श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 619, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें६१८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८
परिशिष्ट भाव—निष्कामभाव प्रकाश है और सकामभाव अँधेरा है।
उपनिषदोंमें कृष्णमार्गके क्रमका अलग-अलग प्रकारसे वर्णन आता है; जैसे—
छान्दोग्योपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,
आकाश, चन्द्रमा (सोम) और फिर पुनरागमनको प्राप्त होना (५।१०।३-४)।
बृहदारण्यकोपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,
चन्द्रमा और फिर पुनरागमनकी प्राप्ति (६।२।१६)।
कृष्णमार्गको उपनिषदोंमें पितृयान, धूममार्ग और दक्षिणमार्ग नामसे भी कहा गया है।
सम्बन्ध—तेईसवें श्लोकसे शुक्ल और कृष्ण-गतिका जो प्रकरण आरम्भ किया था, उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार
करते हैं।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
हि = क्योंकि जगतः = जगत्-(प्राणिमात्र-) अनावृत्तिम्, याति=जानेवालेको लौटना
शुक्लकृष्णे = शुक्ल और कृष्ण- के साथ नहीं पड़ता (और)
एते = ये दोनों (सम्बन्ध रखनेवाली) अनया = दूसरी गतिमें
गती = गतियाँ मते = मानी गयी हैं। जानेवालेको
शाश्वते = अनादिकालसे एकया = (इनमेंसे) एक गतिमें पुनः, आवर्तते = पुनः लौटना पड़ता है।
व्याख्या—'शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते देना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मप्राप्तिके लिये
मते'—शुक्ल और कृष्ण-इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध किसी भी लोकमें, योनिमें कोई बाधा नहीं है। इसका
जगत्के सभी चर-अचर प्राणियोंके साथ है। तात्पर्य है कि कारण यह है कि परमात्माके साथ किसी भी प्राणीका
ऊर्ध्वगतिके साथ मनुष्यका तो साक्षात् सम्बन्ध है और कभी सम्बन्ध-विच्छेद होता ही नहीं। अतः न जाने कब
चर-अचर प्राणियोंकी परम्परासे सम्बन्ध है। कारण कि और किस योनिमें वह परमात्माकी तरफ चल दे-इस
चर-अचर प्राणी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे कभी-न- दृष्टिसे साधकको किसी भी प्राणीको घृणाकी दृष्टिसे
कभी मनुष्य-जन्ममें आते ही हैं और मनुष्यजन्ममें किये देखनेका अधिकार नहीं है।
हुए कर्मोंके अनुसार ही ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने 'योग'को
होती है। अब वे ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करें अथवा न करें, अव्यय कहा है। जैसे योग अव्यय है, ऐसे ही ये शुक्ल
पर उन सबका सम्बन्ध ऊर्ध्वगति अर्थात् शुक्ल और और कृष्ण-दोनों गतियाँ भी अव्यय, शाश्वत हैं अर्थात् ये
कृष्ण-गतिके साथ है ही। दोनों गतियाँ निरन्तर रहनेवाली हैं, अनादिकालसे हैं और
जबतक मनुष्योंके भीतर असत् (विनाशी) वस्तुओंका जगतके लिये अनन्तकालतक चलती रहेंगी।
आदर है, कामना है, तबतक वे कितनी ही ऊँची भोग- 'एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः'—एक
भूमियोंमें क्यों न चले जायँ, पर असत् वस्तुका महत्त्व मार्गसे अर्थात् शुक्लमार्गसे गये हुए साधनपरायण साधक
रहनेसे उनकी कभी भी अधोगति हो सकती है। इसी तरह अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् ब्रह्मलोकमें जाकर
परमात्माके अंश होनेसे उनकी कभी भी ऊर्ध्वगति हो ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, बार-बार जन्म-मरणके
सकती है। इसलिये साधकको हरदम सजग रहना चाहिये चक्करमें नहीं आते; और दूसरे मार्गसे अर्थात् कृष्णमार्गसे
और अपने अन्तःकरणमें विनाशी वस्तुओंको महत्त्व नहीं गये हुए मनुष्य बार-बार जन्म-मरणके चक्करमें आते हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् दोनों मार्गोंको जाननेका माहात्म्य बतानेके लिये आगेके श्लोक कहते हैं।