भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

५२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

जितने दर्शनकार हैं, वे उन पदार्थोंको चाहे प्रकृतिके मानें, चाहे परमात्माके मानें, पर दार्शनिक दृष्टिसे वे उनको अपने नहीं मान सकते। अतः साधक उन सब पदार्थोंको ईश्वरके ही मानकर ईश्वरके अर्पण कर दें, तो उनका 'हम भगवान्के ही थे और भगवान्के ही रहेंगे' ऐसा भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध जाग्रत् हो जायगा।

'मामेवैष्यस्यसंशयम्' —मेरेमें मन-बुद्धि अर्पण करनेवाला होनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। कारण कि मैं तुझे नित्य प्राप्त हूँ। अप्राप्तिका अनुभव तो कभी प्राप्त न होनेवाले शरीर और संसारको अपना माननेसे, उनके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही होता है। नित्यप्राप्त तत्त्वका कभी अभाव नहीं हुआ और न हो सकता है। अगर तू मन, बुद्धि और स्वयंको मेरे अर्पण कर देगा, तो तेरा मेरे साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है।

स्मरण-सम्बन्धी विशेष बात

स्मरण तीन तरहका होता है—बोधजन्य, सम्बन्धजन्य और क्रियाजन्य। बोधजन्य स्मरणका कभी अभाव नहीं होता। जबतक सम्बन्धको न छोड़ें, तबतक सम्बन्धजन्य स्मरण बना रहता है। क्रियाजन्य स्मरण निरन्तर नहीं रहता। इन तीनों प्रकारके स्मरणका विस्तार इस तरह है—

(१) बोधजन्य स्मरण —अपना जो होनापन है, उसको याद नहीं करना पड़ता। परन्तु शरीरके साथ जो एकता मान ली है, वह भूल है। बोध होनेपर वह भूल मिट जाती है, फिर अपना होनापन स्वतःसिद्ध रहता है। गीतामें भगवान्के वचन हैं—'तू, मैं और ये राजालोग पहले नहीं थे, यह बात भी नहीं है और भविष्यमें नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका बारहवाँ श्लोक) अर्थात् निश्चित ही पहले थे और निश्चित ही पीछे रहेंगे। 'जो पहले सर्ग-महासर्ग और प्रलय-महाप्रलयमें था, वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर नष्ट होता है' (आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। इसमें 'वही यह प्राणिसमुदाय' तो परमात्माका अंश है और 'उत्पन्न हो-होकर नष्ट होनेवाला' शरीर है। अगर नष्ट होनेवाले भागका विवेकपूर्वक सर्वथा त्याग कर दें तो अपने होनेपनका स्पष्ट बोध हो जाता है। यह बोधजन्य स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है, कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि यह स्मरण अपने नित्य स्वरूपका है।

(२) सम्बन्धजन्य स्मरण —जिसको हम स्वयं मान लेते हैं, वह सम्बन्धजन्य स्मरण है, जैसे 'शरीर हमारा है, संसार हमारा है' आदि। यह माना हुआ सम्बन्ध तबतक नहीं मिटता, जबतक हम 'यह हमारा नहीं है' ऐसा नहीं मान लेते। परन्तु भगवान् वास्तवमें हमारे हैं; हम मानें तो हमारे हैं; नहीं मानें तो हमारे हैं, जानें तो हमारे हैं, नहीं जानें तो हमारे हैं, हमारे दीखें तो हमारे हैं, हमारे नहीं दीखें तो हमारे हैं। हम सब उनके अंश हैं और वे अंशी हैं। हम उनसे अलग नहीं हो सकते और वे हमसे अलग नहीं हो सकते। जबतक हम शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानते हैं, तबतक भगवान्का यह वास्तविक सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता। जब हम शरीर और संसारके सम्बन्धका अत्यन्त अभाव स्वीकार कर लेते हैं, तब भगवान्का नित्य-सम्बन्ध स्वतः जाग्रत् हो जाता है। फिर भगवान्का स्मरण नित्य-निरन्तर बना रहता है।

(३) क्रियाजन्य स्मरण —क्रियाजन्य स्मरण अभ्यासजन्य होता है। जैसे स्त्रियाँ सिरपर जलका घड़ा रखकर चलती हैं तो अपने दोनों हाथोंको खुला रखती हैं और दूसरी स्त्रियोंके साथ बातें भी करती रहती हैं; परन्तु सिरपर रखे घड़ेकी सावधानी निरन्तर रहती है। नट रस्सेपर चलते हुए गाता भी है, बोलता भी है, पर रस्सेका ध्यान निरन्तर रहता है। ड्राइवर मोटर चलाता है, हाथसे गियर बदलता है, हैंडल घुमाता है और मालिकसे बातचीत भी करता है, पर रास्तेका ध्यान निरन्तर रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण क्रियाओंमें भगवान्को निरन्तर याद रखना अभ्यासजन्य स्मरण है।

इस अभ्यासजन्य स्मरणके भी तीन प्रकार हैं—

(क) संसारका कार्य करते हुए भगवान्को याद रखना—इसमें सांसारिक कार्यकी मुख्यता और भगवान्के स्मरणकी गौणता रहती है। अतः इसमें यह भाव रहता है कि संसारका काम बिगड़े नहीं, ठीक तरहसे होता रहे और साथ-साथ भगवान्का स्मरण भी होता रहे।

(ख) भगवान्को याद रखते हुए संसारका कार्य करना—इसमें भगवान्के स्मरणकी मुख्यता और सांसारिक कार्यकी गौणता रहती है। इसमें भगवान्के स्मरणमें भूल न हो—यह सावधानी रहती है और संसारके काममें भूल भी हो जाय तो उसकी परवाह नहीं होती। कारण कि साधकमें यह जागृति रहेगी कि संसारका काम सुधर जाय तो भी अन्तमें रहेगा नहीं और बिगड़ जाय तो भी अन्तमें रहेगा

श्लोक ७]

  • साधक-संजीवनी *

५९३

नहीं। इसलिये इसमें भगवान्के स्मरणकी भूल नहीं होती।

(ग) कार्यको भगवान्का ही समझना—इसमें काम-धंधा करते हुए भी एक विलक्षण आनन्द रहता है कि 'मेरा अहोभाग्य है कि मैं भगवान्का ही काम करता हूँ, भगवान्की ही सेवा करता हूँ।' अतः इसमें भगवान्की स्मृति विशेषतासे रहती है। जैसे, कोई सज्जन अपनी कन्याके विवाह-कार्यके समय कन्याके लिये तरह-तरहकी वस्तुएँ खरीदता है, तरह-तरहके कार्य करता है, अनेक व्यक्तियोंको निमन्त्रण देता है; परन्तु अनेक प्रकारके कार्य करते हुए भी 'कन्याका विवाह करना है'—यह बात उसको निरन्तर याद रहती है। कन्यामें भगवान्के समान पूज्यभावपूर्वक सम्बन्ध नहीं होता तो भी उसके विवाहके लिये कार्य करते हुए उसकी याद निरन्तर रहती है, फिर भगवान्के लिये कार्य करते हुए भगवान्की पूज्यभावसहित अपनेपनकी मीठी स्मृति निरन्तर बनी रहे—इसमें कहना ही क्या है!

परिशिष्ट भाव —भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा—'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्मुक्तचेतसः'। तो इसपर अर्जुने आठवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें प्रश्न किया—'प्रयाणकाले च कथं त्रेयोऽसि नियतात्मभिः'। उसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि जो मनुष्य अन्तकालमें मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है (आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। परन्तु यह नियम केवल मेरी प्राप्तिके विषयमें नहीं है। मनुष्य जिसका भी स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है—यह सबके लिये सामान्य नियम है (आठवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)। अन्तकाल किसी भी समय आ सकता है। ऐसा कोई वर्ष, महीना, दिन, घण्टा, मिनट, क्षण नहीं है, जिसमें अन्तकाल न आ सके। इसलिये मनुष्यको नित्य-निरन्तर, सब समय मेरा स्मरण करना चाहिये—'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'। जो नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिये मेरी प्राप्ति सुलभ है (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); क्योंकि वह किसी भी समय शरीर छोड़ेगा तो मेरा स्मरण करते हुए ही छोड़ेगा और मेरेको ही प्राप्त होगा।

'मध्यर्पितमनोबुद्धिः' —सब समयमें भगवान्का स्मरण करनेसे साधकके मन-बुद्धि भगवान्के अर्पित हो जाते हैं। मन-बुद्धि अपने नहीं हैं, इनके साथ अपना सम्बन्ध ही नहीं है—इस प्रकार मन-बुद्धिमें अपनापन छोड़नेसे मन-बुद्धि स्वतः भगवान्के अर्पित होंगे; क्योंकि ये भगवान्की ही अपरा प्रकृति हैं। यद्यपि परा और अपरा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्की हैं, तथापि परा प्रकृतिका सम्बन्ध अपराके साथ नहीं है, प्रत्युत केवल भगवान्के साथ है; क्योंकि वह भगवान्का अंश है—'ममैवांशो जीवलोकै' (१५।७)। इसलिये साधक 'मध्यर्पितमनोबुद्धिः' तभी हो सकता है, जब वह अपराके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, अपराको उसके मालिक भगवान्के अर्पित कर दे अर्थात् अपराको अपना और अपने लिये कभी न माने।

यहाँ 'मन' के अन्तर्गत चित्तको और 'बुद्धि' के अन्तर्गत अहंकारको भी समझ लेना चाहिये। मन-बुद्धि अर्पित होनेसे भक्त निर्मम और निरहंकार हो जाता है।

वास्तवमें भक्त स्वयं भगवान्के अर्पित होता है। स्वयं अर्पित होनेसे मन-बुद्धि आदि सर्वस्व अपने-आप अर्पित हो जाता है। सर्वस्व भगवान्के अर्पित होनेसे सर्वस्व नहीं रहता, प्रत्युत केवल भगवान् रह जाते हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।

—◆—

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कही हुई अभ्यासजन्य स्मृतिका अब आगेके श्लोकमें वर्णन करते हैं।

भगवत्सम्बन्धी कार्य दो तरहका होता है—

(१) स्वरूपसे —भगवान्के नामका जप और कीर्तन करना; भगवान्की लीलाका श्रवण, चिन्तन, पठन-पाठन आदि करना—यह स्वरूपसे भगवत्सम्बन्धी काम है।

(२) भावसे —संसारका काम करते हुए भी 'जब सब संसार भगवान्का है, तब संसारका काम भी भगवान्का ही काम हुआ। इसको भगवान्के नाते ही करना है, भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही करना है। इस कामसे हमें कुछ लेना नहीं है। भगवान्ने हमें जिस वर्णमें पैदा किया है, जिस आश्रममें रखा है, उसमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार उचित काम करना है'—ऐसा भाव रहनेसे वह काम सांसारिक होनेपर भी भगवान्का हो जाता है।

[सातवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने सात बातें कही थीं; उन्हीं सात बातोंपर अर्जुने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये और यह प्रकरण भी सात ही श्लोकोंमें समाप्त हुआ।]

