श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १२-१३ ]
- साधक-संजीवनी *
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| वेदविदः | = वेदवेत्तालोग | यत् | = जिसको | चरन्ति | = पालन करते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| यत् | = जिसको | विशन्ति | = प्राप्त करते हैं (और) | तत् | = वह |
| अक्षरम् | = अक्षर | यत् | = (साधक) जिसकी | ||
| (प्राप्तिकी) | पदम् | = पद (में) | |||
| वदन्ति | = कहते हैं, | इच्छन्तः | = इच्छा करते हुए | ते | = तेरे लिये |
| वीतरागाः | = वीतराग | ब्रह्मचर्यम् | = ब्रह्मचर्यका | सङ्गहेण | = संक्षेपसे |
| यतयः | = यति | प्रवक्ष्ये | = कहूँगा। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें जो निर्गुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ —वेदोंको जाननेवाले पुरुष जिसको अक्षर-निर्गुण-निराकार कहते हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता, जो सदा-सर्वदा एकरूप, एकरस रहता है और जिसको इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ कहा गया है, उसी निर्गुण-निराकार तत्त्वका यहाँ ‘अक्षर’ नामसे वर्णन हुआ है।
‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ —जिनके अन्तःकरणमें रागका अत्यन्त अभाव हो गया है; अतः जिनका अन्तःकरण महान् निर्मल है और जिनके हृदयमें सर्वोपरि अद्वितीय परम तत्त्वको पानेकी उत्कट लगन लगी है, ऐसे प्रयत्नशील यति महापुरुष उस तत्त्वमें प्रवेश करते हैं—उसको प्राप्त करते हैं।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें गौणतासे चारों आश्रमोंका वर्णन ले सकते हैं; जैसे—‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ पदोंसे गृहस्थाश्रमका संकेत है; क्योंकि वेदोंका अध्ययन करना ब्राह्मणका खास काम है। ‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ पदोंसे संन्यास और वानप्रस्थाश्रमका संकेत है। ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ पदोंसे ब्रह्मचर्याश्रमका संकेत है।
मुक्ति सभी वर्णों, आश्रमोंमें हो सकती है। इसलिये भगवान्ने आश्रमोंका स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं किया है और वर्णोंका स्पष्टरूपसे वर्णन भी कर्तव्य-पालनकी दृष्टिसे किया है। अर्जुन क्षत्रिय थे और वे अपने युद्धरूप कर्तव्यको छोड़ना चाहते थे। इसलिये भगवान्ने उनको अपने कर्तव्यमें लगानेके उद्देश्यसे वर्णधर्मका वर्णन किया। युद्ध करना वर्णधर्म है, आश्रमधर्म नहीं।
सम्बन्ध—अन्तकालमें उस निर्गुण-निराकार तत्त्वकी प्राप्तिकी फलसहित विधि बतानेके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूढ्यार्धायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्नामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