श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन् ॥ ८ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | करनेवाले | अनुचित्तयन् | = चिन्तन करता हुआ |
|---|---|---|---|---|
| अभ्यास- | चेतसा | = चित्तसे | (शरीर छोड़ने- | |
| योगयुक्तेन | = अभ्यासयोगसे युक्त | परमम् | = परम | वाला मनुष्य) |
| नान्यगामिना | = (और) अन्यका | दिव्यम् | = दिव्य | याति |
| चिन्तन न | पुरुषम् | = पुरुषका | हो जाता है। |
व्याख्या —[सातवें अध्यायके उन्तीसवें-तीसवें श्लोकोंमें जो सगुण-निराकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।]
‘अभ्यासयोगयुक्तेन’ —इस पदमें ‘अभ्यास’ और ‘योग’—ये दो शब्द आये हैं। संसारसे मन हटाकर परमात्मामें बार-बार मन लगानेका नाम अभ्यास है और समताका नाम ‘योग’ है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८)। अभ्यासमें मन लगनेसे प्रसन्नता होती है और मन न लगनेसे खिन्नता होती है। यह अभ्यास तो है, पर अभ्यासयोग नहीं है। अभ्यासयोग तभी होगा, जब प्रसन्नता
और खिन्नता—दोनों ही न हों। अगर चित्तमें प्रसन्नता और खिन्नता हो भी जायँ, तो भी उनको महत्त्व न दे, केवल अपने लक्ष्यको ही महत्त्व दे। अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहना भी योग है। ऐसे योगसे युक्त चित्त हो।
‘चेतसा नान्यगामिना’ —चित्त अन्यगामी न हो अर्थात् एक परमात्माके सिवाय दूसरा कोई लक्ष्य न हो।
‘परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचित्तयन्’ —ऐसे चित्तसे परम दिव्य पुरुषका अर्थात् सगुण-निराकार परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उसी परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने प्रश्न किया था—‘प्रयाणकाले च कथं त्रेयोऽसि नियतात्मभिः’ (८।२)। उस प्रश्नका उत्तर देकर अब आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें अन्तकालमें स्मरण करनेवालोंके प्रकारका वर्णन करते हैं।
सम्बन्ध —अब भगवान् ध्यान करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी सगुण-निराकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं।
कविं पुराणमनुशासितारमणोरेणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥
| यः | = जो | अणीयांसम् | = अत्यन्त सूक्ष्म, | आदित्यवर्णम् | = सूर्यकी तरह |
|---|---|---|---|---|---|
| कविम् | = सर्वज्ञ, | सर्वस्य | = सबका | प्रकाशस्वरूप | |
| पुराणम् | = अनादि, | धातारम् | = धारण-पोषण | अर्थात् ज्ञानस्वरूप | |
| अनुशासितारम् | = सबपर शासन | करनेवाला, | अचिन्त्यरूपम् | =—ऐसे अचिन्त्य | |
| करनेवाला, | तमसः | = अज्ञानसे | स्वरूपका | ||
| अणोः | = सूक्ष्मसे | परस्तात् | = अत्यन्त परे, | अनुस्मरेत् | = चिन्तन करता है। |
व्याख्या —‘कविम्’—सम्पूर्ण प्राणियोंको और उनके सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मोंको जाननेवाले होनेसे उन परमात्माका नाम ‘कवि’ अर्थात् सर्वज्ञ है।
‘पुराणम्’ —वे परमात्मा सबके आदि होनेसे ‘पुराण’ कहे जाते हैं।
‘अनुशासितारम्’ —हम देखते हैं तो नेत्रोंसे देखते हैं।
नेत्रोंके ऊपर मन शासन करता है, मनके ऊपर बुद्धि और बुद्धिके ऊपर ‘अहम्’ शासन करता है तथा ‘अहम्’ के ऊपर भी जो शासन करता है, जो सबका आश्रय, प्रकाशक और प्रेरक है, वह (परमात्मा) ‘अनुशासिता’ है।
दूसरा भाव यह है कि जीवोंका कर्म करनेका जैसा-जैसा स्वभाव बना है, उसके अनुसार ही परमात्मा (वेद,