५९४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन् ॥ ८ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !करनेवालेअनुचित्तयन्= चिन्तन करता हुआ
अभ्यास-चेतसा= चित्तसे(शरीर छोड़ने-
योगयुक्तेन= अभ्यासयोगसे युक्तपरमम्= परमवाला मनुष्य)
नान्यगामिना= (और) अन्यकादिव्यम्= दिव्ययाति
चिन्तन नपुरुषम्= पुरुषकाहो जाता है।

व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें जो सगुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]

‘अभ्यासयोगयुक्तेन’ —इस पदमें ‘अभ्यास’ और ‘योग’—ये दो शब्द आये हैं। संसारसे मन हटाकर परमात्मामें बार-बार मन लगानेका नाम अभ्यास है और समताका नाम ‘योग’ है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८)। अभ्यासमें मन लगनेसे प्रसन्नता होती है और मन न लगनेसे खिन्नता होती है। यह अभ्यास तो है, पर अभ्यासयोग नहीं है। अभ्यासयोग तभी होगा, जब प्रसन्नता

और खिन्नता—दोनों ही न हों। अगर चित्तमें प्रसन्नता और खिन्नता हो भी जायँ, तो भी उनको महत्त्व न दे, केवल अपने लक्ष्यको ही महत्त्व दे। अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहना भी योग है। ऐसे योगसे युक्त चित्त हो।

‘चेतसा नान्यगामिना’ —चित्त अन्यगामी न हो अर्थात् एक परमात्माके सिवाय दूसरा कोई लक्ष्य न हो।

‘परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन्’ —ऐसे चित्तसे परम दिव्य पुरुषका अर्थात् सगुण-निराकार परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उसी परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

परिशिष्ट भाव —अर्जुनने प्रश्न किया था—‘प्रयाणकाले च कथं त्रेयोऽसि नियतात्मभिः’ (८।२)। उस प्रश्नका उत्तर देकर अब आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें अन्तकालमें स्मरण करनेवालोंके प्रकारका वर्णन करते हैं।

सम्बन्ध —अब भगवान् ध्यान करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी सगुण-निराकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं।

कविं पुराणमनुशासितारमणोरेणीयांसमनुस्मरेद्यः ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥

यः= जोअणीयांसम्= अत्यन्त सूक्ष्म,आदित्यवर्णम्= सूर्यकी तरह
कविम्= सर्वज्ञ,सर्वस्य= सबकाप्रकाशस्वरूप
पुराणम्= अनादि,धातारम्= धारण-पोषणअर्थात् ज्ञानस्वरूप
अनुशासितारम्= सबपर शासनकरनेवाला,अचिन्त्यरूपम्=—ऐसे अचिन्त्य
करनेवाला,तमसः= अज्ञानसेस्वरूपका
अणोः= सूक्ष्मसेपरस्तात्= अत्यन्त परे,अनुस्मरेत्= चिन्तन करता है।

व्याख्या —‘कविम्’—सम्पूर्ण प्राणियोंको और उनके सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मोंको जाननेवाले होनेसे उन परमात्माका नाम ‘कवि’ अर्थात् सर्वज्ञ है।

‘पुराणम्’ —वे परमात्मा सबके आदि होनेसे ‘पुराण’ कहे जाते हैं।

‘अनुशासितारम्’ —हम देखते हैं तो नेत्रोंसे देखते हैं।

नेत्रोंके ऊपर मन शासन करता है, मनके ऊपर बुद्धि और बुद्धिके ऊपर ‘अहम्’ शासन करता है तथा ‘अहम्’ के ऊपर भी जो शासन करता है, जो सबका आश्रय, प्रकाशक और प्रेरक है, वह (परमात्मा) ‘अनुशासिता’ है।

दूसरा भाव यह है कि जीवोंका कर्म करनेका जैसा-जैसा स्वभाव बना है, उसके अनुसार ही परमात्मा (वेद,

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

५१५

शास्त्र, गुरु, सन्त आदिके द्वारा) कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और मनुष्योंके पुराने पाप-पुण्यरूप कर्मोंके अनुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर उन मनुष्योंको शुद्ध, निर्मल बनाते हैं। इस प्रकार मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले और मनुष्योंके पाप-पुण्यरूप पुराने कर्मोंका (फल देकर) नाश करनेवाले होनेसे परमात्मा 'अनुशासिता' हैं।

'अणोरीणीयांसम्' —परमात्मा परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा मन-बुद्धिके विषय नहीं हैं; मन-बुद्धि आदि उनको पकड़ नहीं पाते। मन-बुद्धि तो प्रकृति-का कार्य होनेसे प्रकृतिको भी पकड़ नहीं पाते, फिर परमात्मा तो उस प्रकृतिसे भी अत्यन्त परे हैं! अतः वे परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं अर्थात् सूक्ष्मताकी अन्तिम सीमा हैं।

'सर्वस्य धातारम्' —परमात्मा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले हैं, उनका पोषण करनेवाले हैं। उन सभीको परमात्मासे ही सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः वे परमात्मा सबका धारण-पोषण करनेवाले कहे जाते हैं।

'तमसः परस्तात्' —परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे हैं, अज्ञानसे सर्वथा रहित हैं। उनमें लेशमात्र भी अज्ञान नहीं

परिशिष्ट भाव —परमात्माको 'कविम्' कहनेका तात्पर्य है कि उसके ज्ञानके बाहर कुछ भी नहीं है। 'पुराणम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह अनादि है, कालसे भी अतीत अर्थात् कालका भी प्रकाशक है। 'अनुशासितारम्' कहनेका तात्पर्य है कि सब स्वाभाविक ही उसके शासनमें हैं। वह जीव और जगत्—दोनोंका ही शासक है—

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरत्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतर० १।१०)

'प्रकृति तो विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों—(विनाशशील और अविनाशी- ) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।'

'धातारम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा सबका पालन-पोषण करनेवाला है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। 'आदित्यवर्णम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे सूर्यमें स्वतः—स्वाभाविक नित्य प्रकाश रहता है, ऐसे ही परमात्मामें स्वतः—स्वाभाविक नित्य ज्ञान, बोध रहता है। वह परमात्मा ज्ञानस्वरूप है और सबका प्रकाशक है (गीता—तेरहवें अध्यायका तैत्तिरीसवाँ श्लोक)। 'तमसः परस्तात्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा अज्ञानसे अथवा अपरासे अत्यन्त परे हैं—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' (गीता १५।१८)।

सम्बन्ध—अब अन्तकालके चिन्तनके अनुसार गति बताते हैं।

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।

भूवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥

सः= वहअचलेन= अचलभूवोः= भुकूटीके
भक्त्या,मनसा= मनसेमध्ये= मध्यमें
युक्तः= भक्तियुक्त मनुष्य= औरप्राणम्= प्राणोंको
प्रयाणकाले= अन्त समयमेंयोगबलेन= योगबलके द्वारासम्यक्= अच्छी तरहसे

५९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

आवेश्य | = प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) | तम् | = उस | पुरुषम् | = पुरुषको ---|---|---|---|---|--- | | परम् | = परम | एव | = ही | | दिव्यम् | = दिव्य | उपैति | = प्राप्त होता है।

व्याख्या—‘प्रयाणकाले मनसाचलेन ..... स तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ —यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं।

अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।

पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम ‘योगबल’ है। उस योगबलके द्वारा दोनों ध्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शरीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।

‘तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ पदोंका तात्पर्य है कि जिस परमात्मतत्त्वका पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णन हुआ है, उसी दिव्य परम सगुण-निराकार परमात्माको वह प्राप्त हो जाता है।

आठवें श्लोकमें जो बात कही गयी थी, उसीको नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहकर इन तीन श्लोकोंके प्रकरणका उपसंहार किया गया है।

परिशिष्ट भाव—‘भक्त्या युक्तः’ का तात्पर्य है कि संसारकी आसक्ति मिट जानेसे उस साधकका एक परमात्मामें ही आकर्षण रहता है, अन्यमें आकर्षण नहीं रहता। संसारी मनुष्य तो अपरामें आकृष्ट रहते हैं, पर जो अपराको छोड़कर भगवान्में आकृष्ट हो जाता है, वह भक्त हो जाता है। संसारी मनुष्य शरीर-संसारमें आसक्त होनेसे ‘विभक्त’ अर्थात् भगवान्से अलग हो जाते हैं, पर भगवान्में लगा हुआ साधक विभक्त नहीं रहता, प्रत्युत ‘भक्त’ अर्थात् भगवान्से एक (अभिन्न) हो जाता है।

‘योगबलेन’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले किये हुए योगाभ्यासके कारण अन्त समयमें होनेवाली अशक्त अवस्था उसको बाधा नहीं पहुँचा सकती, उसमें कोई विकार पैदा नहीं कर सकती। प्राणायाम आदिका बल ‘योगबल’ है।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें निर्गुण-निराकारकी प्राप्तिके उपायका उपक्रम करते हैं।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्गहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥

श्लोक १२-१३ ]

  • साधक-संजीवनी *

५९७

वेदविदः= वेदवेत्तालोगयत्= जिसकोचरन्ति= पालन करते हैं,
यत्= जिसकोविशन्ति= प्राप्त करते हैं (और)तत्= वह
अक्षरम्= अक्षरयत्= (साधक) जिसकी
(प्राप्तिकी)पदम्= पद (में)
वदन्ति= कहते हैं,इच्छन्तः= इच्छा करते हुएते= तेरे लिये
वीतरागाः= वीतरागब्रह्मचर्यम्= ब्रह्मचर्यकासङ्गहेण= संक्षेपसे
यतयः= यतिप्रवक्ष्ये= कहूँगा।

व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें जो निर्गुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]

‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ —वेदोंको जाननेवाले पुरुष जिसको अक्षर-निर्गुण-निराकार कहते हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता, जो सदा-सर्वदा एकरूप, एकरस रहता है और जिसको इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ कहा गया है, उसी निर्गुण-निराकार तत्त्वका यहाँ ‘अक्षर’ नामसे वर्णन हुआ है।

‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ —जिनके अन्तःकरणमें रागका अत्यन्त अभाव हो गया है; अतः जिनका अन्तःकरण महान् निर्मल है और जिनके हृदयमें सर्वोपरि अद्वितीय परम तत्त्वको पानेकी उत्कट लगन लगी है, ऐसे प्रयत्नशील यति महापुरुष उस तत्त्वमें प्रवेश करते हैं—उसको प्राप्त करते हैं।

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें गौणतासे चारों आश्रमोंका वर्णन ले सकते हैं; जैसे—‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ पदोंसे गृहस्थाश्रमका संकेत है; क्योंकि वेदोंका अध्ययन करना ब्राह्मणका खास काम है। ‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ पदोंसे संन्यास और वानप्रस्थाश्रमका संकेत है। ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ पदोंसे ब्रह्मचर्याश्रमका संकेत है।

