श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें६०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
हाँ, उन लोकोंमें रहनेवालोंमें किसीकी मुक्त होनेके लिये
तीव्र लालसा हो जाती है तो वह भी मुक्त हो जाता है।
ऐसे ही पशु-पक्षियोंमें भी भक्त हुए हैं, पर ये दोनों ही
अपवादरूपसे हैं, अधिकारीरूपसे नहीं। अगर वहाँके
लोग भी अधिकारी माने जायें तो नरकोंमें जानेवाले
सभीकी मुक्ति हो जानी चाहिये; क्योंकि उन सभी
प्राणियोंको परम भागवत, कारकपुरुष यमराजके दर्शन
होते ही हैं? पर ऐसा शास्त्रोंमें न देखा और न सुना
ही जाता है। इससे सिद्ध होता है कि उन-उन लोकोंमें
रहनेवाले प्राणियोंका भक्त आदिके दर्शनसे कल्याण
नहीं होता।
विशेष बात
यह जीव साक्षात् परमात्माका अंश है—'ममैवांश:'
और जहाँ जानेके बाद फिर लौटकर नहीं आना पड़ता,
वह परमात्मा धाम है—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम
परमं मम।' जैसे कोई अपने घरपर जाता है, ऐसे ही
परमात्माका अंश होनेसे इस जीवको वहीं (परमधाममें)
जाना चाहिये। फिर भी यह जीव मरनेके बाद लौटकर
क्यों आता है?
जैसे कोई मनुष्य सत्संग आदिमें जाता है और समय
पूरा होनेपर वहाँसे चल देता है। परन्तु चलते समय उसकी
कोई वस्तु (चद्दर आदि) भूलसे वहाँ रह जाय तो उसको
लेने लिये उसे फिर लौटकर वहाँ आना पड़ता है। ऐसे
ही इस जीवने घर, परिवार, जमीन, धन आदि जिन
चीजोंमें ममता कर ली है, अपनापन कर लिया है, उस
ममता-(अपनापन-) के कारण इस जीवको मरनेके
बाद फिर लौटकर आना पड़ता है। कारण कि जिस
शरीरमें रहते हुए संसारमें ममता-आसक्ति की थी,
वह शरीर तो रहता नहीं, न चाहते हुए भी छूट जाता है।
परन्तु उस ममता-(वासना-) के कारण दूसरा शरीर धारण
करके यहाँ आना पड़ता है। वह मनुष्य बनकर भी आ
सकता है और पशु-पक्षी आदि बनकर भी आ सकता है।
उसको लौटकर आना पड़ता है—यह बात निश्चित है।
भगवान्ने कहा है कि ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका
कारण गुणोंका संग ही है—'कारणं गुणसङ्गोऽस्य
सदसद्योनिजन्मसु' (१३।२१) अर्थात् जो संसारमें ममता,
आसक्ति, कामना करेगा उसको लौटकर संसारमें आना
ही पड़ेगा।
'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते'—ब्रह्मलोकतक
जानेवाले सभीको पुनर्जन्म लेना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय!
समगरूपसे मेरी प्राप्ति होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात्
मेरेको प्राप्त होनेपर फिर संसारमें, जन्म-मरणके चक्करमें
नहीं आना पड़ता। कारण कि मैं कालातीत हूँ; अतः मेरेको
प्राप्त होनेपर वे भी कालातीत हो जाते हैं। यहाँ 'मामुपेत्य'
का अर्थ है कि मेरे दर्शन हो जायँ, मेरे स्वरूपका बोध
हो जाय और मेरेमें प्रवेश हो जाय (गीता-ग्यारहवें
अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)।
मेरेको प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता अर्थात्
जीव लौटकर संसारमें क्यों नहीं आता? क्योंकि जीव मेरा
अंश है और मेरा परमधाम ही इसका वास्तविक घर है।
ब्रह्मलोक आदि लोक इसका घर नहीं है, इसलिये इसको
वहाँसे लौटना पड़ता है। जैसे रेलगाड़ीका जहाँतकका
टिकट होता है, वहाँतक ही मनुष्य उसमें बैठ सकता है।
उसके बाद उसे उतरना ही पड़ता है। परन्तु वह अगर
अपने घरमें बैठा हो तो उसे उतरना नहीं पड़ता। ऐसे ही
जो देवताओंके लोकमें गया है, वह मानो रेलगाड़ीमें बैठा
हुआ है। इसलिये उसको एक दिन नीचे उतरना ही पड़ेगा।
परन्तु जो मेरेको प्राप्त हो गया है, वह अपने घरमें बैठा
हुआ है। इसलिये उसको कभी उतरना नहीं पड़ेगा। तात्पर्य
यह है कि भगवान्को प्राप्त किये बिना ऊँचे-से-
ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी कल्याण नहीं होता। अतः
साधकको ऊँचे लोकोंके भोगोंकी किंचिन्मात्र भी इच्छा
नहीं करनी चाहिये।
ब्रह्मलोकतक जाकर फिर पीछे लौटकर आनेवाले
अर्थात् जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़नेवाले पुरुष आसुरी-
सम्पत्तिवाले होते हैं; क्योंकि आसुरी-सम्पत्तिसे ही बन्धन
होता है—'निबन्धायासुरी मता।' इसलिये ब्रह्मलोकतक
बन्धन-ही-बन्धन है। परन्तु मेरे शरण होनेवाले, मुझे प्राप्त
होनेवाले पुरुष दैवी-सम्पत्तिवाले होते हैं। उनका फिर
जन्म-मरण नहीं होता; क्योंकि दैवी-सम्पत्तिसे मोक्ष होता
है—'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता १६।५)।
विशेष बात
ब्रह्मलोकमें जानेवाले पुरुष दो तरहके होते हैं—एक
तो जो ब्रह्मलोकके सुखका उद्देश्य रखकर यहाँ बड़े-बड़े
पुण्यकर्म करते हैं तथा उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोकका
सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोकमें जाते हैं; और दूसरे, जो
परमात्माप्राप्तिके लिये ही तत्परतापूर्वक साधनमें लगे हुए
हैं; परन्तु प्राणियोंके रहते-रहते परमात्मप्राप्ति हुई नहीं और