भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक [ ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

५११

सम्बन्ध—जब अन्तकालके स्मरणके अनुसार ही गति होती है, तो फिर अन्तकालमें भगवान्का स्मरण होनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मैवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥

तस्मात्= इसलिये (तू)युध्य, च= युद्ध भी कर।असंशयम्= निःसन्देह
सर्वेषु= सबमयि= मुझमेंमाम्= मुझे
कालेषु= समयमेंअर्पितमनो-एव= ही
माम्= मेराबुद्धिः= मन और बुद्धिएष्यसि= प्राप्त होगा।
अनुस्मर= स्मरण कर (और)अर्पित करनेवाला (तू)

व्याख्या—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’— यहाँ ‘सर्वेषु कालेषु’ पदोंका सम्बन्ध केवल स्मरणसे ही है, युद्धसे नहीं; क्योंकि युद्ध सब समयमें, निरन्तर हो ही नहीं सकता। कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं हो सकती, प्रत्युत समय-समयपर ही हो सकती है। कारण कि प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और समाप्ति होती है—यह बात सबके अनुभवकी है। परन्तु भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे भगवान्का स्मरण सब समयमें होता है; क्योंकि उद्देश्यकी जागृति हरदम रहती है।

सब समयमें स्मरण करनेके लिये कहनेका तात्पर्य है कि प्रत्येक कार्यमें समयका विभाग होता है, जैसे—यह समय सोनेका और यह समय जगनेका है, यह समय नित्यकर्मका है, यह समय जीविकाके लिये काम-धंधा करनेका है, यह समय भोजनका है, आदि-आदि। परन्तु भगवान्के स्मरणमें समयका विभाग नहीं होना चाहिये। भगवान्को तो सब समयमें ही याद रखना चाहिये।

‘युध्य च’ कहनेका तात्पर्य है कि यहाँ अर्जुनके सामने युद्धरूप कर्तव्य-कर्म है, जो उनको स्वतः प्राप्त हुआ है—‘यदुच्छथा चोपपन्नम् ’ (गीता २।३२)। ऐसे ही मनुष्यको कर्तव्यरूपसे जो प्राप्त हो जाय, उसको भगवान्का स्मरण करते हुए करना चाहिये। परन्तु उसमें भगवान्का स्मरण मुख्य है और कर्तव्य-कर्म गौण है।

अनुस्मर ’ का अर्थ है कि स्मरणके पीछे स्मरण होता रहे अर्थात् निरन्तर स्मरण होता रहे। दूसरा अर्थ यह है कि भगवान् किसी भी जीवको भूलते नहीं। भगवान्ने सातवें अध्यायमें ‘वेदाहम् ’ (७।२६) कहकर वर्तमानमें सभी जीवोंको स्वतः जाननेकी बात कही है। जब भगवान् वर्तमानमें सबको जानते हैं, तब भगवान्का सम्पूर्ण जीवोंका स्मरण करना स्वाभाविक हुआ, अब यह जीव भगवान्का

स्मरण करे तो इसका बेड़ा पार है!

भगवान्के स्मरणकी जागृतिके लिये भगवान्के साथ अपनापन होना चाहिये। यह अपनापन जितना ही दृढ़ होगा, उतनी ही भगवान्की स्मृति बार-बार आयेगी।

मय्यर्पितमनोबुद्धिः ’—मेरेमें मन-बुद्धि अर्पित कर देनेका साधारण अर्थ होता है कि मनसे भगवान्का चिन्तन हो और बुद्धिसे परमात्माका निश्चय किया जाय। परन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिको भगवान्के ही मानना, कभी भूलसे भी इनको अपने न मानना। कारण कि जितने भी प्राकृत पदार्थ हैं, वे सब-के-सब भगवान्के ही हैं। उन प्राकृत पदार्थोंको अपना मानना ही गलती है। साधक जबतक उनको अपना मानेगा, तबतक वे शुद्ध नहीं हो सकते; क्योंकि उनको अपना मानना ही खास अशुद्धि है और इस अशुद्धिसे ही अनेक अशुद्धियाँ पैदा होती हैं।

वास्तवमें मनुष्यका सम्बन्ध केवल प्रभुके साथ ही है। प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ मनुष्यका सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं और रहेगा भी नहीं। कारण कि मनुष्य साक्षात् परमात्माके सनातन अंश हैं; अतः उनका प्रकृतिसे सम्बन्ध कैसे हो सकता है? इसलिये साधकको चाहिये कि वह मन और बुद्धिको भगवान्के ही समझकर भगवान्के अर्पण कर दे। फिर उसको स्वाभाविक ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रकृतिके कार्य शरीर, मन, बुद्धि आदिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही वह भगवान्से विमुख हुआ था।

वे प्राकृत पदार्थ कैसे हैं—इस विषयमें दार्शनिक मतभेद तो है, पर ‘वे हमारे नहीं हैं और हम उनके नहीं हैं’—इस वास्तविकतामें कोई मतभेद नहीं है अर्थात् इसको सभी दर्शनकार मानते हैं। इन दर्शनकारोंमें जो ईश्वरवादी हैं, वे सभी उन प्राकृत पदार्थोंको ईश्वरके ही मानते हैं और दूसरे