मुक्ति सभी वर्णों, आश्रमोंमें हो सकती है। इसलिये भगवान्ने आश्रमोंका स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं किया है और वर्णोंका स्पष्टरूपसे वर्णन भी कर्तव्य-पालनकी दृष्टिसे किया है। अर्जुन क्षत्रिय थे और वे अपने युद्धरूप कर्तव्यको छोड़ना चाहते थे। इसलिये भगवान्ने उनको अपने कर्तव्यमें लगानेके उद्देश्यसे वर्णधर्मका वर्णन किया। युद्ध करना वर्णधर्म है, आश्रमधर्म नहीं।

सम्बन्ध—अन्तकालमें उस निर्गुण-निराकार तत्त्वकी प्राप्तिकी फलसहित विधि बतानेके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूढ्यार्धायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्नामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥

५९८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

सर्वद्वाराणि= (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंकोआधाय= स्थापित करकेउच्चारण (और)
संयम्य= रोककरयोगधारणाम्= योगधारणामेंमाम्
मनः= मनकाआस्थितः= सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआअनुस्मरन्
हृदि= हृदयमेंयः= जो साधकदेहम्
निरुध्य= निरोध करकेओम्= 'ॐ'त्यजन्
= औरइति= इसप्रयाति
आत्मनः= अपनेएकाक्षरम्= एक अक्षरसः
प्राणम्= प्राणोंकोब्रह्म= ब्रह्मकापराम्
मूर्ध्नि= मस्तकमेंव्याहरन्= (मानसिक)गतिम्
याति= प्राप्त होता है।

व्याख्या—‘सर्वद्वाराणि संयम्य’ —(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका—इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र—त्याग और मल—त्याग—इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा—इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।

‘मनो हृदि निरुध्य च’ —मनका हृदयमें ही निरोध कर ले अर्थात् मनको विषयोंकी तरफ न जाने दे। इससे मन अपने स्थान—(हृदय—) में रहेगा।

‘मूर्ध्नाधायात्मनः प्राणम्’ —प्राणोंको मस्तकमें धारण कर ले अर्थात् प्राणोंपर अपना अधिकार प्राप्त करके दसवें द्वार—ब्रह्मरश्मिमें प्राणोंको रोक ले।

‘आस्थितो योगधारणाम्’ —इस प्रकार योगधारणामें

परिशिष्ट भाव —इन श्लोकोंमें योगाभ्यास करनेवाले अद्वैतवादीका वर्णन है। ‘व्याहरन्’ पदसे मानसिक उच्चारण समझना चाहिये; क्योंकि मनका हृदयमें निरोध करनेपर तथा प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करनेपर वाचिक उच्चारण होना असम्भव है।

सम्बन्ध— जिसके पास योगका बल होता है और जिसका प्राणोंपर अधिकार होता है, उसको तो निर्गुण-निराकारकी प्राप्ति हो जाती है; परन्तु दीर्घकालीन अभ्यास-साध्य होनेसे यह बात सबके लिये कठिन पड़ती है। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अपनी अर्थात् सगुण-साकारकी सुगमतापूर्वक प्राप्तिकी बात कहते हैं।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!यः= जो मनुष्यनित्यशः= नित्य-
अनन्यचेताः= अनन्य चित्तवालामाम्= मेरासततम्= निरन्तर
  • समग्ररूपका प्रकरण होनेसे यहाँ ‘माम्’ शब्दसे निर्गुण-निराकारका चिन्तन लिया गया है।

श्लोक १४]

  • साधक-संजीवनी *

५११

स्मरति= स्मरण करता है,मुझमें लगे हुएसुलभः= सुलभ हूँ अर्थात्
तस्य= उसयोगिनः= योगीके लियेउसको सुलभतासे
नित्ययुक्तस्य= नित्य-निरन्तरअहम्= मैंप्राप्त हो जाता हूँ।

व्याख्या —[सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें जो सगुण-साकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]

'अनन्यचेताः' —जिसका चित्त भगवान्को छोड़कर किसी भी भोगभूमिमें, किसी भी ऐश्वर्यमें किंचिन्मात्र भी नहीं जाता; जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के सिवाय अन्य किसीका कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है, वह पुरुष अनन्य चित्त्वाला है। जैसे, पतिव्रता स्त्रीका पतिका ही व्रत, नियम रहता है। पतिके सिवाय उसके मनमें अन्य किसी भी पुरुषका रागपूर्वक चिन्तन कभी होता ही नहीं। शिष्य गुरुके और सुपुत्र माँ-बापके परायण रहता है, उनका दूसरा कोई इष्ट नहीं होता। इसी तरहसे भक्त भगवान्के ही परायण रहता है।

यहाँ 'अनन्यचेताः' पद सगुण-उपासना करनेवालेका वाचक है। सगुण-उपासनामें विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जो भगवान्के स्वरूप हैं, उनमेंसे जो जिस स्वरूपकी उपासना करता है, उसी स्वरूपका चिन्तन हो। परन्तु दूसरे स्वरूपोंको अपने इष्टसे अलग न माने और अपने-आपको भी अपने इष्टके सिवाय और किसीका न माने, तो उसका अन्यकी तरफ मन नहीं जाता। तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं केवल भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मेरा और कोई नहीं है तथा मैं और किसीका नहीं हूँ' ऐसा भाव होनेसे वह 'अनन्यचेताः' हो जाता है।

'सततं यो मां स्मरति नित्यशः' —'सततम् ' का अर्थ होता है—निरन्तर अर्थात् जबसे नींद खुले, तबसे लेकर गाढ़ नींद आनेतक जो मेरा स्मरण करता है; और 'नित्यशः' का अर्थ होता है—सदा अर्थात् इस बातको जिस दिनसे पकड़ा, उस दिनसे लेकर मृत्युतक जो मेरा स्मरण करता है।

'तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः' —ऐसे नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ। यहाँ 'नित्ययुक्त' पद चित्तके द्वारा निरन्तर चिन्तन करनेवालेका वाचक नहीं है, प्रत्युत ब्रह्मा-प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे खुद भगवान्में लगनेवालेका वाचक है। जैसे कोई ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपनेमें

स्थित रहता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ; क्षत्रिय, वैश्य आदि नहीं हूँ।' वह अपने ब्राह्मणपनेको याद करे या न करे, पर उसके ब्राह्मणपनेमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे ही 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस नित्य-सम्बन्धमें दृढ़ रहनेवाला ही नित्ययुक्त है। ऐसे नित्ययुक्त योगीको भगवान् सुगमतासे मिल जाते हैं।

भगवान्के सिवाय शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि अपने नहीं हैं, केवल भगवान् ही अपने हैं—ऐसा दृढ़तासे माननेपर भगवान् सुलभ हो जाते हैं। परन्तु शरीर आदिको अपना मानते रहनेसे भगवान् सुलभ नहीं होते।

भगवान्के साथ अपनी भिन्नता तथा संसारके साथ अपनी एकता कभी हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। इस रीतिसे मनुष्यकी भगवान्के साथ स्वतः—स्वाभाविक अभिन्नता है और संसारके साथ स्वतः—स्वाभाविक भिन्नता है। परन्तु भूलके कारण मनुष्य अपनेको भगवान्से और भगवान्को अपनेसे अलग मान लेता है तथा अपनेको शरीरका तथा शरीरको अपना मान लेता है। इस विपरीत धारणाके कारण ही यह मनुष्य जन्म-मरणके चक्रमें फँसा रहता है। जब यह विपरीत धारणा सर्वथा मिट जाती है, तब भगवान् स्वतः सुलभ हो जाते हैं।

आठवेंसे तेरहवें श्लोकतक सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारका स्मरण बताया गया। इन दोनों स्मरणोंमें प्राणायामकी मुख्यता रहती है, जिसको सिद्ध करना कठिन है। अन्तकाल-जैसी विकट अवस्थामें भी प्राणायामके बलसे प्राणोंको ध्रुवोंके मध्यमें स्थापित कर सकें अथवा मूर्ध्नि-(दशम द्वार-) में लगा सकें—ऐसा प्राणोंपर अधिकार रहनेकी आवश्यकता है। परन्तु भगवान्के स्मरणमें यह कठिनता नहीं है, क्योंकि यहाँ प्राणोंका खयाल नहीं है। यहाँ तो भगवान्के साथ साधकका स्वयंका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिकी भी जरूरत नहीं है। अतः इसमें अन्तकालमें प्राण आदिको लगानेकी जरूरत नहीं है। जैसे किसी वस्तुका बीमा होनेपर वस्तुके बिगड़ने, टूटने-फूटनेकी चिन्ता नहीं रहती, ऐसे ही शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देनेपर साधकको अपनी गतिके विषयमें कभी किंचिन्मात्र

६००

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

भी चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह साधन क्रियाजन्य | जागृति है। अतः इसमें कठिनताका नामोनिशान नहीं है। अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्धकी | इसीसे भगवान्ने अपने-आपको सुलभ बताया है।

परिशिष्ट भाव—‘अनन्यचेताः’ —भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय अन्यकी सत्ता न होनेसे उसका मन अन्य जगह कैसे जायगा? क्यों जायगा? कहाँ जायगा? इसलिये वह स्वतः अनन्यचित्त्वाला हो जाता है।

‘सततं यो मां स्मरति नित्यशः’ —एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है। जो करते हैं, वह क्रिया है और जो अपने-आप होता है, वह स्मरण है। जैसे, गीताके अन्तमें अर्जुनने कहा—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) तो वह स्मृति क्रिया नहीं है, प्रत्युत भगवान्के साथ अपने नित्य सम्बन्धकी स्वतः होनेवाली स्मृति है। भगवान्के स्मरणमें खास हेतु उनमें अपनापन है। भगवान् ही मेरे हैं और मेरे लिये हैं—इस प्रकार भगवान्में अपनापन होनेसे स्वतः भगवान्में प्रेम होता है और जिसमें प्रेम होता है, उसका स्मरण अपने-आप और नित्य-निरन्तर होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मध्यासक्तमनाः’ पदसे अपनेमें आसक्ति अर्थात् प्रेम होनेकी बात कही है। तात्पर्य है कि केवल भगवान्को ही अपना और अपने लिये माननेसे साधककी भगवान्में प्रियता हो जाती है। भगवान्में प्रियता होनेके बाद फिर भगवान्का स्मरण स्वतः होता है।

‘नित्ययुक्तस्य’ —नित्य-निरन्तर भगवान्के साथ जुड़ा हुआ होनेसे भक्तको ‘नित्ययुक्त’ कहा गया है। सातवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’ पदोंसे भी यही बात कही गयी है। ‘नित्ययुक्तस्य’ पदसे श्लोकके पूर्वाधर्ममें आयी सभी बातोंका समाहार हो जाता है।

‘तस्याहं सुलभः पार्थ’ —भगवान्ने महात्माको तो दुर्लभ बताया है—‘स महात्मा सुदुर्लभः’ (गीता ७।१९), पर यहाँ अपनेको सुलभ बताया है। इसका तात्पर्य है कि संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत उनके तत्त्वको जानकर उनके शरण होनेवाले भक्त दुर्लभ हैं। कारण कि भगवान्को दृढ़े तो वे सब जगह मिल जायेंगे, पर भगवान्का प्यारा भक्त कहीं-कहीं ही मिलेगा—

