्पर्य है कि संसारका सदा अभाव है और परमात्माका सदा भाव है। इस तरह जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब सत्यस्वरूपसे ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा वास्तविक अनुभव हो जाता है, जिसके होनेसे साधक ‘सिद्ध’ कहा जाता है। कारण कि ‘संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है’—ऐसी मान्यता संसारकी सत्ता
- सदा रहनेवाली शान्ति और अनन्त सुख मिले, जिसमें अशान्ति और दुःखका लेश भी न हो—ऐसा विचार करनेवाले ‘साधक’ होते हैं। परन्तु जो संसारमें ही रहना चाहते हैं, संसारसे ही सुख लेना चाहते हैं, सांसारिक संग्रह और भोगोंमें ही लगे रहना चाहते हैं और संसारके सुख-दुःखको भोगते रहते हैं, वे साधक नहीं होते, प्रत्युत ‘संसारी’ होते हैं। वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े रहते हैं।
५८४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
माननेसे ही होती थी और संसारकी सत्ता साधकके रागके कारण ही दीखती थी। तत्त्वतः सब कुछ परमात्मा ही हैं।
(२)
सत् और असत् सब परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहम्’ (१।१९), परमात्मा न सत् कहे जा सकते हैं और न असत् कहे जा सकते हैं—‘न सत्तनासदुच्यते’ (१३।१२); परमात्मा सत् भी हैं; असत् भी हैं और सत्-असत् दोनोंसे परे भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)। इस प्रकार गीतामें भिन्न-भिन्न वचन आते हैं। अब उनकी संगतिके विषयमें विचार किया जाता है।
परमात्मतत्त्व अत्यन्त अलौकिक और विलक्षण है। उस तत्त्वका वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। उस तत्त्वको इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि नहीं पकड़ सकते अर्थात् वह तत्त्व इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिकी परिधिमें नहीं आता। हाँ, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि उसमें विलीन हो सकते हैं। साधक उस तत्त्वमें स्वयं लीन हो सकता है, उसको प्राप्त कर सकता है, पर उस तत्त्वको अपने कब्जेमें, अपने अधिकारमें, अपनी सीमामें नहीं ले सकता।
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधक दो तरहके होते हैं—एक विवेकप्रधान और एक श्रद्धाप्रधान अर्थात् एक मस्तिष्कप्रधान होता है और एक हृदयप्रधान होता है। विवेकप्रधान साधकके भीतर विवेककी अर्थात् जाननेकी मुख्यता रहती है और श्रद्धाप्रधान साधकके भीतर माननेकी मुख्यता रहती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विवेक-प्रधान साधकमें श्रद्धा नहीं रहती और श्रद्धाप्रधान साधकमें विवेक नहीं रहता, प्रत्युत यह तात्पर्य है कि विवेकप्रधान साधकमें विवेककी मुख्यता और साथमें श्रद्धा रहती है, तथा श्रद्धाप्रधान साधकमें श्रद्धाकी मुख्यता और साथमें विवेक रहता है। दूसरे शब्दोंमें, जाननेवालोंमें मानना भी रहता है और माननेवालोंमें जानना भी रहता है। जाननेवाले जानकर मान लेते हैं और माननेवाले मानकर जान लेते हैं। अतः किसी भी तरहके साधकमें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं रहती।
साधक चाहे विवेकप्रधान हो, चाहे श्रद्धाप्रधान हो, पर साधनमें उसकी अपनी रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यताकी प्रधानता रहती है। रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यता एक साधनमें होनेसे साधक उस तत्त्वको जल्दी
समझता है। परन्तु रुचि और श्रद्धा-विश्वास होनेपर भी वैसी योग्यता न हो अथवा योग्यता होनेपर भी वैसी रुचि और श्रद्धा-विश्वास न हो, तो साधकको उस साधनमें कठिनाता पड़ती है। रुचि होनेसे मन स्वाभाविक लग जाता है, श्रद्धा-विश्वास होनेसे बुद्धि स्वाभाविक लग जाती है और योग्यता होनेसे बात ठीक समझमें आ जाती है।
विवेकप्रधान साधक निर्गुण-निराकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि निर्गुण-निराकारमें होती है। श्रद्धाप्रधान साधक सगुण-साकारको पसंद करता है अर्थात् उसकी रुचि सगुण-साकारमें होती है। जो निर्गुण-निराकारको पसंद करता है, वह यह कहता है कि परमात्मतत्त्व न सत् कहा जा सकता है और न असत् कहा जा सकता है। जो सगुण-साकारको पसंद करता है वह कहता है कि परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और सत्-असत्से परे भी हैं।
तात्पर्य यह हुआ कि चिन्मय-तत्त्व तो हरदम ज्यों-का-त्यों ही रहता है और जड़, असत् कहलानेवाला संसार निरन्तर बदलता रहता है। जब यह चेतन जीव बदलते हुए संसारको महत्त्व देता है, उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब यह जन्म-मरणके चक्करमें घूमता रहता है। परन्तु जब यह जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब इसको स्वतःसिद्ध चिन्मय-तत्त्वका अनुभव हो जाता है। विवेकप्रधान साधक विवेक-विचारके द्वारा जड़ताका त्याग करता है। जड़ताका त्याग होनेपर चिन्मय-तत्त्व अवशेष रहता है अर्थात् नित्यप्राप्त तत्त्वका अनुभव हो जाता है। श्रद्धाप्रधान साधक केवल भगवान्के ही सम्मुख हो जाता है, जिससे वह जड़तासे विमुख होकर भगवान्को प्रेमपूर्वक प्राप्त कर लेता है। विवेकप्रधान साधक तो सम, शान्त, सत्-घन, चित्-घन, आनन्द-घन तत्त्वमें अटल स्थित होकर अखण्ड आनन्दको प्राप्त होता है; पर श्रद्धाप्रधान साधक भगवान्के साथ अभिन्न होकर प्रेमके अनन्त, प्रतिक्षण वर्धमान आनन्दको प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार दोनों ही साधकोंको जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक चिन्मय-तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है और ‘सत्-असत् अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही हैं’—ऐसा अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —परिवर्तनशील एवं नाशवान् क्रिया और पदार्थमात्र ‘क्षरभाव’ हैं, जो भगवान्की अपरा प्रकृति है। ज्ञानमें ब्रह्मके साथ एकता होती है और प्रेममें अन्तर्यामी भगवान्के साथ अभिन्नता होती है। भगवान्ने यहाँ अन्तर्यामी-(अधिष्ठित-) को अपना स्वरूप बताया है। अतः ब्रह्म तो विशेषण है और अन्तर्यामी विशेष्य हैं—‘ब्रह्मणो
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
५८५
हि प्रतिष्ठाहम्' (गीता १४।२७)। तात्पर्य है कि जिसको गीताने 'समग्र' कहा है, वह सबका रचयिता और नियन्ता अन्तर््यामी में ही हूँ। इसी अन्तर््यामीको चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें 'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्नाथं दधाम्यहम्' और 'अहं बीजप्रदः पिता' पदोंमें 'अहम्' शब्दसे कहा गया है। गीतामें ब्रह्मके लिये कहा है—'न सत्तन्नासदुच्यते' (१३।१२) और समग्र भगवान्के लिये कहा है—'सदसच्चाहम्' (९।१९), 'सदसत्तत्परं यत्' (११।३७)।
सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें अर्जुनका सातवाँ प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥
| यः | = जो मनुष्य | मुक्त्वा | = छोड़कर | याति | = प्राप्त |
|---|---|---|---|---|---|
| अन्तकाले | = अन्तकालमें | प्रयाति | = जाता है, | होता है, | |
| च | = भी | सः | = वह | अत्र | = इसमें |
| माम् | = मेरा | मद्भावम् | = मेरे | संशयः | = सन्देह |
| स्मरन् | = स्मरण करते हुए | स्वरूपको | न | = नहीं | |
| कलेवरम् | = शरीर | एव | = ही | अस्ति | = है। |
व्याख्या— 'अन्तकाले च * मामेव ..... याति नास्त्यत्र संशयः'—'अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए जो शरीर छोड़कर जाता है'—इसका तात्पर्य हुआ कि इस मनुष्यको जीवनमें साधन-भजन करके अपना उद्धार करनेका अवसर दिया था, पर इसने कुछ किया ही नहीं। अब बेचारा यह मनुष्य अन्तकालमें दूसरा साधन करनेमें असमर्थ है, इसलिये बस, मेरेको याद कर ले तो इसको मेरी प्राप्ति हो जायगी।
'मामेव स्मरन्' का तात्पर्य है कि सुनने, समझने और माननेमें जो कुछ आता है, वह सब मेरा समग्ररूप है। अतः जो उसको मेरा ही स्वरूप मानेगा उसको अन्तकालमें भी मेरा ही चिन्तन होगा अर्थात् उसने जब सब कुछ मेरा ही स्वरूप मान लिया तो अन्तकालमें उसको जो कुछ याद आयेगा, वह मेरा ही स्वरूप होगा, इसलिये वह स्मरण मेरा ही होगा। मेरा स्मरण होनेसे उसको मेरी ही प्राप्ति होगी।
'मद्भावम्' कहनेका तात्पर्य है कि साधकने मेरेको जिस-किसी भिन्न अथवा अभिन्न भावसे अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज-चतुर्भुज तथा नाम, लीला, धाम, रूप आदिसे स्वीकार किया है, मेरी उपासना की है, अन्तसमयके स्मरणके अनुसार वह मेरे उसी भावको
