भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

इसी तरह अन्तकालमें मनुष्यका जैसा चिन्तन होगा, वैसी ही योनि उसको प्राप्त होगी।

फोटो खिंचनेका समय तो पहलेसे ही मालूम रहता है, पर मृत्यु कब आ जाय—इसका हमें कुछ पता नहीं रहता। इसलिये अपने स्वभाव, चिन्तनको निर्मल बनाये रखते हुए हर समय सावधान रहना चाहिये और भगवान्का नित्य-निरन्तर स्मरण करते रहना चाहिये (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ और सातवाँ श्लोक)।

(२)

अन्तकालीन गतिके नियममें भगवान्की न्यायकारिता और दयालुता—ये दोनों ही भरी हुई हैं। साधारण दृष्टिसे न्याय और दया—दोनों परस्पर-विरुद्ध मालूम देते हैं। अगर न्याय करेंगे तो दया सिद्ध नहीं होगी और दया करेंगे तो न्याय सिद्ध नहीं होगा। कारण कि न्यायमें ठीक-ठीक निर्णय होता है, छूट नहीं होती और दयामें छूट होती है। परन्तु वास्तवमें यह विरोध सामान्य और क्रूर पुरुषके

बनाये हुए न्यायमें ही आ सकता है, भगवान्के बनाये हुए न्यायमें नहीं; क्योंकि भगवान् परम दयालु और प्राणिमात्रके सुदृढ़ हैं—‘सुदृढ सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। भगवान्के सभी न्याय, कानून दयासे परिपूर्ण होते हैं।

मनुष्य अन्तकालमें जैसा स्मरण करता है, उसीके अनुसार उसकी गति होती है। अगर कोई कुत्तेका चिन्तन करते हुए मरता है, तो क्रमशः कुत्ता ही बन जाता है। यह भगवान्का मनुष्यमात्रके प्रति लागू होनेवाला न्याय हुआ; क्योंकि भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दी है कि वह चाहे मेरा (भगवान्का) स्मरण करे, चाहे अन्यका स्मरण करे। इसलिये यह भगवान्का ‘न्याय’ है। जितने मूल्यमें कुत्तेकी योनि मिले, उतने ही मूल्यमें भगवान् मिल जायें—यह मनुष्यमात्रके प्रति भगवान्की ‘दया’ है। अगर मनुष्य भगवान्की इस न्यायकारिता और दयालुताकी तरफ खयाल करे, तो उसका भगवान्में आकर्षण हो जायगा।

परिशिष्ट भाव —सातवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने ‘यो यो यां यां तनुं भक्तः’ पदोंसे उपासनाके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बतायी थी, अब इस श्लोकमें गतिके विषयमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता बताते हैं। तात्पर्य है कि अपनी उपासना और गतिके विषयमें मनुष्य स्वतन्त्र है* और उसमें भगवान् अपने दयालु स्वभावके कारण बाधक नहीं बनते, प्रत्युत उसकी सहायता करते हैं। मनुष्य ही मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके दुर्गतिमें चला जाता है।

यह मनुष्यशरीरकी महत्ता है कि वह जो चाहे, वही पा सकता है। ऐसा कोई दुर्लभ पद नहीं है, जो मनुष्यको न मिल सके। जिसमें लाभ-(सुख-)का तो कोई अन्त न हो और दुःखका लेश भी न हो, ऐसा पद मनुष्य प्राप्त कर सकता है (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। परन्तु भोग और संग्रहमें लगकर मनुष्य चौरासी लाख योनियोंमें और नरकोंमें चला जाता है! इसलिये भगवान् दुःखके साथ कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्तनि’ (९।३), ‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधमां गतिम्’ (१६।२०)।

मनुष्य अन्तकालमें जैसा चिन्तन करता है, वैसी ही उसकी गति होती है। इस विषयमें एक श्लोक आता है—

वासना यस्य यत्र स्यात् स तं स्वप्नेषु पश्यति। स्वप्नवन्मरणे ज्ञेयं वासना तु वपुर्नृणाम्॥

‘जिस मनुष्यकी जहाँ वासना होती है, उसी वासनाके अनुरूप वह स्वप्न देखता है। स्वप्नके समान ही मरण होता है अर्थात् वासनाके अनुरूप ही अन्तसमयमें चिन्तन होता है और उस चिन्तनके अनुसार ही मनुष्यकी गति होती है।’

तात्पर्य है कि मृत्युकालमें हम जैसा चाहें, वैसा चिन्तन नहीं कर सकते, प्रत्युत हमारे भीतर जैसी वासना होगी, वैसा ही चिन्तन स्वतः होगा और उसके अनुसार ही गति होगी। जिस वस्तुको हम सत्ता और महत्ता देते हैं, उससे सम्बन्ध जोड़ते हैं, उससे सुख लेते हैं, उसीकी वासना बनती है। अगर संसारमें सुखबुद्धि न हो तो संसारकी वासना नहीं बनेगी। वासना न बननेपर मृत्युकालमें जो भी चिन्तन होगा, भगवान्का ही चिन्तन होगा; क्योंकि सिद्धान्तसे सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’।

‘तं तमेवैति’—जिस तरह सुईके पीछे-पीछे (उसी मार्गसे) धागा जाता है, उसी तरह मनुष्य भी अन्तकालके भावके अनुसार उसी गतिमें जाता है।

  • नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥

नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस, उत्तर १२१।५)