हरि दुरलभ नहि जगतमें, हरिजन दुरलभ होय। हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहि एक होय॥

भगवान् कृपा करके जो मनुष्यशरीर देते हैं, उस शरीरसे जीव अनेक योनियोंमें तथा नरकोंमें भी जा सकता है। परन्तु भक्त कृपा करके भगवान्की ही प्राप्ति करता है—

हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत। हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥

वास्तवमें जो नित्यप्राप्त है, उसमें सुलभता-दुर्लभता कहना बनता ही नहीं। परन्तु लोगोंने उसको दुर्लभ (कठिन) मान रखा है, इस वृत्तिको हटानेके लिये भगवान्ने अपनेको सुलभ बताया है। जिसकी खुदकी सत्ता है ही नहीं, उस असत् (शरीर-संसार) को सत्ता और महत्ता देनेसे तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्यप्राप्त परमात्मा दुर्लभ हो रहे हैं। असत्को सत्ता और महत्ता न दें तो परमात्माकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। असत् है और वह अपना तथा अपने लिये है—ऐसा मानना ही असत्को सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना है।

सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें भगवान् अपनी प्राप्तिका माहात्म्य बताते हैं।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।

नाजुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥

महात्मानः= महात्मालोगदुःखोंके घरवाले
माम्= मुझे(और)पुनर्जन्म = पुनर्जन्मको
उपेत्य= प्राप्त करकेअशाश्वतम् = अशाश्वत अर्थात्न, आजुवन्ति = प्राप्त नहीं होते;
दुःखालयम्= दुःखालय अर्थात्निरन्तर बदलने-(क्योंकि वे)

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

६०९

परमात्= परमगताः= प्राप्त हो गये हैंप्रेमकी प्राप्ति हो
संसिद्धिम्= सिद्धिकोअर्थात् उनको परमगयी है।

व्याख्या —‘मायुपेत्य पुनर्जन्म ’ संसिद्धि परमां गताः—‘मायुपेत्य ’ का तात्पर्य है कि भगवान्के दर्शन कर ले, भगवान्को तत्त्वसे जान ले अथवा भगवान्में प्रविष्ट हो जाय तो फिर पुनर्जन्म नहीं होता। पुनर्जन्मका अर्थ है—फिर शरीर धारण करना। वह शरीर चाहे मनुष्यका हो, चाहे पशु-पक्षी आदि किसी प्राणीका हो, पर उसे धारण करनेमें दुःख-ही-दुःख है। इसलिये पुनर्जन्मको दुःखालय अर्थात् दुःखोंका घर कहा गया है।

मरनेके बाद यह प्राणी अपने कर्मोंके अनुसार जिस योनियोंमें जन्म लेता है, वहाँ जन्म-कालमें जेसे बाहर आते समय उसको वैसा कष्ट होता है, जैसा कष्ट मनुष्यको शरीरकी चमड़ी उतारते समय होता है। परन्तु उस समय वह अपना कष्ट, दुःख किसीको बता नहीं सकता, क्योंकि वह उस अवस्थामें महान् असमर्थ होता है। जन्मके बाद बालक सर्वथा परतन्त्र होता है। कोई भी कष्ट होनेपर वह रोता रहता है,—पर बता नहीं सकता। थोड़ा बड़ा होनेपर उसको खाने-पीनेकी चीजें, खिलौने आदिकी इच्छा होती है और उनकी पूर्ति न होनेपर बड़ा दुःख होता है। पढ़ाईके समय शासनमें रहना पड़ता है। रातों जागकर अभ्यास करना पड़ता है तो कष्ट होता है। विद्या भूल जाती है तथा पढ़नेपर उत्तर नहीं आता तो दुःख होता है। आपसमें ईर्ष्या, द्वेष, डाह, अभिमान आदिके कारण हृदयमें जलन होती है। परीक्षामें फेल हो जाय तो मूर्खताके कारण उसका इतना दुःख होता है कि कई आत्महत्यातक कर लेते हैं।

जवान होनेपर अपनी इच्छाके अनुसार विवाह आदि न होनेसे दुःख होता है। विवाह हो जाता है तो पत्नी अथवा पति अनुकूल न मिलनेसे दुःख होता है। बाल-बच्चे हो जाते हैं तो उनका पालन-पोषण करनेमें कष्ट होता है। लड़कियाँ बड़ी हो जाती हैं तो उनका जल्दी विवाह न होनेपर माँ-बापकी नींद उड़ जाती है, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, हरदम बेचैनी रहती है।

वृद्धावस्था आनेपर शरीरमें असमर्थता आ जाती है। अनेक प्रकारके रोगोंका आक्रमण होने लगता है। सुखसे

उठना-बैठना, चलना-फिरना, खाना-पीना आदि भी कठिन हो जाता है। घरवालोंके द्वारा तिरस्कार होने लगता है। उनके अपशब्द सुनने पड़ते हैं। रातमें खौंसा आती है। नींद नहीं आती। मरनेके समय भी बड़े भयंकर कष्ट होते हैं। ऐसे दुःख कहाँतक कहे? उनका कोई अन्त नहीं।

मनुष्य-जैसा ही कष्ट पशु-पक्षी आदिको भी होता है। उनको शीत-घाम, वर्षा-हवा आदिसे कष्ट होता है। बहुत-से जंगली जानवर उनके छोटे बच्चोंको खा जाते हैं तो उनको बड़ा दुःख होता है। इस प्रकार सभी योनियोंमें अनेक तरहके दुःख होते हैं। ऐसे ही नरकोंमें और चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगने पड़ते हैं। इसलिये पुनर्जन्मको ‘दुःखालय’ कहा गया है।

पुनर्जन्मको ‘अशाश्वत’ कहनेका तात्पर्य है कि कोई भी पुनर्जन्म (शरीर) निरन्तर नहीं रहता। उसमें हरदम परिवर्तन होता रहता है। कहीं किसी भी योनियोंमें स्थायी रहना नहीं होता। थोड़ा सुख मिल भी जाता है तो वह भी चला जाता है और शरीरका भी अन्त हो जाता है। नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें इसी पुनर्जन्मको मौतका रास्ता कहा है—‘मृत्युसंसारवर्त्तनी ।’

यहाँ भगवान्को ‘मेरी प्राप्ति होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता’—इतना ही कहना पर्याप्त था, फिर भी पुनर्जन्मके साथ ‘दुःखालय’ और ‘अशाश्वत’—ये दो विशेषण क्यों दिये गये? ये दो विशेषण देनेसे यह एक भाव निकलता है कि जैसे भगवान् भक्तजनोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना करनेके लिये पृथ्वीपर अवतार लेते हैं, ऐसे ही भगवान्को प्राप्त हुए भक्तलोग भी साधु पुरुषोंकी रक्षा, दुष्टोंकी सेवा और धर्मका अच्छी तरहसे पालन करने तथा करवानेके लिये कारक पुरुषके रूपमें, सत्तके रूपमें इस पृथ्वीपर जन्म ले सकते हैं* अथवा जब भगवान् अवतार लेते हैं, तब उनके साथ पार्पदके रूपमें भी (गवालबालोंकी तरह) वे भक्तजन पृथ्वीपर जन्म ले सकते हैं। परन्तु उन भक्तोंका यह जन्म दुःखालय और अशाश्वत नहीं होता; क्योंकि उनका जन्म कर्मजन्य नहीं होता, प्रत्युत

  • सन्तोने कहा है—

परित्राणाय साधूनां सेवां कर्तुं च दुष्कृताम्। धर्मसम्पालनार्थाय सम्भवन्ति कलौ युगे॥

६०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

भगवद्विच्छासे होता है।

जो आरम्भसे ही भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन साधकोंको भी भगवान्ने 'महात्मा' कहा है (नवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), जो भगवत्त्वसे अभिन्न हो जाते हैं, उनको भी 'महात्मा' कहा है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और जो वास्तविक प्रेमको प्राप्त हो जाते हैं, उनको भी 'महात्मा' कहा है (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि असत् शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध होनेसे मनुष्य 'अल्पात्मा' होते हैं; क्योंकि वे शरीर-संसारके आश्रित होते हैं। अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर वे 'आत्मा' होते हैं; क्योंकि उनमें अणुरूपसे 'अहम्' की गंध रहनेकी संभावना होती है। भगवान्के साथ अभिन्नता होनेपर वे 'महात्मा' होते हैं; क्योंकि वे भगवन्निष्ठ होते हैं, उनकी अपनी कोई स्वतन्त्र स्थिति नहीं होती।

भगवान्ने गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि योगोंमें 'महात्मा' शब्दका प्रयोग नहीं किया है। केवल भक्तियोगमें ही भगवान्ने 'महात्मा' शब्दका प्रयोग किया है। इससे सिद्ध होता है कि गीतामें भगवान् भक्तिको ही सर्वोपरि मानते हैं।

महात्माओंका पुनर्जन्मको प्राप्त न होनेका कारण यह है कि वे परम सिद्धिको अर्थात् परम प्रेमको प्राप्त हो गये हैं—'संसिद्धिं * परमां गताः।' जैसे लोभी व्यक्तिको जितना धन मिलता है, उतना ही उसको थोड़ा मालूम देता है और उसकी धनकी भूख उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है, ऐसे ही अपने अंशी भगवान्को पहचान लेनेपर भक्तमें प्रेमकी

परिशिष्ट भाव —गीताके सातवें अध्यायमें तो संसारको परमात्माका स्वरूप कहा गया है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), पर यहाँ उसको दुःखालय अर्थात् दुःखोंका घर कहा गया है—'दुःखालयम्'। इसका तात्पर्य है कि जो मनुष्य सांसारिक वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेता है, उसके लिये तो संसार भयंकर दुःख देनेवाला है, पर जो वस्तु और क्रियासे व्यक्तियोंकी सेवा करता है, उसके लिये संसार परमात्माका स्वरूप है। सुखकी आशा, कामना और भोग महान् दुःखोंके कारण हैं। सुख भोगनेवाला दुःखसे कभी बच सकता ही नहीं—यह अकाट्य नियम है। इसलिये वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेना ही नहीं है। जिस क्षण सुखबुद्धिका त्याग है, उसी क्षण परमात्माकी प्राप्ति है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)।

जीव उस समय परमात्माका अंश है, जिसके रोम-रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं! पर जीव फँस गया अपरा प्रकृतिके तुच्छ-से-तुच्छ अंश एक शरीरमें! इसलिये जहाँ कोरा आनन्द-ही-आनन्द है, वहाँ जीव कोरा दुःख-ही-दुःख पा रहा है। जैसे—गायके थनोंमें जहाँ केवल दूध-ही-दूध है, वहाँ रहकर चींचड़ केवल खून-ही-खून पीता है। गोस्वामी तुलसीदासजी