प्राप्त होता है।
जो भगवान्की उपासना करते हैं, वे तो अन्तसमयमें उपास्यका स्मरण होनेसे उसी उपास्यको अर्थात् भगवद्भावको प्राप्त होते हैं। परन्तु जो उपासना नहीं करते, उनको भी अन्तसमयमें किसी कारणवशात् भगवान्के किसी नाम, रूप, लीला, धाम आदिका स्मरण हो जाय, तो वे भी उन उपासकोंकी तरह उसी भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं। तात्पर्य है कि जैसे गुणोंमें स्थित रहनेवालेकी (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और अन्तकालमें जिस-किसी गुणके बढ़नेवालेकी वैसी ही गति होती है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक), ऐसे ही जिसको अन्तमें भगवान् याद आ जाते हैं, उसकी भी उपासकोंकी तरह गति होती है अर्थात् भगवान्की प्राप्ति होती है।
भगवान्के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि अनेक रूपोंका और नाम, लीला, धाम आदिका भेद तो साधकोंकी दृष्टिसे है, अन्तमें सब एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सब एक 'मद्भाव'—भगवद्भावको प्राप्त हो जाते हैं; क्योंकि भगवान्का समग्र स्वरूप एक ही है। परन्तु गुणोंके अनुसार गतिको प्राप्त होनेवाले अन्तमें एक नहीं हो सकते; क्योंकि
- यहाँ 'च' अव्ययका अर्थ 'अपि' अर्थात् 'भी' है।
५८६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) अलग-अलग हैं। अतः गुणोंके अनुसार उनकी गतियाँ भी अलग-अलग होती हैं। भगवान्का स्मरण करके शरीर छोड़नेवालोंका तो भगवान्के साथ सम्बन्ध रहता है और गुणोंके अनुसार शरीर छोड़नेवालोंका गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है। इसलिये अन्तमें भगवान्का स्मरण करनेवाले भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् भगवान्को प्राप्त हो जाते हैं और गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाले गुणोंके सम्मुख हो जाते हैं अर्थात् गुणोंके कार्य जन्म-मरणको प्राप्त हो जाते हैं।
भगवान्ने एक यह विशेष छूट दी हुई है कि मरणासन्न व्यक्तिके कैसे ही आचरण रहे हों, कैसे ही भाव रहे हों, किसी भी तरहका जीवन बीता हो, पर अन्तकालमें वह भगवान्को याद कर ले तो उसका कल्याण हो जायगा। कारण कि भगवान्ने जीवका कल्याण करनेके लिये ही उसको मनुष्यशरीर दिया है और जीवने उस मनुष्यशरीरको स्वीकार किया है। अतः जीवका कल्याण हो जाय, तभी भगवान्का इस जीवको मनुष्यशरीर देना और जीवका मनुष्यशरीर लेना सफल होगा। परन्तु वह अपना उद्धार किये बिना ही आज दुनियासे विदा हो रहा है, इसके लिये भगवान् कहते हैं कि 'भैया! तेरी और मेरी दोनोंकी इज्जत रह जाय, इसलिये अब जाते-जाते (अन्तकालमें) भी तू मेरेको याद कर ले तो तेरा कल्याण हो जाय।' अतः हरक मनुष्यके लिये सावधान होनेकी जरूरत है कि वह सब समयमें भगवान्का स्मरण करे, कोई समय खाली न जाने दे; क्योंकि अन्तकालका पता नहीं है कि कब आ जाय। वास्तवमें सब समय अन्तकाल ही है। यह बात तो है नहीं कि इतने वर्ष, इतने महीने और इतने दिनोंके बाद मृत्यु होगी। देखनेमें तो यही आता है कि गर्भमें ही कई बालक मर जाते हैं, कई जन्मते ही मर जाते हैं, कई कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें मर जाते हैं। इस प्रकार मरनेकी चाल हरदम चल ही रही है। अतः सब समयमें भगवान्को याद रखना चाहिये और यही समझना चाहिये कि बस, यही अन्तकाल है! नीतिमें यह बात आती है कि अगर धर्मका आचरण करना हो, कल्याण करना हो तो मृत्युने मेरे केश पकड़े हुए हैं; झटका दिया कि खत्म! ऐसा विचार हरदम
रहना चाहिये—'गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।' भगवान्की उपर्युक्त छूटसे मनुष्यमात्रको विशेष लाभ लेना चाहिये। कहीं कोई भी व्याधिग्रस्त, मरणासन्न व्यक्ति हो तो उसके इष्टके चित्र या मूर्तिको उसे दिखाना चाहिये; जैसी उसकी उपासना है और जिस भगवन्नाममें उसकी रुचि हो, जिसका वह जप करता हो, वही भगवन्नाम उसको सुनाना चाहिये; जिस स्वरूपमें उसकी श्रद्धा और विश्वास हो, उसकी याद दिलानी चाहिये; भगवान्की महिमाका वर्णन करना चाहिये; गीताके श्लोक सुनाने चाहिये। अगर वह बेहोश हो जाय तो उसके पास भगवन्नामका जप-कीर्तन करना चाहिये, जिससे उस मरणासन्न व्यक्तिके सामने भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल बना रहे। भगवत्सम्बन्धी वायुमण्डल रहनेसे वहाँ यमराजके दूत नहीं आ सकते। अजामिलके द्वारा मृत्युके समय 'नारायण' नामका उच्चारण करनेसे वहाँ भगवान्के पार्षद आ गये और यमदूत भागकर यमराजके पासमें गये, तो यमराजने अपने दूतोंसे कहा कि 'जहाँ भगवन्नामका जप, कीर्तन, कथा आदि होते हों, वहाँ तुमलोग कभी मत जाना; क्योंकि वहाँ हमारा राज्य नहीं है।' ऐसा कहकर यमराजने भगवान्का स्मरण करके भगवान्से क्षमा माँगी कि 'मेरे दूतोंके द्वारा जो अपराध हुआ है, उसको आप क्षमा करें।'।
अन्तकालमें स्मरणका तात्पर्य है कि उसने भगवान्का जो स्वरूप मान रखा है, उसकी याद आ जाय अर्थात् उसने पहले राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, सर्वव्यापक विश्वरूप परमात्मा आदिमेंसे जिस स्वरूपको मान रखा है, उस स्वरूपके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण, प्रभाव आदिकी याद आ जाय। उसकी याद करते हुए शरीरको छोड़कर जानेसे वह भगवान्को ही प्राप्त होता है। कारण कि भगवान्की याद आनेसे 'मैं' शरीर हूँ और शरीर 'मेरा' है—इसकी याद नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान्को ही याद करते हुए शरीर छूट जाता है। इसलिये उसके लिये भगवान्को प्राप्त होनेके अतिरिक्त और कोई गुंजाइश ही नहीं है।
यहाँ शंका होती है कि जिस व्यक्तिने उग्रभरमें भजन-स्मरण नहीं किया, कोई साधन नहीं किया, सर्वथा
१-एवं विमूष्य सुधियो भगवत्यनन्ते सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्।
ते मे न दण्डमहँत्यथ यद्यमीषां स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरगायवादः ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।२६)
२-तत्क्षम्यात् स भगवान् पुरुषः पुराणो नारायणः स्वपुरुषैर्यदसक्तुर्न नः।
स्वानामहो न विदुषां रचितान्जलीनां क्षान्तिर्गीरीयसि नमः पुरुषाय भूमे ॥ (श्रीमद्भा० ६।३।३०)
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
५८७
भगवान्से विमुख रहा, उसको अन्तकालमें भगवान्का स्मरण कैसे होगा और उसका कल्याण कैसे होगा? इसका समाधान है कि अन्तसमयमें उसपर भगवान्की कोई विशेष कृपा हो जाय अथवा उसको किसी सन्तके दर्शन हो जायें तो भगवान्का स्मरण होकर उसका कल्याण हो जाता है। उसके कल्याणके लिये कोई साधक उसको भगवान्का नाम, लीला, चरित्र सुनाये, पद गाये तो भगवान्का स्मरण होनेसे उसका कल्याण हो जाता है। अगर मरणासन्न व्यक्तिको गीतामें रुचि हो तो उसको गीताका आठवाँ अध्याय सुनाना चाहिये; क्योंकि इस अध्यायमें जीवकी सदगंतिका विशेषतासे वर्णन आया है। इसको सुननेसे उसको भगवान्की स्मृति हो जाती है। कारण कि वास्तवमें परमात्माका ही अंश होनेसे उसका परमात्माके साथ स्वतः सम्बन्ध है ही। अगर अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी आदि किसी तीर्थस्थलमें उसके प्राण छूट जायें तो उस तीर्थके प्रभावसे उसको भगवान्की स्मृति हो जायगी१। ऐसे ही जिस जगह भगवान्के नामका जप, कीर्तन, कथा, सत्संग आदि होता है, उस जगह उसकी मृत्यु हो जाय तो वहाँके पवित्र वायुमण्डलके प्रभावसे उसको भगवान्की स्मृति हो सकती है। अन्तकालमें कोई भयंकर स्थिति आनेसे भयभीत होनेपर भी भगवान्की याद आ सकती है। शरीर छूटते समय शरीर, कुटुम्ब, रूपये आदिकी आशा-ममता छूट जाय और यह भाव हो जाय कि 'हे नाथ! आपके बिना मेरा कोई नहीं है, केवल आप ही मेरे हैं' तो भगवान्की स्मृति होनेसे कल्याण हो जाता है। ऐसे ही किसी कारणसे अचानक अपने कल्याणका भाव बन जाय, तो भी कल्याण हो सकता है। ऐसे ही कोई साधक किसी प्राणी, जीव-जन्तुके मृत्युसमयमें 'उसका कल्याण हो जाय' इस भावसे उसको भगवन्नाम सुनाता है, तो उस भगवन्नामके
प्रभावसे उस प्राणीका कल्याण हो जाता है। शास्त्रोंमें तो सन्त-महापुरुषोंके प्रभावकी विचित्र बातें आती हैं कि यदि सन्त-महापुरुष किसी मरणासन्न व्यक्तिको देख लें अथवा उसके मृत शरीर-(मुर्दे-) को देख लें अथवा उसकी चिताके धुएँको देख लें अथवा चिताकी भस्मको देख लें, तो भी उस जीवका कल्याण हो जाता है२!
