भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

आवेश्य | = प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) | तम् | = उस | पुरुषम् | = पुरुषको ---|---|---|---|---|--- | | परम् | = परम | एव | = ही | | दिव्यम् | = दिव्य | उपैति | = प्राप्त होता है।

व्याख्या—‘प्रयाणकाले मनसाचलेन ..... स तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ —यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं।

अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।

पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम ‘योगबल’ है। उस योगबलके द्वारा दोनों ध्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शरीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।

‘तं परं पुरुषमपैति दिव्यम्’ पदोंका तात्पर्य है कि जिस परमात्मतत्त्वका पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णन हुआ है, उसी दिव्य परम सगुण-निराकार परमात्माको वह प्राप्त हो जाता है।

आठवें श्लोकमें जो बात कही गयी थी, उसीको नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहकर इन तीन श्लोकोंके प्रकरणका उपसंहार किया गया है।

परिशिष्ट भाव—‘भक्त्या युक्तः’ का तात्पर्य है कि संसारकी आसक्ति मिट जानेसे उस साधकका एक परमात्मामें ही आकर्षण रहता है, अन्यमें आकर्षण नहीं रहता। संसारी मनुष्य तो अपरामें आकृष्ट रहते हैं, पर जो अपराको छोड़कर भगवान्में आकृष्ट हो जाता है, वह भक्त हो जाता है। संसारी मनुष्य शरीर-संसारमें आसक्त होनेसे ‘विभक्त’ अर्थात् भगवान्से अलग हो जाते हैं, पर भगवान्में लगा हुआ साधक विभक्त नहीं रहता, प्रत्युत ‘भक्त’ अर्थात् भगवान्से एक (अभिन्न) हो जाता है।

‘योगबलेन’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले किये हुए योगाभ्यासके कारण अन्त समयमें होनेवाली अशक्त अवस्था उसको बाधा नहीं पहुँचा सकती, उसमें कोई विकार पैदा नहीं कर सकती। प्राणायाम आदिका बल ‘योगबल’ है।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें निर्गुण-निराकारकी प्राप्तिके उपायका उपक्रम करते हैं।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्गहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