  • यहाँ 'सिद्धि' शब्दके साथ 'सम्' उपसर्ग और 'परमाम्' विशेषण देनेका तात्पर्य है कि इससे बढ़कर कोई भी सिद्धि नहीं है। कारण कि जीव भगवान्का अंश है और जब वह सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाता है, तब कोई भी सिद्धि बाकी नहीं रहती।

भूख बढ़ती रहती है, उसको प्रतिक्षण वर्धमान, असौम्य, अगाध, अनन्त प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है। यह प्रेम भक्तिकी अन्तिम सिद्धि है। इसके समान दूसरी कोई सिद्धि है ही नहीं।

विशेष बात

गीताका अध्ययन करनेसे ऐसा असर पड़ता है कि भगवान्ने गीतामें अपनी भक्तिकी बहुत विशेषतासे महिमा गायी है। भगवान्ने भक्तको सम्पूर्ण योगियोंमें युक्ततम (सबसे श्रेष्ठ) कहा है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) और अपने-आपको भक्तके लिये सुलभ बताया है (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। परन्तु अपने आग्रहका त्याग करके कोई भी साधक केवल कर्मयोग, केवल ज्ञानयोग अथवा केवल भक्तियोगका अनुष्ठान करे तो अन्तमें वह एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाता है। इसका कारण यह है कि साधकोंकी दृष्टिमें तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन भेद हैं, पर साध्यतत्त्व एक ही है। साध्यतत्त्वमें भिन्नता नहीं है। परन्तु इसमें एक बात विचार करनेकी है कि जिस दर्शनमें ईश्वर, भगवान्, परमात्मा सर्वोपरि हैं—ऐसी मान्यता नहीं है, उस दर्शनके अनुसार चलनेवाले असत्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके मुक्त तो हो जाते हैं; पर अपने अंशीकी स्वीकृतिके बिना उनको परम प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती और परम प्रेमकी प्राप्तिके बिना उनको प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द नहीं मिलता। उस प्रतिक्षण वर्धमान आनन्दको, प्रेमको प्राप्त होना ही यहाँ परमसिद्धिको प्राप्त होना है।

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

६०३

महाराज कहते हैं—

आनंद-सिंधु-मध्य तव बासा।

बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ (विनयपत्रिका १३६।२)

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन!पुनःलौटकरमाम्= मुझे
आब्रह्मभुवनात्-ब्रह्मलोकतकसंसारमेंआनाउपेत्य= प्राप्त होनेपर
लोकाः= सभी लोकपड़ता है;पुनर्जन्म= पुनर्जन्म
पुनरावर्तिनः= पुनरावर्तीवाले हैंतु= परन्तु= नहीं
अर्थात् वहाँ जानेपरकौन्तेय= हे कौन्तेय!विद्यते= होता।

व्याख्या— * 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो- र्जुन'—हे अर्जुन! ब्रह्माजीके लोकको लेकर सभी लोक पुनरावर्ती हैं, अर्थात् ब्रह्मलोक और उससे नीचेके जितने लोक (सुखभोग-भूमियाँ) हैं, उनमें रहनेवाले सभी प्राणियोंको उन-उन लोकोंके प्रापक पुण्य समाप्त हो जानेपर लौटकर आना ही पड़ता है।

जितनी भी भोग-भूमियाँ हैं, उन सबमें ब्रह्मलोकको श्रेष्ठ बताया गया है। मात्र पृथ्वीमण्डलका राजा हो और उसका धन-धान्यसे सम्पन्न राज्य हो, स्त्री-पुरुष, परिवार आदि सभी उसके अनुकूल हों, उसकी युवावस्था हो तथा शरीर नीरोग हो—यह मृत्युलोकका पूर्ण सुख माना गया है। मृत्युलोकके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख मर्त्य देवताओंका है। मर्त्य देवता उनको कहते हैं, जो पुण्यकर्म करके देवलोकको प्राप्त होते हैं और देवलोकके प्रापक पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं (गीता— नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इन मर्त्य देवताओंसे सौ गुणा अधिक सुख आजीवन देवताओंका है। आजीवन देवता वे कहलाते हैं, जो कल्पके आदिमें देवता बने हैं और कल्पके अन्ततक देवता बने रहेंगे। इन आजीवन देवताओंसे सौ गुणा अधिक सुख इन्द्रका माना गया है। इन्द्रके सुखसे सौ गुणा अधिक सुख ब्रह्मलोकका माना गया है। इस ब्रह्मलोकके सुखसे भी अनन्त गुणा अधिक सुख भगवत्प्राप्त, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरुषका माना गया है। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमण्डलसे लेकर ब्रह्मलोकतकका सुख सीमित, परिवर्तनशील और विनाशी है। परन्तु

भगवत्प्राप्तिका सुख अनन्त है, अपार है, अगाध है। यह सुख कभी नष्ट नहीं होता। अनन्त ब्रह्मा और अनन्त ब्रह्माण्ड समाप्त हो जायें, तो भी यह परमात्मप्राप्तिका सुख कभी नष्ट नहीं होता, सदा बना रहता है।

'पुनरावर्तिनः' का एक भाव यह भी है कि ये प्राणी साक्षात् परमात्माके अंश होनेके कारण नित्य हैं। अतः ये जबतक नित्य तत्त्व परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेते, तबतक कितने ही ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी इनको वहाँसे पीछे लौटना ही पड़ता है। अतः ब्रह्मलोक आदि ऊँचे लोकोंमें जानेवाले भी पुनर्जन्मको प्राप्त होते हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि सन्तों, भक्तों, जीवन्मुक्तों और कारकपुरुषोंके दर्शनमात्रसे जीवका कल्याण हो जाता है और ब्रह्माजी स्वयं कारकपुरुष हैं तथा भगवान्के भक्त भी हैं। ब्रह्मलोकमें जानेवाले ब्रह्माजीके दर्शन करते ही हैं, फिर उनकी मुक्ति क्यों नहीं होती? वे लौटकर क्यों आते हैं? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें कल्याण दर्शनमात्रसे नहीं होता, प्रत्युत अपनी भावना विशेष होनेसे होता है। इसके सिवाय सन्त, भक्त आदिके दर्शन, सम्भाषण, चिन्तन आदिका माहात्म्य इस मृत्युलोकके मनुष्योंके लिये ही है। कारण कि यह मनुष्य-शरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मनुष्यको भगवत्प्राप्तिका कोई भी और किञ्चिन्मात्र भी मुक्तिका उपाय मिल जाता है तो अपनी भावनाके अनुसार वह मुक्त हो सकता है। ऐसा मुक्तिका अधिकार अन्य लोकोंमें नहीं है, इसलिये वे मुक्त नहीं होते।

  • 'आब्रह्मभुवनात्' पदमें जो 'आ' शब्द आया है, उसके दो अर्थ होते हैं—(१) अभिविधि—जैसे, ब्रह्मलोकको लेकर सभी लोक अर्थात् ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके सभी लोक। (२) मर्यादा—जैसे ब्रह्मलोकको छोड़कर नीचेके सभी लोक अर्थात् ब्रह्मलोकसे नीचेके सभी लोक। यहाँ 'आ' शब्द 'अभिविधि' अर्थमें आया है।

६०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८

हाँ, उन लोकोंमें रहनेवालोंमें किसीकी मुक्त होनेके लिये

तीव्र लालसा हो जाती है तो वह भी मुक्त हो जाता है।

ऐसे ही पशु-पक्षियोंमें भी भक्त हुए हैं, पर ये दोनों ही

अपवादरूपसे हैं, अधिकारीरूपसे नहीं। अगर वहाँके

लोग भी अधिकारी माने जायें तो नरकोंमें जानेवाले

सभीकी मुक्ति हो जानी चाहिये; क्योंकि उन सभी

प्राणियोंको परम भागवत, कारकपुरुष यमराजके दर्शन

होते ही हैं? पर ऐसा शास्त्रोंमें न देखा और न सुना

ही जाता है। इससे सिद्ध होता है कि उन-उन लोकोंमें

रहनेवाले प्राणियोंका भक्त आदिके दर्शनसे कल्याण

नहीं होता।

विशेष बात

यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश है—'ममैवांश:'

और जहाँ जानेके बाद फिर लौटकर नहीं आना पड़ता,

वह परमात्मा धाम है—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम

परमं मम।' जैसे कोई अपने घरपर जाता है, ऐसे ही

परमात्माका अंश होनेसे इस जीवको वहीं (परमधाममें)

जाना चाहिये। फिर भी यह जीव मरनेके बाद लौटकर

क्यों आता है?

जैसे कोई मनुष्य सत्संग आदिमें जाता है और समय

पूरा होनेपर वहाँसे चल देता है। परन्तु चलते समय उसकी

कोई वस्तु (चद्दर आदि) भूलसे वहाँ रह जाय तो उसको

लेने लिये उसे फिर लौटकर वहाँ आना पड़ता है। ऐसे

ही इस जीवने घर, परिवार, जमीन, धन आदि जिन

चीजोंमें ममता कर ली है, अपनापन कर लिया है, उस

ममता-(अपनापन-) के कारण इस जीवको मरनेके

बाद फिर लौटकर आना पड़ता है। कारण कि जिस

शरीरमें रहते हुए संसारमें ममता-आसक्ति की थी,

वह शरीर तो रहता नहीं, न चाहते हुए भी छूट जाता है।

परन्तु उस ममता-(वासना-) के कारण दूसरा शरीर धारण

करके यहाँ आना पड़ता है। वह मनुष्य बनकर भी आ

सकता है और पशु-पक्षी आदि बनकर भी आ सकता है।

उसको लौटकर आना पड़ता है—यह बात निश्चित है।

भगवान्ने कहा है कि ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका

कारण गुणोंका संग ही है—'कारणं गुणसङ्गोऽस्य

सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१) अर्थात् जो संसारमें ममता,

आसक्ति, कामना करेगा उसको लौटकर संसारमें आना

ही पड़ेगा।

'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते'—ब्रह्मलोकतक

जानेवाले सभीको पुनर्जन्म लेना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय!