मार्मिक बात
इस अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें ब्रह्म, अध्यात्म आदि जिन छः बातोंका वर्णन किया गया है, उसका तात्पर्य समग्ररूपसे है; और समग्ररूपका तात्पर्य है—'वासुदेवः सर्वम्' अर्थात् सब कुछ वासुदेव ही है। जिसको समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसके लिये अन्तकालके स्मरणकी बात ही नहीं की जा सकती। कारण कि जिसकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न होकर सब कुछ वासुदेव ही है, उसके लिये 'अन्तकालमें भगवान्का चिन्तन करें' यह कहना ही नहीं बनता। जैसे सामान्य मनुष्यको 'मैं हूँ' इस अपने होनेपनका किंचिन्मात्र भी स्मरण नहीं करना पड़ता, ऐसे ही उस महापुरुषको भगवान्का स्मरण नहीं करना पड़ता, प्रत्युत उसको जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें भगवान्के होनेपनका स्वाभाविक अटल ज्ञान रहता है।
पवित्र-से-पवित्र अथवा अपवित्र-से-अपवित्र किसी भी देशमें; उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष, दिन-रात्रि, प्रातः-सायं आदि किसी भी कालमें; जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूच्छा, रूग्णाता, नीरोगता आदि किसी भी अवस्थामें; और पवित्र अथवा अपवित्र कोई भी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदि सामने होनेपर भी उस महापुरुषके कल्याणमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता!
उपर्युक्त महापुरुषोंके सिवाय परमात्माकी उपासना
१-अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका। पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
(नारदपुराण, पूर्व० २७। ३५)
२-एक बार एक सज्जन गंगाजीसे होकर आये थे और सबको गंगाजलका आचमन दे रहे थे। वहाँ एक व्यक्ति खड़ा था; उसको जब वे आचमन देने लगे तो उसने कहा—मेरे पाप बहुत हैं, मेरी जानकारीमें मैंने बहुत पाप किये हैं, इसलिये इतने थोड़े गंगाजलसे मेरे पाप कैसे कट जायेंगे? मेरा कल्याण कैसे हो जायगा? तो उससे पूछा—कितना चाहिये? उसने कहा—लोटाभर दो। उस सज्जने उसे लोटाभर गंगाजल दे दिया। उसने उस लोटाभर गंगाजलको पी लिया और कहा—अब मेरे पाप नहीं रहेंगे! यह सब घटना वहाँके एक भाईने सुनी थी। बादमें उस भाईने बताया कि वह व्यक्ति जब मरा, तब उसके प्राण दसवें द्वारको फोड़कर निकले, अर्थात् उसका कल्याण हो गया।
३-महापातकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकैः। परं पदं प्रयान्त्येव महद्द्विरवलोकिताः॥
कलेवरं वा तद्दस्म तद्भूमं वापि सत्तम। यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परां गतिम्॥
(नारदपुराण, पूर्व० १। ७। ७४-७५)
५८८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
करनेवाले जितने भी साधक हैं, वे चाहे साकारके उपासक हों अथवा निराकारके उपासक हों; चाहे सगुणके उपासक हों अथवा निर्गुणके उपासक हों; चाहे राम, कृष्ण आदि अवतारोंके उपासक हों; भगवान्के किसी भी नाम, रूप, लीला, धाम आदिकी श्रद्धा-प्रेमपूर्वक उपासना करनेवाले क्यों न हों, उन सबको अपनी-अपनी रुचिके अनुसार अन्तसमयमें भगवान्के किसी भी स्वरूप, नाम आदिका स्मरण हो जाय, तो वह भगवान्का ही स्मरण है।
साधकोंके सिवाय जिन मनुष्योंमें ‘भगवान् हैं’ ऐसा सामान्य आस्तिक-भाव है और वे किसी उपासना-विशेषमें नहीं लगे हैं, उनको भी अन्तसमयमें कई कारणोंसे भगवान्का स्मरण हो सकता है। जैसे, जीवनमें उसने सुना
हुआ है कि दुःखोंके दुःखको भगवान् मिटाते हैं, इस संस्कारसे अन्तसमयकी पीड़ा-(दुःख-)के समय भगवान्की याद आ सकती है। अन्तसमयमें अगर यमदूत दिखायी दे जायँ, तो भयके कारण भगवान्का स्मरण हो सकता है। कोई सज्जन उसके सामने भगवान्का चित्र रख दे—उसको दिखा दे, उसको भगवन्नाम सुना दे, भगवान्की लीला-कथा सुना दे, भक्तोंके चरित्र सुना दे, उसके सामने कीर्तन करने लग जाय, तो उसको भगवान्की याद आ जायगी। इस प्रकार किसी भी कारणसे भगवान्की तरफ वृत्ति होनेसे वह स्मरण भगवान्का ही स्मरण है।
ऐसे साधक और सामान्य मनुष्योंके लिये ही अन्तकालमें भगवत्स्मरणकी बात कही जाती है, तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुषोंके लिये नहीं।
परिशिष्ट भाव —जो मनुष्य शरीरके रहते-रहते अपना उद्धार नहीं कर सका, वह यदि अन्तकालमें भी भगवान्का स्मरण करते हुए शरीर छोड़े तो वह भगवान्को ही प्राप्त होता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है। फिर जो सब समय भगवान्का स्मरण करता है, वह अन्तकालमें भगवान्का स्मरण करके भगवान्को प्राप्त हो जाय—इसमें तो कहना ही क्या है! भगवान्ने मनुष्यको (अपना उद्धार करनेकी) बहुत स्वतन्त्रता दी है, छूट दी है कि किसी तरहसे उसका कल्याण हो जाय। यह भगवान्की मनुष्यपर बहुत विशेष कृपा है!
सम्बन्ध—अन्तकालमें जो मेरा स्मरण करते हैं, वे तो मेरेको ही प्राप्त होते हैं, पर जो मेरा स्मरण न करके अन्य किसीका स्मरण करते हैं, वे किसको प्राप्त होते हैं—इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
कौन्तेय | = हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! | स्मरन् | = स्मरण करते हुए | होता हुआ ---|---|---|---|--- अन्ते | = (मनुष्य) अन्तकालमें | कलेवरम् | = शरीर | तम्, तम् | = उस-उसको यम्, यम्, | = जिस-जिस | त्यजति | = छोड़ता है | एव | = ही वा, अपि | = भी | सदा, | | एति | = प्राप्त होता है भावम् | = भावका | तद्भावभावितः | = वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित | | अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।
व्याख्या —‘यं यं वापि स्मरन्भावं ..... सदा तद्भावभावितः’—भगवान्ने इस नियममें दयासे भरी हुई एक विलक्षण बात बतायी है कि अन्तिम चिन्तनके अनुसार मनुष्यको उस-उस योनिकी प्राप्ति होती है जब यह नियम है, तो मेरी स्मृतिसे मेरी प्राप्ति होगी ही! परम दयालु भगवान्ने अपने लिये अलग कोई विशेष नियम नहीं बताया है, प्रत्युत सामान्य नियममें ही अपनेको शामिल कर
दिया है। भगवान्की दयाकी यह कितनी विलक्षणता है कि जितने मूल्यमें कुत्तेकी योनि मिले, उतने ही मूल्यमें भगवान् मिल जायँ!
