श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 593, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
जितने दर्शनकार हैं, वे उन पदार्थोंको चाहे प्रकृतिके मानें, चाहे परमात्माके मानें, पर दार्शनिक दृष्टिसे वे उनको अपने नहीं मान सकते। अतः साधक उन सब पदार्थोंको ईश्वरके ही मानकर ईश्वरके अर्पण कर दें, तो उनका 'हम भगवान्के ही थे और भगवान्के ही रहेंगे' ऐसा भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध जाग्रत् हो जायगा।
'मामेवैष्यस्यसंशयम्' —मेरेमें मन-बुद्धि अर्पण करनेवाला होनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। कारण कि मैं तुझे नित्य प्राप्त हूँ। अप्राप्तिका अनुभव तो कभी प्राप्त न होनेवाले शरीर और संसारको अपना माननेसे, उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही होता है। नित्यप्राप्त तत्त्वका कभी अभाव नहीं हुआ और न हो सकता है। अगर तू मन, बुद्धि और स्वयंको मेरे अर्पण कर देगा, तो तेरा मेरे साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है।
स्मरण-सम्बन्धी विशेष बात
स्मरण तीन तरहका होता है—बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य। बोधजन्य स्मरणका कभी अभाव नहीं होता। जबतक सम्बन्धको न छोड़ें, तबतक सम्बन्धजन्य स्मरण बना रहता है। क्रियाजन्य स्मरण निरन्तर नहीं रहता। इन तीनों प्रकारके स्मरणका विस्तार इस तरह है—
(१) बोधजन्य स्मरण —अपना जो होनापन है, उसको याद नहीं करना पड़ता। परन्तु शरीरके साथ जो एकता मान ली है, वह भूल है। बोध होनेपर वह भूल मिट जाती है, फिर अपना होनापन स्वतःसिद्ध रहता है। गीतामें भगवान्के वचन हैं—'तू, मैं और ये राजालोग पहले नहीं थे, यह बात भी नहीं है और भविष्यमें नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका बारहवाँ श्लोक) अर्थात् निश्चित ही पहले थे और निश्चित ही पीछे रहेंगे। 'जो पहले सर्ग-महासर्ग और प्रलय-महाप्रलयमें था, वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर नष्ट होता है' (आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें 'वही यह प्राणिसमुदाय' तो परमात्माका अंश है और 'उत्पन्न हो-होकर नष्ट होनेवाला' शरीर है। अगर नष्ट होनेवाले भागका विवेकपूर्वक सर्वथा त्याग कर दें तो अपने होनेपनका स्पष्ट बोध हो जाता है। यह बोधजन्य स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि यह स्मरण अपने नित्य स्वरूपका है।
(२) सम्बन्धजन्य स्मरण —जिसको हम स्वयं मान लेते हैं, वह सम्बन्धजन्य स्मरण है, जैसे 'शरीर हमारा है, संसार हमारा है' आदि। यह माना हुआ सम्बन्ध तबतक नहीं मिटता, जबतक हम 'यह हमारा नहीं है' ऐसा नहीं मान लेते। परन्तु भगवान् वास्तवमें हमारे हैं; हम मानें तो हमारे हैं; नहीं मानें तो हमारे हैं, जानें तो हमारे हैं, नहीं जानें तो हमारे हैं, हमारे दीखें तो हमारे हैं, हमारे नहीं दीखें तो हमारे हैं। हम सब उनके अंश हैं और वे अंशी हैं। हम उनसे अलग नहीं हो सकते और वे हमसे अलग नहीं हो सकते। जबतक हम शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानते हैं, तबतक भगवान्का यह वास्तविक सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता। जब हम शरीर और संसारके सम्बन्धका अत्यन्त अभाव स्वीकार कर लेते हैं, तब भगवान्का नित्य-सम्बन्ध स्वतः जाग्रत् हो जाता है। फिर भगवान्का स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है।
(३) क्रियाजन्य स्मरण —क्रियाजन्य स्मरण अभ्यासजन्य होता है। जैसे स्त्रियाँ सिरपर जलका घड़ा रखकर चलती हैं तो अपने दोनों हाथोंको खुला रखती हैं और दूसरी स्त्रियोंके साथ बातें भी करती रहती हैं; परन्तु सिरपर रखे घड़ेकी सावधानी निरन्तर रहती है। नट रस्सेपर चलते हुए गाता भी है, बोलता भी है, पर रस्सेका ध्यान निरन्तर रहता है। ड्राइवर मोटर चलाता है, हाथसे गियर बदलता है, हैंडल घुमाता है और मालिकसे बातचीत भी करता है, पर रास्तेका ध्यान निरन्तर रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण क्रियाओंमें भगवान्को निरन्तर याद रखना अभ्यासजन्य स्मरण है।
इस अभ्यासजन्य स्मरणके भी तीन प्रकार हैं—
(क) संसारका कार्य करते हुए भगवान्को याद रखना—इसमें सांसारिक कार्यकी मुख्यता और भगवान्के स्मरणकी गौणता रहती है। अतः इसमें यह भाव रहता है कि संसारका काम बिगड़े नहीं, ठीक तरहसे होता रहे और साथ-साथ भगवान्का स्मरण भी होता रहे।
(ख) भगवान्को याद रखते हुए संसारका कार्य करना—इसमें भगवान्के स्मरणकी मुख्यता और सांसारिक कार्यकी गौणता रहती है। इसमें भगवान्के स्मरणमें भूल न हो—यह सावधानी रहती है और संसारके काममें भूल भी हो जाय तो उसकी परवाह नहीं होती। कारण कि साधकमें यह जागृति रहेगी कि संसारका काम सुधर जाय तो भी अन्तमें रहेगा नहीं और बिगड़ जाय तो भी अन्तमें रहेगा