समगरूपसे मेरी प्राप्ति होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात्

मेरेको प्राप्त होनेपर फिर संसारमें, जन्म-मरणके चक्करमें

नहीं आना पड़ता। कारण कि मैं कालातीत हूँ; अतः मेरेको

प्राप्त होनेपर वे भी कालातीत हो जाते हैं। यहाँ 'मामुपेत्य'

का अर्थ है कि मेरे दर्शन हो जायँ, मेरे स्वरूपका बोध

हो जाय और मेरेमें प्रवेश हो जाय (गीता-ग्यारहवें

अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)।

मेरेको प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता अर्थात्

जीव लौटकर संसारमें क्यों नहीं आता? क्योंकि जीव मेरा

अंश है और मेरा परमधाम ही इसका वास्तविक घर है।

ब्रह्मलोक आदि लोक इसका घर नहीं है, इसलिये इसको

वहाँसे लौटना पड़ता है। जैसे रेलगाड़ीका जहाँतकका

टिकट होता है, वहाँतक ही मनुष्य उसमें बैठ सकता है।

उसके बाद उसे उतरना ही पड़ता है। परन्तु वह अगर

अपने घरमें बैठा हो तो उसे उतरना नहीं पड़ता। ऐसे ही

जो देवताओंके लोकमें गया है, वह मानो रेलगाड़ीमें बैठा

हुआ है। इसलिये उसको एक दिन नीचे उतरना ही पड़ेगा।

परन्तु जो मेरेको प्राप्त हो गया है, वह अपने घरमें बैठा

हुआ है। इसलिये उसको कभी उतरना नहीं पड़ेगा। तात्पर्य

यह है कि भगवान्को प्राप्त किये बिना ऊँचे-से-

ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी कल्याण नहीं होता। अतः

साधकको ऊँचे लोकोंके भोगोंकी किंचिन्मात्र भी इच्छा

नहीं करनी चाहिये।

ब्रह्मलोकतक जाकर फिर पीछे लौटकर आनेवाले

अर्थात् जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़नेवाले पुरुष आसुरी-

सम्पत्तिवाले होते हैं; क्योंकि आसुरी-सम्पत्तिसे ही बन्धन

होता है—'निबन्धायासुरी मता।' इसलिये ब्रह्मलोकतक

बन्धन-ही-बन्धन है। परन्तु मेरे शरण होनेवाले, मुझे प्राप्त

होनेवाले पुरुष दैवी-सम्पत्तिवाले होते हैं। उनका फिर

जन्म-मरण नहीं होता; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिसे मोक्ष होता

है—'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता १६।५)।

विशेष बात

ब्रह्मलोकमें जानेवाले पुरुष दो तरहके होते हैं—एक

तो जो ब्रह्मलोकके सुखका उद्देश्य रखकर यहाँ बड़े-बड़े

पुण्यकर्म करते हैं तथा उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोकका

सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोकमें जाते हैं; और दूसरे, जो

परमात्माप्राप्तिके लिये ही तत्परतापूर्वक साधनमें लगे हुए

हैं; परन्तु प्राणियोंके रहते-रहते परमात्मप्राप्ति हुई नहीं और

श्लोक १७ ]

  • साधक-संजीवनी *

६०५

अन्तकालमें भी किसी कारण-विशेषसे साधनसे विचलित हो गये, तो वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं और वहाँ रहकर महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं। इन साधकोंका ब्रह्मलोकके सुखभोगका उद्देश्य नहीं होता; किन्तु अन्तकालमें साधनसे विमुख होनेसे तथा अन्तःकरणमें सुखभोगकी किंचिन्मात्र इच्छा रहनेसे ही उनको ब्रह्मलोकमें जाना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मलोकका सुख भोगकर ब्रह्माजीके साथ मुक्त होनेको 'क्रम-मुक्ति' कहते हैं। परन्तु जिन साधकोंको यहीं बोध हो जाता है, वे यहाँ ही मुक्त हो जाते हैं। इसको 'सद्योमुक्ति' कहते हैं।

इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनका प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर

परिशिष्ट भाव —यहाँ कोई शंका कर सकता है कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक भगवान्के ही स्वरूप हैं—'वासुदेवः सर्वम्', फिर उन लोकोंमें जानेवालोंका संसारमें पुनर्जन्म क्यों होता है? इसका समाधान है कि उन लोकोंमें जानेवाले मनुष्य उन लोकोंको भगवान्का स्वरूप नहीं समझते, प्रत्युत भोग-सामग्री समझते हैं (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। वे सुखभोगके उद्देश्यसे ही ब्रह्मलोक आदिमें जाते हैं। इसलिये उनको कर्मफलके रूपमें ब्रह्मलोकतकके लोकोंकी प्राप्ति होती है और उनका पुनर्जन्म मिटता नहीं।

पुनर्जन्म सुखासक्तिके कारण ही होता है। इसलिये यहाँ 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः' कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक सुखोंकी आखिरी हद जो 'ब्रह्मलोक' है, वहाँ जानेपर भी जीवको लौटना ही पड़ता है। अन्त ब्रह्माण्डोंका सुख मिलकर भी जीवको सुखी नहीं कर सकता, उसकी आफत, जन्म-मरण नहीं मिटा सकता। अतः संसारसे सुखकी आशा करनेवाला केवल धोखेमें रहता है।

ब्रह्मलोकमें दो प्रकारके मनुष्य जाते हैं—एक तो सुखभोगके लिये ब्रह्मलोक जाते हैं और फिर लौटकर संसारमें आते हैं और दूसरे क्रममुक्तिवाले ब्रह्मलोक जाते हैं और ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं (गीता—आठवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। वे (क्रममुक्तिवाले) लौटकर संसारमें नहीं आते तो यह उनके उद्देश्यकी महिमा है, ब्रह्मलोककी महिमा नहीं है। ब्रह्मलोक तो पुनरावर्ती ही हैं; क्योंकि वहाँ कोई भी सदा नहीं रह सकता, न भोगी सदा रहता है, न योगी (क्रममुक्तिवाला) सदा रहता है। ब्रह्मलोकतक सब कर्मफल है। जब कर्मात्रा आदि-अन्तवाला (नाशवान्) होता है तो फिर उसका फल अविनाशी कैसे हो सकता है?

'मामुपेत्य' में 'माम्' पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा—दोनोंका मालिक है। उसको प्राप्त होनेके बाद फिर दुःखालय संसारमें जन्म नहीं होता। हाँ, उनको प्राप्त हुए मनुष्य उनकी इच्छासे कारक महापुरुषके रूपमें अथवा भगवान्के अवतारके समय संसारमें आ सकते हैं। परन्तु उनका वह जन्म कर्मिके अधीन नहीं होता, प्रत्युत भगवान्की इच्छासे होता है।

सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले भी पीछे लौटकर आते हैं—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्ष्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥

यत्= जो मनुष्यपर्यन्तम्= एक हजार(और)
ब्रह्मणः= ब्रह्माकेचतुर्भुगीवालेयुग-
सहस्रयुग-अहः= एक दिनकोसहस्रान्ताम् = एक हजार

६०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

रात्रिम् | चतुर्भुगीवाली = एक रात्रिको | ते | = वे | दिन और ---|---|---|---|--- विदुः | = जानते हैं, | जनाः | = मनुष्य | रातको जानने- | | अहोरात्रविदः | = ब्रह्माके | वाले हैं।

व्याख्या—‘सहस्रयुगपर्यन्तम् ..... तेऽहोरात्रविदो जनाः’ —सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—मृत्युलोकके इन चार युगोंको एक चतुर्भुगी कहते हैं। ऐसी एक हजार चतुर्भुगी बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है और एक हजार चतुर्भुगी बीतनेपर ब्रह्माजीकी एक रात होती है*। दिन-रातकी इसी गणनाके अनुसार सौ वर्षोंकी ब्रह्माजीकी आयु होती है। ब्रह्माजीकी आयुके सौ वर्ष बीतनेपर ब्रह्माजी परमात्मामें लीन हो जाते हैं और उनका ब्रह्मलोक भी प्रकृतिमें लीन हो जाता है तथा प्रकृति परमात्मामें लीन

हो जाती है।

कितनी ही बड़ी आयु क्यों न हो, वह भी कालकी अवधिवाली ही है। ऊँचे-से-ऊँचे कहे जानेवाले जो भोग हैं, वे भी संयोगजन्य होनेसे दुःखोंके ही कारण हैं—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५। २२) और कालकी अवधिवाले हैं। केवल भगवान् ही कालातीत हैं। इस प्रकार कालके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्य ब्रह्मलोकतकके दिव्य भोगोंको किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं देते।

सम्बन्ध—ब्रह्माजीके दिन और रातको लेकर जो सर्ग और प्रलय होते हैं, उसका वर्णन अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अव्यक्तादव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके ॥ १८ ॥

अहरागमे= ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमेंव्यक्तयः= शरीरअव्यक्तसञ्ज्ञके,= अव्यक्त नामवाले-
अव्यक्तात्= अव्यक्त-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) सेप्रभवन्ति= पैदा होते हैं (और)एव(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) में ही
सर्वाः= सम्पूर्णरात्र्यागमे= ब्रह्माकी रातके आरम्भकालमेंप्रलीयन्ते= (सम्पूर्ण शरीर)
तत्र= उसलीन हो जाते हैं।
  • अत्यन्त सूक्ष्म काल है—परमाणु। दो परमाणुओंका एक अणु और तीन अणुओंका एक त्रसरेणु होता है। झरोखेसे आधी सूर्य-किरणोंमें त्रसरेणु उड़ते हुए दीखते हैं। ऐसे तीन त्रसरेणुओंको पार करनेमें सूर्य जितना समय लेता है, उसे त्रुटि कहते हैं। सौ त्रुटियोंका एक वंश, तीन वंशोंका एक लव, तीन लवोंका एक निषेध और तीन निषेधोंका एक क्षण होता है। पाँच क्षणोंकी एक काष्ठा, पंद्रह काष्ठाओंका एक लघु, पंद्रह लघुओंकी एक नाड़िका, छः नाड़िकाओंका एक प्रहर और आठ प्रहरोंका एक दिन-रात होता है। पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, दो पक्षोंका एक मास, छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है।

इस प्रकार मनुष्योंके एक वर्षके समान देवताओंकी एक दिन-रात है अर्थात् मनुष्योंका छः महीनोंका उत्तरायण देवताओंका दिन है और छः महीनोंका दक्षिणायन देवताओंकी रात है। इस तरह देवताओंके समयका परिमाण मनुष्योंके समयके परिमाणसे तीन सौ साठ गुणा अधिक माना जाता है। इस हिसाबसे मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रात, मनुष्योंके तीस वर्ष देवताओंका एक महीना और मनुष्योंके तीन सौ साठ वर्ष देवताओंका एक दिव्य वर्ष है। ऐसे ही मनुष्यके सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग बीतनेपर देवताओंका एक दिव्ययुग होता है अर्थात् मनुष्योंके सत्ययुगके सत्रह लाख अठ्ठाईस हजार, त्रेताके बारह लाख छियानबे हजार, द्वापरके आठ लाख चौंसठ हजार और कलिके चार लाख बत्तीस हजार—ऐसे कुल तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षोंके बीतनेपर देवताओंका एक दिव्ययुग होता है। इसको ‘महायुग’ और ‘चतुर्भुगी’ भी कहते हैं।

मनुष्यों और देवताओंके समयका परिमाण तो सूर्यसे होता है, पर ब्रह्माजीके दिन-रातका परिमाण देवताओंके दिव्य युगोंसे होता है अर्थात् देवताओंके एक हजार दिव्ययुगोंका (मनुष्योंके चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षोंका) ब्रह्माजीका एक दिन होता है और उतने ही दिव्ययुगोंकी एक रात होती है। ब्रह्माजीके इसी दिनको ‘कल्प’ या ‘सर्ग’ कहते हैं और रातको ‘प्रलय’ कहते हैं।