‘सदा तद्भावभावितः’ का तात्पर्य है कि अन्तकालमें जिस भावका—जिस किसीका चिन्तन होता है, शरीर छोड़नेके बाद वह जीव जबतक दूसरा शरीर धारण नहीं कर लेता, तबतक वह उसी भावसे भावित रहता है अर्थात्
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
५८९
अन्तकालका चिन्तन (स्मरण) वैसा ही स्थायी बना रहता है। अन्तकालके उस चिन्तनके अनुसार ही उसका मानसिक शरीर बनता है और मानसिक शरीरके अनुसार ही वह दूसरा शरीर धारण करता है। कारण कि अन्तकालके चिन्तनको बदलनेके लिये वहाँ कोई मौका नहीं है, शक्ति नहीं है और बदलनेकी स्वतन्त्रता भी नहीं है तथा नया चिन्तन करनेका कोई अधिकार भी नहीं है। अतः वह उसी चिन्तनको लिये हुए उसीमें तल्लीन रहता है। फिर उसका जिस किसीके साथ कर्मोंका किंचित्मात्र भी सम्बन्ध रहता है, वायु, जल, खाद्य-पदार्थ आदिके द्वारा वह वहाँ पुरुष-जातिमें प्रविष्ट होता है। फिर पुरुष-जातिसे स्त्री-जातिमें जाकर समयपर जन्म लेता है। जैसे, कुत्तेका पालन करनेवाला कोई मनुष्य अन्तसमयमें कुत्तेको याद करते हुए शरीर छोड़ता है, तो उसका मानसिक शरीर कुत्तेका बन जाता है, जिससे वह क्रमशः कुत्ता ही बन जाता है अर्थात् कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है। इस तरह अन्तकालमें जिस किसीका स्मरण होता है, उसीके अनुसार जन्म लेना पड़ता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मकानको याद करते हुए शरीर छोड़नेसे मकान बन जायगा, धनको याद करते हुए शरीर छोड़नेसे धन बन जायगा आदि। प्रत्युत मकानका चिन्तन होनेसे वह उस मकानमें चूहा, छिपकली आदि बन जायगा और धनका चिन्तन होनेसे वह साँप बन जायगा आदि। तात्पर्य यह हुआ कि अन्तकालके चिन्तनका नियम सजीव प्राणियोंके लिये ही है, निर्जीव (जड़) पदार्थोंके लिये नहीं। अतः जड़ पदार्थका चिन्तन होनेसे वह उससे सम्बन्धित कोई सजीव प्राणी बन जायगा।
मनुष्येतर (पशु, पक्षी आदि) प्राणियोंको अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही अन्तकालमें स्मरण होता है और उसीके अनुसार उनका अगला जन्म होता है। इस तरह अन्तकालके स्मरणका कानून सब जगह लागू पड़ता है। परन्तु मनुष्यशरीरमें यह विशेषता है कि उसका अन्तकालका स्मरण कर्मोंके अधीन नहीं है, प्रत्युत पुरुषार्थके अधीन है। पुरुषार्थमें मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है। तभी तो अन्य योनियोंकी अपेक्षा इसकी अधिक महिमा है।
मनुष्य इस शरीरमें स्वतन्त्रतापूर्वक जिससे सम्बन्ध जोड़ लेता है, उस सम्बन्धके अनुसार ही उसका अन्य योनियोंमें जन्म हो सकता है। परन्तु अन्तकालमें अगर वह भगवान्का स्मरण कर ले तो उसके सारे सम्बन्ध टूट जाते हैं। कारण कि वे सब सम्बन्ध वास्तविक नहीं हैं, प्रत्युत
वर्तमानके बनाये हुए कृत्रिम हैं, जब कि भगवान्के साथ सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है, बनाया हुआ नहीं है। अतः भगवान्की याद आनेसे उसके सारे कृत्रिम सम्बन्ध टूट जाते हैं।
विशेष बात
(१)
दूसरे जन्मकी प्राप्ति अन्तकालमें हुए चिन्तनके अनुसार होती है। जिसका जैसा स्वभाव होता है, अन्तकालमें उसे प्रायः वैसा ही चिन्तन होता है। जैसे, जिसका कुत्ते पालनेका स्वभाव होता है, अन्तकालमें उसे कुत्तेका चिन्तन होता है। वह चिन्तन आकाशवाणी-केन्द्रके द्वारा प्रसारित (विशेष शक्तियुक्त) ध्वनिकी तरह सब जगह फैल जाता है। जैसे आकाशवाणी-केन्द्रके द्वारा प्रसारित ध्वनि रेडियोके द्वारा (किसी विशेष नंबरपर) पकड़में आ जाती है। ऐसे ही अन्तकालीन कुत्तेका चिन्तन सम्बन्धित कुत्तेके द्वारा (जिसके साथ कोई ऋणानुबन्ध अथवा कर्मों आदिका कोई-न-कोई सम्बन्ध है) पकड़में आ जाता है। फिर जीव सूक्ष्म और कारणशरीरको साथ लिये अन्न, जल, वायु (श्वास) आदिके द्वारा उस कुत्तेमें प्रविष्ट हो जाता है। फिर कृतियाँ प्रविष्ट होकर गर्भ बन जाता है और निश्चित समयपर कुत्तेके शरीरसे जन्म लेता है।
अन्तकालीन चिन्तन और उसके अनुसार गतिको एक दृष्टान्तके द्वारा समझा जा सकता है। एक आदमी फोटो खिंचवाने गया। जब वह फोटो खिंचवाने बैठा, तब फोटोग्राफरने उससे कहा कि फोटो खिंचते समय हिलना मत और मुसकराते रहना। जैसे ही फोटो खिंचनेका समय आया, उस आदमीको नाकपर एक मक्खी बैठ गयी। हाथसे मक्खीको भगाना ठीक न समझकर (कि कहीं फोटोमें वैसा न आ जाय) उसने अपनी नाकको सिकोड़ा। ठीक इसी समय उसकी फोटो खिंच गयी। उस आदमीने फोटोग्राफरसे फोटो माँगी, तो उसने कहा कि अभी फोटोको प्रत्यक्षरूपमें आनेमें कुछ समय लगेगा; आप अमुक दिन फोटो ले जाना। वह दिन आनेपर फोटोग्राफरने उसे फोटो दिखायी, तो उसमें (अपनी नाक सिकोड़े हुए) भदे रूपको देखकर वह आदमी बहुत नाराज हुआ कि तुमने फोटो बिगाड़ दी! फोटोग्राफरने कहा कि इसमें मेरी क्या गलती है? फोटो खिंचते समय आपने जैसी आकृति बनायी थी, वैसी ही फोटोमें आ गयी; अब तो फोटोमें परिवर्तन नहीं हो सकता।
५९०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
इसी तरह अन्तकालमें मनुष्यका जैसा चिन्तन होगा, वैसी ही योनि उसको प्राप्त होगी।
फोटो खिंचनेका समय तो पहलेसे ही मालूम रहता है, पर मृत्यु कब आ जाय—इसका हमें कुछ पता नहीं रहता। इसलिये अपने स्वभाव, चिन्तनको निर्मल बनाये रखते हुए हर समय सावधान रहना चाहिये और भगवान्का नित्य-निरन्तर स्मरण करते रहना चाहिये (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ और सातवाँ श्लोक)।
(२)
अन्तकालीन गतिके नियममें भगवान्की न्यायकारिता और दयालुता—ये दोनों ही भरी हुई हैं। साधारण दृष्टिसे न्याय और दया—दोनों परस्पर-विरुद्ध मालूम देते हैं। अगर न्याय करेंगे तो दया सिद्ध नहीं होगी और दया करेंगे तो न्याय सिद्ध नहीं होगा। कारण कि न्यायमें ठीक-ठीक निर्णय होता है, छूट नहीं होती और दयामें छूट होती है। परन्तु वास्तवमें यह विरोध सामान्य और क्रूर पुरुषके
बनाये हुए न्यायमें ही आ सकता है, भगवान्के बनाये हुए न्यायमें नहीं; क्योंकि भगवान् परम दयालु और प्राणिमात्रके सुदृढ़ हैं—‘सुदृढ सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। भगवान्के सभी न्याय, कानून दयासे परिपूर्ण होते हैं।
मनुष्य अन्तकालमें जैसा स्मरण करता है, उसीके अनुसार उसकी गति होती है। अगर कोई कुत्तेका चिन्तन करते हुए मरता है, तो क्रमशः कुत्ता ही बन जाता है। यह भगवान्का मनुष्यमात्रके प्रति लागू होनेवाला न्याय हुआ; क्योंकि भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दी है कि वह चाहे मेरा (भगवान्का) स्मरण करे, चाहे अन्यका स्मरण करे। इसलिये यह भगवान्का ‘न्याय’ है। जितने मूल्यमें कुत्तेकी योनि मिले, उतने ही मूल्यमें भगवान् मिल जायें—यह मनुष्यमात्रके प्रति भगवान्की ‘दया’ है। अगर मनुष्य भगवान्की इस न्यायकारिता और दयालुताकी तरफ खयाल करे, तो उसका भगवान्में आकर्षण हो जायगा।
परिशिष्ट भाव —सातवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने ‘यो यो यां यां तनुं भक्तः’ पदोंसे उपासनाके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बतायी थी, अब इस श्लोकमें गतिके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बताते हैं। तात्पर्य है कि अपनी उपासना और गतिके विषयमें मनुष्य स्वतन्त्र है* और उसमें भगवान् अपने दयालु स्वभावके कारण बाधक नहीं बनते, प्रत्युत उसकी सहायता करते हैं। मनुष्य ही मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके दुर्गतिमें चला जाता है।
यह मनुष्यशरीरकी महत्ता है कि वह जो चाहे, वही पा सकता है। ऐसा कोई दुर्लभ पद नहीं है, जो मनुष्यको न मिल सके। जिसमें लाभ-(सुख-)का तो कोई अन्त न हो और दुःखका लेश भी न हो, ऐसा पद मनुष्य प्राप्त कर सकता है (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। परन्तु भोग और संग्रहमें लगकर मनुष्य चौरासी लाख योनियोंमें और नरकोंमें चला जाता है! इसलिये भगवान् दुःखके साथ कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्तनि’ (९।३), ‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधमां गतिम्’ (१६।२०)।
मनुष्य अन्तकालमें जैसा चिन्तन करता है, वैसी ही उसकी गति होती है। इस विषयमें एक श्लोक आता है—
वासना यस्य यत्र स्यात् स तं स्वप्नेषु पश्यति। स्वप्नवन्मरणे ज्ञेयं वासना तु वपुर्नृणाम्॥
‘जिस मनुष्यकी जहाँ वासना होती है, उसी वासनाके अनुरूप वह स्वप्न देखता है। स्वप्नके समान ही मरण होता है अर्थात् वासनाके अनुरूप ही अन्तसमयमें चिन्तन होता है और उस चिन्तनके अनुसार ही मनुष्यकी गति होती है।’
तात्पर्य है कि मृत्युकालमें हम जैसा चाहें, वैसा चिन्तन नहीं कर सकते, प्रत्युत हमारे भीतर जैसी वासना होगी, वैसा ही चिन्तन स्वतः होगा और उसके अनुसार ही गति होगी। जिस वस्तुको हम सत्ता और महत्ता देते हैं, उससे सम्बन्ध जोड़ते हैं, उससे सुख लेते हैं, उसीकी वासना बनती है। अगर संसारमें सुखबुद्धि न हो तो संसारकी वासना नहीं बनेगी। वासना न बननेपर मृत्युकालमें जो भी चिन्तन होगा, भगवान्का ही चिन्तन होगा; क्योंकि सिद्धान्तसे सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’।
‘तं तमेवैति’—जिस तरह सुईके पीछे-पीछे (उसी मार्गसे) धागा जाता है, उसी तरह मनुष्य भी अन्तकालके भावके अनुसार उसी गतिमें जाता है।
- नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस, उत्तर १२१।५)
श्लोक [ ७ ]
- साधक-संजीवनी *
५११
सम्बन्ध—जब अन्तकालके स्मरणके अनुसार ही गति होती है, तो फिर अन्तकालमें भगवान्का स्मरण होनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मैवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥
| तस्मात् | = इसलिये (तू) | युध्य, च | = युद्ध भी कर। | असंशयम् | = निःसन्देह |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वेषु | = सब | मयि | = मुझमें | माम् | = मुझे |
| कालेषु | = समयमें | अर्पितमनो- | एव | = ही | |
| माम् | = मेरा | बुद्धिः | = मन और बुद्धि | एष्यसि | = प्राप्त होगा। |
| अनुस्मर | = स्मरण कर (और) | अर्पित करनेवाला (तू) |
व्याख्या—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’— यहाँ ‘सर्वेषु कालेषु’ पदोंका सम्बन्ध केवल स्मरणसे ही है, युद्धसे नहीं; क्योंकि युद्ध सब समयमें, निरन्तर हो ही नहीं सकता। कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं हो सकती, प्रत्युत समय-समयपर ही हो सकती है। कारण कि प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और समाप्ति होती है—यह बात सबके अनुभवकी है। परन्तु भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे भगवान्का स्मरण सब समयमें होता है; क्योंकि उद्देश्यकी जागृति हरदम रहती है।
सब समयमें स्मरण करनेके लिये कहनेका तात्पर्य है कि प्रत्येक कार्यमें समयका विभाग होता है, जैसे—यह समय सोनेका और यह समय जगनेका है, यह समय नित्यकर्मका है, यह समय जीविकाके लिये काम-धंधा करनेका है, यह समय भोजनका है, आदि-आदि। परन्तु भगवान्के स्मरणमें समयका विभाग नहीं होना चाहिये। भगवान्को तो सब समयमें ही याद रखना चाहिये।
‘युध्य च’ कहनेका तात्पर्य है कि यहाँ अर्जुनके सामने युद्धरूप कर्तव्य-कर्म है, जो उनको स्वतः प्राप्त हुआ है—‘यदुच्छथा चोपपन्नम् ’ (गीता २।३२)। ऐसे ही मनुष्यको कर्तव्यरूपसे जो प्राप्त हो जाय, उसको भगवान्का स्मरण करते हुए करना चाहिये। परन्तु उसमें भगवान्का स्मरण मुख्य है और कर्तव्य-कर्म गौण है।
‘अनुस्मर ’ का अर्थ है कि स्मरणके पीछे स्मरण होता रहे अर्थात् निरन्तर स्मरण होता रहे। दूसरा अर्थ यह है कि भगवान् किसी भी जीवको भूलते नहीं। भगवान्ने सातवें अध्यायमें ‘वेदाहम् ’ (७।२६) कहकर वर्तमानमें सभी जीवोंको स्वतः जाननेकी बात कही है। जब भगवान् वर्तमानमें सबको जानते हैं, तब भगवान्का सम्पूर्ण जीवोंका स्मरण करना स्वाभाविक हुआ, अब यह जीव भगवान्का
स्मरण करे तो इसका बेड़ा पार है!
