श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 596, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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शास्त्र, गुरु, सन्त आदिके द्वारा) कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और मनुष्योंके पुराने पाप-पुण्यरूप कर्मोंके अनुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर उन मनुष्योंको शुद्ध, निर्मल बनाते हैं। इस प्रकार मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले और मनुष्योंके पाप-पुण्यरूप पुराने कर्मोंका (फल देकर) नाश करनेवाले होनेसे परमात्मा 'अनुशासिता' हैं।
'अणोरीणीयांसम्' —परमात्मा परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा मन-बुद्धिके विषय नहीं हैं; मन-बुद्धि आदि उनको पकड़ नहीं पाते। मन-बुद्धि तो प्रकृति-का कार्य होनेसे प्रकृतिको भी पकड़ नहीं पाते, फिर परमात्मा तो उस प्रकृतिसे भी अत्यन्त परे हैं! अतः वे परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं अर्थात् सूक्ष्मताकी अन्तिम सीमा हैं।
'सर्वस्य धातारम्' —परमात्मा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले हैं, उनका पोषण करनेवाले हैं। उन सभीको परमात्मासे ही सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः वे परमात्मा सबका धारण-पोषण करनेवाले कहे जाते हैं।
'तमसः परस्तात्' —परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे हैं, अज्ञानसे सर्वथा रहित हैं। उनमें लेशमात्र भी अज्ञान नहीं
परिशिष्ट भाव —परमात्माको 'कविम्' कहनेका तात्पर्य है कि उसके ज्ञानके बाहर कुछ भी नहीं है। 'पुराणम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह अनादि है, कालसे भी अतीत अर्थात् कालका भी प्रकाशक है। 'अनुशासितारम्' कहनेका तात्पर्य है कि सब स्वाभाविक ही उसके शासनमें हैं। वह जीव और जगत्—दोनोंका ही शासक है—
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरत्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतर० १।१०)
'प्रकृति तो विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों—(विनाशशील और अविनाशी- ) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।'
'धातारम्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा सबका पालन-पोषण करनेवाला है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। 'आदित्यवर्णम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे सूर्यमें स्वतः—स्वाभाविक नित्य प्रकाश रहता है, ऐसे ही परमात्मामें स्वतः—स्वाभाविक नित्य ज्ञान, बोध रहता है। वह परमात्मा ज्ञानस्वरूप है और सबका प्रकाशक है (गीता—तेरहवें अध्यायका तैत्तिरीसवाँ श्लोक)। 'तमसः परस्तात्' कहनेका तात्पर्य है कि वह परमात्मा अज्ञानसे अथवा अपरासे अत्यन्त परे हैं—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' (गीता १५।१८)।
सम्बन्ध—अब अन्तकालके चिन्तनके अनुसार गति बताते हैं।
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भूवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
| सः | = वह | अचलेन | = अचल | भूवोः | = भुकूटीके |
|---|---|---|---|---|---|
| भक्त्या, | मनसा | = मनसे | मध्ये | = मध्यमें | |
| युक्तः | = भक्तियुक्त मनुष्य | च | = और | प्राणम् | = प्राणोंको |
| प्रयाणकाले | = अन्त समयमें | योगबलेन | = योगबलके द्वारा | सम्यक् | = अच्छी तरहसे |