श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 606, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १७ ]
- साधक-संजीवनी *
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अन्तकालमें भी किसी कारण-विशेषसे साधनसे विचलित हो गये, तो वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं और वहाँ रहकर महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं। इन साधकोंका ब्रह्मलोकके सुखभोगका उद्देश्य नहीं होता; किन्तु अन्तकालमें साधनसे विमुख होनेसे तथा अन्तःकरणमें सुखभोगकी किंचिन्मात्र इच्छा रहनेसे ही उनको ब्रह्मलोकमें जाना पड़ता है। इस प्रकार ब्रह्मलोकका सुख भोगकर ब्रह्माजीके साथ मुक्त होनेको 'क्रम-मुक्ति' कहते हैं। परन्तु जिन साधकोंको यहीं बोध हो जाता है, वे यहाँ ही मुक्त हो जाते हैं। इसको 'सद्योमुक्ति' कहते हैं।
इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनका प्रश्न था कि अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? इसका उत्तर
परिशिष्ट भाव —यहाँ कोई शंका कर सकता है कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक भगवान्के ही स्वरूप हैं—'वासुदेवः सर्वम्', फिर उन लोकोंमें जानेवालोंका संसारमें पुनर्जन्म क्यों होता है? इसका समाधान है कि उन लोकोंमें जानेवाले मनुष्य उन लोकोंको भगवान्का स्वरूप नहीं समझते, प्रत्युत भोग-सामग्री समझते हैं (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। वे सुखभोगके उद्देश्यसे ही ब्रह्मलोक आदिमें जाते हैं। इसलिये उनको कर्मफलके रूपमें ब्रह्मलोकतकके लोकोंकी प्राप्ति होती है और उनका पुनर्जन्म मिटता नहीं।
पुनर्जन्म सुखासक्तिके कारण ही होता है। इसलिये यहाँ 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः' कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक सुखोंकी आखिरी हद जो 'ब्रह्मलोक' है, वहाँ जानेपर भी जीवको लौटना ही पड़ता है। अन्त ब्रह्माण्डोंका सुख मिलकर भी जीवको सुखी नहीं कर सकता, उसकी आफत, जन्म-मरण नहीं मिटा सकता। अतः संसारसे सुखकी आशा करनेवाला केवल धोखेमें रहता है।
ब्रह्मलोकमें दो प्रकारके मनुष्य जाते हैं—एक तो सुखभोगके लिये ब्रह्मलोक जाते हैं और फिर लौटकर संसारमें आते हैं और दूसरे क्रममुक्तिवाले ब्रह्मलोक जाते हैं और ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं (गीता—आठवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। वे (क्रममुक्तिवाले) लौटकर संसारमें नहीं आते तो यह उनके उद्देश्यकी महिमा है, ब्रह्मलोककी महिमा नहीं है। ब्रह्मलोक तो पुनरावर्ती ही हैं; क्योंकि वहाँ कोई भी सदा नहीं रह सकता, न भोगी सदा रहता है, न योगी (क्रममुक्तिवाला) सदा रहता है। ब्रह्मलोकतक सब कर्मफल है। जब कर्मात्रा आदि-अन्तवाला (नाशवान्) होता है तो फिर उसका फल अविनाशी कैसे हो सकता है?
'मामुपेत्य' में 'माम्' पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा—दोनोंका मालिक है। उसको प्राप्त होनेके बाद फिर दुःखालय संसारमें जन्म नहीं होता। हाँ, उनको प्राप्त हुए मनुष्य उनकी इच्छासे कारक महापुरुषके रूपमें अथवा भगवान्के अवतारके समय संसारमें आ सकते हैं। परन्तु उनका वह जन्म कर्मिके अधीन नहीं होता, प्रत्युत भगवान्की इच्छासे होता है।
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले भी पीछे लौटकर आते हैं—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्ष्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
| यत् | = जो मनुष्य | पर्यन्तम् | = एक हजार | (और) |
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| ब्रह्मणः | = ब्रह्माके | चतुर्भुगीवाले | युग- | |
| सहस्रयुग- | अहः | = एक दिनको | सहस्रान्ताम् = एक हजार |