भगवान्के स्मरणकी जागृतिके लिये भगवान्के साथ अपनापन होना चाहिये। यह अपनापन जितना ही दृढ़ होगा, उतनी ही भगवान्की स्मृति बार-बार आयेगी।
‘मय्यर्पितमनोबुद्धिः ’—मेरेमें मन-बुद्धि अर्पित कर देनेका साधारण अर्थ होता है कि मनसे भगवान्का चिन्तन हो और बुद्धिसे परमात्माका निश्चय किया जाय। परन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिको भगवान्के ही मानना, कभी भूलसे भी इनको अपने न मानना। कारण कि जितने भी प्राकृत पदार्थ हैं, वे सब-के-सब भगवान्के ही हैं। उन प्राकृत पदार्थोंको अपना मानना ही गलती है। साधक जबतक उनको अपना मानेगा, तबतक वे शुद्ध नहीं हो सकते; क्योंकि उनको अपना मानना ही खास अशुद्धि है और इस अशुद्धिसे ही अनेक अशुद्धियाँ पैदा होती हैं।
वास्तवमें मनुष्यका सम्बन्ध केवल प्रभुके साथ ही है। प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ मनुष्यका सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं और रहेगा भी नहीं। कारण कि मनुष्य साक्षात् परमात्माके सनातन अंश हैं; अतः उनका प्रकृतिसे सम्बन्ध कैसे हो सकता है? इसलिये साधकको चाहिये कि वह मन और बुद्धिको भगवान्के ही समझकर भगवान्के अर्पण कर दे। फिर उसको स्वाभाविक ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रकृतिके कार्य शरीर, मन, बुद्धि आदिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही वह भगवान्से विमुख हुआ था।
वे प्राकृत पदार्थ कैसे हैं—इस विषयमें दार्शनिक मतभेद तो है, पर ‘वे हमारे नहीं हैं और हम उनके नहीं हैं’—इस वास्तविकतामें कोई मतभेद नहीं है अर्थात् इसको सभी दर्शनकार मानते हैं। इन दर्शनकारोंमें जो ईश्वरवादी हैं, वे सभी उन प्राकृत पदार्थोंको ईश्वरके ही मानते हैं और दूसरे
५२२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
जितने दर्शनकार हैं, वे उन पदार्थोंको चाहे प्रकृतिके मानें, चाहे परमात्माके मानें, पर दार्शनिक दृष्टिसे वे उनको अपने नहीं मान सकते। अतः साधक उन सब पदार्थोंको ईश्वरके ही मानकर ईश्वरके अर्पण कर दें, तो उनका 'हम भगवान्के ही थे और भगवान्के ही रहेंगे' ऐसा भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध जाग्रत् हो जायगा।
'मामेवैष्यस्यसंशयम्' —मेरेमें मन-बुद्धि अर्पण करनेवाला होनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। कारण कि मैं तुझे नित्य प्राप्त हूँ। अप्राप्तिका अनुभव तो कभी प्राप्त न होनेवाले शरीर और संसारको अपना माननेसे, उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही होता है। नित्यप्राप्त तत्त्वका कभी अभाव नहीं हुआ और न हो सकता है। अगर तू मन, बुद्धि और स्वयंको मेरे अर्पण कर देगा, तो तेरा मेरे साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है।
स्मरण-सम्बन्धी विशेष बात
स्मरण तीन तरहका होता है—बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य। बोधजन्य स्मरणका कभी अभाव नहीं होता। जबतक सम्बन्धको न छोड़ें, तबतक सम्बन्धजन्य स्मरण बना रहता है। क्रियाजन्य स्मरण निरन्तर नहीं रहता। इन तीनों प्रकारके स्मरणका विस्तार इस तरह है—
(१) बोधजन्य स्मरण —अपना जो होनापन है, उसको याद नहीं करना पड़ता। परन्तु शरीरके साथ जो एकता मान ली है, वह भूल है। बोध होनेपर वह भूल मिट जाती है, फिर अपना होनापन स्वतःसिद्ध रहता है। गीतामें भगवान्के वचन हैं—'तू, मैं और ये राजालोग पहले नहीं थे, यह बात भी नहीं है और भविष्यमें नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका बारहवाँ श्लोक) अर्थात् निश्चित ही पहले थे और निश्चित ही पीछे रहेंगे। 'जो पहले सर्ग-महासर्ग और प्रलय-महाप्रलयमें था, वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर नष्ट होता है' (आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें 'वही यह प्राणिसमुदाय' तो परमात्माका अंश है और 'उत्पन्न हो-होकर नष्ट होनेवाला' शरीर है। अगर नष्ट होनेवाले भागका विवेकपूर्वक सर्वथा त्याग कर दें तो अपने होनेपनका स्पष्ट बोध हो जाता है। यह बोधजन्य स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि यह स्मरण अपने नित्य स्वरूपका है।
(२) सम्बन्धजन्य स्मरण —जिसको हम स्वयं मान लेते हैं, वह सम्बन्धजन्य स्मरण है, जैसे 'शरीर हमारा है, संसार हमारा है' आदि। यह माना हुआ सम्बन्ध तबतक नहीं मिटता, जबतक हम 'यह हमारा नहीं है' ऐसा नहीं मान लेते। परन्तु भगवान् वास्तवमें हमारे हैं; हम मानें तो हमारे हैं; नहीं मानें तो हमारे हैं, जानें तो हमारे हैं, नहीं जानें तो हमारे हैं, हमारे दीखें तो हमारे हैं, हमारे नहीं दीखें तो हमारे हैं। हम सब उनके अंश हैं और वे अंशी हैं। हम उनसे अलग नहीं हो सकते और वे हमसे अलग नहीं हो सकते। जबतक हम शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानते हैं, तबतक भगवान्का यह वास्तविक सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता। जब हम शरीर और संसारके सम्बन्धका अत्यन्त अभाव स्वीकार कर लेते हैं, तब भगवान्का नित्य-सम्बन्ध स्वतः जाग्रत् हो जाता है। फिर भगवान्का स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है।
(३) क्रियाजन्य स्मरण —क्रियाजन्य स्मरण अभ्यासजन्य होता है। जैसे स्त्रियाँ सिरपर जलका घड़ा रखकर चलती हैं तो अपने दोनों हाथोंको खुला रखती हैं और दूसरी स्त्रियोंके साथ बातें भी करती रहती हैं; परन्तु सिरपर रखे घड़ेकी सावधानी निरन्तर रहती है। नट रस्सेपर चलते हुए गाता भी है, बोलता भी है, पर रस्सेका ध्यान निरन्तर रहता है। ड्राइवर मोटर चलाता है, हाथसे गियर बदलता है, हैंडल घुमाता है और मालिकसे बातचीत भी करता है, पर रास्तेका ध्यान निरन्तर रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण क्रियाओंमें भगवान्को निरन्तर याद रखना अभ्यासजन्य स्मरण है।
इस अभ्यासजन्य स्मरणके भी तीन प्रकार हैं—
(क) संसारका कार्य करते हुए भगवान्को याद रखना—इसमें सांसारिक कार्यकी मुख्यता और भगवान्के स्मरणकी गौणता रहती है। अतः इसमें यह भाव रहता है कि संसारका काम बिगड़े नहीं, ठीक तरहसे होता रहे और साथ-साथ भगवान्का स्मरण भी होता रहे।
(ख) भगवान्को याद रखते हुए संसारका कार्य करना—इसमें भगवान्के स्मरणकी मुख्यता और सांसारिक कार्यकी गौणता रहती है। इसमें भगवान्के स्मरणमें भूल न हो—यह सावधानी रहती है और संसारके काममें भूल भी हो जाय तो उसकी परवाह नहीं होती। कारण कि साधकमें यह जागृति रहेगी कि संसारका काम सुधर जाय तो भी अन्तमें रहेगा नहीं और बिगड़ जाय तो भी अन्तमें रहेगा
श्लोक ७]
- साधक-संजीवनी *
५९३
नहीं। इसलिये इसमें भगवान्के स्मरणकी भूल नहीं होती।
(ग) कार्यको भगवान्का ही समझना—इसमें काम-धंधा करते हुए भी एक विलक्षण आनन्द रहता है कि 'मेरा अहोभाग्य है कि मैं भगवान्का ही काम करता हूँ, भगवान्की ही सेवा करता हूँ।' अतः इसमें भगवान्की स्मृति विशेषतासे रहती है। जैसे, कोई सज्जन अपनी कन्याके विवाह-कार्यके समय कन्याके लिये तरह-तरहकी वस्तुएँ खरीदता है, तरह-तरहके कार्य करता है, अनेक व्यक्तियोंको निमन्त्रण देता है; परन्तु अनेक प्रकारके कार्य करते हुए भी 'कन्याका विवाह करना है'—यह बात उसको निरन्तर याद रहती है। कन्यामें भगवान्के समान पूज्यभावपूर्वक सम्बन्ध नहीं होता तो भी उसके विवाहके लिये कार्य करते हुए उसकी याद निरन्तर रहती है, फिर भगवान्के लिये कार्य करते हुए भगवान्की पूज्यभावसहित अपनेपनकी मीठी स्मृति निरन्तर बनी रहे—इसमें कहना ही क्या है!