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

६०७

व्याख्या —‘अव्यक्तादव्यक्तयः’……… तत्रैवाव्यक्त-सञ्ज्के—‘मात्र प्राणियोंके जितने शरीर हैं, उनको यहाँ ‘व्यक्तयः’ और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मूर्तयः’ कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् ‘मैं’ और ‘मेरापन’ को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टि जीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टि जीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि दीखती है, वह सब-की-सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात् प्रकृतिसे

परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं। वे पुनरावर्ती क्यों हैं? इसके उत्तरमें भगवान् सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें बताते हैं कि ऊँचे-से-ऊँचा ब्रह्मलोक भी कालकी अवधिमें है। उस अवधिका विवेचन करते हुए भगवान् बताते हैं कि ब्रह्मलोककी अवधि कितनी ही बड़ी क्यों न हो, है वह कालके अन्तर्गत ही। परन्तु भगवान् कालकी अवधिमें नहीं हैं।

जैसे हम रातको सोते हैं तो संसारको भूल जाते हैं और प्रातः जागते हैं तो संसार पुनः याद आ जाता है ऐसे ही ब्रह्माजीके रातमें सम्पूर्ण सृष्टि लीन हो जाती है और दिनमें पुनः उत्पन्न हो जाती है। यह रात और दिनकी आखिरी हद है। ब्रह्माजीके दिन और रात सूर्यसे नहीं होते, प्रत्युत प्रकृतिसे होते हैं।

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ११ ॥

पार्थ= हे पार्थ !अवशः= प्रकृतिके परवश( और )
सः, एव= वहीहुआरात्र्यागमे = ब्रह्माकी रात्रिके
अयम्= यहअहरागमे = ब्रह्माके दिनेकेसमय
भूतग्रामः= प्राणिसमुदायसमयप्रलीयते = लीन
भूत्वा, भूत्वा= उत्पन्न हो-होकरप्रभवति = उत्पन्न होता हैहोता है।

व्याख्या —‘भूतग्रामः स एवायम्’—अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ यह प्राणिसमुदाय वही है, जो कि साक्षात् मेरा अंश, मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होनेसे यह नित्य है। सर्ग और प्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलयमें भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसका न कभी अभाव हुआ है और न आगे कभी इसका अभाव होगा। तात्पर्य है कि यह अविनाशी है, इसका कभी विनाश नहीं होता। परन्तु भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो बदलते रहते हैं, उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, पर यह उनके सम्बन्धको पकड़ रहा है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी (सांसारिक पदार्थ) तो नहीं रहते, पर उनका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि उस सम्बन्धको स्वयंने पकड़ा है। अतः यह स्वयं जबतक उस सम्बन्धको नहीं

पैदा होती है और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माजीके जगनेपर तो ‘सर्ग’ होता है और ब्रह्माजीके सोनेपर ‘प्रलय’ होता है। जब ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी आयु बीत जाती है, तब ‘महाप्रलय’ होता है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान्में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीकी जितनी आयु होती है, उतना ही महाप्रलयका समय रहता है। महाप्रलयका समय बीतनेपर ब्रह्माजी भगवान्से प्रकट होते हैं तो ‘महासर्ग’का आरम्भ होता है (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।

छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। उस सम्बन्धको छोड़नेमें यह स्वतन्त्र है, सबल है। वास्तवमें यह उस सम्बन्धको रखनेमें सदा परतन्त्र है; क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बदलते रहते हैं, पर यह नया-नया सम्बन्ध पकड़ता रहता है। जैसे, बालकपनको इसने नहीं छोड़ा और न छोड़ना चाहा, पर वह छूट गया। ऐसे ही जवानीको इसने नहीं छोड़ा, पर वह छूट गयी। और तो क्या, यह शरीरको भी छोड़ना नहीं चाहता, पर वह भी छूट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं, पर यह जीव उन पदार्थोंके साथ अपने सम्बन्धको बनाये रखता है, जिससे इसको बार-बार शरीर धारण करने पड़ते हैं, बार-बार जन्मना-मरना पड़ता है। जबतक यह उस माने हुए सम्बन्धको नहीं छोड़ेगा, तबतक यह जन्म-मरणकी परम्परा चलती ही रहेगी, कभी मिटेगी नहीं।

६०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

भगवान्के द्वारा अकेले खेल नहीं हुआ (‘एकाकी न रमते’) तो खेल खेलनेके लिये अर्थात् प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये भगवान्ने इस प्राणिसमुदायको शरीर-रूप खिलौनेके सहित प्रकट किया। खेलका यह नियम होता है कि खेलके पदार्थ केवल खेलनेके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु यह प्राणिसमुदाय खेल खेलना तो भूल गया और खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरोंको व्यक्तिगत मानने लग गया। इसीसे यह उनमें फँस गया और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गया।

‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’—ये पद शरीरोंके लिये कहे गये हैं, जो कि उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं अर्थात् जिनमें प्रतिक्षण ही परिवर्तन होता रहता है। परन्तु जीव उन शरीरोंके परिवर्तनको अपना परिवर्तन और उनके जन्मने-मरनेको अपना जन्म-मरण मानता रहता है। इसी मान्यताके कारण उसका जन्म-मरण कहा जाता है।

यह स्वयं सत्स्वरूप है—‘भूतग्रामः स एवायम्’ और शरीर उत्पत्ति-विनाशशील हैं—‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’, इसलिये शरीरोंको धारण करना अर्थात् जन्म-मरणका होना परधर्म है और मुक्त होना स्वधर्म है।

‘रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे’—यहाँ ‘अवशः’ कहनेका तात्पर्य है कि अगर यह जीव प्रकृतिकी वस्तुओंमेंसे किसी भी वस्तुको अपनी मानता रहेगा तो उसको वहम तो यह होगा कि ‘मैं इस वस्तुका मालिक हूँ’, पर हो जायगा उस वस्तुके परवश, पराधीन। प्राकृत पदार्थोंको यह जितना ही अधिक ग्रहण करेगा, उतना ही यह महान् परतन्त्र बनता चला जायगा। फिर इसकी परतन्त्रता कभी छूटेगी ही नहीं। ब्रह्माजीके जगने और सोनेपर अर्थात् सर्ग और प्रलयके होनेपर (आठवें

परिशिष्ट भाव—एक विभाग बदलनेवाले संसारका है और एक विभाग न बदलनेवाली चिन्मय सत्ताका है। जो अनादिकालसे जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़ा हुआ है, वही यह जीव-समुदाय बार-बार उत्पन्न और लीन होता है। ब्रह्माके दिन और रातके बीचमें भी जीव निरन्तर जन्म लेता और मरता रहता है। तात्पर्य है कि जो बार-बार उत्पन्न और लीन होता है, वह संसार है और जो वही रहता है (जो पहले सर्गावस्थामें था), वह जीवका असली स्वरूप अर्थात् चिन्मय सत्ता है, जो परमात्माका साक्षात् अंश है। ब्रह्माजीके कितने ही रात-दिन बीत जायें, पर जीव स्वयं वही-का-वही रहता है।

चिन्मय सत्ता (चितिशक्ति) अर्थात् स्वयंमें स्वीकार अथवा अस्वीकार करनेकी सामर्थ्य है। इस सामर्थ्यका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् जड़ताको स्वीकार करनेसे ही वह जन्मता-मरता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। यदि वह इस सामर्थ्यका दुरुपयोग न करे तो उसका जन्म-मरण हो ही नहीं सकता। अतः जीवका खास पुरुषार्थ है—जड़ताको स्वीकार न करना अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित होना अथवा अपने अंशों भगवान्के शरण होना। जड़तामें अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थितियोंमें परिवर्तन होता है, अपनेमें (अपने होनेपनमें) कभी परिवर्तन नहीं होता—यह मनुष्यमात्रका अनुभव है। परन्तु ऐसा अनुभव होते हुए भी मनुष्य सुखासक्तिके कारण जड़तासे बँधा रहता है, जिससे

अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), ब्रह्माजीके प्रकट और लीन होनेपर अर्थात् महासर्ग और महाप्रलयके होनेपर (नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक) तथा वर्तमानमें प्रकृतिके परवश होकर कर्म करते रहनेपर (तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी यह जीव ‘जन्मना और मरना तथा कर्म करना और उसका फल भोगना’—इस आफतसे कभी छूटेगा ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, बोध नहीं होता और यह प्रकृतिके सम्बन्धको नहीं छोड़ता, तबतक परतन्त्र होनेके कारण यह दुःखरूप जन्म-मरणके चक्करसे छूट नहीं सकता। परन्तु जब इसकी प्रकृति और प्रकृतिजन्म पदार्थोंकी परवशता मिट जाती है अर्थात् इसको प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा रहित अपने शुद्ध स्वरूपका बोध हो जाता है, तो फिर यह महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होता और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होता—‘सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४।२)।

मूलमें परवशता प्रकृतिजन्म पदार्थोंको महत्त्व देने, उनको स्वीकार करनेमें ही है। इस परवशताको ही कहीं कालकी, कहीं स्वभावकी, कहीं कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशताके नामसे कहा गया है।

इस प्राणिसमुदायकी यह परवशता तभीतक रहती है, जबतक यह प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे सुख लेना चाहता है। इस संयोगजन्म सुखकी इच्छासे ही यह पराधीनता भोगता रहता है और ऐसा मानता रहता है कि यह पराधीनता छूटती नहीं, इसको छोड़ना बड़ा कठिन है। परन्तु यह परवशता इसकी ही बनायी हुई है, स्वतः नहीं है। अतः इसको छोड़नेको जिम्मेवारी इसीपर है। इसको यह जब चाहे, तभी छोड़ सकता है।

श्लोक २०]

  • साधक-संजीवनी *

६०९

उसको अपने सहज स्वरूपका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत वह पशु-पक्षी आदिकी तरह अपने स्वरूपको भूला रहता है।

‘अवशः’ अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे जीव परवश, पराधीन हो जाता है—‘भूतग्राममिमं कृतन्मवशं प्रकृतेर्वशात् ’ (गीता ९।८)*। अतः प्रकृतिके साथ माना हुआ सम्बन्ध छूटनेपर यह स्वाधीन अर्थात् मुक्त हो जाता है।

हमारी सत्ता अपरा प्रकृतिके अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है। प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक व्यक्तिका जन्म (संयोग) और मरण (वियोग) होता है तथा प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इन तीनों-(वस्तु, व्यक्ति और क्रिया-) को जाननेवाली हमारी चिन्मय सत्ता-(होनेपन-) का कभी उत्पत्ति-विनाश, जन्म-मरण (संयोग-वियोग) और आरम्भ-अन्त नहीं होता। यह सत्ता नित्य-निरन्तर स्वतः ज्यों-की-त्यों रहती है—‘भूतग्रामः स एवायम् ’। इस सत्ताका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’ (गीता २।१६)। इस सत्तामें स्वतः-स्वाभाविक स्थितिके अनुभवका नाम ही मुक्ति (स्वाधीनता) है।

