भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

सर्वद्वाराणि= (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंकोआधाय= स्थापित करकेउच्चारण (और)
संयम्य= रोककरयोगधारणाम्= योगधारणामेंमाम्
मनः= मनकाआस्थितः= सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआअनुस्मरन्
हृदि= हृदयमेंयः= जो साधकदेहम्
निरुध्य= निरोध करकेओम्= 'ॐ'त्यजन्
= औरइति= इसप्रयाति
आत्मनः= अपनेएकाक्षरम्= एक अक्षरसः
प्राणम्= प्राणोंकोब्रह्म= ब्रह्मकापराम्
मूर्ध्नि= मस्तकमेंव्याहरन्= (मानसिक)गतिम्
याति= प्राप्त होता है।

व्याख्या—‘सर्वद्वाराणि संयम्य’ —(अन्तसमयमें) सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारोंका संयम कर ले अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों विषयोंसे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका—इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा बोलना, ग्रहण करना, गमन करना, मूत्र—त्याग और मल—त्याग—इन पाँचों क्रियाओंसे वाणी, हाथ, चरण, उपस्थ और गुदा—इन पाँचों कर्मेन्द्रियोंको सर्वथा हटा ले। इससे इन्द्रियाँ अपने स्थानमें रहेंगी।

‘मनो हृदि निरुध्य च’ —मनका हृदयमें ही निरोध कर ले अर्थात् मनको विषयोंकी तरफ न जाने दे। इससे मन अपने स्थान—(हृदय—) में रहेगा।

‘मूर्ध्नाधायात्मनः प्राणम्’ —प्राणोंको मस्तकमें धारण कर ले अर्थात् प्राणोंपर अपना अधिकार प्राप्त करके दसवें द्वार—ब्रह्मरश्मिमें प्राणोंको रोक ले।

‘आस्थितो योगधारणाम्’ —इस प्रकार योगधारणामें

परिशिष्ट भाव —इन श्लोकोंमें योगाभ्यास करनेवाले अद्वैतवादीका वर्णन है। ‘व्याहरन्’ पदसे मानसिक उच्चारण समझना चाहिये; क्योंकि मनका हृदयमें निरोध करनेपर तथा प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करनेपर वाचिक उच्चारण होना असम्भव है।

सम्बन्ध— जिसके पास योगका बल होता है और जिसका प्राणोंपर अधिकार होता है, उसको तो निर्गुण-निराकारकी प्राप्ति हो जाती है; परन्तु दीर्घकालीन अभ्यास-साध्य होनेसे यह बात सबके लिये कठिन पड़ती है। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अपनी अर्थात् सगुण-साकारकी सुगमतापूर्वक प्राप्तिकी बात कहते हैं।

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!यः= जो मनुष्यनित्यशः= नित्य-
अनन्यचेताः= अनन्य चित्तवालामाम्= मेरासततम्= निरन्तर
  • समग्ररूपका प्रकरण होनेसे यहाँ ‘माम्’ शब्दसे निर्गुण-निराकारका चिन्तन लिया गया है।
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