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा—'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः'। तो इसपर अर्जुने आठवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें प्रश्न किया—'प्रयाणकाले च कथं त्रेयोऽसि नियतात्मभिः'। उसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि जो मनुष्य अन्तकालमें मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है (आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। परन्तु यह नियम केवल मेरी प्राप्तिके विषयमें नहीं है। मनुष्य जिसका भी स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है—यह सबके लिये सामान्य नियम है (आठवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)। अन्तकाल किसी भी समय आ सकता है। ऐसा कोई वर्ष, महीना, दिन, घण्टा, मिनट, क्षण नहीं है, जिसमें अन्तकाल न आ सके। इसलिये मनुष्यको नित्य-निरन्तर, सब समय मेरा स्मरण करना चाहिये—'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'। जो नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिये मेरी प्राप्ति सुलभ है (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); क्योंकि वह किसी भी समय शरीर छोड़ेगा तो मेरा स्मरण करते हुए ही छोड़ेगा और मेरेको ही प्राप्त होगा।
'मध्यर्पितमनोबुद्धिः' —सब समयमें भगवान्का स्मरण करनेसे साधकके मन-बुद्धि भगवान्के अर्पित हो जाते हैं। मन-बुद्धि अपने नहीं हैं, इनके साथ अपना सम्बन्ध ही नहीं है—इस प्रकार मन-बुद्धिमें अपनापन छोड़नेसे मन-बुद्धि स्वतः भगवान्के अर्पित होंगे; क्योंकि ये भगवान्की ही अपरा प्रकृति हैं। यद्यपि परा और अपरा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्की हैं, तथापि परा प्रकृतिका सम्बन्ध अपराके साथ नहीं है, प्रत्युत केवल भगवान्के साथ है; क्योंकि वह भगवान्का अंश है—'ममैवांशो जीवलोकै' (१५।७)। इसलिये साधक 'मध्यर्पितमनोबुद्धिः' तभी हो सकता है, जब वह अपराके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, अपराको उसके मालिक भगवान्के अर्पित कर दे अर्थात् अपराको अपना और अपने लिये कभी न माने।
यहाँ 'मन' के अन्तर्गत चित्तको और 'बुद्धि' के अन्तर्गत अहंकारको भी समझ लेना चाहिये। मन-बुद्धि अर्पित होनेसे भक्त निर्मम और निरहंकार हो जाता है।
वास्तवमें भक्त स्वयं भगवान्के अर्पित होता है। स्वयं अर्पित होनेसे मन-बुद्धि आदि सर्वस्व अपने-आप अर्पित हो जाता है। सर्वस्व भगवान्के अर्पित होनेसे सर्वस्व नहीं रहता, प्रत्युत केवल भगवान् रह जाते हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।
—◆—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कही हुई अभ्यासजन्य स्मृतिका अब आगेके श्लोकमें वर्णन करते हैं।
भगवत्सम्बन्धी कार्य दो तरहका होता है—
(१) स्वरूपसे —भगवान्के नामका जप और कीर्तन करना; भगवान्की लीलाका श्रवण, चिन्तन, पठन-पाठन आदि करना—यह स्वरूपसे भगवत्सम्बन्धी काम है।
(२) भावसे —संसारका काम करते हुए भी 'जब सब संसार भगवान्का है, तब संसारका काम भी भगवान्का ही काम हुआ। इसको भगवान्के नाते ही करना है, भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही करना है। इस कामसे हमें कुछ लेना नहीं है। भगवान्ने हमें जिस वर्णमें पैदा किया है, जिस आश्रममें रखा है, उसमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार उचित काम करना है'—ऐसा भाव रहनेसे वह काम सांसारिक होनेपर भी भगवान्का हो जाता है।
[सातवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने सात बातें कही थीं; उन्हीं सात बातोंपर अर्जुने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये और यह प्रकरण भी सात ही श्लोकोंमें समाप्त हुआ।]
५९४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन् ॥ ८ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | करनेवाले | अनुचित्तयन् | = चिन्तन करता हुआ |
|---|---|---|---|---|
| अभ्यास- | चेतसा | = चित्तसे | (शरीर छोड़ने- | |
| योगयुक्तेन | = अभ्यासयोगसे युक्त | परमम् | = परम | वाला मनुष्य) |
| नान्यगामिना | = (और) अन्यका | दिव्यम् | = दिव्य | याति |
| चिन्तन न | पुरुषम् | = पुरुषका | हो जाता है। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें जो सगुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
‘अभ्यासयोगयुक्तेन’ —इस पदमें ‘अभ्यास’ और ‘योग’—ये दो शब्द आये हैं। संसारसे मन हटाकर परमात्मामें बार-बार मन लगानेका नाम अभ्यास है और समताका नाम ‘योग’ है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८)। अभ्यासमें मन लगनेसे प्रसन्नता होती है और मन न लगनेसे खिन्नता होती है। यह अभ्यास तो है, पर अभ्यासयोग नहीं है। अभ्यासयोग तभी होगा, जब प्रसन्नता
और खिन्नता—दोनों ही न हों। अगर चित्तमें प्रसन्नता और खिन्नता हो भी जायँ, तो भी उनको महत्त्व न दे, केवल अपने लक्ष्यको ही महत्त्व दे। अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहना भी योग है। ऐसे योगसे युक्त चित्त हो।
‘चेतसा नान्यगामिना’ —चित्त अन्यगामी न हो अर्थात् एक परमात्माके सिवाय दूसरा कोई लक्ष्य न हो।
‘परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन्’ —ऐसे चित्तसे परम दिव्य पुरुषका अर्थात् सगुण-निराकार परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उसी परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने प्रश्न किया था—‘प्रयाणकाले च कथं त्रेयोऽसि नियतात्मभिः’ (८।२)। उस प्रश्नका उत्तर देकर अब आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें अन्तकालमें स्मरण करनेवालोंके प्रकारका वर्णन करते हैं।
सम्बन्ध —अब भगवान् ध्यान करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी सगुण-निराकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं।
कविं पुराणमनुशासितारमणोरेणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥
| यः | = जो | अणीयांसम् | = अत्यन्त सूक्ष्म, | आदित्यवर्णम् | = सूर्यकी तरह |
|---|---|---|---|---|---|
| कविम् | = सर्वज्ञ, | सर्वस्य | = सबका | प्रकाशस्वरूप | |
| पुराणम् | = अनादि, | धातारम् | = धारण-पोषण | अर्थात् ज्ञानस्वरूप | |
| अनुशासितारम् | = सबपर शासन | करनेवाला, | अचिन्त्यरूपम् | =—ऐसे अचिन्त्य | |
| करनेवाला, | तमसः | = अज्ञानसे | स्वरूपका | ||
| अणोः | = सूक्ष्मसे | परस्तात् | = अत्यन्त परे, | अनुस्मरेत् | = चिन्तन करता है। |
व्याख्या —‘कविम्’—सम्पूर्ण प्राणियोंको और उनके सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मोंको जाननेवाले होनेसे उन परमात्माका नाम ‘कवि’ अर्थात् सर्वज्ञ है।
‘पुराणम्’ —वे परमात्मा सबके आदि होनेसे ‘पुराण’ कहे जाते हैं।
‘अनुशासितारम्’ —हम देखते हैं तो नेत्रोंसे देखते हैं।
नेत्रोंके ऊपर मन शासन करता है, मनके ऊपर बुद्धि और बुद्धिके ऊपर ‘अहम्’ शासन करता है तथा ‘अहम्’ के ऊपर भी जो शासन करता है, जो सबका आश्रय, प्रकाशक और प्रेरक है, वह (परमात्मा) ‘अनुशासिता’ है।
दूसरा भाव यह है कि जीवोंका कर्म करनेका जैसा-जैसा स्वभाव बना है, उसके अनुसार ही परमात्मा (वेद,
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
५१५
शास्त्र, गुरु, सन्त आदिके द्वारा) कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और मनुष्योंके पुराने पाप-पुण्यरूप कर्मोंके अनुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर उन मनुष्योंको शुद्ध, निर्मल बनाते हैं। इस प्रकार मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले और मनुष्योंके पाप-पुण्यरूप पुराने कर्मोंका (फल देकर) नाश करनेवाले होनेसे परमात्मा 'अनुशासिता' हैं।
'अणोरीणीयांसम्' —परमात्मा परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा मन-बुद्धिके विषय नहीं हैं; मन-बुद्धि आदि उनको पकड़ नहीं पाते। मन-बुद्धि तो प्रकृति-का कार्य होनेसे प्रकृतिको भी पकड़ नहीं पाते, फिर परमात्मा तो उस प्रकृतिसे भी अत्यन्त परे हैं! अतः वे परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं अर्थात् सूक्ष्मताकी अन्तिम सीमा हैं।
'सर्वस्य धातारम्' —परमात्मा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले हैं, उनका पोषण करनेवाले हैं। उन सभीको परमात्मासे ही सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः वे परमात्मा सबका धारण-पोषण करनेवाले कहे जाते हैं।
'तमसः परस्तात्' —परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे हैं, अज्ञानसे सर्वथा रहित हैं। उनमें लेशमात्र भी अज्ञान नहीं
परिशिष्ट भाव —परमात्माको 'कविम्' कहनेका तात्पर्य है कि उसके ज्ञानके बाहर कुछ भी नहीं है। 'पुराणम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह अनादि है, कालसे भी अतीत अर्थात् कालका भी प्रकाशक है। 'अनुशासितारम्' कहनेका तात्पर्य है कि सब स्वाभाविक ही उसके शासनमें हैं। वह जीव और जगत्—दोनोंका ही शासक है—