मनुष्यको यह वहम रहता है कि अमुक वस्तुकी प्राप्ति होनेपर, अमुक व्यक्तिके मिलनेपर तथा अमुक क्रियाको करनेपर मैं स्वाधीन (मुक्त) हो जाऊँगा। परन्तु ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति और क्रिया है ही नहीं, जिससे मनुष्य स्वाधीन हो जाय। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रिया तो मनुष्यको पराधीन बनानेवाली हैं। उनसे सर्वथा असंग होनेपर ही मनुष्य स्वाधीन हो सकता है। अतः साधकको चाहिये कि वह वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना अपनेको अकेला अनुभव करनेका स्वभाव बनाये, उस अनुभवको महत्त्व दे, उसमें अधिक-से-अधिक स्थित रहे। यह मनुष्यमात्रका अनुभव है कि सुषुप्तिके समय वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना भी हम स्वतः रहते हैं; परन्तु हमारे बिना वस्तु, व्यक्ति और क्रिया नहीं रहती। जब जाग्रतमें भी हम इनके बिना रहनेका स्वभाव बना लेंगे, तब हम स्वाधीन (मुक्त) हो जायेंगे। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके सम्बन्धकी मान्यता ही हमें स्वाधीन नहीं होने देती और हमारे न चाहते हुए भी हमें पराधीन बना देती है।

परमात्मामें अनन्त शक्तियाँ हैं, जो चित्स्वरूप हैं। माया-(प्रकृति-) में भी अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वे जड़स्वरूप तथा परिवर्तनशील हैं—‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूर्यते सचराचरम् ’ (९।१०)। सबसे विलक्षण शक्ति भगवत्प्रेममें है। परन्तु मुक्ति-(स्वाधीनता-) में सन्तोष करनेसे वह प्रेम प्रकट नहीं होता। जड़ताके सम्बन्धसे ही परवशता होती है और मुक्त होनेपर वह परवशता सर्वथा मिट जाती है और जीव स्वाधीन हो जाता है। परन्तु प्रेम इस स्वाधीनतासे भी विशेष विलक्षण है। स्वाधीनता-(मुक्ति-) में अखण्ड आनन्द है, पर प्रेममें अनन्त आनन्द है।

ज्ञानयोगी तो स्वाधीन होता है और भक्त प्रेमी होता है। भक्तियोगमें भक्त भगवान्के पराधीन नहीं होता; क्योंकि भगवान् परकीय नहीं हैं, प्रत्युत स्वकीय (अपने) हैं। स्वकीयकी अधीनतामें विशेष स्वाधीनता होती है।

भगवान् तो स्वाधीन-से-स्वाधीन हैं। जीव ही जड़ताके पराधीन हो जाता है। उस पराधीनताको मिटानेसे वह स्वाधीन हो जाता है। परन्तु भगवान्के शरण होनेसे वह स्वाधीनतापूर्वक स्वाधीन अर्थात् परम स्वाधीन हो जाता है। भगवान्की अधीनता परम स्वाधीनता है, जिसमें भगवान् भी भक्तके अधीन हो जाते हैं—‘अहं भक्तपराधीनः ’ (श्रीमद्भगवद्गीता १।४।६३)।

सम्बन्ध—अनित्य संसारका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें जीवोंके प्रापणीय परमात्माकी महिमाका विशेष वर्णन करते हैं।

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽन्यत्कोऽन्यत्कात्सनातनः ।

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्यस्मृ न विनश्यति ॥ २० ॥

तु= परन्तुसनातनः= अनादिसः= वह
तस्मात्= उसपरः= अत्यन्त श्रेष्ठसर्वेषु= सम्पूर्ण
अन्यत्कात्= अन्यत्क-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) सेभावः= भावरूपभूतेषु= प्राणियोंके
अन्यः= अन्य (विलक्षण)यः= जोनश्यत्यस्मृ= नष्ट होनेपर भी
अन्यत्कः= अन्यत्क (ईश्वर) है,न, विनश्यति= नष्ट नहीं होता।
  • यहाँ (८।१९ में) और नवें अध्यायके आठवें श्लोकमें—दोनों जगह ‘भूतग्राम’ और ‘अवश’ शब्द आये हैं। फर्क इतना है कि यहाँ सर्ग तथा प्रलयका वर्णन है, वहाँ (९।८ में) महसर्ग तथा महाप्रलयका वर्णन है।

६१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

व्याख्या—‘परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्-सनातनः’ —सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके लोकोंको पुनरावर्ती कहा गया है। परन्तु परमात्मतत्त्व उनसे अत्यन्त विलक्षण है—यह बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद दिया गया है।

यहाँ ‘अव्यक्तात्’ पद ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरका ही वाचक है। कारण कि इससे पहले अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे प्राणियोंके पैदा होनेकी और प्रलयमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें प्राणियोंके लीन होनेकी बात कही गयी है। इस श्लोकमें आया ‘तस्मात्’ पद भी ब्रह्माजीके उस सूक्ष्मशरीरका द्योतन करता है। ऐसा होनेपर भी यहाँ ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर- (समष्टि मन, बुद्धि और अहंकार-) से भी पर अर्थात् अत्यन्त विलक्षण जो भावरूप अव्यक्त कहा गया है, वह ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीरके साथ-साथ ब्रह्माजीके कारण-शरीर- (मूल प्रकृति-) से भी अत्यन्त विलक्षण है।

ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पर दो तत्त्व हैं—मूल प्रकृति और परमात्मा। यहाँ प्रसंग मूल प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत परमात्माका है। अतः इस श्लोकमें परमात्माको ही पर और श्रेष्ठ कहा गया है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। आगेके श्लोकमें भी ‘अव्यक्तोऽक्षर’

परिशिष्ट भाव— एक अपरिवर्तनशील (स्थायी) तत्त्व ‘परा’ है और एक परिवर्तनशील (अस्थायी) तत्त्व ‘अपरा’ है। परामें कभी परिवर्तन होता ही नहीं और अपरामें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अपरा कभी परिवर्तनके बिना रहती ही नहीं, रह सकती ही नहीं। सर्ग और प्रलयमें तो परिवर्तन होता रहता है, महासर्ग और महाप्रलयमें भी परिवर्तन होता रहता है।

अगर परा और अपरा—दोनों ही तत्त्व अपरिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय अथवा दोनों ही परिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय! परन्तु स्वयं अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव- (परा-) ने परिवर्तनशील अपरासे सम्बन्ध जोड़ लिया, इसीसे वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गया। जगत्से अपना सम्बन्ध जोड़कर वह भी जगत् हो गया (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जैसे कोई चलती हुई गाड़ीमें बैठकर चल पड़े, ऐसे ही परिवर्तनशील संसारको पकड़कर जीव भी परिवर्तनशील बन गया—अनेक योनियोंमें भटकने लग गया!

परमात्माको ‘पर’ अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे भी श्रेष्ठ मूल प्रकृति (कारणशरीर) है और मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ परमात्मा है।

सम्बन्ध—अभीतक जो परमात्मविषयक वर्णन हुआ है, उस सबकी एकता करते हुए अनन्यभक्तिके विशेष महत्त्वका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥ २१ ॥

आदि पदोंसे उस परमात्माका ही वर्णन आया है।

गीतामें प्राणियोंके अप्रकट होनेको अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ (२।२८); ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरको भी अव्यक्त कहा गया है (८।१८); प्रकृतिको भी अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तमेव च’ (१३।५) आदि। उन सबसे परमात्माका स्वरूप विलक्षण, श्रेष्ठ है, चाहे वह स्वरूप व्यक्त हो, चाहे अव्यक्त हो। वह भावरूप है अर्थात् किसी भी कालमें उसका अभाव हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। कारण कि वह सनातन है अर्थात् वह सदासे है और सदा ही रहेगा। इसलिये वह पर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता और होनेकी सम्भावना भी नहीं है।

‘यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति’ —अब उत्तरार्धमें उसकी विलक्षणता बताते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी अर्थात् उन सम्पूर्ण शरीरोंका अभाव होनेपर भी उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता—ऐसा वह परमात्माका अव्यक्त स्वरूप है।

‘न विनश्यति’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें कार्यरूपसे अनेक तरहके परिवर्तन होनेपर भी वह परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों ही अपरिवर्तनशील रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन होता ही नहीं।

श्लोक २२]

  • साधक-संजीवनी *

६११

तम्= उसीकोपरमा्= परमन, निवर्तन्ते= फिर लौटकर
अव्यक्तः= अव्यक्त (और)गतिम्= गति(संसारमें) नहीं आते,
अक्षरः= अक्षर—आहुः= कहा गया है (और)तत्= वह
इति= ऐसायम्= जिसकोमम= मेरा
उक्तः= कहा गया है (तथा
उसीको)प्राप्य= प्राप्त होनेपर
(जीव)परमम्= परम
धाम= धाम है।

व्याख्या —‘अव्यक्तोऽक्षर’”तद्भाम परमं मम’—भगवान्ने सातवें अध्यायके अठ्ठाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें जिसको ‘माम्’, कहा है तथा आठवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म’, चौथे श्लोकमें ‘अधियज्ञः’, पाँचवें और सातवें श्लोकमें ‘माम्’, आठवें श्लोकमें ‘परमं पुरुषं दिव्यम्’, नवें श्लोकमें ‘कविं पुराणमनुशासितारम्’ आदि, तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें ‘माम्’, बीसवें श्लोकमें ‘अव्यक्तः’ और ‘सनातनः’ कहा है, उन सबकी एकता करते हुए भगवान् कहते हैं कि उसीको अव्यक्त और अक्षर कहते हैं तथा उसीको परमगति अर्थात् सर्वश्रेष्ठ गति कहते हैं; और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है अर्थात् मेरा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। इस प्रकार जिस प्रापणीय वस्तुको अनेक रूपोंमें कहा गया है, उसकी यहाँ एकता की गयी है। ऐसे ही चौदहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भी ‘ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकात्मिक सुखका आश्रय मैं हूँ’ ऐसा कहकर भगवान्ने प्रापणीय वस्तुकी एकता की है।

लोगोंकी ऐसी धारणा रहती है कि सगुण-उपासनाका फल दूसरा है और निर्गुण-उपासनाका फल दूसरा है। इस धारणाको दूर करनेके लिये इस श्लोकमें सबकी एकताका

परिशिष्ट भाव —अव्यक्त, अक्षर आदि नामोंकी पहुँच उस प्रापणीय तत्त्वतक नहीं है। कारण कि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति दोनोंसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है। उसको प्राप्त होनेपर जीव लौटकर नहीं आता; क्योंकि उसकी अवधि नहीं है।

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥

पार्थ | = हे पृथानन्दन अर्जुन! | येन | = जिससे | परः | = परम ---|---|---|---|---|--- भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | इदम् | = यह | पुरुषः | = पुरुष परमात्मा यस्य | = जिसके | सर्वम् | = सम्पूर्ण संसार | तु | = तो अन्तःस्थानि | = अन्तर्गत हैं (और) | ततम् | = व्याप्त है, | अनन्यया, भक्त्या | = अनन्य भक्तिसे | | सः | = वह | लभ्यः | = प्राप्त होनेयोग्य है।