श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ च ]
‘योग’ की प्राप्ति हो जाती है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेका तात्पर्य है—शरीर, वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यको अपनी न समझकर, प्रत्युत दूसरोंकी ही समझकर दूसरोंकी सेवामें अर्पित कर देना।
संसारमें वस्तु और व्यक्तिके साथ हमारा संयोग होता है। जहाँ संयोग होता है, वहाँ कर्तव्यका पालन करनेकी आवश्यकता होती है। वस्तुका संयोग होनेपर उस वस्तुमें ममता न करके उसका सदुपयोग करना, उसको दूसरोंकी सेवामें लगाना हमारा कर्तव्य है। व्यक्तिका संयोग होनेपर उस व्यक्तिमें ममता न करके उसकी सेवा करना, उसको सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। कामना और ममतासे रहित होकर कर्तव्यका पालन करनेसे शरीर—संसारके संयोगका वियोग हो जाता है और योगकी प्राप्ति हो जाती है—‘तं विद्याद्वुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्’ (गीता ६।२३)। संयोगका तो वियोग होता है, पर योगका कभी वियोग नहीं होता। योगकी प्राप्ति होनेपर मनुष्य राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और उसको स्वाधीनता, निर्विकारता, असंगता, समताकी प्राप्ति हो जाती है।
प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरूँ नहीं; मैं सब कुछ जान जाऊँ, कभी अज्ञानी न रहूँ; मैं सदा सुखी रहूँ, कभी दुःखी न रहूँ। परन्तु मनुष्यकी यह चाहना अपने बलसे अथवा संसारसे कभी पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य जो चाहता है, वह संसारके पास है ही नहीं। वास्तवमें मनुष्यको जो चाहिये, वह उसको पहलेसे ही प्राप्त है। उससे गलती यह होती है कि वह उन वस्तुओंको चाहने लगता है, जिनका संयोग और वियोग होता है, जो मिलने और अरि बिछुड़नेवाली हैं। यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु कभी भी हमारेसे अलग होती है, वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी (वर्तमानमें) भी हमारेसे अलग है। जैसे, शरीर कभी भी हमारेसे अलग होगा तो वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी भी हमारेसे अलग है। इसी तरह जो वस्तु (परमात्मा) कभी भी हमारेसे अलग नहीं होती, वह सदा ही मिली हुई है और अभी भी हमारेको मिली हुई है। तात्पर्य यह निकला कि वास्तवमें संसारका सदा ही वियोग है और परमात्माका सदा ही योग है।
कोई आचार्य पहले कर्मयोग, फिर ज्ञानयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम मानते हैं और कोई आचार्य पहले कर्मयोग, फिर भक्तियोग, फिर ज्ञानयोग—यह क्रम मानते हैं। परन्तु गीता पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम मानती है। गीता कर्मयोगको ज्ञानयोगकी अपेक्षा विशेष मानती है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासात्मकर्मयोगो विशिष्यते’ (५।२)। कारण कि ज्ञानयोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है—‘कर्मणैव हि संसिद्धिमारिथ्यता जनकादयः’ (३।२०), ‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४।२३), पर कर्मयोगके बिना ज्ञानयोग होना कठिन है—‘सन्त्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः’ (५।६)। श्रीमद्भागवतमें भी पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम कहा गया है*। एक विलक्षण बात और है कि गीता कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको समकक्ष और लौकिक बताती है—‘लोकैऽस्मिन्द्रविधा निष्ठाः’ (३।३)। क्षर (जगत्) और अक्षर (जीव)—दोनों लौकिक हैं—‘द्वविभौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६), पर भगवान् अलौकिक हैं—‘उत्तमः पुरुषस्तन्यः’ (१५।१७)। क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; अतः कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक हैं। परन्तु भक्तियोग भगवान्को लेकर चलता है; अतः भक्तियोग अलौकिक है।
गीताने भक्तिको सर्वश्रेष्ठ बताया है (छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। गीताकी भक्ति भेदवाली नहीं है, प्रत्युत अद्वैत भक्ति है। वास्तवमें देखा जाय तो ज्ञानमें द्वैत है और भक्तिमें अद्वैत है। कारण कि ज्ञानमें तो जड़-चेतन, जगत्-जीव, शरीर-शरीरी, असत्-सत्, प्रकृति-पुरुष आदि दो-दो हैं, पर भक्तिमें केवल भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।१९)। भगवान्ने ज्ञानके साधनोंमें भी भक्ति बताया है—‘मयि चानन्ययोगेन०’ (१३।१०) और गुणातीत होनेका उपाय भी भक्ति बताया है—‘मां च योऽव्यभिचारेण०’ (१४।२६)। ज्ञानकी परानिष्ठासे भी पराभक्तिकी प्राप्ति होती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (१८।५५)। इस पराभक्तिसे जानना, देखना और प्रवेश करना—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। भगवान् अपने भक्तको कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंकी प्राप्ति करा देते हैं (दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। भगवान्ने अपने भक्तको सबसे उत्तम योगी बताया है—‘स मे युक्तमतो मतः’ (६।४७), ‘ते मे युक्ततमा मताः’ (१२।२), ‘स योगी परमो मतः’ (६।३२)। ध्यानयोगमें भी भक्ति आयी है—‘युक्त आसीत मत्परः’ (६।१४)। कर्मयोगमें भी भगवान्ने भक्ति बताया है—‘युक्त आसीत मत्परः’ (२।६१)। भगवान्ने सभी योगोंमें अपनी भक्ति (परायणता) बताया है, यह भक्तिकी विशेषता है।
- योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।६)