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरत्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतर० १।१०)
'प्रकृति तो विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों—(विनाशशील और अविनाशी- ) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।'
'धातारम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा सबका पालन-पोषण करनेवाला है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। 'आदित्यवर्णम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे सूर्यमें स्वतः—स्वाभाविक नित्य प्रकाश रहता है, ऐसे ही परमात्मामें स्वतः—स्वाभाविक नित्य ज्ञान, बोध रहता है। वह परमात्मा ज्ञानस्वरूप है और सबका प्रकाशक है (गीता—तेरहवें अध्यायका तैत्तिरीसवाँ श्लोक)। 'तमसः परस्तात्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा अज्ञानसे अथवा अपरासे अत्यन्त परे हैं—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' (गीता १५।१८)।
सम्बन्ध—अब अन्तकालके चिन्तनके अनुसार गति बताते हैं।
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भूवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
| सः | = वह | अचलेन | = अचल | भूवोः | = भुकूटीके |
|---|---|---|---|---|---|
| भक्त्या, | मनसा | = मनसे | मध्ये | = मध्यमें | |
| युक्तः | = भक्तियुक्त मनुष्य | च | = और | प्राणम् | = प्राणोंको |
| प्रयाणकाले | = अन्त समयमें | योगबलेन | = योगबलके द्वारा | सम्यक् | = अच्छी तरहसे |
५९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
आवेश्य | = प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) | तम् | = उस | पुरुषम् | = पुरुषको ---|---|---|---|---|--- | | परम् | = परम | एव | = ही | | दिव्यम् | = दिव्य | उपैति | = प्राप्त होता है।
व्याख्या—‘प्रयाणकाले मनसाचलेन ..... स तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ —यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं।
अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।
पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम ‘योगबल’ है। उस योगबलके द्वारा दोनों ध्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शरीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।
‘तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ पदोंका तात्पर्य है कि जिस परमात्मतत्त्वका पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णन हुआ है, उसी दिव्य परम सगुण-निराकार परमात्माको वह प्राप्त हो जाता है।
आठवें श्लोकमें जो बात कही गयी थी, उसीको नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहकर इन तीन श्लोकोंके प्रकरणका उपसंहार किया गया है।
परिशिष्ट भाव—‘भक्त्या युक्तः’ का तात्पर्य है कि संसारकी आसक्ति मिट जानेसे उस साधकका एक परमात्मामें ही आकर्षण रहता है, अन्यमें आकर्षण नहीं रहता। संसारी मनुष्य तो अपरामें आकृष्ट रहते हैं, पर जो अपराको छोड़कर भगवान्में आकृष्ट हो जाता है, वह भक्त हो जाता है। संसारी मनुष्य शरीर-संसारमें आसक्त होनेसे ‘विभक्त’ अर्थात् भगवान्से अलग हो जाते हैं, पर भगवान्में लगा हुआ साधक विभक्त नहीं रहता, प्रत्युत ‘भक्त’ अर्थात् भगवान्से एक (अभिन्न) हो जाता है।
‘योगबलेन’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले किये हुए योगाभ्यासके कारण अन्त समयमें होनेवाली अशक्त अवस्था उसको बाधा नहीं पहुँचा सकती, उसमें कोई विकार पैदा नहीं कर सकती। प्राणायाम आदिका बल ‘योगबल’ है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें निर्गुण-निराकारकी प्राप्तिके उपायका उपक्रम करते हैं।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्गहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
श्लोक १२-१३ ]
- साधक-संजीवनी *
५९७
| वेदविदः | = वेदवेत्तालोग | यत् | = जिसको | चरन्ति | = पालन करते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| यत् | = जिसको | विशन्ति | = प्राप्त करते हैं (और) | तत् | = वह |
| अक्षरम् | = अक्षर | यत् | = (साधक) जिसकी | ||
| (प्राप्तिकी) | पदम् | = पद (में) | |||
| वदन्ति | = कहते हैं, | इच्छन्तः | = इच्छा करते हुए | ते | = तेरे लिये |
| वीतरागाः | = वीतराग | ब्रह्मचर्यम् | = ब्रह्मचर्यका | सङ्गहेण | = संक्षेपसे |
| यतयः | = यति | प्रवक्ष्ये | = कहूँगा। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें जो निर्गुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ —वेदोंको जाननेवाले पुरुष जिसको अक्षर-निर्गुण-निराकार कहते हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता, जो सदा-सर्वदा एकरूप, एकरस रहता है और जिसको इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ कहा गया है, उसी निर्गुण-निराकार तत्त्वका यहाँ ‘अक्षर’ नामसे वर्णन हुआ है।
‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ —जिनके अन्तःकरणमें रागका अत्यन्त अभाव हो गया है; अतः जिनका अन्तःकरण महान् निर्मल है और जिनके हृदयमें सर्वोपरि अद्वितीय परम तत्त्वको पानेकी उत्कट लगन लगी है, ऐसे प्रयत्नशील यति महापुरुष उस तत्त्वमें प्रवेश करते हैं—उसको प्राप्त करते हैं।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें गौणतासे चारों आश्रमोंका वर्णन ले सकते हैं; जैसे—‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ पदोंसे गृहस्थाश्रमका संकेत है; क्योंकि वेदोंका अध्ययन करना ब्राह्मणका खास काम है। ‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ पदोंसे संन्यास और वानप्रस्थाश्रमका संकेत है। ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ पदोंसे ब्रह्मचर्याश्रमका संकेत है।
मुक्ति सभी वर्णों, आश्रमोंमें हो सकती है। इसलिये भगवान्ने आश्रमोंका स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं किया है और वर्णोंका स्पष्टरूपसे वर्णन भी कर्तव्य-पालनकी दृष्टिसे किया है। अर्जुन क्षत्रिय थे और वे अपने युद्धरूप कर्तव्यको छोड़ना चाहते थे। इसलिये भगवान्ने उनको अपने कर्तव्यमें लगानेके उद्देश्यसे वर्णधर्मका वर्णन किया। युद्ध करना वर्णधर्म है, आश्रमधर्म नहीं।
सम्बन्ध—अन्तकालमें उस निर्गुण-निराकार तत्त्वकी प्राप्तिकी फलसहित विधि बतानेके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूढ्यार्धायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्नामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
५९८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
| सर्वद्वाराणि | = (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको | आधाय | = स्थापित करके | उच्चारण (और) |
|---|---|---|---|---|
| संयम्य | = रोककर | योगधारणाम् | = योगधारणामें | माम् |
| मनः | = मनका | आस्थितः | = सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ | अनुस्मरन् |
| हृदि | = हृदयमें | यः | = जो साधक | देहम् |
| निरुध्य | = निरोध करके | ओम् | = 'ॐ' | त्यजन् |
| च | = और | इति | = इस | प्रयाति |
| आत्मनः | = अपने | एकाक्षरम् | = एक अक्षर | सः |
| प्राणम् | = प्राणोंको | ब्रह्म | = ब्रह्मका | पराम् |
| मूर्ध्नि | = मस्तकमें | व्याहरन् | = (मानसिक) | गतिम् |
| याति | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या—‘सर्वद्वाराणि संयम्य’ —(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका—इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र—त्याग और मल—त्याग—इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा—इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।
‘मनो हृदि निरुध्य च’ —मनका हृदयमें ही निरोध कर ले अर्थात् मनको विषयोंकी तरफ न जाने दे। इससे मन अपने स्थान—(हृदय—) में रहेगा।
‘मूर्ध्नाधायात्मनः प्राणम्’ —प्राणोंको मस्तकमें धारण कर ले अर्थात् प्राणोंपर अपना अधिकार प्राप्त करके दसवें द्वार—ब्रह्मरश्मिमें प्राणोंको रोक ले।
‘आस्थितो योगधारणाम्’ —इस प्रकार योगधारणामें
परिशिष्ट भाव —इन श्लोकोंमें योगाभ्यास करनेवाले अद्वैतवादीका वर्णन है। ‘व्याहरन्’ पदसे मानसिक उच्चारण समझना चाहिये; क्योंकि मनका हृदयमें निरोध करनेपर तथा प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करनेपर वाचिक उच्चारण होना असम्भव है।
सम्बन्ध— जिसके पास योगका बल होता है और जिसका प्राणोंपर अधिकार होता है, उसको तो निर्गुण-निराकारकी प्राप्ति हो जाती है; परन्तु दीर्घकालीन अभ्यास-साध्य होनेसे यह बात सबके लिये कठिन पड़ती है। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अपनी अर्थात् सगुण-साकारकी सुगमतापूर्वक प्राप्तिकी बात कहते हैं।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | यः | = जो मनुष्य | नित्यशः | = नित्य- |
