भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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होता है और दूसरी सत्ताकी मान्यता मिटनेसे निवृत्तिकी दृढ़ता होती है। प्रवृत्तिका उदय होना 'भोग' है और निवृत्तिकी दृढ़ता होना 'योग' है। गीता 'सब कुछ परमात्मा है'—ऐसा मानती है और इसीको महत्त्व देती है। संसारमें कार्यरूपसे, कारणरूपसे, प्रभावरूपसे, सब रूपोंसे मैं-ही-मैं हूँ—यह बतानेके लिये ही भगवान्ने गीतामें चार जगह (सातवें, नवें, दसवें और पन्द्रहवें अध्यायमें) अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव), अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ), अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांच भौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातु देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर््यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—ये सब-के-सब 'वासुदेव: सर्वम्' के अन्तर्गत आ जाते हैं (सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि सत्, असत् और उससे परे जो कुछ भी है, वह सब परमात्मा ही हैं—'त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्' (गीता ११।३७)। संसार अपने रागके कारण ही दीखता है। रागके कारण ही दूसरी सत्ता दीखती है। राग न हो तो एक परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है। जैसे, भगवान्ने कहा है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' (गीता १५।१५) 'मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ'। जिस हृदयमें भगवान् रहते हैं, उसी हृदयमें राग-द्वेष, हलचल, अशान्ति होते हैं। हृदयमें ही सुख होता है और हृदयमें ही दुःख आता है। समुद्र-मन्थनमें वहीसे विष निकला, वहीसे अमृत निकला। भगवान् शंकरने विष पी लिया तो अमृत निकल आया। इसी तरह राग-द्वेषको मिटा दें तो परमात्मा निकल आयेंगे। सन्त-महात्माओंके हृदयमें राग-द्वेष नहीं रहते; अतः वहाँ परमात्मा रहते हैं।

सब कुछ परमात्मा ही हैं—यह खुले नेत्रोंका ध्यान है। इसमें न आँख बन्द करने (ध्यान)—की जरूरत है, न कान बन्द करने (नादानुसन्धान)—की जरूरत है, न नाक बन्द करने (प्राणायाम)—की जरूरत है ! इसमें न संयोगका असर पड़ता है, न वियोगका; न किसीके आनेका असर पड़ता है, न किसीके जानेका। जब सब कुछ परमात्मा ही है तो फिर दूसरा कहाँसे आये ? कैसे आये ?

गीता समग्रको मानती है, इसीलिये गीताका आरम्भ और अन्त शरणागतिमें हुआ है। शरणागतिसे ही समग्रकी प्राप्ति होती है। परमात्माके समग्र-रूपमें सब रूप होते हुए भी सगुणकी मुख्यता है। कारण कि सगुणके अन्तर्गत तो निर्गुण भी आ जाता है, पर निर्गुणमें (गुणोंका निषेध होनेसे) सगुण नहीं आता। अतः सगुण ही समग्र हो सकता है।

भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं—'असंशयं समग्रं माम्' (गीता ७।१)। गीता समग्रकी वाणी है, इसलिये गीतामें सब कुछ है। जो जिस दृष्टिसे गीताको देखता है, गीता उसको वैसी ही दीखने लगती है—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४।११)।

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन ही योग हैं। शरीर (अपरा)—को लेकर कर्मयोग है, शरीरी (परा)—को लेकर ज्ञानयोग है और शरीर-शरीरी दोनोंके मालिक (भगवान्)—को लेकर भक्तियोग है। भगवान्ने गीताके आरम्भमें पहले शरीरीको लेकर और फिर शरीरीको लेकर क्रमशः ज्ञानयोग और कर्मयोगका वर्णन किया। फिर ध्यानयोगका वर्णन किया; क्योंकि वह भी कल्याण करनेका एक साधन है। फिर सातवें अध्यायसे भक्तिका विशेषतासे वर्णन किया, जो भगवान्का खास ध्येय है। मनुष्य कर्मयोगसे जगत्के लिये, ज्ञानयोगसे अपने लिये और भक्तियोगसे भगवान्के लिये उपयोगी हो जाता है।

गीतामें समताको 'योग' कहा गया है—'समत्वं योग उच्यते' (गीता २।४८)। वास्तवमें 'योग' की आवश्यकता कर्ममें ही है, ज्ञानमें भी योगकी आवश्यकता नहीं है और भक्तिमें तो योगकी बिलकुल आवश्यकता नहीं है। ज्ञान और भक्ति वास्तवमें 'योग' ही हैं। कर्म जड़ हैं, बाँधनेवाले हैं और विषय हैं, इसलिये उनमें योगकी आवश्यकता है—'योगस्यः कुरु कर्माणि' (गीता २।४८)। कर्मोंमें योग ही मुख्य है—'योगः कर्मसु कौशलम्' (गीता २।५०)। योगके सिवाय कर्म कुछ नहीं है—'दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्ब्रह्मज्यय' (गीता २।४९)। कर्तृत्व भी कर्म करनेसे ही आता है। इसलिये गीतामें 'योग' शब्द विशेषकर 'कर्मयोग' का ही वाचक आता है। गीताकी पुष्पिकामें भी 'योगशास्त्रे' पदका अर्थ कर्मयोगकी शिक्षा है।

कर्मयोगमें दो विभाग हैं—कर्मविभाग और योगविभाग। कर्मविभाग पूर्वार्ध है और योगविभाग उत्तरार्ध है। कर्म करणसापेक्ष है और योग करणनिरपेक्ष है। कर्मविभागमें कर्तव्यपरायणता है और योगविभागमें स्वाधीनता, निर्विकारता, असंगता, समता है। संसारमें हमारा जो कर्तव्य होता है, वह दूसरेका अधिकार होता है। इसलिये व्यक्ति का जो कर्तव्य है, वह परिवारका, समाजका और संसारका अधिकार है। जैसे, वक्ताका जो कर्तव्य है, वह श्रोताका अधिकार है और श्रोताका जो कर्तव्य है, वह वक्ताका अधिकार है। वक्ता बोलकर श्रोताके अधिकारकी रक्षा करता है और श्रोता सुनकर वक्ताके अधिकारकी रक्षा करता है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेसे मनुष्य ऋणमुक्त हो जाता है और उसको