श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ८ ]
अन्तःकरणवाले हैं अर्थात् जो संसारसे सर्वथा हटकर अनन्यभावसे केवल आपमें ही लगे हुए हैं, उनके द्वारा
अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं? अर्थात् वे आपके किस रूपको जानते हैं और किस प्रकारसे जानते हैं?
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुनके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| परमम् | = परम | (जीव-) को | करः | = प्राणियोंकी सत्ता- |
|---|---|---|---|---|
| अक्षरम् | = अक्षर | अध्यात्मम् | = अध्यात्म | को प्रकट करनेवाला |
| ब्रह्म | = ब्रह्म है (और) | उच्यते | = कहते हैं। | विसर्गः |
| स्वभावः | = परा प्रकृति- | भूतभावोद्भव- | कर्मसञ्जितः |
व्याख्या—‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’— परम अक्षरका नाम ब्रह्म है। यद्यपि गीतामें ‘ब्रह्म’ शब्द प्रणव, वेद, प्रकृति आदिका वाचक भी आया है, तथापि यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्दके साथ ‘परम’ और ‘अक्षर’ विशेषण देनेसे यह शब्द सर्वोपरि, सच्चिदानन्दधन, अविनाशी, निर्गुण-निराकार परमात्माका वाचक है।
‘स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते’— ऐसे तो आत्माको लेकर जो वर्णन किया जाता है, वह भी अध्यात्म है; अध्यात्म-मार्गका जिसमें वर्णन हो, वह मार्ग भी अध्यात्म है और इस आत्माकी जो विद्या है, उसका नाम भी अध्यात्म है (गीता—दसवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ ‘स्वभाव’ विशेषणके साथ ‘अध्यात्म’ शब्द आत्माका अर्थात् जीवके होनेपनका (स्वरूपका) वाचक है।
‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः’— स्थावर-जंगम जितने भी प्राणी देखनेमें आते हैं, उनका जो भाव अर्थात् होनापन है, उस होनेपनको प्रकट करनेके लिये जो विसर्ग अर्थात् त्याग है, उसको ‘कर्म’ कहते हैं।
महाप्रलयके समय प्रकृतिकी अक्रिय-अवस्था मानी जाती है तथा महासर्गके समय प्रकृतिकी सक्रिय-अवस्था मानी जाती है। इस सक्रिय-अवस्थाका कारण भगवान्का संकल्प है कि ‘मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ।’ इसी संकल्पसे सृष्टिकी रचना होती है। तात्पर्य है कि महाप्रलयके समय अहंकार और संचित कर्मोंके सहित प्राणी प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं और उन प्राणियोंके सहित प्रकृति एक तरहसे परमात्मामें लीन हो जाती है। उस लीन हुई प्रकृतिको विशेष क्रियाशील करनेके लिये
भगवान्का पूर्वोक्त संकल्प ही विसर्ग अर्थात् त्याग है। भगवान्का यह संकल्प ही कर्मोंका आरम्भ है, जिससे प्राणियोंकी कर्म-परम्परा चल पड़ती है। कारण कि महाप्रलयमें प्राणियोंके कर्म नहीं बनते, प्रत्युत उसमें प्राणियोंकी सुषुप्त-अवस्था रहती है। महासर्गके आदिसे कर्म शुरू हो जाते हैं।
चौदहवें अध्यायमें आया है—परमात्माकी मूल प्रकृतिका नाम ‘महद्ब्रह्म’ है। उस प्रकृतिमें लीन हुए जीवोंका प्रकृतिके साथ विशेष सम्बन्ध करा देना अर्थात् जीवोंका अपने-अपने कर्मोंके फलस्वरूप शरीरोंके साथ सम्बन्ध करा देना ही परमात्माके द्वारा प्रकृतिमें गर्भ-स्थापन करना है (गीता—चौदहवें अध्यायका तीसरा-चौथा श्लोक)। उसमें भी अलग-अलग योनियोंमें तरह-तरहके जितने शरीर पैदा होते हैं, उन शरीरोंकी उत्पत्तिमें प्रकृति हेतु है और उनमें जीवरूपसे भगवान्का अंश है—‘ममैवांशो जीवलोकै’ (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। इस प्रकार प्रकृति और पुरुषके अंशसे सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं।
तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि स्थावर-जंगम जितने भी प्राणी उत्पन्न होते हैं, वे सब क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ-(पुरुष-) के संयोगसे ही होते हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विशेष संयोग अर्थात् स्थूलशरीर धारण करानेके लिये भगवान्का संकल्प-रूप विशेष सम्बन्ध ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके स्थूलशरीर पैदा करनेका कारण है। उस संकल्पके होनेमें भगवान्का कोई अभिमान नहीं है, प्रत्युत जीवोंके जन्म-जन्मान्तरोंके जो कर्म-संस्कार हैं, वे