|---|---|---|---|---|---|
| अनन्यचेताः | = अनन्य चित्तवाला | माम् | = मेरा | सततम् | = निरन्तर |
- समग्ररूपका प्रकरण होनेसे यहाँ ‘माम्’ शब्दसे निर्गुण-निराकारका चिन्तन लिया गया है।
श्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
५११
| स्मरति | = स्मरण करता है, | मुझमें लगे हुए | सुलभः | = सुलभ हूँ अर्थात् |
|---|---|---|---|---|
| तस्य | = उस | योगिनः | = योगीके लिये | उसको सुलभतासे |
| नित्ययुक्तस्य | = नित्य-निरन्तर | अहम् | = मैं | प्राप्त हो जाता हूँ। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें जो सगुण-साकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
'अनन्यचेताः' —जिसका चित्त भगवान्को छोड़कर किसी भी भोगभूमिमें, किसी भी ऐश्वर्यमें किंचिन्मात्र भी नहीं जाता; जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के सिवाय अन्य किसीका कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है, वह पुरुष अनन्य चित्त्वाला है। जैसे, पतिव्रता स्त्रीका पतिका ही व्रत, नियम रहता है। पतिके सिवाय उसके मनमें अन्य किसी भी पुरुषका रागपूर्वक चिन्तन कभी होता ही नहीं। शिष्य गुरुके और सुपुत्र माँ-बापके परायण रहता है, उनका दूसरा कोई इष्ट नहीं होता। इसी तरहसे भक्त भगवान्के ही परायण रहता है।
यहाँ 'अनन्यचेताः' पद सगुण-उपासना करनेवालेका वाचक है। सगुण-उपासनामें विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जो भगवान्के स्वरूप हैं, उनमेंसे जो जिस स्वरूपकी उपासना करता है, उसी स्वरूपका चिन्तन हो। परन्तु दूसरे स्वरूपोंको अपने इष्टसे अलग न माने और अपने-आपको भी अपने इष्टके सिवाय और किसीका न माने, तो उसका अन्यकी तरफ मन नहीं जाता। तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं केवल भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मेरा और कोई नहीं है तथा मैं और किसीका नहीं हूँ' ऐसा भाव होनेसे वह 'अनन्यचेताः' हो जाता है।
'सततं यो मां स्मरति नित्यशः' —'सततम् ' का अर्थ होता है—निरन्तर अर्थात् जबसे नींद खुले, तबसे लेकर गाढ़ नींद आनेतक जो मेरा स्मरण करता है; और 'नित्यशः' का अर्थ होता है—सदा अर्थात् इस बातको जिस दिनसे पकड़ा, उस दिनसे लेकर मृत्युतक जो मेरा स्मरण करता है।
'तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः' —ऐसे नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ। यहाँ 'नित्ययुक्त' पद चित्तके द्वारा निरन्तर चिन्तन करनेवालेका वाचक नहीं है, प्रत्युत ब्रह्मा-प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे खुद भगवान्में लगनेवालेका वाचक है। जैसे कोई ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपनेमें
स्थित रहता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ; क्षत्रिय, वैश्य आदि नहीं हूँ।' वह अपने ब्राह्मणपनेको याद करे या न करे, पर उसके ब्राह्मणपनेमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे ही 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस नित्य-सम्बन्धमें दृढ़ रहनेवाला ही नित्ययुक्त है। ऐसे नित्ययुक्त योगीको भगवान् सुगमतासे मिल जाते हैं।
भगवान्के सिवाय शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि अपने नहीं हैं, केवल भगवान् ही अपने हैं—ऐसा दृढ़तासे माननेपर भगवान् सुलभ हो जाते हैं। परन्तु शरीर आदिको अपना मानते रहनेसे भगवान् सुलभ नहीं होते।
भगवान्के साथ अपनी भिन्नता तथा संसारके साथ अपनी एकता कभी हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। इस रीतिसे मनुष्यकी भगवान्के साथ स्वतः—स्वाभाविक अभिन्नता है और संसारके साथ स्वतः—स्वाभाविक भिन्नता है। परन्तु भूलके कारण मनुष्य अपनेको भगवान्से और भगवान्को अपनेसे अलग मान लेता है तथा अपनेको शरीरका तथा शरीरको अपना मान लेता है। इस विपरीत धारणाके कारण ही यह मनुष्य जन्म-मरणके चक्रमें फँसा रहता है। जब यह विपरीत धारणा सर्वथा मिट जाती है, तब भगवान् स्वतः सुलभ हो जाते हैं।
आठवेंसे तेरहवें श्लोकतक सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारका स्मरण बताया गया। इन दोनों स्मरणोंमें प्राणायामकी मुख्यता रहती है, जिसको सिद्ध करना कठिन है। अन्तकाल-जैसी विकट अवस्थामें भी प्राणायामके बलसे प्राणोंको ध्रुवोंके मध्यमें स्थापित कर सकें अथवा मूर्ध्नि-(दशम द्वार-) में लगा सकें—ऐसा प्राणोंपर अधिकार रहनेकी आवश्यकता है। परन्तु भगवान्के स्मरणमें यह कठिनता नहीं है, क्योंकि यहाँ प्राणोंका खयाल नहीं है। यहाँ तो भगवान्के साथ साधकका स्वयंका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिकी भी जरूरत नहीं है। अतः इसमें अन्तकालमें प्राण आदिको लगानेकी जरूरत नहीं है। जैसे किसी वस्तुका बीमा होनेपर वस्तुके बिगड़ने, टूटने-फूटनेकी चिन्ता नहीं रहती, ऐसे ही शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देनेपर साधकको अपनी गतिके विषयमें कभी किंचिन्मात्र
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
भी चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह साधन क्रियाजन्य | जागृति है। अतः इसमें कठिनताका नामोनिशान नहीं है। अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्धकी | इसीसे भगवान्ने अपने-आपको सुलभ बताया है।
परिशिष्ट भाव—‘अनन्यचेताः’ —भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय अन्यकी सत्ता न होनेसे उसका मन अन्य जगह कैसे जायगा? क्यों जायगा? कहाँ जायगा? इसलिये वह स्वतः अनन्यचित्त्वाला हो जाता है।
‘सततं यो मां स्मरति नित्यशः’ —एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है। जो करते हैं, वह क्रिया है और जो अपने-आप होता है, वह स्मरण है। जैसे, गीताके अन्तमें अर्जुनने कहा—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) तो वह स्मृति क्रिया नहीं है, प्रत्युत भगवान्के साथ अपने नित्य सम्बन्धकी स्वतः होनेवाली स्मृति है। भगवान्के स्मरणमें खास हेतु उनमें अपनापन है। भगवान् ही मेरे हैं और मेरे लिये हैं—इस प्रकार भगवान्में अपनापन होनेसे स्वतः भगवान्में प्रेम होता है और जिसमें प्रेम होता है, उसका स्मरण अपने-आप और नित्य-निरन्तर होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मध्यासक्तमनाः’ पदसे अपनेमें आसक्ति अर्थात् प्रेम होनेकी बात कही है। तात्पर्य है कि केवल भगवान्को ही अपना और अपने लिये माननेसे साधककी भगवान्में प्रियता हो जाती है। भगवान्में प्रियता होनेके बाद फिर भगवान्का स्मरण स्वतः होता है।
‘नित्ययुक्तस्य’ —नित्य-निरन्तर भगवान्के साथ जुड़ा हुआ होनेसे भक्तको ‘नित्ययुक्त’ कहा गया है। सातवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’ पदोंसे भी यही बात कही गयी है। ‘नित्ययुक्तस्य’ पदसे श्लोकके पूर्वाधर्ममें आयी सभी बातोंका समाहार हो जाता है।
‘तस्याहं सुलभः पार्थ’ —भगवान्ने महात्माको तो दुर्लभ बताया है—‘स महात्मा सुदुर्लभः’ (गीता ७।१९), पर यहाँ अपनेको सुलभ बताया है। इसका तात्पर्य है कि संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत उनके तत्त्वको जानकर उनके शरण होनेवाले भक्त दुर्लभ हैं। कारण कि भगवान्को दृढ़े तो वे सब जगह मिल जायेंगे, पर भगवान्का प्यारा भक्त कहीं-कहीं ही मिलेगा—
हरि दुरलभ नहि जगतमें, हरिजन दुरलभ होय। हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहि एक होय॥
भगवान् कृपा करके जो मनुष्यशरीर देते हैं, उस शरीरसे जीव अनेक योनियोंमें तथा नरकोंमें भी जा सकता है। परन्तु भक्त कृपा करके भगवान्की ही प्राप्ति करता है—
हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत। हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥
वास्तवमें जो नित्यप्राप्त है, उसमें सुलभता-दुर्लभता कहना बनता ही नहीं। परन्तु लोगोंने उसको दुर्लभ (कठिन) मान रखा है, इस वृत्तिको हटानेके लिये भगवान्ने अपनेको सुलभ बताया है। जिसकी खुदकी सत्ता है ही नहीं, उस असत् (शरीर-संसार) को सत्ता और महत्ता देनेसे तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्यप्राप्त परमात्मा दुर्लभ हो रहे हैं। असत्को सत्ता और महत्ता न दें तो परमात्माकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। असत् है और वह अपना तथा अपने लिये है—ऐसा मानना ही असत्को सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना है।
सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें भगवान् अपनी प्राप्तिका माहात्म्य बताते हैं।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाजुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
| महात्मानः | = महात्मालोग | दुःखोंके घर | वाले |
|---|---|---|---|
| माम् | = मुझे | (और) | पुनर्जन्म = पुनर्जन्मको |
| उपेत्य | = प्राप्त करके | अशाश्वतम् = अशाश्वत अर्थात् | न, आजुवन्ति = प्राप्त नहीं होते; |
| दुःखालयम् | = दुःखालय अर्थात् | निरन्तर बदलने- | (क्योंकि वे) |